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मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा

Posted By: kaashindia on February 19, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा की गारंटी देती है तो राष्टीय सुरक्षा के अतर्गत सरकार विदेशी आक्रमणो से अपनी सीमाओ की सुरक्षा की व्यवस्था करती है। सामाजिक सुरक्षा के लिये सरकार पुलिस विभाग बनाती है तो राष्टीय सुरक्षा के लिये सेना भर्ती करती है। दोनो ही महत्वपूर्ण हैं किन्तु समाज के लिये दोनो मे से क्या अधिक महत्वपूर्ण है यह विचारणीय है।
कोई भी सरकार सेना को अधिक महत्वपूर्ण मानती है क्योकि उसके लिये सीमाओ की सुरक्षा बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है। समाज पुलिस विभाग को अधिक महत्व देता है क्योकि उसकी सुरक्षा मे सेना की भूमिका नगण्य और पुलिस विभाग की बहुत महत्वपूर्ण होती है। हर अपराधी लगातार यह प्रयत्न करता है कि पुलिस का मनोबल गिरा रहे क्योकि पुलिस ही उसके अपराधीकरण मे बडी बाधा होती है। यहां तक कि अपराधी न्यायालय से उतना नही डरते जितना पुलिस से डरते है। अपराधियो को सेना से कोई विशेष खतरा नही होता। दूसरी ओर दूसरे देश के लोग हमेशा यह प्रयत्न करते है कि पडोसी देश की सेना का मनोबल लगातार गिरा हुआ रहे क्योकि सशक्त सेना ही उसके लिये बडी बाधा होती है। यदि हम भारत का आकलन करे तो सम्पूर्ण भारत मे भी लगभग वही हाल है। भारत का भी हर अपराधी लगातार पुलिस विभाग का मनोबल तोडने का प्रयत्न करता है। किसी भी पुलिस वाले से कोई गलत कार्य हो जाये तो पूरे पुलिस विभाग पर आरोग लगाया जाता है। न्यायपालिका के लोग भी अपने न्यायालय मे पुलिस विभाग के लोगो के साथ बहुत ही नीचे स्तर का व्यवहार करते है। आम आदमी पुलिस विभाग को भ्रष्ट कहने मे गर्व का अनुभव करता है किन्तु जितने भी छापे पडे है उनमे पुलिस वालो की तुलना मे दूसरे विभागो का खजाना कई गुना अधिक पकडा जाता है। हर नेता पुलिस वालो पर गैर कानूनी कार्य करने के लिये दबाव बनाता है और जब पुलिस वाला बदनाम होता है तब वह किनारे हो जाता है। थाने नीलाम होते है और नीलाम करने वाला कभी भ्रष्ट नही कहा जाता है। भ्रष्ट मान जाता है, पुलिस वाला जो नीलामी मे थाने की बोली लगाता है।
दूसरी ओर सेना के सैनिको का सम्मान बना रहे इस बात का प्रयत्न पूरी सरकार करती है, पूरी न्यायपालिका करती है, हर नेता करता है और हर नागरिक से भी चाहता है कि सेना के सैनिक को सर्वोच्च सम्मान दिया जाय। किसी नेता ने पुलिस वालो के पक्ष मे कुछ बोल दिया तो सब उस नेता पर टूट पडते है जबकि किसी नेता ने सिर्फ यह कह दिया कि सैनिक तो जान देने के लिये ही बार्डर पर रहता है तो ऐसे नेता को माफी तक मागनी पडी। अगर कोई सैनिक शहीद होता है तो उसे लगभग एक करोड रूपये की सहायता दी जाती है उसके बाद भी उसके परिवार वाले पचीस तरह का नाटक करते रहते है, जबकि पुलिस वालो के लिये यह राशि बहुत छोटी होती है।
विचारणीय प्रश्न यह है कि पुलिस समाज की सुरक्षा करती है और सेना देश की । फिर भी पुलिस और सेना के बीच इतना अंतर क्यो। पुलिस वालो के पद हमेशा खाली रहते है जबकि सेना का बजट हमेशा बढाने की मांग होती है । भारत मे आंतरिक असुरक्षा लगातार बढती जा रही है जबकि वार्डर के असुरक्षित होने का अभी तक कोई बडा खतरा नही दिखता । इसके बाद भी लगातार समाज मे इस प्रकार की भावना फैलायी जा रही है, जिससे पुलिस का मनोबल गिरा रहे । राष्टीय सुरक्षा के लिये भारत सरकार पूरे प्रयत्न कर रही है। यदि सीमाओ पर कोई असुरक्षा होगी तब भारत सरकार जनता का आहवान करेगी और जनता को ऐसे संकट मे सेना के साथ जुट जाना चाहिये किन्तुु अपराधियो और गुण्डा तत्वो से पुलिस निपटने मे किसी न किसी कारण से कमजोर पडती है तब सरकार या पुलिस के समर्थन मे आहवान के बाद भी कोई नही आता। कोई अपराधी अनेक अपराध करने के बाद भी भ्रष्टाचार या तकनीकी कारणो से निर्दोष सिद्ध हो जाता है तब भी न्यायपालिका से किसी तरह का कोई प्रश्न नही होता। प्रश्न होता है पुलिस से कि उसने ठीक से जांच नही की। ऐसा लगता है जैसे न्यायपालिका का नेतृत्व भगवान के पास हो और पुलिस मे सारे भ्रष्ट लोग भरे हुए है। यदि बार बार न्यायपालिका से मुक्त हुए वास्तविक अपराधी को पुलिस फर्जी मुठभेड मे मार देती है तो सारे निकम्मे नेता मानवाधिकारवादी न्यायालय सभी अपने अपने विलो से निकलकर अपराधी के पक्ष मे चिल्लाना शुरू कर देते है। कोई नही कहता कि पुलिस वाले ने अच्छी नीयत से गैर कानूनी कार्य किया है अर्थात कानून पुलिस वाले को दंडित करेगा किन्तु समाज को इस संबंध मे निर्पेक्ष रहना चाहिये। कश्मीर मे दो सैनिक पाकिस्तान की सेना द्वारा मार दिये जाते है और किसी शहर मे अपराधियो द्वारा चार व्यक्तियो की हत्या कर दी जाती है । कश्मीर मे मारे गये सैनिक और अपराधियो द्वारा मारे गये नागरिक के बीच आसमान जमीन का फर्क होता है। सैनिक नागरिको द्वारा दिये गये वेतन से वहां नियुक्त है और नागरिक वेतन देने वाला मालिक है। कोर्इ्र भी देश प्रेमी मालिक की चिंता बिल्कुल नही करते । मेरे विचार मे राष्टीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा के बीच यह अंतर खतरनाक है। पुलिस विभाग का गिरता मनोबल इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आपराधिक मनोबल बढ रहा है। रामानुजगंज के लोगो ने लीक से हटकर ज्ञान यज्ञ के माध्यम से एक नया प्रयोग किया, जिसमे पुलिस विभाग का मनोबल उंचा करने का प्रयत्न हुआ। उसका परिणाम हुआ कि रामानुजगंज शहर मे देश के अन्य भागो की तुलना मे एक प्रकार के अपराधो का ग्राफ बहुत तेजी से गिरा ।
मै चाहता हॅूु कि हम राष्टीय सुरक्षा के साथ साथ सामाजिक सुरक्षा का भी महत्व समझे। राष्ट्र प्रेम का यह अर्थ नही है कि हम समाज को लगातार कमजोर होने दे । राष्ट और समाज के बीच एक संतुलन होना ही चाहिये जो वर्तमान समय मे बिगड रहा है। राष्ट को ही सरकार और सरकार को ही समाज मान लेने की भूल हो रही है। इस दिशा मे देश के चिंतनशील लोगो को विचार करना चाहिये।
मंथन का अगला विषय-ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?

मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु

Posted By: kaashindia on February 17, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती हैं। शत्रु के साथ व्यवहार करते समय हम किसी भी प्रकार के असत्य और छल कपट का सहारा ले सकते है। शत्रु के साथ व्यवहार में कोई नैतिकता हमारे बीच बाधक नहीं होती। विरोधी के साथ व्यवहार में हम झूठ नहीं बोल सकते भले ही हम सत्य को छिपा ले या पूरी तरह तोड मरोडकर प्रस्तुत कर दे। विरोधी के विरूद्ध हम छल-कपट का प्रयोग नहीं कर सकते। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ आलोचक मात्र है, किन्तु विरोधी नहीं तो हमें विरोधी की तुलना में उसके प्रति और अच्छा मार्ग अपनाना चाहिये अर्थात उसकी कमजोरियों को प्रकट करके अच्छाइयों को आंषिक रूप से छिपा सकते है पूरी तरह नही। यदि कोई तटस्थ समीक्षक मात्र है तो हमें भी पूरी तरह निष्पक्ष रहना चाहिये। ऐसे व्यक्ति की अच्छाई बुराई में से किसी तरफ झुकने की जरूरत नहीं। यदि हम किसी के प्रशंसक है तो हम उसके अच्छे कार्यो को अधिक और गलतियों को कम करके बता सकते है। यदि हम किसी के समर्थक है तो इसकी गलतियों को छिपाकर सिर्फ अच्छाइयो का प्रचार कर सकते है। यदि हम किसी के सहयोगी है तो हम उसके हर अच्छे काम में सहयोग कर सकते है और गलत कार्यो से चुप रह सकते है। किन्तु यदि हम किसी के किसी काम में सहभागी है तो हम उसके उस अच्छे या बुरे काम के सभी परिणामों से संबद्ध रहना होगा। हम अपने सहभागी की मदद से लिये असत्य का भी सहारा ले सकते है।
हमारी दो भूमिकायें हैं। 1. धार्मिक 2. राष्ट्रीय। सामाजिक भूमिका पर हम कोई चर्चा नहीं कर रहे। अमेरिका एक इसाई बहुल देश है। इसाइयों के अतिरिक्त हमें मुसलमानों से भी सम्पर्क रहता है तथा नास्तिक अर्थात साम्यवादियों से भी। यदि हम इसाइयों मुसलमानों तथा साम्यवादियों के बीच तुलना करे तो साम्यवादी सबसे अधिक खतरनाक होते है तो इसाई सबसे कम। साम्यवादी लगभग पूरी तरह भावना शून्य तथा बुद्धि प्रधान होते है तो मुसलमान पूरी तरह भावना प्रधान। हर साम्यवादी व्यक्तिगत आधार पर भी खतरनाक होता है जबकि मुसलमान स्वयं खतरनाक नहीं होता क्योंकि हर साम्यवादी संचालक होता है और आम तौर पर मुसलमान संचालित। साथ ही यह भी सत्य है कि आम तौर पर मुसलमानों का बाहरी लोग ऐसा ब्रेन वाश कर देते है कि वह विचार शून्य होकर उनका अनुकरण करने लग जाता है । इस तरह कुल मिलाकर मुसलमान बुद्धि के मामले में कमजोर होने के कारण अन्य कट्टरपंथी धर्म गुरूओं या साम्यवादियों की लय ताल पर सक्रिय होकर अधिक खतरनाक बन जाता है। इस मामले में इसाइयों का व्यवहार अन्य दो की तुलना में बहुत अच्छा है। साम्यवादी साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लेकर अपना विस्तार करते है तो मुसलमान सिर्फ दंड और भेद के बल पर। इसाई साम, दाम और भेद का प्रयोग करते है। दंड का नहीं करते । इसलिये हम उन्हें कम खतरनाक मानते है। मुस्लिम शासन और इसाई शासन की भारत मे तुलना करे तो दोनो का अंतर स्पष्ट हो जाता है। आज भी भारत में अपनी जनसंख्या बढाने में मुसलमानों और इसाईयों का तुलनात्मक फर्क देखा जा सकता है
हम राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य में अमेरिका की समीक्षा करे। अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है तो अधिकांश साम्यवादी तथा मुस्लिम देश लोकतंत्र और तानाशाही के बीच नाटक करते रहते है। लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें पसंद नहीं तो तानाशाही शब्द भी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। हाल में ही चीन के राष्ट्रपति ने संविधान संशोधन के लिये जनमत संग्रह का नाटक कर दिखाया। रूस भी ऐसा कोई न कोई नाटक करेगा ही। मुस्लिम देशो में भी जनमत संग्रह का नाटक चलता रहता है। किसी मुस्लिम तानाशाह की उसकी हत्या के बाद बहुत दुर्गति होती है और हत्या के पूर्व उसे 95 प्रतिशत तक वोट मिलते है। नकली लोकतंत्र का ऐसा नमूना अधिकांश मुस्लिम और साम्यवादी देशो में देखने को मिल सकता है। इन सबकी तुलना में अमेरिका या अन्य सहयोगी देशो का लोकतंत्र बहुत अच्छा है। अमेरिका आदि देश अन्य देशो को कूटनीतिक या आर्थिक तरीके से जाल मे फंसाकर उन्हे अपने पक्ष में रहने को मजबूर कर देते है जबकि मुस्लिम और साम्यवादी देश सैनिक ताकत को ही अपनी कूटनीति समझते है। आज तक अमेरिका ने किसी भी देश पर सैनिक नियंत्रण नहीं किया जबकि रूस और चीन ने कही भी अपने प्रयासो को नहीं छोडा। हम कह सकते है कि भारत को अमेरिका से कूटनीतिक राजनैतिक अथवा आर्थिक गुलामी का तो खतरा है किन्तु सैनिक गुलामी का नहीं जबकि भारत को चीन या पाकिस्तान से आर्थिक कुटनैतिक या राजनैतिक गुलामी का कोई खतरा नहीं है। यदि है तो सिर्फ सैनिक गुलामी का।
हम जानते है कि अमेरिका एक पूंजीवादी देश है और चीन अर्ध साम्यवादी । भारत भी एक लोकतांत्रिक और पूंजीवादी देश है। भारत अपनी सुरक्षा तक सीमित रहता है। आक्रमण से विस्तार के लिये तो कभी सोचा ही नहीं गया। इस तरह पूंजीवाद और लोकतंत्र के मामले में भारत और अमेरिका स्वाभाविक मित्र होने के कारण बहुत निकटता है तो चीन, रूस अथवा मुस्लिम देशो से भारत की बहुत दूरी है।
हम इस नतीजे पर पहुंच रहे है कि लोकतांत्रिक पूूंजीवादी देश अमेरिका सैद्धांतिक रूप से हमारा विरोधी है ही नहीं। व्यावहारिक धरातल पर जब भारत सरकार चीन ओर रूस की तरफ झुकी हुई थी तब मजबूर होकर अमेरिका को भारत के विरूद्ध पाकिस्तान को खडा करना पडता था । अब भारत अमेरिका के साथ तालमेल बिठा रहा है तब स्वाभाविक है कि अमेरिका भारत का विरोधी देश न होकर उसी तरह एक प्र्रतिस्पर्धी देश के रूप में स्थापित हो रहा है जिस तरह ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा या जर्मनी जापान। मोदी के आने के पूर्व भारत कभी भी अमेरिका के साथ इतना विश्वस नीय नहीं रहा जितना अब है।
