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मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?

Posted By: kaashindia on February 2, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »


किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य। हम इन सबकी समीक्षा करने में तीन व्यक्तियों के बीच तुलना करेंगे-(1) गांधी (2) नेहरु (3) अम्बेडकर। ये तीनों समकक्ष थे समान कार्य में लगे हुये थे तथा समकालीन थे। मैंने जो समीक्षा की है उसके अनुसार गांधी को मैंने नायक के रुप में देखा है और अम्बेडकर को खलनायक के रुप में। नेहरु,पटेल तथा अन्य को औसत दर्जे का माना जा सकता है।
किसी भी व्यक्ति में योग्यता तीन प्रकार से आती है- (1) जन्म पूर्व के संस्कार (2) पारिवारिक वातावरण (3) सामाजिक परिवेश । मेरे आकलन के अनुसार भीमराव अम्बेडकर मे एक कुटिल राजपुरुष के सारे दुर्गुण मौजुद थे। वे विलक्षण प्रतिभावान थे। सत्ता के प्रति प्रांरभ से अंत तक तिकडम करते रहे। वे पूरी तरह भावना विहीन थे और उनके अन्दर बौद्धिक चातुर्य चरम सीमा तक था। वे बालिग होने से लेकर मृत्यु तक धर्म,राष्ट्र या समाज से भी उपर अपने राजनैतिक स्वार्थ पूर्ति को मानते रहे। यह गुण उन्हें कहा से प्राप्त हुआ यह पता नहीं। क्योंकि प्रत्यक्ष रुप से तो उनके माता पिता विलक्षण प्रतिभा के नहीं थे, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी अछूत गरीब परिवार का ही था। पूर्व जन्म वे मानते ही नहीं थे इसलिये उसका प्रश्न ही नहीं उठता।
उनके जीवन का अधिक समय स्वतंत्रता संघर्ष काल का है। स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी भूमिका शून्यवत रही। या तो उन्होने अंग्रेज सत्ता से तालमेल का प्रयास किया या कांग्रेस में रहकर स्वतंत्रता संघर्ष में अपनी गुटबंदी के माध्यम से व्यवधान पैदा किया। पूरे जीवन भर वे गांधी, नेहरु पटेल के साथ रहते हुये भी हर बात में टकराते रहे। गांधी की लोकप्रियता के समक्ष अपने को बौना देखकर वे उनके समक्ष झुक जाते थे। नेहरु पटेल को तो वे अपना प्रतिद्धंदी मानते ही थे। अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रभावित होकर सबसे पहले उन्होने इस्लाम,अछूत, और शूद्र को एक जूट करके नेतृत्व का प्रयास किया। बताया जाता है कि इसके लिए उन्होने स्वयं इस्लाम ग्रहण करके मुसलमान बनने की कोशिश की। बात बढी तो गांधी जी ने अनशन करने की धमकी देकर उन्हें मुसलमान बनने से रोका। निराश होकर और जिन्ना द्वारा मुस्लिम नेतृत्व संभाल लेने के बाद अम्बेडकर जी ने अछूत, हरिजन और महिलाओं को मिलाकर एकजुट करने का प्रयास किया। उन्होने अंत तक यह दिखाने की कोशिश की कि उनके मन में सवर्णो के प्रति प्रतिशोध का भाव है, घृणा का नहीं। किन्तु ऐसा भी संदेह होता है कि यह सब उनकी सोची समझी योजना थी क्योंकि उन्हें पूरी शिक्षा जिस ब्राहम्ण ने दी थी, उनका अम्बेडकर जी पर इतना अधिक स्नेह और प्रभाव था कि अम्बेडकर जी ने अपने गुरु का नाम ही अपने साथ जोडकर अम्बेडकर कर लिया। उनका सारा लालन पालन शिक्ष दीक्षा तत्कालीन महाराजा की सहायता से पूरी हुई। उन्होने अपना दूसरा विवाह भी एक ब्राहमणी से ही करने को प्राथमिकता दी। उनके मन में महिलाओं के प्रति कैसी धारणा थी यह भी उनका अपनी पत्नी के प्रति व्यवहार से स्पष्ट होता है कि उनकी पत्नी मृत्यु के पूर्व तीर्थ यात्रा करना चाहती थी और अम्बेडकर जी ने पुरुष प्रधानता के बल पर उसे नहीं जाने दिया।
