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मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण

Posted By: kaashindia on February 4, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका है। भारत का प्रत्येक व्यक्ति भ्रष्टाचार से चिंतित भी है और प्रभावित भी। किन्तु अपने को लाचार महसूस कर रहा है। भ्रष्टाचार पर विचार मंथन करते समय कुछ सिद्धांतों पर ध्यान देना होगाः-
(1) अपने मालिक से छिपाकर लिया गया लाभ भ्रष्टाचार होता है अन्य कोई कार्य भ्रष्टाचार नहीं होता। दूसरे मालिक से छिपाकर लिया गया धन चोरी होता है, भ्रष्टाचार नहीं।
(2) कोई भी भ्रष्टाचार सिर्फ मालिक के लिए अपराध माना जाता है, समाज के लिए नहीं। समाज के लिए या व्यक्ति के लिए वह मात्र गैरकाूननी होता है।
(3) तानाशाही व्यवस्था में या लोकस्वराज्य में भ्रष्टाचार न के बराबर होता है । लोकतंत्र में भ्रष्टाचार अधिक होता है।
(4) लोकतांत्रिक व्यवस्था में 2 प्रतिशत तक ही अपराध रोके जा सकते है इससे अधिक नहीं। भ्रष्टाचार की उत्पत्ति 2 प्रतिशत से अधिक होती है तो भ्रष्टाचार रोकना कठिन होता है।
(5) किसी भी व्यवस्था में कानून की मात्रा जितनी अधिक होती है, भ्रष्टाचार के अवसर उतने ही अधिक होते है। तानाशाही या लोकस्वराज्य में कानून न के बराबर होते है और लोकतंत्र में बहुत अधिक।
उपरोक्त सिद्धांतो के आधार पर हम भारतीय व्यवस्था का आकलन करें तो भारतीय राजनैतिक व्यवस्था के अन्तर्गत सामाजिक जीवन में 90 प्रतिशत तक कानूनों का हस्तक्षेप है। स्पष्ट है कि 90 प्रतिशत भ्रष्टाचार पैदा होता है और 2 प्रतिशत ही रोका जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि भ्रष्टाचार रोकने वाली इकाईयां भी निरंतर भ्रष्ट होती चली जाती हैं और लगातार भ्रष्टाचार अनियंत्रित होता जाता है। यहाॅ तक कि अपराध नियंत्रण के मामले भी भ्रष्टाचार की भेट चढ जाते हैं। परिभाषा के अनुसार अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि मालिक सरकार है या समाज। संसदीय लोकतंत्र में समाज रुपी मालिक राजनेताओं को नियुक्त करता है तथा राजनेता शेष सारी व्यवस्था को मालिक के रुप में नियुक्त करते हैं। इसका अर्थ हुआ कि सिर्फ राजनेताओं को दिया गया अधिकार जनता रुपी मालिक की अमानत होता है। शेष सरकारी अधिकारियों को दिया गया अधिकार जनता की अमानत न होकर राजनैतिक व्यवस्था की अमानत होता है। स्पष्ट है कि राजनेताओं का भ्रष्टाचार अपराध होता है और सरकारी कर्मचारियों का भ्रष्टाचार गैरकानूनी । यदि राजनेता रुपी मालिक ही सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार में हिस्सेदार हो जाये तो महत्वपूर्ण समस्या होती है कि मालिक रुपी समाज क्या करे? राजनेता बडी चलाकी से स्वयं को सुरक्षित रखते हुये समाज को मार्ग दर्शन देता है कि समाज कर्मचारियों का भ्रष्टाचार रोके। जबकि समाज को ऐसे भ्रष्टाचार को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। भ्रष्टाचार का जन्मदाता और सुरक्षा देने वाला राजनेता स्वयं को सुरक्षित कर लेता है और अपने साहित्यकार,कलाकार, मीडियाकर्मी,राजनैतिक कार्यकताओ को दलाल के रुप में खडा करके निरंतर प्रचारित करता है कि समाज दोषी है। जबकि आवश्यकता से अधिक कानून वही लोग बनाते है, वही लोग भ्रष्टाचार के अवसर पैदा करते है और वही लोग भ्रष्टाचार में हिस्सा लेकर सुरक्षा देते है। फिर वही लोग समाज को उपदेष देते है कि समाज भ्रष्टाचार रोके। भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए जो इकाई बनाई जाती है वह स्वयं भ्रष्ट होती है तो महत्वपूर्ण प्रश्न है कि भ्रष्टाचार कभी रोका नहीं जा सकता बल्कि सुरसा की तरह बढता ही रहेगा।
स्पष्ट है कि हम भ्रष्टाचार को तब तक नहीं रोक सकते है जब तक उसका उत्पादन बंद न हो और भ्रष्टाचार का उत्पादन कम करने के लिए हमें कानूनों की संख्या 90 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत तक करनी पडेगी जो कोई राजनेता तैयार नहीं है। यहाॅ तक कि अनेक राजनैतिक एजेंट तो अर्थव्यवस्था में भी सरकारी हस्तक्षेप बढाने की वकालत करते दिखते है। दूसरी ओर ऐसे लोग भ्रष्टाचार के लिए समाज को भी दोषी ठहराते हैं। इसलिए आवष्यक है कि ऐसे राजनैतिक एजेंटो से दूर हटकर हम भ्रष्टाचार नियंत्रण पर सोचना शुरु करें। समाधान के रुप में कुछ उपाय हो सकते हैः-
