Just another WordPress site

मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग

Posted By: kaashindia on February 3, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्ट्र गौण । इस्लामिक संस्कृति में धर्म सर्वोच्च होता है, परिवार समाज व्यक्ति, राष्ट्र गौण। साम्यवाद में राज्य सर्वोच्च होता है, व्यक्ति परिवार धर्म समाज राष्ट्र गौण। भारतीय संस्कृति में समाज सर्वोच्च होता है, व्यक्ति धर्म राष्ट्र गौण। यदि हम वर्तमान स्थिति की तुलना करें तो पश्चिम इस्लाम और साम्यवाद अपनी अपनी संस्कृतियों पर टिके हुये हैं किन्तु भारत पूरी तरह अपनी संस्कृति को छोडता ही जा रहा है। साथ ही अन्य तीन संस्कृतियों की प्रतिस्पर्धा में अपनी सांस्कृतिक पहचान खो रहा है अर्थात समाज से भी उपर धर्म राष्ट्र या व्यक्ति को मानने लगा है।
प्राकृतिक रुप से कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह समान नहीं होते, किन्तु महिला और पुरुष के बीच तो यह दूरी बहुत अधिक है। अब तक प्रकृति के अनेक रहस्य सुलझने बाकी है। उसी तरह यह भी एक रहस्य ही है कि प्राकृतिक रुप से महिला और पुरुष के बीच स्वाभाविक आकर्षण है जो इन दोनों को एक दूसरे के साथ रहने के लिए मजबूर करता है। इस आकर्षण को किसी परिस्थिति में रोकना या बाधा पहुचाना बहुत घातक कार्य है। किन्तु इस आकर्षण को यदि व्यवस्थित नहीं किया गया तो समाज में अव्यवस्था फैल जायेगी। इसलिए परिवार रुपी एक इकाई बनाकर बीच का रास्ता निकाला गया जिसमें महिला और पुरुष की प्राकृतिक आवश्यकता पूरी होती रहें, किन्तु अव्यवस्था भी न फैले ।
आदर्श स्थिति में व्यक्ति और समाज को मौलिक इकाई माना जाता है। न तो व्यक्ति से नीचे कोई इकाई है, न ही समाज से उपर। व्यक्ति और समाज के बीच आपसी तालमेल बनाये रखने के लिए एक सीढी का उपयोग होता है जो परिवार,गांव, जिला, प्रदेश और राष्ट्र से होती हुई समाज तक जाती है। यह सीढी व्यक्ति को समाज से सम्पर्क रखने का काम करती है। इसी तरह समाज द्वारा निर्मित सरकार रुपी एक इकाई होती है जो सबसे उपर होती है और व्यक्ति को नियंत्रित करने के लिये यह सीढी राज्य के काम आती है। इस तरह यह सीढी ही व्यक्ति से समाज तक और सरकार से व्यक्ति तक के सम्पर्क का माध्यम होती है।
व्यक्ति के बाद पहली सीढी परिवार होती है। परिवार एक से अधिक व्यक्तियों को मिलाकर बनता है। सामान्यतया उसमें पुरुष और महिलाये दोनों प्रकार के लोग शामिल होते है। परिवार स्वयं में एक संगठन होता है। कोई व्यक्ति जब किसी परिवार का सदस्य होता है तो स्वाभाविक रुप से उसका परिवार के प्रति सम्पूर्ण समर्पण होता है जिसमें वह स्वयं भी बराबर का सहभागी होता है। परिवार में शामिल होने के बाद व्यक्ति के संवैधानिक अथवा सामाजिक अधिकार समाप्त होकर परिवार के साथ जुड जाया करते है। परिवार में रहते हुये व्यक्ति की पहचान उसी तरह होती है जिस तरह शक्कर और पानी मिलकर शर्बत बन जाते है अथवा आॅक्सीजन और हाईड्रोजन मिलकर पानी बन जाते है। स्वाभाविक है कि दोनों का अलग अलग अस्तित्व तब तक शून्य हो जाता है जब तक दोनों को अलग अलग न कर दिया जाये। परिवार एक तीन पैर की दौड मानी जाती है जिसमें परिवार के सदस्यों का एक एक पैर खुला रहता है और बीच का पैर बंधा हुआ। स्वाभाविक है कि तीन पैर की दौड में कोई भी एक सदस्य यदि तालमेल से अलग हुआ या कर दिया गया तो दौडने वाला निश्चित रुप से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जायेगा। वर्तमान समय में हम परिणाम देख रहे हैं कि तालमेल के मामले में इस्लाम सबसे सफल है और साम्यवाद सबसे पीछे। पाश्चात्य संस्कृति में भी तालमेल का अभाव ही है और वर्तमान भारतीय संस्कृति को तो कभी पृथक संस्कृति माना ही नहीं जा रहा।