यदि हम विरोधी और शत्रु के बीच खोज करे तो चीन हमारा विरोधी देश हो सकता है किन्तु शत्रु नहीं। विरोधी और शत्रु में बहुत अंतर होता है। चीन के साथ भारत का सिर्फ सीमा विवाद है किन्तु सांस्कृतिक रूप से कोई टकराव नहीं है। पाकिस्तान के साथ भारत का कोई सीमा विवाद नहीं है बल्कि सांस्कृतिक विवाद हैं जिसमें पाकिस्तान कट्टरपंथी मुसलमानों के दबाव में भारत से टकराता रहता है और भारत अपनी सुरक्षा के लिये मजबूर है। कश्मीर विवाद कोई भी सीमा विवाद नहीं है बल्कि आम मुसलमानों की विस्तारवादी नीति के कारण जिस तरह सारी दुनियां के सभी देशो में बिना बात का झगडा पैदा किया जाता है, कश्मीर विवाद भी उसी की एक कडी है। मुस्लिम देशो को तो सबके साथ लडना ही है। यदि कोई अन्य देश हो तो उससे लडेगे न हो तो अपनो से लडेंगे। यहां तक कि आमतौर पर मुसलमान स्वप्न मे भी किसी न किसी से अवश्य लडता होगा। जहाॅ शक्तिषाली होते है वहाॅ किसी को न्याय नहीं देते और कमजोर होते है तो इन्हें सबसे न्याय चाहिये। ऐसी परिस्थिति मे भारत के लिये पाकिस्तान की भूमिका विरोधी की न होकर शत्रु की है क्योंकि पाकिस्तान तो न स्वयं संचालित है न लोकतांत्रिक है और न ही पूंजीवादी है बल्कि वह तो कट्टरपंथी इस्लामिक देश है जिससे भारत की शत्रुता स्वाभाविक है।
भारत को हमेशा अमेरिका को प्रतिस्पर्धी चीन को विरोधी और पाकिस्तान को शत्रु देष मानना चाहिये । वर्तमान भारत सरकार अन्य मामलो मे तो लगभग ऐसी नीति पर चल रही है। किन्तु पाकिस्तान को शत्रु देश न मानकर अब तक विरोधी ही मान रही हैं जो पूरी तरह गलत है। भारत के विपक्षी दलो की तो कभी कोई नीति रही ही नही । वे तो सत्ता का विरोध करना ही एकमात्र कार्य मानते रहे है। जब भाजपा विरोध मे थी तो उसकी भी नीतियां ऐसी ही थी जैसी आज कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलो की है। इस मामले मे थोडा सा नीतिश कुमार तथा अखिलेश यादव को अधिक समझदार माना जा सकता है तो अरविन्द केजरीवाल को सबसे कम । फिर भी प्रतिस्पर्धी विरोधी और शत्रु के बीच का फर्क संघ परिवार भी कभी नही कर पाता। संघ परिवार के लोग भी कभी भी अमेरिका का अंध विरोध करने लग जाते है। ये लोग कभी कभी चीन को भी शत्रु की श्रेणी मे डाल देते है जो इनकी नासमझी का प्रतीक है। पाकिस्तान और चीन की मित्रता हमारे लिये सोच समझकर नीति बनाने का अवसर है। हमे चीन के साथ शत्रुता का व्यवहार नहीं बनाना चाहिये भले ही हम सतर्क रहे। साथ ही बिना जरूरत अमेरिका आदि लोकतांत्रिक देशो की सिर्फ इसलिये आलोचना नहीं करनी चाहिये कि वे इसाई देश है। इसाई भारत में हिन्दूओं के भी प्रतिस्पर्धी है। प्रतिस्पर्धा विरोध और शत्रुता के बीच स्पष्ट विभाजन कि सीमा रेखाएं बनी हुई है। अब नासमझ संघ परिवार इन सीमा रेखाओ को बिना सोचे समझे मनमाने तरीके से शत्रुता और मित्रता का निर्धारण करने लगे तो हमे इस संबंध मे बहुत सोच समझकर चलना चाहिये। मेरा यह मत है कि भारत को लोकतांत्रित पूंजीवादी देश के साथ मैंत्रीपूर्ण प्रतिस्पर्धा की नीति पर आगे बढना चाहिये और पाकिस्तान को एक मात्र शत्रु मानकर हमे अपनी सारी नीतियां बनानी चाहिये।

मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।

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समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुंचाई हो। समाज को भी ऐसा अंकुश लगाने का अधिकार नहीं। किन्तु जब कोई अन्य व्यक्ति या व्यक्ति समूह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधक होता है तब उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करने का दायित्व समाज का है। समाज स्वयं में एक अमूर्त इकाई होने से वह प्रत्यक्ष रूप से ऐसी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता। इसलिये समाज ऐसी सुरक्षा की गारंटी के लिये एक तंत्र की नियुक्ति करता है जिसे सरकार कहते है। यह तंत्र बहुत शक्तिशाली होता है क्योंकि उसके पास सेना, पुलिस, वित्त सहित अनेक अधिकार होते है। तंत्र उच्श्रृंखल न हो जाये इसलिये तंत्र के अधिकारों की सीमाएं निर्धारित करने के लिये समाज एक संविधान का निर्माण करता है। तंत्र स्वेच्छा से उस संविधान में कोई फेर बदल नहीं कर सकता। तंत्र स्वयं ही व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक न बन जाये अथवा तानाशाह न हो जाये इसलिये समाज संवैधानिक रूप से तंत्र की शक्तियों को तीन भागों में बाॅटकर रखता है। इन तीन भागों को विधायिका, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के नाम से जाना जाता है। संविधान के अंतर्गत तीनों के अधिकार दायित्व तथा सीमाएं बराबर होती है। तीनों ही एक दूसरे के सहायक भी होते है और नियंत्रक भी। यदि कोई एक अपनी सीमाएं तोडने लगे तब अन्य दो मिलकर उस पर अंकुश लगाते है । यदि तीनों मिलकर सीमाएं तोडने लगे तब संविधान उसमे हस्तक्षेप करता है, अन्यथा नहीं।
