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मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद

Posted By: kaashindia on February 1, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का देकर आगे बढने की कोशिश की और टिकट ले आया। धक्का देने मे एक बुढ़िया गिर गई, उसने उठाया भी नहीं और मेरी आपत्ति पर उसने कहा कि लोकतंत्र में तो कमजोर ही धक्का खाता है और खड़ा रह जाता है। जबकि धक्का देने वाला हमेशा आगे बढता रहता है। मैं वर्षो तक विचार करता रहा, सोचता रहा कि धक्का खाकर खडे़ रह जाना उचित है या धक्का देकर आगे जाना। वर्षो बाद मैंने अपने झारखंड के एक मित्र से दुविधा बताई तो उसने कहा कि दोनो ही मार्ग गलत है। मैं तो धक्का देने वाले को पटक दूंगा और जरूरत पडी तो गोली भी मार दूंगा। मेरा वही मित्र बाद में नक्सलवादियों का नेता बना। उसने हमारे शहर के आस पास कुछ लोगो को गोलियां भी मारी और खुद भी मारा गया। आज भी हमारे पूरे क्षेत्र में वही तीनों स्थितियां विद्यमान है जैसी पहले थी। यदि ठीक से सर्वे किया जाये तो देष की सम्पूर्ण आबादी में तीनो ही प्रकार के लोग मिलते है। तीनो के अपने-अपने तर्क हैं और तर्क भी आकाट्य है । उन्हीं तीनों में कुछ लोगों को शरीफ कहते है तो कुछ लोगों को चालाक और कुछ को उग्रवादी।
आम तौर पर ऐसे उग्रवादी संगठित हो जाया करते है। भारत मे ऐसे तीन संगठन हैं जो उग्रवादी विचारों के आधार पर कार्य करते रहते है । उग्रवादियों में से ही कुछ लेाग अतिवादी हो जाते है जो आतंकवादी कहे जाते है। संघ विचारो से ओत प्रोत आतंकवादी अभिनव भारत के नाम से आगे बढे तो इस्लाम की विचार धारा से प्रेरित आतंकवादी प्रत्यक्ष दुनियां भर मे दिख रहे है और साम्यवादी विचार धारा से प्रेरित आतंकवादियों को नक्सलवादी कहा जाता है। सभी उग्रवादी संगठन प्रारंभ में आतंकवादियों का अप्रत्यक्ष समर्थन करते है। दूसरी ओर जब आतंकवादी मजबूत होते है तो सबसे पहले उसी संगठन को निशाना बनाते है जिसके सहारे वे आगे बढे है। नक्सलवादियों ने भी बंगाल में साम्यवादियों को निषाना बनाने में कोई कसर नहीं छोडी थी। यहां तक कि उन्होंने ममता बनर्जी तक का साथ दिया था। मुझे देश भर के नक्सलवादियों से तो प्रत्यक्ष जानकारी नहीं है किन्तु मेरा अनुभव बताता है कि छत्तीसगढ में नक्सलवाद के प्रोत्साहन में दिग्विजय सिंह जी का अप्रत्यक्ष प्रयास रहा है। बाद में जब गृहमंत्री चितम्बरम ने ईमानदारी से नक्सलवाद को समाप्त करने की योजना बनाई तब भी दिग्विजय सिंह जी ने ही राहुल गांधी की शराफत का लाभ उठाकर नक्सलवादियों को बचाने की भूमिका अदा की थी। गांधी वादी भी ऐसे ही सीधे साधे होते है और वे भी ऐसे नक्सलवादियो को बचाने में हमेशा ढाल का काम करते है। उग्रवाद और आतंकवाद से निपटने के तरीके अलग-अलग होते है। उग्रवाद से कानून निपट सकता है किन्तु आतंकवाद से कानून की जगह राज्य को निपटना पड़ता है। नक्सलवाद की सुरक्षा में अनेक लोग या संगठन कानून का सहारा लेकर राज्य का विरोध करते देखे जाते है। वामपंथी और जे एन यू संस्कृति से प्रभावित न्यायपालिका के लोग भी यही भूल करते रहे है। अनेक बडे-बडे लेखक और साहित्यकार भी ऐसा करते देखे गये है। ऐसे लोग नक्सलवाद के लिये एक सुरक्षा कवच का काम करते है और साथ में यह भी कहकर अपनी पीठ थपथपाते है कि उन्होंने कानून और मानवाधिकार की रक्षा की है जबकि नक्सलवादियों द्वारा किये जा रहे अपराधो या अमानवीय कार्यो की रोकथाम के समय ऐसे न्यायाधीशो या अन्य लोगो की कोई भूमिका नहीं होती।
