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मंथन क्रमांक 41 आरक्षण

Posted By: kaashindia on February 4, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है।
(2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।
(3)कोई भी सुविधा व्यक्ति को दी जा सकती है समूह को नहीं।
(4)प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार समान होते है। किसी व्यक्ति को कोई सुविधा अधिकार के रुप में नहीं दी जा सकती, सुविधा के रुप में दी जा सकती है । भारत में आरक्षण अधिकार के रुप में दिया गया, जो गलत है।
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के उद्देश्य से योग्यता के आधार पर निर्धारित होने वाली वर्ण व्यवस्था को जन्म के आधार पर शुरु कर दिया। यह बदलाव कब से हुआ इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। मनु स्मृति में भी जो मिलता है वह मनु लिखित है या प्रक्षिप्त यह कहना भी संभव नहीं है। इस प्रकार के सामाजिक आरक्षण के कारण स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में बाधा उत्पन्न हुई और समाज में अनेक विसंगतियाॅ पैदा हुई। मूर्ख लोग विद्वान और विद्वान श्रमिक या अल्पज्ञानी माने जाने लगे। ब्राम्हण का लडका ब्राम्हण और श्रमिक का लडका श्रम करने के लिए आरक्षित कर दिया गया। इस विसंगति को दूर करने के लिए कुछ महापुरुषों ने प्रयत्न किये उनमें स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी प्रमुख थे। ये जाति और वर्ण को जन्म की जगह योग्यतानुसार सामाजिक मान्यता दिला रहे थे। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो हमारे राजनेताओं ने उक्त आरक्षण से उत्पन्न विसंगति को दूर करने के नाम पर एक संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था घोषित कर दी। इस संवैधानिक आरक्षण में आरक्षण को अधिकार मान लिया गया तथा योग्यता के स्थान पर जन्म को ही जाति का आधार घोषित कर दिया गया। आर्य समाज और गांधी ने भरपूर विरोध किया किन्तु राजनेताओं की नीयत खराब थी और वे आरक्षण के नाम पर समाज में वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष फैलाकर राजनैतिक लाभ उठाना चाहते थे इसलिए उन्होने किसी की एक न सुनी। ये सभी राजनेता बुद्धिजीवी वर्ग के थे और श्रम के साथ न्याय नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए इन नेताओं और विशेष कर भीमराव अम्बेडकर ने सवर्ण बुद्धिजीवियों और अवर्ण बुद्धिजीवियों के बीच एक समझौता करा दिया जिसे आरक्षण कहते है। अब सारे लाभ के उच्च पदों में अवर्ण बुद्धिजीवियों का भी हिस्सा हो गया किन्तु श्रम के साथ न्याय की बात कहीं नहीं उठी। दुनिया जानती है कि भारत के 90 प्रतिशत आदिवासी और हरिजन श्रमजीवी है किन्तु श्रम मूल्य की कोई चिंता नहीं की गई और ऐसा लगा जैसे आरक्षण लूट के माल बंटवारे के झगडे के समाधान के रुप में था । आरक्षण के द्वारा वह झगडा सुलझ गया। आदिवासी नाम से एक नया वर्ग बनाकर एक अलग तरह का वर्ग संघर्ष पैदा कर दिया गया जबकि स्वतंत्रता के पूर्व आदिवासी और श्रमिक लगभग एक समान थे। 70 वर्षो के बाद भी हम देख रहे है कि 90 प्रतिशत आदिवासी हरिजन आज भी मजदूरी कर रहे है, किसी तरह अपना पेट पाल रहे है। ये लोग निरंतर अपना कर्तव्य कर रहे है और गाय के नाम पर कुत्ता रोटी खा रहा है। यह कुत्ता मोटा होकर काटने के लिए भी दौड रहा है और आटा पीसने वाले को परेषान भी कर रहा है कि वह और तेजी से आटा पीसे। गाय कमजोर हो रही है इसकी चिंता न कुत्ते को है न आटा पीसने वाले को।
