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मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत

Posted By: kaashindia on February 7, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-
1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।
2 व्यक्ति और समाज को अहिंसक होना चाहिए और व्यवस्था को हमेशा हिंसक। भारत में व्यवस्था अहिंसक हो रही है और व्यक्ति समाज हिंसक।
3 भारतीय संस्कृति संतुलित हिंसा की पक्षधर रही है। बुद्ध महावीर और ईशु मसीह ने अतिवादी अहिंसा का पक्ष लेकर व्यवस्था को असंतुलित किया। हजरत मुहम्मद ने अतिवादी हिंसा का समर्थन करके उसे पलटने का प्रयास किया।
4 अहिंसा या हिंसा परिस्थिति अनुसार मार्ग होता है, सिद्धांत नहीं। गांधी के बाद गांधीवाद ने अहिंसा को सिद्धांत मान लिया तो संघ ने हिंसा को।
5 गांधी और संघ भारत में सामाजिक हिंसा के विस्तार के लिए दोषी हैं। गांधी ने राज्य को न्यूनतम हिंसा की सलाह दी तो संघ ने समाज को अपनी सुरक्षा के लिए हिंसा के उपयोग की सलाह दी।
6 भारतीय संस्कृति समाज और राज्य के सामंजस्य की पक्षधर है । समाज हृदय परिवर्तन पर जोर देता है तो राज्य कठोर दण्ड व्यवस्था पर। इस्लामिक संस्कृति इसके ठीक विपरीत समाज को भी हिंसा की छूट देती है और राज्य को भी।
हम दुनिया की वर्तमान स्थिति का आकलन करें तो सम्पूर्ण मानव समाज में हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है। यह ग्लोबल वार्मिंग खतरनाक स्थिति तक आ गई है। पूरी दुनिया आतंकवाद को सबसे बडा खतरा समझ रही है जबकि आतंकवाद का जन्म हिंसक प्रवृत्ति के विस्तार से होता है। हिंसक प्रवृत्ति धीरे धीरे उग्रवाद का रुप ग्रहण करती है और उग्रवाद धीरे धीरे आतंकवाद की दिशा में बढ जाता है। अपराध उग्रवाद और आतंकवाद में अंतर होता हैं। अपराध आमतौर पर व्यक्तिगत स्वार्थ के उद्देश्य तक सीमित होते हैं । उग्रवाद किसी विचारधारा से प्रभावित होता है। आतंकवाद उग्रवाद का अतिवादी स्वरुप होता है। भारत में तीन विचारधारायें उग्रवादी मानी जाती है- 1 संघ विचारधारा 2 इस्लामिक विचारधारा 3 साम्यवादी विचारधारा। इन तीन विचारधाराओं का ही अतिवादी स्वरुप अभिनव भारत, इस्लामिक आतंकवाद तथा नक्सलवाद के रुप में खतरनाक रुप ग्रहण कर लेता है। यह अतिवादी विचारधारा खतरनाक रुप ग्रहण करने के बाद उग्रवादी संगठनों के लिए भी खतरनाक बन जाती है क्योंकि यह आतंकवाद किसी सीमा को नहीं मानता भले ही कोई उसका हित चिंतक ही क्यों न हो। पिछले 100 वर्षो के इतिहास में हिटलर को सबसे बडा आतंकवादी माना गया जिसने सिद्धांत के तौर पर यहुदियों की खोज खोज कर हत्यायें करवाई।
आतंकवादी भी दो प्रकार के होते हैं-1 संचालक 2 संचालित। आतंकवादी विचारधारा के संचालक हमेशा अप्रत्यक्ष होते है और उग्रवाद तक सीमित रहते है। आमतौर पर उस विचारधारा से संचालित कुछ लोग आतंकवादी हो जाते हैं जो प्रत्यक्ष दिखते हैं। नाथूराम गोडसे एक उग्रवादी विचारों से संचालित व्यक्ति था जिसका अपना कोई विचार नहीं था। संचालक अप्रत्यक्ष होता है और संचालित प्रत्यक्ष इसलिए नाथूराम गोडसे को फांसी पर चढना पडा।
यदि हम सिर्फ भारतीय आतंकवाद की समीक्षा करें तो भारत में शांति व्यवस्था को अपराधियों से उतना खतरा नहीं है जितना उग्रवाद प्रभावित आतंकवाद से। भारत दो प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहा हैै-1 इस्लामिक आतंकवाद 2 नक्सलवादी आतंकवाद। दुनिया में साम्यवाद के पतन के बाद भारत में भी साम्यवाद की ताकत बहुत कम हो गई है। नरेन्द्र मोदी के बाद साम्यवादी विचारधारा भी सामाजिक वातावरण से अलग थलग होती जा रही है। सरकार ने भी नक्सलवाद समाप्त करने का बीडा उठा लिया है और जल्दी ही इस आतंकवाद से पिण्ड छूट जायेगा किन्तु इस्लामिक आतंकवाद अभी नियंत्रित नहीं हो पा रहा है। इस्लामिक उग्रवाद को वामपंथी उग्रवाद का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। पडोसी देश पाकिस्तान भी निरंतर इस प्रयत्न में लगा हुआ है कि