नक्सलवादियों से मेरी चर्चा रही है। वे सभी समस्याओं का कारण राजनैतिक, सामाजिक ,आर्थिक व्यवस्था को तथा समाधान अपनी सरकार को बताते रहे है। उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था का कोई स्वरुप नहीं था। उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था कि यदि उनकी सरकार गलत करेगी तो उसे हटाने का समाज के पास क्या तरीका होगा। हमारी संविधान मंथन सभा मे भी ऐसे कुछ लोग आते रहे है किन्तु उनके पास कोई ऐसा प्रारूप नहीं था कि वे कैसा संविधान प्रस्तुत करेंगे । उनका ये ही उत्तर था कि जब समय आयेगा तब देखा जायेगा। जब सरगुजा जिले में नक्सलवाद आया और हमलोगों ने उन्हें सलाह दी कि वे गोली बंदूक छोडकर ग्राम सभाओ को स्वतंत्रता पूर्वक अपना कार्य करने दे तो उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इस तरह यह स्पष्ट हो गया कि नक्सलवाद किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन नहीं है। बल्कि पूरी तरह सत्ता संघर्ष है। हमलोगो ने उनसे दूरी बना ली और सरकार का साथ दिया। परिणाम हुआ कि नक्सलवाद हमारे जिले से शून्य हो गया। पूरे भारत में हमारा जिला अकेला ऐसा है जहां नक्सलवाद बहुत तेजी से आया, छाया भी और उसी तेजी से हार थक कर समाप्त भी हो गया। दूसरी ओर हम छत्तीसगढ के उस दक्षिणी छोर को भी देख रहे है जहां नक्सलवादियों ने एक छोटे भूभाग पर अपनी स्वतंत्र सरकार बना रखी है और भारत सरकार निरंतर उसे मुक्त कराने का प्रयास कर रही है। देष भर में यह प्रचारित किया जाता है कि नक्सलवादियों को स्थानीय लोगो का जन समर्थन प्राप्त है। यह बात पूरी तरह गलत है। हमारे जिले में भी जब नक्सलवादी उस स्थिति में थे तो उनसे भयभीत लोग उनका समर्थन करते थे और आज जब सरकार का शासन है तो उनकी प्रशंसा करने वाला एक भी व्यक्ति पुरे जिले में नहीं मिलेगा। नक्सलवादियों के हितैषी इस तरह का दुष्प्रचार करते ही रहते है।
नक्सलवाद साम्यवाद का अतिवादी स्वरुप है। इसका अर्थ है कि साम्यवाद के सारे दुर्गुण नक्सलवाद में भी मौजूद रहते है। गुण तो कोई न साम्यवाद में दिखता है न ही नक्सलवाद में । वर्ग विद्वेश को आधार बनाकर असंतोष का विस्तार इन सबका एक मात्र मार्ग होता है। धीरे धीरे ये लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में भी असंतुष्ट हो जाते है। जो लोग भय या स्वार्थ के कारण नक्सलवादी नहीं होते। ऐसे लोग अपने बाद के जीवन में असंतोष को महसूस करते है। नक्सलवाद के जन्म दाता कानू सान्याल वृद्धावस्था में आत्महत्या करके मरे । क्योंकि वे नक्सलवाद के सत्ता संघर्ष के मार्ग के विरूद्ध थे । दो चार दिन पहले ही प्रसिद्ध कवि गदर के भी हृदय परिवर्तन की खबरे आ रही है।
यदि हम नक्सलवाद के भविष्य की बात करे तो पिछली सरकारो के समय पूरे प्रशासन में बडी संख्या में लोग नक्सलवादियों की ढ़ाल के रूप में काम करते थे। मानवाधिकार संगठन या अन्य कई प्रकार के लोग भिन्न-भिन्न बोर्ड लगाकर भिन्न-भिन्न तरीको से नक्सलवाद का समर्थन करते दिखते रहते थे। अब वातावरण बदल गया है। जे एन यू उस विचार धारा का प्रमुख केन्द्र था। वह स्वयं अपने अस्तित्व की लडाई लड रहा है। साम्यवाद भी देश भर में समाप्ति की ओर है । न्यायपालिका की भी सोच में बदलाव आ रहा है। साहित्य और पत्रकारिता के लोग भी पुरस्कार वापसी के असफल प्रयास के बाद चुप हैं। अग्निवेश जी भी स्थितिया भाप रहे है। दिग्विजय सिंह जी का प्रभाव अपने आप घट रहा है। ब्रहमदेव शर्मा तो चले गये और सर्वोदय भी अब दो गुटों में बंटकर कमजोर हो गया है। राज्य सभा में धीरे-धीरे वर्तमान सरकार मजबूत होती जा रही है और ऐसा लगता है कि नक्सलवाद का सम्पूर्ण समापन बहुत दूर नहीं है। अर्थात एक दो वर्षो की ही बात है। यदि कल्लूरी बस्तर में रह गये होते तो यह काम बहुत जल्दी निपट गया होता किन्तु उनके जाने के बाद भी कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं आएगा। क्योकि अब सरकार में आतंकवाद और नक्सलवाद का अप्रत्यक्ष समर्थन करने वाले कोई नहीं है। एक बार बस्तर मुक्त होते ही पूरे देश में नक्सलवाद की कमर टूट जायेगी । और इस तरह मैं आशवस्त हॅू कि नक्सलवाद देश के लोगो के लिये कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं है। देश कीे वर्तमान सरकार उसे समाप्त कर ही लेगी। नक्सलवाद का जीवित रहना कश्मीर समस्या के अपेक्षा भी अधिक बडा कलंक था। किन्तु अब उस कलंक से हमें मुक्ति मिल जायेगी। ऐसा निश्चित दिखता है।

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