तीनो के कार्य क्षेत्र अलग-अलग है। विधायिका न्याय अन्याय को परिभाषित करती है किन्तु वह किसी इकाई के न्याय अन्याय का विश्लेषण नहीं कर सकती। न्यायपालिका किसी इकाई के न्याय-अन्याय के मामले मेंविश्लेषण करके घोषित करती है, किन्तु क्रियान्वित नहीं कर सकती। विधायिका द्वारा परिभाषित और न्यायपालिका द्वारा घोशित न्याय अन्याय का क्रियान्वयन कार्यपालिका करती है। इस तरह तीनों के बीच स्पष्ट कार्य विभाजन है। साथ ही न्यायपालिका को एक विशेष अधिकार प्राप्त है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संविधान अथवा तंत्र द्वारा भी बनायी गई किसी बाधा से व्यक्ति को सुरक्षा दे सकता है। इस तरह न्यायपालिका संविधान से व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षा का भी दायित्व पूरी करती है। यदि संविधान का कोई संशोधन समाज या तंत्र के द्वारा इस प्रकार किया जाता है कि वह व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारो का उल्लंघन करता है तो न्यायपालिका पूरे विश्व समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए उक्त संशोधन को रद्द कर सकती है। इसके अतिरिक्त न्यायपालिका व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान के विरूद्ध हो तो न्यायालय उस कानून को रद्द कर सकता है। यदि कार्यपालिका किसी कानून के विरूद्ध कोई आदेश देती है तो न्यायपालिका ऐसे आदेश को भी रद्द कर सकती है। यदि कार्यपालिका का कोई व्यक्ति किसी कार्यपालिक आदेश के विरूद्ध क्रिया करता है तो न्यायपालिका ऐसी क्रिया को भी रोक सकती है । इस तरह न्यायपालिका को कुछ विशेष अधिकार दिखते है किन्तु वास्तविकता में विशेष अधिकार है नहीं, क्योंकि न्यायपालिका कोइ्र्र विधायी या कार्यपालिक आदेश नहीं दे सकती । वह तो किसी अधिकार के अतिक्रमण को रोक देने तक सीमित रहती है। अप्रत्यक्ष रूप से भी उसे वीटों पावर अर्थात निशेषाधिकार तो प्राप्त है किन्तु विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है।
स्वतंत्रता के बाद विधायिका तत्काल ही उच्श्रृंखल हो गई, क्योंकि उसने संविधान संशोधन का विशेषाधिकार अपने पास सुरक्षित कर लिया था। भारतीय लोकतंत्र में यह विशेषाधिकार समाज के पास होता है और विदेशी लोकतंत्र में आंशिक रूप से समाज की भूमिका होती है तथा साथ ही तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वतंत्रता के समय संविधान बनाने वालो ने भारतीय संविधान बनाते समय बुरी नीयत से संविधान संशोधन के अधिकार से समाज को पूरी तरह अलग कर दिया और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका को भी किनारे करते हुए सारे अधिकार अपने पास समेट लिये। अप्रत्यक्ष रूप से विधायिका तानाशाह बन गई और उसने स्वतंत्रता के प्रारंभ से ही इस अधिकार का खुला दुरूपयोग किया। पंडित नेहरू तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जो लोकतंत्र का मुखौटा पहने हुए थे। उन्होंने सन् 50 में ही न्यायपालिका के पंख कतरने शुरू कर दिये जिसे बाद मे उनकी तानाशाह बेटी इंन्दिरा ने राष्ट्रपति अर्थात कार्यपालिका के पंख कतरकर पूरा किया। इस तरह सारी शक्ति विधायिका के पास आ गई। इस शक्ति के एकत्रीकरण के विरूद्ध कार्यपालिका आज तक उसी स्थिति में है किन्तु न्यायपालिका ने संविधान के विरूद्ध जाकर केशवानंद भारती प्रकरण में अपनी स्वतंत्रता स्थापित करने की शुरूआत की । जब इंदिरा गांधी के बाद विधायिका का एक क्षत्र शासन कमजोर होने लगा तब न्यायपाकिा और मजबूत होने लगी। धीरे-धीरे विधायिका इतनी कमजोर हो गई कि न्यायपालिका के मन मे भी सर्वोच्चता की भूख पैदा हुई और 1995 के आस पास उसने संविधान की मनमानी व्याख्या करके अपनी तानाशाही की शुरूआत कर दी। काॅलेजियम सिस्टम एक ऐसी ही शुरूआत थी। बदनाम विधायिका और कमजोर कार्यपालिका मुकाबला नहीं कर सकी और न्यायपालिका अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करती रही । स्थिति यहां तक आई कि विधायिका की तुलना मे न्यायपालिका के भ्रष्टाचार की अधिक चर्चा होने लगी । किन्तु स्वाभाविक है कि भ्रष्ट दुकानदार किसी भी संभावित बदनाम से नहीं डरता। न्यायपालिका भी ऐसे ही दुकानदार के समान सारी बदनामी झेलते हुए भी ढीठ बनी हुई है। अब परिस्थितियां बदली और नरेन्द्र मोदी ने आने के बाद न्यायपालिका को अपनी औकात में रहने का सबक सिखाना शुरू कर दिया। अब फिर विधायिका अपना रंग दिखा सकती है
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विधायिका और न्यायपालिका मे से क्या कोई सर्वोच्च है और क्या कोई सर्वोच्च हो सकता है लोकतंत्र मे लोक सर्वोच्च होता है, तंत्र नहीं क्योंकि लोक नियुक्त करता है और तंत्र नियुक्त होता है । सिद्धान्त रूप से इन सब में किसी को सर्वोच्च नहीं होना चाहिये और यदि तीनो एक साथ जुट जाये तब भी वे सर्वोच्च नही हो सकते क्योकि संविधान इन सबसे उपर होता है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर इन तीनों नें एकजुट होकर भारतीय संविधान पर अपना नियंत्रण कर लिया और उस आधार पर इन नकली समूहों ने अपने को सरकार कह दिया। संविधान पर नियंत्रण जिसका होगा वही सर्वोच्च होगा । क्योकि लोकतंत्र और तानाशाही मे सिर्फ एक ही फर्क होता है कि लोकतंत्र मे संविधान का शासन होता है तो तानाशाही मे शासन का संविधान । स्पष्ट है कि वर्तमान समय मे लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही चल रही है। क्योकि संविधान तंत्र के नियंत्रण मे है । यदि संविधान पर ही तंत्र का नियंत्रण समाप्त होकर लोक का नियंत्रण हो जाये तो सर्वोच्चता का विवाद सदा के लिये समाप्त हो सकता है। सिद्धान्त रूप से तो यही घोषित है कि लोक ही सर्वोच्च है किन्तु व्यवहारिक धरातल पर न्यायपालिका और विधायिका ने व्यक्ति को अक्षम अयोग्य घोषित करके स्वयं को संरक्षक बता दिया है और संविधान पर अपना नियंत्रण कर लिया है। अच्छा होगा कि इस विवाद को सदा के लिये समाप्त कर दे। इस उद्देश्य से संविधान संशोधन का पूरा अधिकार इनके हाथ से बाहर कर दिया जाना चाहिये। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी ।

मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार

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सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रेजो ने भारत पर इतने लम्बे समय तक शासन किया । व्यापार अनेक राजनैतिक तथा सामाजिक प्रणालियो मे शीर्ष स्थान रख रहा है।