यदि हम नये प्रकार के आरक्षण के लाभ हानि की चर्चा करें तो इससे सामाजिक व्यवस्था में जाति प्रथा कमजोर हुई है और संवैधानिक व्यवस्था में जाति प्रथा मजबूत हुई है। आरक्षण को अधिकार घोषित कर देने से वर्ग संघर्ष भी बढा है। आरक्षण की गलत व्यवस्था के कारण समाज निरंतर टकराव की दिशा में बढ रहा है। आरक्षण की व्यवस्था ने यदि 10 प्रतिशत लोगों को न्याय दिलाया है तो 90 प्रतिशत लोगों के साथ अन्याय भी किया है। विशेष कर उन आदिवासी हरिजनों के साथ जो आज भी अपनी स्थिति से उपर नहीं उठ सके। मैं स्पष्ट कर दॅू कि भारत में 70 वर्षो के बाद बुद्धिजीवियों का जीवन स्तर औसत आठ गुना बढा है तो श्रमजीवियों का सिर्फ दोगुना, यह एक प्रकार का अन्याय है। पूरे भारत की औसत विकास दर से श्रमजीवियों की विकास दर भले ही अधिक न हो किन्तु बराबर तो होना ही चाहिये । हम देख रहे है कि निरंतर औसत विकास दर मेें श्रम और बुद्धि के बीच असमानता बढती जा रही है।
मैं मानता हॅू कि स्वतंत्रता के पूर्व के सामाजिक आरक्षण ने अनेक जातियों के लोगों के बौद्धिक विकास को रोक रखा था। यदि श्रममूल्य बढता तो श्रम और बुद्धि के बीच का आर्थिक फर्क कम होता और यह अंतर घटता चला जाता। किन्तु मैं इस मांग से सहमत नहीं कि आरक्षण सवर्णो के साथ कोई अन्याय है क्योंकि स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण का लाभ उठाकर ही वे लोग बिना योग्यता के योग्य बन गये थे। वर्तमान समय में जो लोग आरक्षण का विरोध कर रहे है उनका विरोध उस लूट के माल में हिस्सेदारी तक सीमित है जो संवैधानिक आरक्षण से कुछ जातियों को मिली। वास्तव में जिन लोगों के साथ अन्याय हुआ वे तो आरक्षण का विरोध कर ही नहीं रहे क्योकि उन्हे तो इस षडयंत्र का आभास ही नहीं है।
मैं समझता हॅू कि किसी भी प्रकार के आरक्षण को पुरी तरह समाप्त होना ही चाहिये किन्तु आरक्षण को समाप्त करने के पूर्व श्रम बुद्धि और धन के बीच बढते हुये अंतर को कम करने का प्रयास करना होगा। मेरे विचार से यदि कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्यवृद्धि कर दी जाये और उससे प्राप्त धन आधी आबादी को बराबर बराबर बांट दिया जाये तो श्रम का मूल्य बढ सकता है। आर्थिक असमानता भी घट सकती है और आरक्षण पूरी तरह एक झटके में समाप्त किया जा सकता है। वर्तमान में आरक्षण का लाभ उठा रहे लोग तो इसका खुला विरोध करेंगे ही किन्तु अन्य सवर्ण बुद्धिजीवी भी श्रममूल्य वृद्धि का विरोध करेंगे। फिर भी मुझे विष्वास है कि बडी संख्या में बुद्धिजीवी इस कदम का समर्थन भी कर सकते है।
मैं यह भी समझता हॅू कि इतना गंभीर कदम तत्काल उठाना वर्तमान व्यवस्था के लिए कठिन है क्योंकि वर्तमान सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था पर बुद्धिजीवियों और पूॅजीपतियों का ही एकाधिकार है। ऐसी परिस्थिति में यह संभव है कि जो लोग आरक्षण का लाभ उठाकर सामान्य जीवन स्तर जीने योग्य हो गये है उन्हें आरक्षण से बाहर करके उन्हें अनारक्षित या सवर्ण घोषित कर दिया जाये। इससे धीरे धीरे आरक्षित वर्ग के व्यक्तियों की संख्या घटेगी और इससे बाहर होने वाले आरक्षित जातियों के लोग आरक्षण का विरोध करते नजर आयेंगे क्योंकि कोई भी व्यक्ति यह पसंद नहीं करेगा कि दूसरों के साथ न्याय हो और उसकी सुविधा में कटौती हो। इसके साथ साथ हम यह भी व्यवस्था कर सकते है कि जिस परिवार को आरक्षण के आधार पर नौकरी या राजनैतिक पद प्राप्त हो गया है उसका पूरा परिवार भविष्य में सवर्ण माना जायेगा। इससे भी बहुत कुछ सुधार संभव है।
मैं पूरी तरह स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा का पक्षधर हॅू। मैं किसी भी प्रकार के जातीय धार्मिक या महिलाओं के भी आरक्षण के विरुद्ध हॅू। मैं अपंगो को भी कोई आरक्षण नहीं देने के पक्ष में हॅू। किन्तु यदि अल्पकालिक समाधान के रुप में कुछ चरणों में आरक्षण को कमजोर करने की योजना बनती है तो मैं ऐसी योजना का समर्थन कर सकता हॅू। मंै बुद्धि और श्रम के बीच बढती हुई दूरी को बहुत घातक मानता हॅू और मेरी मान्यता है कि वर्तमान संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था स्वतंत्रता के पूर्व की आरक्षण व्यवस्था से भिन्न नहीं है। भले ही नई बोतल में पुरानी शराब का स्वरुप बदल गया हो।

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