अम्बेडकर जी ने स्वतंत्रता के पूर्व और पश्चात् जो भी नीतियां बनाई वे सारी समाज में वर्ग विद्वेश  और वर्ग संघर्ष पैदा करने वाली थी। उनका एकमात्र लक्ष्य था भारत की परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करना। वे श्रमजीवी और बुद्धिजीवी के बीच इस सीमा तक बुद्धिजीवियों के पक्ष में थे कि उन्होने अंतिम समय तक श्रमजीवियों के विरुद्ध और बुद्धिजीवियों के पक्ष में नीतियां बनाईं। स्पष्ट है कि स्वतंत्रता के पूर्व की सामाजिक व्यवस्था में श्रमजीवियों को सामाजिक आरक्षण के माध्यम से योग्यतानुसार स्थान पाने का अधिकार नही था। गांधी इस जातिवाद को कमजोर करना चाहते थे और अम्बडेकर इस जातिवाद की बुराई का भरपूर लाभ उठाना चाहते थे। उन्हे यह पता था कि गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों पर वामपंथियों का विशेष प्रभाव है इसलिए बुद्धिजीवियों को एकजुट करके अपने साथ जोडना सत्ता का मूल मंत्र है। उन्होने गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों की चिंता छोडकर बुद्धिजीवी अवर्णो का सवर्णो के साथ आरक्षण के नाम पर एक ऐसा समझौता करा दिया जिस आधार पर बुद्धिजीवी सवर्णो के लूट के माल में बुद्धिजीवी अवर्णो की भी हिस्सेदारी हो गई और आज तक श्रमजीवी आज भी उस षडयंत्र का शिकार है। आज भी बुद्धि और श्रम के बीच खाई लगातार बढती जा रही है। आज भी 98 प्रतिशत अवर्ण श्रमजीवी अपने उसी हाल पर श्रम करने को मजबूर हैं और दो प्रतिषत अवर्ण बुद्धिजीवी इन सबका शोषण करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त कर चुके हैं। यह अम्बेडकर जी की ही सूझबूझ थी कि उन्होने संविधान बनाते समय ऐसे प्रावधान घुसा दिये जिसके आधार पर लोक गुलाम सरीखा हो गया और तंत्र सर्वाधिकार प्राप्त मालिक के समान। यहा तक कि लोकतंत्र में संविधान सबसे उपर होता है किन्तु अम्बेडकर जी की कृपा से ही संविधान संषोधन के असीम अधिकार भी तंत्र के पास ही सुरक्षित कर दिये गये।
अम्बेडकर जी ने जो महत्वपूर्ण कार्य किये उनमें भारतीय संविधान और हिन्दू कोड बिल की ज्यादा दुहाई दी जाती है। 70 वर्षो में यह सिद्ध हो चुका है कि भारत में दिख रही सारी समस्याओं का मुख्य कारण वर्तमान रददी संविधान के प्रावधान ही है । गांधी को धोखा देने के लिये संविधान मे नीति निर्देशक सिद्धान्त का ढोग अम्बेडकर ने ही रचा। अम्बेडकर जी ने गांधी के मरते ही लोक तंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदल कर लोक नियुक्त तंत्र कर दी। भारत के संविधान में विदेशो की पूरी तरह नकल की गई और भारतीय परिवेश को जानबूझकर किनारे किया गया। भारतीय संविधान से परिवार और गांव को बाहर निकाल दिया गया। दूसरी ओर धर्म, जाति, अल्पसंख्यक,महिला जैसे समाज तोडक प्रावधानों को संविधान का महत्वपूर्ण भाग बना दिया गया। ऐसा समस्यायें पैदा करने वाला संविधान स्थापित होने के बाद भी अम्बेडकर संतुष्ट नहीं थे क्योंकि वे तो इससे भी अधिक घातक संविधान बनाना चाहते थे। उन्होने यह व्यक्त भी किया था कि वे इस संविधान से बिल्कुल संतुष्ट नहीं है । बाद में उन्होने हिन्दू कोड बिल बनाकर भारत की सामाजिक संरचना की छाती में एक और कील ठोक दी जिसके परिणाम से आज भी भारत कराह रहा है। उन्होंने मुसलमानों की आबादी बढती रहे ऐसा सोचकर हिन्दू कोड बिल में यह प्रावधान किया कि हिन्दू एक से अधिक विवाह नहीं कर सकते और मुसलमान कर सकते है। इस प्रावधान को उन्होने उन हिन्दू महिलाओं के प्रति न्याय बताया जिस हिन्दू धर्म से उनके मन में सदैव घृणा रही। किन्तु उन्होने कभी उन मुस्लिम महिलाओं की चिंता नहीं की जिसके प्रति उनके मन में प्रारंभ में ही प्रेम जगा था । उनके अन्दर नैतिकता का भाव कितना प्रबल था यह इस बात से स्पष्ट होता है कि ऐसा कहा जाता है कि हिन्दू कोड बिल के पक्ष में एक बडे वैदिक विद्वान को खडा करने के लिए उन्होने मंत्री रहते