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मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?

Posted By: kaashindia on February 19, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही हैं। भावना और बुद्धि के बीच भी अंतर बढता जा रहा है। शरीफ लोगो की संख्या भी बढती जा रही है तो चालाक और धूर्त लोगो की संख्या भी बढ रही है। शरीफ और धूर्त के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है और समझदारी निरंतर घट रही है । हर धूर्त यह प्रयत्न कर रहा है कि अन्य लोग समझदार न होकर शरीफ बने अर्थात भावना प्रधान हो । विचार प्रचार बहुत तेज गति से हो रहा है और विचार मंथन की प्रकृया लगातार घट रही है। विपरीत विचारो के लोग अलग अलग गिरोहों मे बंटकर संगठित हो रहे है तो विपरीत विचारो के लोग एक साथ बैठकर कभी समस्याओ की न तो चर्चा करते है न समाधान सोचते है । यहां तक कि पूरे विश्व मे विपरीत विचारो के लोग एक दूसरे के विरूद्ध बिना विचारे इतने सक्रिय हो जाते है कि उसका लाभ धूर्त उठाते है। हर कार्य मे आम नागरिको की सक्रियता बढती जा रही है भले ही वह एक दूसरे के विरूद्ध ही क्यों न हो।
यदि हम भारत की समीक्षा करें तो भारत दुनियां की तुलना मे कुछ अधिक ही समस्या ग्रस्त है। राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषाए बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियो को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतो के बीच टकराव बढाया जा रहा है। परिणाम स्वरूप समाज के शरीफ लोगो द्वारा सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियो की मदद लेना मजबूरी बन गया है। राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर किसान मजदूर शहरी ग्रामीण आदि के नाम पर समाज मे अलग अलग संगठन बनाकर उनमे वर्ग विद्वेष का कार्य योजना बद्ध तरीके से राज्य कर रहा है । शिक्षा और ज्ञान के बीच भी लगातार असंतुलन पैदा किया जा रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोजगार के अवसर के रूप मे बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। परिणाम हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। पूरे भारत मे हिंसा के प्रति विश्वास बढता जा रहा है। अनेक असत्य धारणाए सत्य के समान स्थापित हो रही है। अच्छे अच्छे विद्वान नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक मे क्या अंतर है, समाज राष्ट्र और धर्म मे कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान मे क्या अंतर है, अपराध गैर कानूनी और अनैतिक मे क्या अंतर है, कार्यपालिका और विधायिका मे क्या अंतर है आदि आदि। स्पष्ट है कि समस्याए दिख रही है और समाधान नहीं दिख रहा । समस्याओ का अंबार लगा है। समाधान कहां से शुरू करें यह समझ मे नही आ रहा ।
तंत्र की नीतियां गलत नही है बल्कि नीयत गलत है। तंत्र समाज को गुलाम बनाकर रखने की नीयत से सारे अधिकार अपने पास समेट रहा है। तंत्र ने संविधान रूपी एक पुस्तक लिखकर उसे समाज मे धर्म ग्रन्थ या भगवान के रूप मे स्थापित कर दिया है और तंत्र जब चाहे उसमे मनमाने संशोधन करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता है। हमारे लिये भगवान और तंत्र के लिये गुलाम । लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदलकर लोक नियुक्त तंत्र कर दी गई है। तंत्र को लोक का प्रबंधक या मैनेजर होना चाहिये था किन्तु वह अपने को शासक अर्थात सरकार मानता भी है और कहता भी है। कैसी विडंबना है कि लोक शासित है और तंत्र शासक। इसलिय यह निष्कर्ष निकलता है कि सम्पूर्ण विश्व की राजनैतिक व्यवस्था मे आमूल परिवर्तन होना चाहिये जिसकी शुरूआत भारत से हो।
हमे भारत मे दो दिशाओ मे एक साथ काम करना चाहिये । 1 समाज सशक्तिकरण 2 राज्य कमजोरीकरण। राज्य और समाज के बीच जो असीमित दूरी राज्य के पक्ष मे बढ गई हैं उस दूरी को समाज के पक्ष मे करना ही व्यवस्था परिवर्तन है। समाज सषक्तिकरण का कार्य ज्ञान यज्ञ परिवार राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पूर्वक कर रहा है। राज्य कमजोरीकरण का कार्य ग्राम संसद अभियान ने अपने उपर लिया है।
स्वराज्य का अर्थ है सम्पूर्ण विश्व के संविधान के निर्माण और संशोधन मे प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका तथा अपने कानून बनाने और क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता। इसे ही हम लोक स्वराज्य कहते हैं। भारत मे भी लोक स्वराज्य का अर्थ वही है अर्थात भारतीय संविधान के निर्माण तथा संशोधन मे भारत के प्रत्येक व्यक्ति की सम्पूर्ण भूमिका । सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ हैं भारत की अव्यवस्थित राजनैतिक, सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक, पारिवारिक, आर्थिक, तथा अन्य सभी प्रकार की व्यवस्थाओ मे अब तक आये पतन से मुक्ति। लोक स्वराज्य ही सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का आधार बन सकता है। चूकि यह कार्य बहुत अधिक कठिन है इसलिये संशोधित रूप मे व्यवस्था परिवर्तन को आधार बनाया जा सकता है। व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ है संविधान के निर्माण और संशोधन मे भारत के प्रत्येक नागरिक की महत्वपूर्ण भूमिका। कई वर्षो तक प्रयत्न के बाद महसूस हुआ कि व्यवस्था परिवर्तन की तुलना मे कुछ और लचीला मार्ग अपनाया जाये। यह सोचकर ग्राम संसद अभियान को आधार बनाकर जन जागरण शुरू किया गया। ग्राम संसद अभियान का अर्थ है, प्रत्येक ग्राम या वार्ड सभा को राष्ट्रीय संविधान संशोधन मे महत्वपूर्ण भूमिका तथा अपने आंतरिक कानून बनाने और क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता । इसका अर्थ हुआ कि वर्तमान तंत्र यदि संविधान मे कोई संशोधन करता है तो उसे ग्राम सभाओ की स्वीकृति अनिवार्य होगी । यदि ग्राम सभाएं अस्वीकृत कर दें तब या तो संविधान संशोधन नही होगा अथवा जनमत संग्रह कराना होगा।
मै मानता हॅू कि ग्राम संसद अभियान समस्याओ का समाधान नही है बल्कि वर्तमान अव्यवस्था से एक समझौता मात्र है। आदर्श स्थिति यह है कि संविधान निर्माण और संशोधन मे लोक की ही एक मात्र भूमिका होनी चाहिये, किन्तु ग्राम संसद अभियान इस मामूली से प्रयत्न के आधार पर जन जागरण कर रहा है कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र तक सीमित न हो और उसमे लोक की भी कोई भूमिका हो।
यदि कोई अन्य समूह व्यवस्था परिवर्तन अथवा सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन की दिशा मे काम करता है तो हम उसका पूरा समर्थन या सहयोग करेंगे। यदि संविधान संशोधन के लिये जनमत संग्रह अथवा परिवारों को भी कोई भूमिका दी जाती है तो हम उसका पूरा समर्थन सहयोग के लिये तैयार हैं। यदि तंत्र जनता द्वारा निर्वाचित किसी लोक संसद को भी संविधान निर्माण और संशोधन मे कोई भूमिका के लिये तैयार हो तो हमारा समर्थन और सहयोग होगा । ऐसी स्थिति न देखकर ग्राम संसद अभियान अपनी एक सूत्रीय मांग पर जन जागरण कर रहा है। मै इतना और स्पष्ट कर दूं कि यदि चर्चा के माध्यम से तंत्र ने आंशिक सहमति की इच्छा जताई तो आवश्यकतानुसार ग्राम संसद अभियान गांवो को अपने कानून बनाने और क्रियान्वित करने की मांग को अल्प काल के लिये स्थगित भी कर सकता है, किन्तु संविधान संशोधन मे ग्राम और वार्ड सभाओ की भूमिका की मांग स्थिर है । हमारे भगवान रूपी संविधान को तंत्र के जेलखाने से मुक्त कराना हमारा पहला लक्ष्य है
ग्राम संसद अभियान का कार्यालय दिल्ली से संचालित होता है। पूरे देश को 99 लोक प्रदेशो मे बांटकर प्रत्येक लोक प्रदेेश मे ग्राम संसद अभियान की कमेटियां बन रही है। सभी लोक प्रेदशो मे बैठको का क्रम एक साथ चल रहा है। 20 अगस्त से नवम्बर तक सभी लोक प्रदेशो मे ऐसी बैठकें हो जायेगी, जो लोक प्रदेश सम्मेलनो की योजना बनायेगी। अक्टूबर से मार्च तक के छ महिनो मे सभी लोक प्रदेशो मे ग्राम संसद अभियान के सम्मेलन पूरे करने की योजना है। इन सम्मेलनो मे कुछ लोगो का चयन करके एक राष्ट्र स्तरीय सम्मेलन रखा जायेगा जिसमे आगे की योजना पर विचार किया जायेगा। मुझे विश्वास है कि ग्राम संसद अभियान वर्ष 2024 तक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे सफल हो सकेगा। मै जानता हॅू कि यह कार्य भी संविधान संशोधन से ही संभव है और ग्राम संसद अभियान का निश्चय है कि हम कोई कानून नही तोडेेगे बल्कि संवैधानिक तरीके से ही तंत्र की गुलामी से संविधान को मुक्त कराने का जन जागरण जारी रखेंगे । इसके लिये दो मार्ग दिखते हैं या तो इन विचारो के लोग संसद मे 2 तिहाई बहुमत बनाकर संविधान संशोधन कर दें और नई व्यवस्थानुसार नये चुनाव करा दे अथवा इतना प्रबल जनमत खडा हो कि वर्तमान तंत्र इस छोटे से संषोधन के लिये सहमत हो जाये । क्या होगा यह पता नही। दोनो ही प्रयत्नो मे जन जागण की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिये ग्राम संसद अभियान संगठित रूप से अपने को जन जागरण तक सीमित रख रहा है। जन जागरण के बाद कौन सा मार्ग आगे आयेगा वह लोक तय करेगा ग्राम संसद अभियान नही। आम नागरिको से अपेक्षा है कि वे इस संगठन के साथ जुडकर जनजागरण मे सक्रिय होंगे।
मै समझता हॅू कि ज्ञान यज्ञ परिवार तथा ग्राम संसद अभियान के संयुक्त प्रयासों से सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग खुल सकता है।

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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