पूराने समय से ही व्यापार के अनेक तरीके प्रचलित रहे है । इन तरीको मे ही एक भय का व्यापार भी शामिल रहा है। ईश्वर या सत्ता का भय दिखाकर हजारो वर्षो से कुछ लोग अपनी दुकानदारी चलाते रहे है। आज भी ईश्वर के भय के नाम पर आशा राम, राम रहीम जैसे चालाक लोग करोडो अरबो का धन इकठठा करते रहे है। भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र भी ऐसा ही भय का व्यापार माना जाता है। अस्तित्वहीन धारणाओ को प्रचारित करके इन तंत्र मंत्रो के आधार पर अनेक लोग फलते फूलते रहे है। आजकल तो एक वास्तुशास्त्र भी बहुत प्रभावी होता जा रहा है। इस तरह भय के व्यापार का पुराना इतिहास रहा है जो वर्तमान मे वैज्ञानिक काल खंड मे भी लगभग उसी तरह प्रभावी है ।
वर्तमान समय मे एक नये प्रकार के भय का व्यापार शुरू हो गया है। पर्यावरण के नाम पर सम्पूर्ण भारत मे एक अदृष्य भय का वातावरण बना दिय गया हैं। बंदना शिवा सरीखे सैकडो लोग इसी व्यापार के माध्यम से अपना जीवन यापन कर रहे है। जिन्होने जीवन मे कभी एक भी पेड नही लगाया वे भी सडक चौडी करते समय कुछ हरे भरे पेडो की कटाई के विरोध मे खडे दिखते है। स्वाभाविक है कि यही उनका रोजगार है। मै देखता हॅू कि हमारे शहर के पास तातापानी सडक किनारे एक छोटा सा पेड आवागमन मे बहुत बाधक बना हुआ है । उस पेड के कारण कई एक्सीडेन्ट भी हो चुके है। किन्तु वह पेड कानूनी प्रक्रिया लम्बी होने के कारण कट नही सकता और यदि कट गया तो अनेक पेशेवर पर्यावरण वादी छाती पीटना शुरू कर देगे। आजकल तो बडे बडे शहरो मे पर्यावरण के नाम पर बीच सडक मे पेड-पौधे लगाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कुछ जगहो पर तो लगे हुए पेड हटाने के नाम पर इतना बडा नाटक खडा किया जाता है कि हंसी आती है। पेड को जड से उखाडकर मशीनो के द्वारा कही दुसरी जगह ले जाकर इस तरह लगाया जाता है जैसे कि कोई जीवित प्राणी हो। पर्यावरण के नाम पर पूरे देष मे कुछ निकम्मो का एक ऐसा गिरोह बना हुआ है, जिनकी रोजी रोटा का यही मुख्य आधार है।
जल अभाव भी एक ऐसा ही माध्यम बना हुआ है। राजेन्द्र सिंह सहित अनेक लोग ऐसा हौवा खडा करते है जिनके आधार पर जल अभाव ही विश्व युद्ध का कारण बनेगा। यह बात लगातार फैलाई जाती है । इसी तरह की काल्पनिक बात इतनी तेजी से फैलाई जाती है कि बहुत लोग इस बात को दूहराना शूरू कर देते है। कितनी बचकाना बात है कि जल अभाव को दुनियां की सबसे बडी समस्या प्रचारित किया जाये, जबकि ऐसी कोई समस्या आंशिक हो सकती है व्यापक नही। एक तरफ ऐसे लोग जल अभाव की बात करते है तथा पानी बचाव आंदोलन चलाते है तो इन्ही लोगो मे से दूसरी टीम पर्यावरण सूरक्षा के नाम पर हवाई जल सिचन अथवा बडे शहरो मे सडको पर पानी छीटने की भी मांग करते है। बडे बडे शहरो मे बीच सडक पर पौधा रोपण करके उनकी सिचाई करना भी कुछ लोगो के लिये आवश्यक कार्य है तो जल अभाव का वातावरण बनाकर पानी बचाव आंदोलन भी कुछ लोगो का रोजगार बन गया है।
हम देखते है कि आमतौर पर कभी वातावरण गरम होने के कारण भयंकर गर्मी के खतरे का समाज मे भय फैलाया जाता है तो कभी हिमयुग आने की कल्पना से समाज को भयभीत किया जाता है। दोनो ही बाते प्रतिवर्ष किसी न किसी रूप मे बहुत वीभत्स स्वरूप देकर समाज मे प्रचलित की जाती है। कभी समझ मे नही आया कि दोनो मे से क्या सही है, और यह खतरा तात्कालिक स्वरूप मे कितना बडा है। यह भी समझ मे नही आया कि इस प्रकार के खतरो को सामान्य समाज मे प्रचारित करना कितना आवष्यक है और क्या समाधान करेगा। स्पष्ट दिखता है कि इस प्रकार के मौसमी वातावरण के काल्पनिक भय विस्तार मे भी कुछ लोगो का रोजगार निहित होता है।
कुछ लोग ग्रीन हाउस गैस का खतरा भी तिल का ताड बना कर प्रस्तुत करते रहते है तो कुछ लोग डीजल पेट्रोल समाप्त होने का खतरा भी लगातार बताते रहते है। कुछ लोग बढती आबादी को भी बहुत बडा संकट बताकर प्रचारित करते रहते है। वे हर मामले मे बढती आबादी को दोष देते है । सामान्य व्यक्ति इस प्रकार के भय से प्रभावित तो होता रहता है किन्तु कुछ समाधान नही कर पाता । मानवाधिकार के नाम पर भी ऐसे अनेक कार्यक्रम चलते रहते है । तीस्ता शीतलवाड का नाम आपने सुना होगा । गुजरात की बडी प्रमुख मानवाधिकार वादी की पोल खुली तो पता चला कि ये सबलोग भय के व्यापार के अतिरिक्त और कोई धंधा नही करते । ऐसे लोगो की संख्या भारत मे हजारो के रूप मे है जो किसी न किसी नाम पर समाज मे काल्पनिक भय का वातावरण बनाकर स्वयं को उसका मुखिया बना लेते है और जीवन भर उनकी दुकानदारी आराम से चलती रहती है।
मै मानता हॅू कि ऐसी समस्याए आंशिक रूप से होती भी है किन्तु ऐसी समस्याओ का तात्कालिक प्रभाव बहुत नाम मात्र का होता है और हजारो वर्षो के बाद ही उनका व्यापक प्रभाव संभावित है । दूसरी बात यह भी है कि उन समस्याओ के समाधान मे आंम लोग कोई भूमिका अदा नही कर सकते क्योकि ये बहुत उचे लेबल का मामला होता है । यहां तक कि इन समस्याओ के विस्तार देने वाले विकसित राष्ट्र ही भारत जैसे देश मे अपने एजेन्डो को सक्रिय करके इन समस्याओ को बढा चढाकर प्रचारित कराते है । यदि ठीक से खोजबीन किया जाय तो पर्यावरण, मानवाधिकार, जल अभाव, गर्मी सर्दी, मौसम, ग्रीन हाउस जैसी अनेक समस्याए विकसित राष्ट्र पैदा करते है। साथ ही इन विकसित राष्ट्रो का एजेन्डा इन्ही विकसित राष्टो के एजेन्ट गुप्त रूप से समाज सेवी संस्थाओ का बोर्ड लगाकर सामाजिक वातावरण मे भय का जहर घोलते है। ऐसे निकम्मे लोगो की फौज छोटे छोटे शहरो तक स्थापित हो चुकी है। आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रकार के अनावश्यक भय के वातावरण से समाज को मुक्त कराया जाय। साथ ही ऐसे पेशेवर लोगो की भी पोल खोली जाय जो अनावश्यक भय का वातावरण बनाकर अपनी रोजी रोटी चलाते रहते है।

मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क

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व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्तियो की सहमति से तथा समाज की स्वीकृति से बनती है। राष्ट्र की कोई भौगौलिक सीमा अवश्य होती है जबकि समाज की कोई भौगोलिक सीमा नहीं हुआ करती।