(1) काूननो की मात्रा कम से कम करने का सरकार पर दबाव डाला जाये। सरकार से सुविधाओं की अपेक्षा स्वतंत्रता की मांग करें।
(2) किसी भी प्रकार के सरकारीकरण का अधिकतम विरोध किया जाये। बाजारीकरण या निजीकरण भ्रष्टाचार नियंत्रण का एक अच्छा माध्यम है। अधिकतम निजीकरण की मांग की जाये।
(3) निजीकरण भ्रष्टाचार का उत्पादन नियंत्रित कर सकता है किन्तु समाधान तो लोकस्वराज्य अर्थात समाजीकरण में ही निहित है। हम सरकारवाद और पूॅजीवाद से हटकर समाजीकरण को आदर्श स्थिति माने।
(4) हम किसी भी भ्रष्टाचार के मामले में कही भी दोषी नहीं है। हम अपने को अपराध भाव से मुक्त करे। यदि भ्रष्टाचार होता है तो हम उसे रोकने में सीधा हस्तक्षेप न करें बल्कि व्यवस्था का सहारा ले।
(5) जब तक भारतीय लोकतंत्र लोक नियुक्त तंत्र से बदलकर लोक नियंत्रित तंत्र नहीं बन जाता है तब तक हम अपने को मालिक समझने की भूल न करें। नेता धोखा देने के लिए हमें मालिक कहते हैं किन्तु होते स्वयं मालिक हैं । इसलिए हम तब तक भ्रष्टाचार के दोषी नहीं जब तक संविधान निर्माण और संशोधन में हमारी प्रत्यक्ष भूमिका न हो। वर्तमान समय में संविधान में संसद और न्यायपालिका की ही अंतिम भूमिका है इसलिए वे ही भारत में फैले सब प्रकार के भ्रष्टाचार के दोषी है।
मैं यह कह सकता हॅू कि भ्रष्टाचार ला ईलाज बीमारी नहीं है बल्कि राजनेताओं द्वारा पैदा की हुई बीमारी है जिसका वे समाधान इसलिए नहीं करना चाहते क्योंकि उनका व्यक्तिगत हित भ्रष्टाचार से जुडा हुआ है। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार पर तब तक नियंत्रण नहीं हो सकता जब तक राजनेताओं पर संविधान का तथा संविधान पर समाज का प्रत्यक्ष नियंत्रण न हो । मेरे विचार से भ्रष्टाचार पर आंशिक नियंत्रण के लिए अधिकतम निजीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिये।
मैं समझता हॅू कि तंत्र से जुडा कोई भी सरकारी कर्मचारी या राजनेता ऐसा निजीकरण नहीं होने देना चाहता। किन्तु इसके अतिरिक्त कोई तात्कालिक समाधान भी नहीं है क्योंकि भ्रष्ट व्यवस्था भ्रष्टाचार रोक नहीं सकती और भ्रष्टाचार का उत्पादन बिना निजीकरण के रुक नहीं सकता। हमें चाहिये कि हम राजनेताओं अफसरों और उनके तथाकथित एजेंटो के आभा मंडल से दूर रहकर समाजीकरण या अधिकतम निजीकरण का समर्थन करें।
जंतर मंतर पर असहिष्णुता के विरुद्ध प्रदर्षन
देष के अनेक मुसलमानों ने कुछ धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के साथ मिलकर देश में बढ़ रही साम्प्रदायिक असहिष्णुता के विरुद्ध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन एकपक्षीय था तथा हिन्दुओं में दयाभाव पैदा करनेे के उद्देश्य से था। मुझे लगा कि प्रदर्शन से हिन्दुओं में दयाभाव पैदा न होकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और बढा। यदि प्रदर्शन कश्मीर में हो रहे मुस्लिम आतंकवाद, पत्थरबाजी तथा आजमखान के एकपक्षीय विचारों के विरुद्ध हुआ होता तो संभव है कि मुझ जैसे हिन्दुओं में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कम होता। अब भी समय है कि संविधान की दुहाई देकर भारत के मुसलमान 70 वर्ष तक जारी अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढाने की जिद छोड दें । तब संभव है कि भारत में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण उल्टी दिशा में चलना शुरु कर दे, अन्यथा जो ध्रुवीकरण वर्तमान में हो रहा है वह और तेज होगा। 70 वर्षो से चली आ रही राजनैतिक व्यवस्था धर्म निरपेक्षता का मुखौटा लगाकर भारतीय मुसलमानों को यथार्थ बोध होने से रोक रही है। अब मुसलमानों को समझना है कि वे टकराव चाहते है या समन्वय।

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