यदि हम परिवार व्यवस्था के आधार पर आकलन करे तो मुस्लिम संस्कृति और हिन्दू संस्कृति के बीच बहुत एकता है। जबकि पाश्चात्य संस्कृति और साम्यवादी संस्कृति के बीच भी बहुत सीमा तक एकता है। ये दोनों संस्कृतियां मिलकर भारतीय और इस्लामिक परिवार व्यवस्था को किसी भी तरह तोडना चाहती हैं। इस टूटन का ही प्रयोग स्थल भारत बना हुआ है। स्वाभाविक है कि परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के लिये महिला और पुरुष के बीच अविष्वास की दीवार खडी करनी आवश्यक है। यदि तीन पैर की दौड से एक सदस्य के मन में संदेह के बीज बो दिये जाये तो परिणामस्वरुप पाश्चात्य और साम्यवादी संस्कृति अपने प्रतिस्पर्धी को पराजित कर सकती है। इसी बुरी नीयत को आधार बनाकर भारत में इन दोनों संस्कृतियों के एजेंट सफलतापूर्वक यह धारणा फैला रहे है कि महिला एक पृथक वर्ग है, संयुक्त परिवार की सदस्य नहीं। निरंतर यह बात फैलाई जा रही है कि पुरुष शोषक है और महिला शोषित। यह बात भी सब लोग जानते है कि महिला और पुरुष को एकाकार होना एक प्राकृतिक अनिवार्यता है। यदि किसी बालिग महिला को पुरुष के साथ जुडने से रोक दिया जाये तो वह महिला भी उतना ही विद्रोह करती है जितना पुरुष किन्तु थोडे ही दिनों बाद पाश्चात्य और साम्यवादी प्रचार से प्रभावित उस परिवार के पति पत्नी के बीच शोषक और शोषित की दीवार खडी कर दी जाती है । यह समाज व्यवस्था के लिए बहुत घातक है किन्तु भारत में सामाजिक कार्य समझ कर किया जा रहा है। कुछ लोग वर्ग विद्वेष बढा रहे है तो कुछ लोग ना समझी में वर्ग समन्वय की बात कर रहे है जबकि सच्चाई यह है कि महिला और पुरुष अलग वर्ग है ही नहीं। नरेन्द्र मोदी समेत हर राजनेता महिला सशक्तिकरण जैसे समाज विरोधी नारे को जोर शोर से हवा दे रहे है। बेटी बचाओं जैसे शब्दों का धडल्ले से उपयोग हो रहा है। महिलाओं को कानून तोडने की ट्रेनिंग दी जा रही है। लगभग सिद्ध कर दिया गया है कि पुरुष शोषक है और महिला शोषित। न्यायालयों में भी कुछ मामलों में महिलाओं को सत्यवादी माना जाने लगा है। एक जमाना था जब इस्लाम महिलाओं को आधी गवाही का हकदार मानता था तो अब नये जमाने में उन्हें दुगुना विश्वसनीय बताया जाने लगा है। न इस्लामिक मान्यता ठीक थी,न ही वर्तमान मान्यता ठीक है क्योकि किसी भी समूह में अच्छे और बुरे लोगों का प्रतिषत लगभग बराबर होता है,कम ज्यादा नहीं। किन्तु सम्पूर्ण भारत में यह षडयंत्र निरंतर चल रहा है। भारत में दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये 98 प्रतिषत पारम्परिक परिवारों की महिलाओं को ब्लैकमेल कर रही है । इन दो प्रतिषत का व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन भी कुछ भिन्न होता है। ये महिलाये या तो अपने परिवार के संरक्षण में शेष परिवारों का आरक्षण के नाम पर या प्रगतिशीलता के नाम पर शोषण