प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 सामाजिक 2 राष्ट्रीय । व्यक्ति हमेशा समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का। प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार भी अलग अलग होते है। प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्ति के रूप मे जो प्राकृतिक अधिकार मिलते है उन्हे मौलिक अधिकार कहते है । इन प्राकृतिक अधिकारो के आधार पर व्यक्ति समाज का अंग होता है। इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को कुछ संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त होते है जो उन्हे राष्ट्र या राज्य के द्वारा दिये जाते है । इन्हे नागरिक अधिकार कहा जाता है। मै स्पष्ट कर दू कि समाज के सुचारू संचालन के लिये राज्य एक अनिवार्य आवश्यकता होती है। प्राकृतिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है । उनमे कभी कोई भेद नही होता न ही वे अधिकार उसकी सहमति के बिना किसी भी तरह कम ज्यादा किये जा सकते है। नागरिक अधिकार संविधान प्रदत होते है और वे अलग अलग हो सकते है। साथ ही कम ज्यादा भी किये जा सकते है। इस तरह हम कह सकते है कि व्यक्ति समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का । भले ही प्रत्येक व्यक्ति की दोनो भूमिकाए अलग अलग होते हुए भी उसी व्यक्ति मे निहित होती है।
किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसे समाज का अंग नही बनाया जा सकता। न ही उसकी सहमति के बिना उसके उपर कोई कानून थोपा जा सकता है। इसका अर्थ हुआ कि सिद्धान्त रूप से कोई भी व्यक्ति अकेला रह सकता है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर प्रत्येक व्यक्ति को समाज के साथ संबंद्धता उसकी मजबूरी होती है। क्योकि उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी समाज ही देता है। समाज भी उसकी सुरक्षा की गारंटी राज्य के माध्यम से ही देता है। इस तरह दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राष्ट्र की नागरिकता के लिये मजबूर होता है और यह मजबूरी ही उसकी स्वीकृति है। अर्थात कोई भी व्यक्ति अकेला रहने के लिये स्वतंत्र है किन्तु वह अकेला रह नही सकता और उसे व्यक्ति और नागरिक की दोहरी भूमिका निभानी ही होती है।
कोई भी व्यक्ति यदि किसी अन्य देश मे जाता है और रहता है तो उसे भले ही उस देश के नागरिक अधिकार प्राप्त न हो किन्तु उसके सामाजिक अधिकार सुरक्षित रहते है । दुनिया का कोई भी कानून उस व्यक्ति की सहमति के बिना उसके प्राकृतिक अधिकारो मे किसी प्रकार की कोई कटौती नही कर सकता। साथ ही जब कोई व्यक्ति किसी देश का नागरिक बन जाता है तब उसके सारे प्राकृतिक अधिकार तब तक उस देश के संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहमत मान लिये जाते है जब तक वह सहमत है । इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी देश की नागरिकता कभी भी छोड सकता है और वह नागरिक कानूनो से मुक्त हो सकता है। किन्तु जब तक वह नागरिकता नही छोडता तब तक वह उस देश की कानूनो को मानने के लिये बाध्य है। इस तरह आदर्श राजनैतिक व्यवस्था मे किसी भी व्यक्ति को कभी भी देश छोडने से नही रोका जा सकता जब तक उसने कोई अपराध न किया हो। वर्तमान स्थिति यह है कि अनेक देश तो अपने नागरिको को देश छोडने के प्रयत्नो मे गोली तक मार देते है जबकि यह उसकी स्वतंत्रता है क्योकि उक्त व्यक्ति समाज का सदस्य पहले है और राष्ट्र का नागरिक बाद मे । इतना अवश्य है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी देश मे प्रवेश करने के पूर्व अनुमति स्वीकृति आवश्यक है ।
किसी भी देश का कानून उसकी सहमति के बिना व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा नही बना सकता न ही उसे दंड दे सकता है। इसका अर्थ हुआ कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बनाने मे भी उस व्यक्ति की अप्रत्यक्ष सहमति है। इतना अवश्य है कि जिस व्यक्ति ने किसी देश की नागरिकता स्वीकार की है उस देश के सारे कानूनो मे उस व्यक्ति की सहमति मान ली जाती है। इस तरह कानून के अनुसार व्यक्ति को दंडित करना उसकी अप्रत्यक्ष सहमति है।
आज सबसे बडी कठिनाई यह खडी हो गई है कि राष्ट्र और समाज के बीच का अंतर समाप्त हो गया है। आम तौर पर पढे लिखे लोग भी व्यक्ति और नागरिक के बीच का अंतर नही समझते। यह भी जानकारी नही हो पाती है कि मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकार के बीच क्या फर्क होता है। अधिकांश लोग तो राष्ट्र को ही अंतिम इकाई मान लेते है और समाज को राष्ट्र के अंतर्गत कहने लग जाते है। अथवा कुछ लोग समाज के भी कई भाग कर देते है। ये सारा भ्रम जानकारी के अभाव मे फैल जाता है अथवा फैला दिया जाता है। व्यक्ति एक सर्व सम्प्रभुता सम्पन्न प्राकृतिक इकाई के रूप मे होता है और उसकी सहमति के बिना उसी स्वतंत्रता की कोई सीमा नही बनाई जा सकती । इस तरह यदि किसी राष्ट्र मे कोई कानून बनता है तो उस कानून के बनाने मे उस राष्ट्र के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सहमति आवश्यक है। इसका अर्थ हुआ कि जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र से भी उपर समाज का अंग है तब सम्पूर्ण विश्व की भी कोई एक ऐसी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिये जिसकी सहमति या स्वीकृति से ही किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारो को छीना जा सके। अब तक दुनियां मे ऐसी कोई व्यवस्था बन नही सकी है भले ही आंशिक रूप से इस दिशा मे कुछ प्रयत्न हुए भी और धीरे धीरे आगे बढ भी रहे है।
