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मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान

Posted By: kaashindia on February 4, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मैं गीता को समझने लगा और एक दो वर्षाे के अंदर ही मेरे जीवन पर गीता का प्रभाव पडने लगा।
मैं नहीं कह सकता कि गीता धार्मिक ग्रंथ है या ऐतिहासिक। मै इस विवाद से भी संबंध नहीं रखता कि महाभारत यु़द्ध यथार्थ है या कल्पना अथवा गीता का ज्ञान कृष्णा ने दिया था अथवा लेखक ने अपने विचारों को कृष्ण के नाम से प्रस्तुत किया। किन्तु मैं इतना अवश्य कह सकता हॅू कि गीता ज्ञान की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसका कार्यकाल कब का है और कोई अंश प्रक्षिप्त है या नहीं, यह भी मेरी चर्चा का विषय नहीं है। मैंने जहाॅ तक समझा है उसके अनुसार गीता एक ऐसा अथाह समुद्र है जिसमें मोतियों का भंडार भरा पडा है और मैं उन मोतियों में से अपनी क्षमता अनुसार दो तीन मोती आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हॅू-
धर्म के संबंध में गीता में लिखा है कि ‘‘स्वधर्मे निधनम श्रेयः’’ अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को किसी अन्य के धर्म के अनुसार न आचरण करना चाहिए न हस्तक्षेप, भले ही अपने धर्म में मृत्यु ही क्यों न हो जाये। प्रश्न उठता है कि प्राचीन समय में धर्म का अर्थ हिन्दू, मुसलमान, इसाई से था अथवा पूजा पद्धति से । यदि पूजा धर्म था तो सभी व्यक्तियों का धर्म एक ही होगा, अलग अलग नहीं किन्तु यदि पूजा पद्धति धर्म थी तब पूजा पद्धति के आधार पर बने समूह धर्म माने जाते जैसा अभी दिख रहा है। धर्म के नाम पर अलग अलग संगठन उस समय नहीं थे न ही सबका धर्म एक समान था। इसका अर्थ हुआ कि धर्म का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति के अपने व्यक्तिगत कर्तव्य तक निहित था जो बढते बढते वर्ण और आश्रम तक चला जाता था। वर्तमान समय में धर्म एक है यह धारणा भी गलत प्रतीत होती है और धर्म हिन्दू, मुसलमान, इसाई से जुडी हुई है यह भी धारणा गलत है । धर्म का वास्तविक अर्थ ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी अन्य के हित में किया जाने वाला निःस्वार्थ कार्य धर्म होता है। व्यक्ति का पिता, माता, पत्नी, पुत्र, पडोसी या समाज के प्रति अलग अलग धर्म होता है, एक समान नहीं। इसी तरह गीता में ‘‘यदायदा ही धर्मस्य’’ के माध्यम से भी धर्म की व्याख्या की गई है। इस श्लोक में भी धर्म का अर्थ न तो पूजा पद्धति है, न ही हिन्दू मुसलमान । यहाॅ धर्म का अर्थ कर्म करने की स्वतंत्रता से निहित है। जब भी धर्म पर संकट आता है और अपराधी तत्व अधिक मजबूत हो जाते है तब संकट काल मानकर किसी शक्ति का उदय होता है जो अपराधी तत्वों को दबाकर पुनः धर्म की स्थापना करती है। इसी क्रम में एक तीसरा श्लोक आता है ‘‘सर्वधर्म परित्यज्य’’ जिसका अर्थ है आपातकाल में सारे कार्य रोककर किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति या व्यवस्था के अतर्गत इकट्ठा हो जाना चाहिये। सामान्य काल के लिए गीता धर्म का अलग अर्थ बताती है और अपातकाल के लिए अलग । यदि हम वर्तमान अव्यवस्था का आकलन करें तो सारी अव्यवस्था का मुख्य कारण धर्म के गीता में बताये गये अर्थो का दुरुपयोग ही दिखता है।
गीता में ज्ञान कर्म और उपासना की अलग अलग विस्तृत व्याख्या की गई है किन्तु उसमें भी ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। गीता में जगह जगह ज्ञान यज्ञ को अन्य सब प्रकार के यज्ञों से श्रेष्ठ बताया गया है जो मेरे विचार से सच भी है। प्राचीन समय से ही भारत ज्ञान मार्ग को सर्वोच्च स्थान देता रहा है किन्तु यदि हम वर्तमान का आकलन करें तो राज्य सत्ता धन शक्ति और संगठन शक्ति के बीच प्रतिस्पर्धा चल रही है जिसमें ज्ञान का महत्व शून्यवत हो गया है। इस आधार पर भी हम गीता के विपरीत आचरण कर रहे हैं।
गीता पढने से यह स्पष्ट होता है कि सभी क्षेत्रों में उत्तम मध्यम और निम्न वर्ग के आधार पर तीन वर्गीकरण हुये है, दो नहीं। गुणों में भी सत रज तम के आधार पर तीन का विभाजन है। यदि हम वर्तमान का आकलन करें तो तीन के विभाजन को दो में करके बहुत बडी भूल हुई है। व्यक्तियों का सामाजिक ,असामाजिक, समाज विरोधी के बीच विभाजन होना व्यवस्था की दृष्टि से बहुत अच्छा है किन्तु अच्छे और बुरे के रुप में विभाजन करके अनेक प्रकार की समस्याये पैदा की गई। इसी तरह गीता में वर्ण व्यवस्था के अनुसार मार्ग दर्शन किया है। अर्जुन को युद्ध करने की प्रेरणा कृष्ण ने दी। अर्जुन जब ब्राम्हणों की भाषा बोलने लगा और युद्ध से विमुख होने लगा तब कृष्ण ने उसे डांटा। किन्तु अर्जुन यदि ब्राम्हण प्रवृत्ति का होता तो कृष्ण उसे युद्ध करने की प्रेरणा न देकर दुर्योधन का हृदय परिवर्तन कराने की प्रेरणा देते। कृष्ण ने उपदेश के लिए अर्जुन को चुना युधिष्ठिर को नहीं क्योंकि कृष्ण के विचार में युधिष्ठिर ऐसी प्रेरणा के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं थे। सम्पूर्ण गीता वर्ण व्यवस्था पर बहुत गंभीर विवेचना प्रस्तुत करती है।
यह स्पष्ट है कि गीता धर्म ग्रंथ है किसी धर्म का ग्रंथ नहीं। गीता को हिन्दू मुसलमान के बीच बांटकर देखना घातक है। हिन्दू यदि गीता पर अपना दावा प्रस्तुत करते है तो वह उचित नहीं, और मुसलमान इसाई यदि गीता को हिन्दू धर्म ग्रंथ मानते है तो वह भी ठीक नहीं। लम्बे समय से गीता ने अनेक महापुरुषों का मार्ग दर्शन किया है और वर्तमान में भी मेरे जैसे लोग प्रेरणा ले रहे है। मैं समझता हॅू कि वेदो को हम हिन्दुओं का धर्म ग्रंथ कह सकते है किन्तु गीता को नहीं। वेदों के प्रति मेरे मन में श्रद्धा है किन्तु वेदों से मुझे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका क्योंकि वेद सामान्यजन के लिए कठिन है । गीता इस संबंध में सामान्यजन के लिए मार्ग दर्शन की पूरी क्षमता रखती है। गीता को एक मानव धर्मग्रंथ के रुप में देखा जाना चाहिये और मैं तो अपने बचपन मे आज तक गीता को उसी रुप में देखता आया हॅू।

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