हुए घूस के पैसे भिजवाये और उसे पक्ष में किया। उनकी भाषा नीति की भी चर्चा होती है और हमारे कई मित्र उनके संस्कृत प्रेम की प्रशंसा करते है। मैं नहीं कह सकता कि उनका संस्कृत प्रेम हिन्दी के विरुद्ध कोई चाल थी या वास्तविक प्रेम किन्तु उनका अंग्रेजी प्रेम सर्वविदित है। उन्हाने संयुक्त परिवार प्रथा को सम्मिलित परिवार के रुप में बदलने के प्रयत्न किया । इसके पीछे उनका क्या भाव था यह मुझे नहीं पता किन्तु यदि उन्होने संयुक्त परिवार की जगह लोकतांत्रिक परिवार का प्रारुप दिया होता तो जिस तरह आज परिवार टूट रहे है वे नहीं टूटते। हो सकता है कि उनकी कल्पना परिवार को छिन्न भिन्न करने की रही हो। मुझे आश्चर्य र्होता है कि वे परिवार व्यवस्था को संविधान से बाहर रखे दूसरी ओर कानूनों में यह भी शामिल कर दिया कि पत्नी को छोडकर कोई अन्य व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में तब तक परिवार का सदस्य नहीं हो सकता जब तक वह रक्त संबंध से न जुडा हो।
आज हम देख रहे हैं कि भारत का हर सत्ता लोलुप नेता, हर बुद्धिजीवी, आरक्षण का लाभ ले चुके बुद्धिजीवी अवर्ण, अम्बेडकर जी को भगवान की तरह मानते हैं । इनके सामने कोई अम्बेडकर जी की जरा सी आलोचना कर दे तो ये सब आसमान सर पर उठा लेते हैं। यहा तक कि यदि कोई भारतीय संविधान में भी कोई खामी निकाल दे तो इनकी भावनाये भडक जाती है क्योंकि भारत में अम्बेडकर जी ही अकेले वो व्यक्ति है जिन्होने राजनेताओं को अनंतकाल के लिए यह अधिकार दिया कि वे समाज को गुलाम बनाकर रख सकें। अम्बेडकर जी ने ही बुद्धिजीवियों को यह अधिकार दिया कि वे जितनी मर्जी उतना श्रम का शोषण कर सकें। अम्बेडकर जी ने ही अल्पसंख्यकों को यह अधिकार दिया कि वे जितनी चाहे उतनी आबादी बढा सकें। यदि कोई हिन्दू एक से अधिक विवाह करना चाहता है तो उसे मुसलमान बन जाना चाहिये। यदि इतने अधिकार मिलने के बाद भी कोई अम्बेडकर जी को भगवान न माने तो यह कृतघ्नता ही कहा जायेगा। यहा तक कि जो थोडे से लोग अंदर अंदर अम्बेडकर जी की आलोचना भी करते है वे भी इसलिए नहीं करते कि उनके मन में गरीब ग्रामीण श्रमजीवी के प्रति कोई अच्छा भाव है बल्कि वे तो इसलिए आलोचना करते है कि अम्बेडकर जी ने सवर्णो के एकपक्षीय लाभ में से दो प्रतिशत अवर्ण बुद्धिजीवियों को हिस्सेदार बना दिया।
किसी को इस बात की चिंता नहीं कि समाज कब तक गुलाम रहेगा, कब तक भारतीय संविधान संसद के जेल खाने में बंद रहेगा? कब तक गरीब ग्रामीण श्रमजीवी अपने इसी हाल पर संतोष करते रहेंगे? इसलिये यह आवश्यक है कि अम्बेडकर जी की पोल खुलनी चाहिये। मैं मानता हॅू कि कुछ लोग सब कुछ जानते हुये भी इस रणनीति के अन्तर्गत अम्बेडकर जी की पूजा करते होंगे कि साम्यवादी और साम्प्रदायिक मुसलमान बुद्धिजीवी अवर्णो को भी अपने साथ जोडकर एक बडी ताकत न बन जाये। इतना होते हुये भी हमे सत्य को स्थापित करते ही रहना चाहिये। समय आ गया है कि किसी खलनायक को परिस्थितिवश नायक कहने की स्थिति से बचा जाये। अम्बेडकर जी ने जो गलत किये है उन सबको सुधारने का प्रयत्न किया जाये। परिवार गांव को संवैधानिक मान्यता दिलाई जाये। हमारे कलंक रुपी हिन्दू कोड बिल से मुक्ति पाई जाये। समान नागरिक संहिता स्थापित हो। अल्पसंख्यक बहुसंख्यक, का भेद खतम हो। महिला पुरुष सबको समान अधिकार प्राप्त हो और संविधान संशोधन में ग्राम सभाओं अथवा मतदाताओं की सीधी भूमिका हो। मैं समझता हॅू कि यदि हम इस दिशा में ठीक गति से आगे बढे तो अम्बेडकर जी का यथार्थ अपने आप समाज के समझ प्रकट हो जायेगा।
मंथन का अगला विषय ‘‘आर्थिक असमानता का कारण और समाधान’’ होगा।

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