इस तरह व्यक्ति और नागरिक अधिकारो के मामले मे अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे के साथ जुडे हुए होते है। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति के लिये दोनो भूमिकाओ मे रहना उसकी मजबूरी है और उसकी सहमति के बिना कोई भी अन्य उसकी स्वतंत्रता मे कटौती नही कर सकता। आदर्श व्यवस्था यह होगी कि चरित्र निर्माण मे मुख्य भूमिका परिवार और समाज की होनी चाहिये तथा राज्य को विशेष परिस्थिति मे ही हस्तक्षेप करना चाहिये । वर्तमान समय मे व्यवस्था का अर्थ समाज और परिवार से हटकर राज्य तक सीमित हो गया है। परिवार और समाज को किनारे करके राज्य ने सारी व्यवस्था स्वयं तक सीमित कर ली है। दुनियां के राष्ट्रो के बीच आपसी टकराव भी इसी शक्ति संग्रह के परिणाम होते है। उचित होगा कि राज्य परिवार और समाज अपनी अपनी अलग अलग भूमिकाओ को समझे । राज्य इन भूमिकाओ को अलग अलग सक्रिय होने दे और यदि राज्य ऐसा न करे तो व्यक्तियो को चाहिये कि वे राज्य को इस दिशा मे मजबूर करे। व्यक्ति और नागरिक की अलग अलग पहचान और भूमिका स्पष्ट होनी चाहिये जिसका अभाव वर्तमान अव्यवस्था का मुख्य कारण है।
नोट-मंथन का अगला विषय भय का व्यापार होगा।

मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था

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किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम दिया जाता है जिसमे पारिवारिक व्यवस्था भी शामिल होती है। बहुत प्राचीन समय मे व्यक्ति के गुण और स्वभाव के आधार पर परीक्षाए लेकर उनके वर्ण निर्धारित करने की प्रक्रिया बताई जाती है और वर्ण के आधार पर उनका कर्म के अनुसार विभाजन करके जातियां बनती थी। इसका अर्थ हुआ कि व्यक्ति महत्वपूर्ण न होकर चरित्र निर्माण मे व्यवस्था महत्वपूर्ण होती थी । बाद मे धीरे-धीरे व्यवस्था टूटने लगी और व्यक्ति महत्वपूर्ण होने लगे। राजा का बेटा ही राजा और विद्वान का बेटा ही विद्वान घोषित होगा, चाहे उसके संस्कार कैसे भी हो, चाहे उसकी योग्यता कुछ भी क्यो न हो। परिवार का मुखिया भी मां के गर्भ से बनने लगा । इस सामाजिक विकृति के कारण अनेक प्रकर की समस्याएं पैदा हुई ।
जब कोई व्यक्ति व्यवस्था का निर्माता और संचालक साथ साथ होता है उसे तानाशाही कहते है । जब अलग अलग व्यक्ति व्यवस्था के निर्माता और संचालक होते है उसे लोकतंत्र कहते है। किन्तु जब किसी व्यवस्था से प्रभावित सभी लोग मिलकर व्यवस्था बनाते है और उस व्यवस्था के अनुसार सब लोग काम करते है, उस व्यवस्था को लोक स्वराज्य कहते है। पश्चिम के देशो मे लोक स्वराज्य और लोकतंत्र के बीच की राजनैतिक तथा पारिवारिक व्यवस्था काम करती है। भारत सहित दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की राजनैतिक व्यवस्था काम करती है। अधिकांश मुस्लिम और साम्यवादी देशों मे व्यवस्था लगभग पूरी तरह तानाशाही की ओर झुकी रहती है। भारत मे परिवारो की आंतरिक व्यवस्था मे भी तानाशाही का ही प्रभाव प्रमुख होता है। इसका अर्थ हुआ कि व्यवस्था से व्यक्ति नही चलता बल्कि व्यक्ति के अनुसार व्यवस्था चलती है। व्यक्ति के अनुसार व्यवस्था परिवारो मे भी है धार्मिक व्यवस्था मे भी है, राजनैतिक व्यवस्था मे भी है, तथा सामाजिक व्यवस्था भी इससे भिन्न नही है।
व्यक्ति दो प्रकार के होते है। 1 अच्छे 2 बुरे। आज तक दुनियां मे ऐसा कोई भौतिक मापदंड नही बना जिसके आधार पर किसी व्यक्ति को अतिम रूप से अच्छा या बुरा मान लिया जाये। इसका अर्थ हुआ कि यदि व्यक्ति ही व्यवस्था बनाने का काम करेगा तो व्यवस्था के अच्छे या बुरे होने की संभावनाए पचास पचास प्रतिशत ही होगी। क्योकि व्यवस्था बनाने वाला अच्छा आदमी होगा, इसका कोई पैमाना नही है। ऐसी अच्छी बुरी व्यवस्था मे जीने के लिये व्यक्ति समूह मजबूर होगा । इसलिये सारी दुनियां मे लगातार नैतिक पतन हो रहा है। धूर्त लोग व्यवस्था बनाने मे आगे आ जाते है। आप विचार करिये कि हजारो वर्षो से स्वामी विवेकानंद, दयानंद, चाणक्य आदि अनेक महापूरूष सामाजिक व्यवस्था बनाते रहे । आज भी अनेक महापूरूष निरंतर सामाजिक व्यवस्था बनाने मे संलग्न हैं। राजनेता भी लगातार व्यवस्था बनाते रहे है और बना रहे हैं। स्वतंत्रता के तत्काल बाद की राजनैतिक व्यवस्था मे आज की अपेक्षा कई गुना चरित्रवान लोग थे। इन सब प्रयत्नो के बाद भी व्यक्ति का चरित्र नीचे जा रहा है। यहां तक कि चरित्र निर्माण करने वाले महत्वपूर्ण लोगो का भी चरित्र का स्तर गिर रहा है। स्वाभाविक है कि यदि चरित्र निर्माण का कार्य व्यवस्था की अपेक्षा व्यक्ति करेगा तो चरित्र पतन का खतरा निरंतर बना ही रहेगा। यदि व्यक्ति चरित्र निर्माण की भूमिका मे रहेगा तो ऐसा क्या तरीका हो सकता है कि किसी अच्छे व्यक्ति को चुनकर यह दायित्व सौपा जाये? आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति को चुनने वाला व्यक्ति चुने जाने वाले से अधिक चरित्रवान होना चाहिये। किन्तु दुनियां मे ऐसा कोई तरीका न तो आज तक बन सका है न ही बन सकेगा कि सर्वोच्च चरित्रवान को चरित्र निर्माण तथा व्यवस्था बनाने के लिये किसी तरीके से चुना जाये । स्पष्ट है कि अन्ना हजारे , जय प्रकाश नारायण अथवा गांधी ने भी चरित्रवान व्यक्ति को व्यवस्था मे भेजने की वकालत की है किन्तु ये उनके व्यक्तिगत संस्कार हो सकते हैं, उचित मार्ग नही । किसी भी चुनाव द्वारा राजनैतिक प्रणाली मे अच्छे व्यक्ति को चुनकर भेजने की बात पूरी तरह गलत है। न तो कोई अच्छा व्यक्ति कभी चुना जा सकता है न ही उसका अच्छा रहना निश्चित है, तब इस अच्छे व्यक्ति को चुनने की सलाह को मृगतृष्णा से अधिक और कुछ कैसे समझा जाये । मै तो अच्छी तरह समझ चुका हॅू कि चुनाव प्रणाली मे सुधार और अच्छे लोगो को चुनने की बाते अनर्गल प्रलाप के अतिरिक्त कुछ नही है।