करती है, ब्लैकमेल करती है अथवा अपने परिवार में तलाक का गाजर मूली की तरह उपयोग करती हैं। किसी भी प्रकार का महिला सशक्तिकरण अथवा महिला आरक्षण या तो परिवार या समाज व्यवस्था में विखण्डन पैदा करता है अथवा शोषण। संसद में और सरकारी कार्यालयों में ये महिलाये एक साथ बैठ सकती हैं किन्तु रेल डब्बों में या अस्पतालों में इन्हें खतरा महसूस होता है। सेना में लडने के लिए अब बहादुरी की अपेक्षा महिला होने को भी महत्व दिया जायेगा। पंचायतों में भी अब महिलाओं को आरक्षण मिलेगा। मैं अभी तक नहीं समझा कि महिला और पुरुष की दूरी घटना इतना खतरनाक है तो संसद पंचायत सरकारी कार्यालयों और सेना पुलिस में यह दूरी प्रयत्नपूर्वक क्यों घटाई जा रही हैं। आये दिन देखा जा रहा है कि अपराधी प्रवृत्ति की महिलायें खुलेआम पुलिस वालो के समक्ष अपराध कर रही है। मुख्यमंत्री और मंत्री पद पर आसीन महिलाये भी जब चाहे तब किसी पुरुष के विरुद्ध आरोप लगा देती है। मैंने तो यहाॅ तक देखा है कि अधिकांश महिला लेखक घुमा फिराकर महिला सशक्तिकरण के लिए ही लेख लिखती है। उन्हे इसके अतिरिक्त कोई समस्या दिखती ही नहीं। अनेक महिलाये जो विवाह के पूर्व भी महिला सशक्तिकरण की पक्षधर रही है वे भी विवाह करने से अथवा गुप्त रुप से पुरुषों के साथ सम्पर्क बनाने से दूरी नहीं बनाती। सम्पूर्ण समाज में एक प्रचलन है कि विवाह के समय लडका अधिक योग्य और लडकी कम योग्य के बीच तालमेल बनाया जाता है। ये दो प्रतिषत महिला सशक्तिकरण का ढोंग करने वाली महिलाये भी अपनी लडकियों के विवाह के लिए अधिक योग्य लडका ही खोजती है और लडकी को पति परिवार में जाने देती है। जब आपको स्वयं पता है कि इसका परिणाम पुरुष प्रधानता में ही है तो क्या यह उचित नहीं होता कि कम से कम आप तो अपनी लडकी का विवाह कम योग्य लडके से करती और लडके को अपने घर में लाकर रखती। विवाह करते समय भारतीय संस्कृति का पोषण और विवाह के बाद पाश्चात्य संस्कृति के आधार पर विखडण्न की दोहरी नीति बहुत घातक है।
महिला और पुरुष को दो वर्गो के रुप में खडा किया जा चुका है। वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष की दिशा में महिलाओं को निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है। ना समझ धर्मगुरु कन्या बचाओ, महिला बचाओ का नारा लगा रहे है और 98 प्रतिषत पारम्पारिक परिवारों के लोग किं कर्तव्य विमूढ है । समझ में नहीं आ रहा की क्या करें। गांव-गांव में समाज तोडक राजनेताओं के एजेंट महिलाओं को छोटे छोटे पद देकर महिला पुरुष के बीच टकराव की पृष्ठभुमि बना रहे है । ऐसी परिस्थिति में हम इस बाढ को रोक नहीं सकते यह तो पता है किन्तु फिर भी हम समाज को सतर्क तो कर सकते है कि ऐसे समाज तोडक लोगों से सावधान रहें। मेरा आपसे निवेदन है कि आप जब तक मजबूर न हो या कोई स्वार्थ न हो तब तक महिला और पुरुष को परिवार का अभिन्न अंग ही बने रहने दें। उन्हें पृथक वर्ग के रुप में खडा करके अपने पैरों में कुल्हाडी मत मारे।
मंथन का अगला विषय ‘‘स्वतंत्र अर्थपालिका’’ होगा।

Leave a Reply

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

  •  
  •  
  •  

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

Categories

Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal