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मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम

Posted By: kaashindia on February 22, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और राज करो की नीति बहुत पुरानी है जो अभी तक चल रही है। इसी वर्ग विद्वेष के आठ उपकरणो मे उम्र के नाम पर फैलाया गया वर्ग विद्वेष भी शामिल है। बालक, युवक और वृद्ध के नाम पर तीन अलग अलग समूह बनाकर तीनो के बीच मे भेद भाव पैदा करना राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकताओ मे से एक है। इस महत्वपूर्ण कार्य मे राजनैतिक दलो का आपसी भेद भाव भी नही है न्यायपालिका भी लगातार इस कार्य को महत्वपूर्ण समझती है और कार्यपालिका तो सक्रिय रहती ही है। बालक युवा और वृद्ध कभी भिन्न नही होते क्योकि प्रत्येक व्यक्ति एक निश्चित उम्र तक बालक मध्य काल मे युवक और अंतिम काल मे वृद्ध होता है। परिवार मे रहते हुए भी बालक, युवक, वृद्ध तीनो प्रकार के लोग एक साथ संयुक्त रहते है। अपवाद स्वरूप ही कुछ बालक, युवक या वृद्ध के रूप मे माने जा सकते है जो नितांत अकेले हो या संयुक्त परिवार से अलग हो।
प्राकृतिक या मौलिक अधिकार सबके समान होते है जिसमे बालक, युवक और वृद्ध का कोई अंतर नही होता। पारिवारिक सामाजिक और संवैधानिक अधिकारो मे कुछ भिन्नता हो सकती है। बालक जब तक बालिग नही हो जाता तब तक परिवार उसका संरक्षक होता है, मालिक नही। परिवार मे बालक समाज या राज्य की अमानत नही होता बल्कि परिवार का एक सहभागी सदस्य होता है। इसका अर्थ हुआ कि बालक की भी परिवार के सभी प्रकार के लाभ हानि मे बराबर की हिस्सेदारी होती है, भले ही सक्रियता के नाम पर उसकी अन्य सदस्यो से कम ही भूमिका क्यो न हो। समाज बालक का अभिरक्षक माना जाता है और राज्य उसका अनुरक्षक। इसका अर्थ हुआ कि राज्य सिर्फ बालक के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा की चिंता करता है। साथ ही राज्य का यह भी दायित्व है कि परिवार बालक के संरक्षक होने की अपनी सीमाएं तोड तो नही रहा। इसका अर्थ हुआ कि परिवार यदि अपनी सीमाएं तोडकर मालिक के समान व्यवहार करता है तब राज्य हस्तक्षेप कर सकता है। समाज तभी हस्तक्षेप करता है जब परिवार बालक के संरक्षक के कर्तब्य नही करता। इस तरह तीनो की भूमिका अलग अलग होती है। राज्य या समाज विशेष परिस्थितियो मे ही परिवार के आंतरिक मामलो मे हस्तक्षेप कर सकता है अन्यथा सामान्य स्थिति मे नही कर सकता।
साम्यवादी देश पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था के विरोधी होते है तो पश्चिम के देश पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण नही मानते। भारतीय और इस्लामिक व्यवस्था मे परिवार और समाज व्यवस्था को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है। भारत जब पष्चिम का गुलाम हुआ और स्वतंत्रता के बाद जब साम्यवादी विचार धारा की तरफ बढता चला गया तब स्वाभाविक था कि भारत की राज्य व्यवस्था मे भी परिवार और समाज व्यवस्था को तोडने या अमान्य करने की बुरी आदत शुरू हुई। वैसे भी भारत नकल करने के लिये प्रसिद्ध है। इतिहास से प्रमाणित है कि भारत का संविधान बनाने मे भी असल का कोई शब्द भी शामिल नही है। संविधान मे जो कुछ भी लिखा गया है वह सब नकल ही नकल है। इसी नकल के परिणाम स्वरूप भारत मे भी बालिक युवा और वृद्ध के अलग अलग कानून बनने लगे, जबकि परिवार मे तीनो का कोई अलग अस्तित्व होता ही नही है। भारत मे भी पेशेवर लोग, मानवाधिकार, बाल श्रम, पर्यावरण, जल संरक्षण, बंधुआ मजदूरी आदि के नाम पर विदेषी एजेंट के रूप मे दुकाने खोलते रहे है और मानवाधिकर पर्यावरण बालश्रम आदि के नाम पर अच्छा काम कर रही सामाजिक संस्थाओ को किनारे करते जा रहे है। इन पेशेवर लोगो को पश्चिम के देशों से बडी बडी अंतराष्ट्रीय सम्मानजनक पहचान भी दे दी जाती है और इन्हे गुप्त रूप से आर्थिक मदद भी इसलिये दी जाती है कि ये समूह भारत मे बाल श्रम पर्यावरण और मानवाधिकार के नाम पर वर्ग विद्वेष फैला सके, परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था मे टूटन पैदा कर सके। ऐसे पेशेवर लोगो से भारत सरकार भी प्रभावित रहती है और उन्हे सम्मान देने के लिये मजबूर रहती है भले ही वे भारत के लिये सामाजिक कलंक ही क्यों न हो ।
भारत के आम नागरिको को अब तक नही पता कि भारत मे बने कानून के अनुसार परिवार अपने बच्चे से अपने घर या दुकान का काम भी नही करवा सकता । यहां तक कि उसकी सहमति से भी नही। पहली बार नरेन्द्र मोदी सरकार ने जब इस कानून को शिथिल कराने की कोशिश की तो कुछ निर्लज मानवाधिकार प्रेमियो ने तो ऐसे प्रयत्न को रोकने का भी प्रयास किया। मोदी सरकार ने दृढ इच्छा षक्ति के सहारे ऐसे सुधार को स्वीकृति दी। फिर भी बाल श्रम के नाम पर अनेक ऐसे कानून भारत मे बने हुए है जो विकास मे भी बाधक है और पारिवारिक व्यवस्था को भी छिन्न भिन्न करने वाले है। ऐसी परिवार तोडक अंतर्राष्ट्रीय लावी भारत मे भी इतनी मजबूत है कि नरेन्द्र मोदी सरीखा सक्षम प्रधानमंत्री भी अभी उन पर हाथ डालने की हिम्मत नही कर पा रहा। विपक्ष को तो मोदी विरोध के अतिरिक्त उचित अनुचित से कोई मतलब ही नही है। ऐसा प्रमाणित किया जा रहा है जैसे बालक सिर्फ राष्ट्र की सम्पत्ति हो और परिवार उसकी अमानत की सुरक्षा तक सीमित हो। बालिग होने के बाद परिवार बालक को राष्ट्र को समर्पित करने के लिये मजबूर होगा ऐसी अवधारणा मूलतः गलत है। किन्तु भारत की संवैधानिक मान्यता ऐसी ही बनी हुई है। आदर्श स्थिति ऐसी नही मानी जा सकती कि बालक पर राष्ट्र का ही सर्वोच्च अधिकार है। या तो बालक पर परिवार समाज और राज्य का संयुक्त अधिकार माना जा सकता है अन्यथा उसमे परिवार का आधा और समाज राज्य का आधा । यह नही हो सकता कि राज्य बालक के मामले मे सर्वे सर्वा बन जाये। इस लिये व्यक्तिगत रूप से मै इस मत का हॅूूू कि पूरे भारत मे बालश्रम संबंधी बने किसी भी प्रकार के कानून का पूरी तरह विरोध होना चाहिये। साथ ही बालश्रम के नाम पर पेशेवर दुकानदारो का भी पूरा विरोध होना चाहिये चाहे वे कितने भी सम्मानित क्यों न हों।

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