भारत कश्मीर के नाम पर निरंतर अशांत बना रहे। कश्मीर प्रदेश तो पूरी तरह इस्लामिक आतंकवाद का गढ बना हुआ ही है किन्तु भारत का मुस्लिम बहुमत तथा वामपंथी विचारधारा के लोग भी येनकेन प्रकारेण इस्लामिक आतंकवाद की अप्रत्यक्ष ढाल बनकर खडे हो गये है। एक बार तो भारत का राजनैतिक विपक्ष ऐसी उम्मीद करने लगा था कि कश्मीर भारत से निकल सकता है किन्तु फिर से सरकार ने ऐसी संभावनाओं पर पानी फेर दिया है। एक बार फिर इस्लामिक आतंकवाद नियंत्रित होता दिख रहा है। कश्मीर में वातारण जिस तरह सरकार के पक्ष में बदल रहा है उसके परिणाम स्वरुप विपक्ष की राजनीति भी यह सोचने को मजबूर हो रही है कि सिर्फ मुस्लिम वोटो के सहारे अब भारत में राजनीति करना संभव नहीं है। भारत के मुसलमानों में से भी जो लोग मोदी के पूर्व इस्लामिक उग्रवाद के पक्षधर न होते हुए भी चुप थे वे भी अब मुखर होकर बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि जैसे प्रकरणों में सामने आने लगे है। मैं आश्वस्त हॅू कि जिस तरह शिया धर्मगुरु ने खुलकर अपना पक्ष रखा है, मोदी के पूर्व उनके ऐसे प्रयत्न आतंकवादियों के निशाने पर हो सकते थे। स्पष्ट है कि इस्लामिक उग्रवाद के विरोधियों की हिम्मत धीरे धीरे बढ रही है।
जहाॅ तक भारतीय संस्कृति का सवाल है तो अब हिन्दू आतंकवाद का खतरा पूरी तरह समाप्त हो गया है। एक बार ऐसा संदेह होने लगा था कि इस्लामिक आतंकवाद और साम्यवादी आतंकवाद की प्रतिस्पर्धा में हिन्दू आतंकवाद भी जन्म ले रहा है किन्तु जन्म के समय ही उसकी मृत्यु हो गई और वह फिर आगे नहीं बढ पाया। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद अब ऐसा कोई तर्क भी नहीं दिखता जो हिन्दू आतंकवाद की आवश्यकता का समर्थन करें। अब तो आवश्यकता यह है कि पूरा भारत एकजुट होकर इस्लामिक आतंकवाद से मुक्त होने का प्रयास करे। साथ ही साथ भारत दुनिया के इस्लामिक आतंकवाद से मुक्ति में भी अपना अच्छी भूमिका अदा करे। इस भूमिका में हिन्दू और मुसलमान अथवा राजनैतिक पक्ष विपक्ष को पूरी तरह भूल जाने की आवश्यकता है क्योंकि आतंकवाद किसी के लिए भी हितकर नहीं है, उन उग्रवादियों के लिए भी नहीं जिनके समर्थन से आतंकवाद फलता फूलता है।
मैं इस संबंध में एक सलाह और देना चाहता हॅू कि संघ परिवार ने तीन वर्ष पूर्व तक उग्रवाद के विरुद्ध उसी की भाषा में उत्तर देने के लिए उग्रवाद के विस्तार का जो प्रयत्न किया उस प्रयत्न के लिए वह धन्यवाद का पात्र है किन्तु अब नरेन्द्र मोदी के बाद संघ परिवार को अपनी स्वतंत्र रणनीति बदल लेनी चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि आतंकवाद या उग्रवाद को अब भारत में राजनैतिक स्तर पर निपटा दिया जायेगा और अब संघ परिवार के प्रयत्न इस प्रक्रिया में बाधक ही बनेंगे, साधक नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि आतंकवाद और उग्रवाद के साथ साथ समाज में बढ रहा हिंसा के प्रति समर्थन भी नियंत्रित करने की आवश्यकता है। भारत सरकार गांधीवाद के न्यूनतम सरकारी हिंसा से उपर उठकर संतुलित हिंसा के मार्ग पर निरंतर बढ रही है। आवश्यकता इस बात की है कि हम समाज में अहिंसा के पक्ष में वातावरण बनाने का प्रयास करें। जो लोग हिंसा के समर्थक है वे अब तक तो इसलिए राडार पर नहीं थे क्योंकि राज्य स्वयं ही वातावरण नहीं बना पा रहा था जिससे आतंकवाद और उग्रवाद से सफलतापूर्वक निपटना संभव हो। अब राज्य इस दिशा में ठीक तरीके से आगे बढ रहा है। अब संघ परिवार को चाहिए कि वह अपने को जरुरत से ज्यादा चालाक समझने की भूल न करे और आंख मूंदकर नरेन्द्र मोदी का समर्थन करे। इस समय भारत में नरेन्द्र मोदी लाख मर्ज की एक दवा के रुप में स्थापित हो रहे है। उनके प्रयत्नों की समीक्षा नये चुनाव के बाद की जा सकती है, अभी नहीं। मुझे उम्मीद है कि संघ भी इस बात को समझने का प्रयास करेगा।
मंथन का अगला विषय‘‘ कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान’’ होगा।

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