तंत्र से जुडे लोगो की संख्या भी सीमित होती है और शक्ति भी । यदि किसी देश मे बन चुके कानूनो की संख्या दो प्रतिशत से अधिक आबादी को प्रभावित करती है तो उक्त कानून को लागु करना कठिन होता है। ऐसे कानून समाज मे भ्रष्टाचार और चरित्र पतन के कारण बनते है। वर्तमान समय मे भारत मे निन्यानवे प्रतिशत लोग कानूनो से प्रभावित है । प्रत्येक व्यक्ति सैकडो कानूनो से प्रभावित होता है। भारत मे चरित्र पतन का मुख्य कारण कानूनो की
बेशुमार संख्या है।
कल्पना करिये की एक ट्रेन मे यात्रा के लिये आप टिकट के लिये लाइन मे खडे है। दुसरे लोग धक्का देकर या भ्रष्टाचार द्वारा टिकट पहले ले लेते है और आप वही के वही खडे है। मन मे तीन तरह के सवाल उठते है । 1 क्या मै वही खडा रहूं और अपनी बारी का इंतजार करता रहूं। 2 क्या मै भी अन्य लोगो की तरह धक्के देकर या भ्रष्टाचार से टिकट प्राप्त कर लूॅ। 3 क्या मै धक्का देने वालो को बल पूर्वक आगे बढने से रोकने का प्रयास करू। आज तक यह निर्णय नही हो सका कि कौन सा कार्य ठीक है। जो लोग चरित्र निर्माण को व्यवस्था से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते है उन्हे उत्तर देना चाहिये कि तीनो मे से कौन सा मार्ग उचित है। मेरे विचार से सिर्फ चौथा मार्ग उचित है और वह है व्यवस्था परिवर्तन । व्यवस्था व्यक्ति की नही होगी बल्कि सामूहिक होगी । सामूहिक व्यवस्था से ही व्यक्ति अपनी सीमाओ मे चलने के लिये मजबूर होगा और यदि नही होगा तो व्यवस्था द्वारा मजबूर कर दिया जायेगा।
कल्पना करिये कि मुझे प्रतिबंधित सडक से सौ फुट चलकर किसी जगह जाना है। यदि स्वीकृत सडक से जायेगे तो एक किलो मीटर की दूरी है और प्रतिबंधित सडक से बहुत नजदीक है । मै देख रहा हॅू कि अनेक लोग मेरे सामने प्रतिबंधित सडक से जाने मे पांच पांच रूपया सिपाही को घूस देकर जा रहे है। मेरे सामने संकट है कि मै क्या करू। मै देखता हॅू कि अनेक लोग गर्व से कहते है कि वे घूस नही देते जबकि मै अपने को तौलता हॅू तो पाता हॅू कि बिना घूस दिये मेरा कोई काम नही होता । गर्व करने वाले मुझे दो नम्बर का व्यक्ति कहकर आत्म संतोष कर लेते है और मै उन लोगो को अव्यावहारिक मानकर अपने उपर गर्व करता हॅू । प्रश्न उठता है कि व्यवस्था मुझे दो नम्बर का कार्य करने के लिये मजबूर कर रही है या मै स्वयं गलत हॅू। मै लम्बे समय तक राजनीति मे रहा। तीस चालीस वर्ष पूर्व राजनीति मे इमानदार लोगो का जो प्रतिशत था वह आज घट कर लगभग शून्य हो गया है। इस पतन का कारण व्यक्ति का गिरता चरित्र नही है बल्कि व्यवस्था की कमजोरियो के कारण मजबूरी है। इक्के दुक्के उच्च चरित्रवान लोग अपने चरित्र के घमंड मे ऐसे व्यावहारिक लोगो का मजाक उडाते है । यदि मुझे कोई यह कहे कि आप जैसे अच्छे चरित्रवान व्यक्ति को ऐसा दो नम्बर का काम नही करना चाहिये था तो आप सोचिये कि मै उस मुर्ख को क्या कहॅू। इसलिये मै इस नतीजे पर पहुॅचां कि व्यक्ति के चरित्र पर व्यवस्था का प्रभाव अधिक पडता है और शिक्षा प्रवचन उपदेश का कम । ये प्रवचन और उपदेश चरित्र वान लोगो को अधिक चरित्र की ओर प्रेरित कर सकते है किन्तु किसी चालाक या धूर्त को किसी तरह चरित्रवान नही बना सकते हैं बल्कि ऐसे दुश्चरित लोगो का ऐसा चरित्र वालो के उपदेश और प्रवचन मार्ग प्रशस्त करते है । यही कारण है कि आज सम्पूर्ण समाज मे चरित्र पतन की गति अधिक से अधिक तेज होती जा रही है । यदि अच्छे लोगो को व्यवस्था मे बिठाने या चुनने की अब्यावहारिक सलाह को पूरी तरह ठुकराकर व्यवस्था को ही ठीक करने का प्रयास किया जाता है तो बहुत कम समय मे चरित्र पतन को रोका जा सकता है। व्यवस्था का प्रभाव चरित्र पर पडता है चरित्र का व्यवस्था पर नही पडता । यह बात स्वीकार करनी चाहिये यह आदर्श वाक्य पूरी तरह भूल जाने की जरूरत है कि यदि अच्छा व्यक्ति सत्ता मे आयेगा तो सब ठीक कर देगा। यह सोच ही अव्यावहारिक है। इसलिये मेरे विचार से चरित्र निर्माण की अपेक्षा व्यवस्था परिवर्तन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिये ।
कुछ निष्कर्ष निकले है-
1 व्यक्ति कितना भी महत्वपूर्ण क्यो न हो किन्तु व्यवस्था से नियंत्रित ही होना चाहिये। व्यवस्था कितनी भी महत्वपूर्ण क्यो न हो किन्तु समाज से नियंत्रित ही होनी चाहिये। वर्तमान समय मे व्यवस्था समाज पर और व्यक्ति व्यवस्था पर हावी होता जा रहा है।
2 संसदीय लोकतंत्र असफल है। इसे सहभागी लोकतंत्र के रूप मे बदलना चाहिये । भारत को इस दिशा मे पहल करनी चाहिये।
3 व्यवस्था समाज के नीचे होती है। व्यवस्था व्यक्ति को नियंत्रित या निर्देषित कर सकती है किन्तु व्यक्ति समूह अर्थात समाज को नही कर सकती।
4 व्यक्ति की तीन अलग अलग भूमिकाएं होती है। जब व्यक्ति होता है तब वह स्वतंत्र होता है। जब वह नागरिक होता है तब व्यवस्था का गुलाम होता है और जब वह समूह मे होता है तब व्यवस्था का मालिक होता है। व्यक्ति को अपनी सीमाएं समझनी चाहिये।
5 संविधान तंत्र को लोक के प्रतिनिधि के रूप मे नियंत्रित करता है। संविधान संशोधन मे तंत्र का हस्तक्षेप शून्य तथा लोक का सम्पूर्ण होना चाहिये।
6 तंत्र से जुडे किसी भी व्यक्ति या समूह को स्वयं प्रबंधक ही मानना और कहना चाहिये, सरकार नहीं। सरकार तो सिर्फ समाज ही हो सकता है, समाज का प्रतिनिधि नहीं। सरकार शब्द अहंकार भरा है मालिक का बोध कराता है तथा घातक है।7 कानूनो की मात्रा जितनी अधिक होती है चरित्र पतन भी उतना ही अधिक होता है। कानून का पालन करने वाले कानून तोडने के लिये मजबूर हो जाते है और कानून के रक्षक भ्रष्ट । बहुत थोडे से कानून रखकर अन्य सारे कानून हटा लेने चाहिये ।

मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?

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दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है कि बुद्धि प्रधान लोगो मे हमेशा ही श्रम का शोषण किया । वर्ण व्यवस्था को कर्म के आधार से हटाकर जन्म के आधार पर कर दिया गया और सारे सम्मान जनक कार्य अपने लिये आरक्षित कर लिये गये, चाहे योग्यता हो या न हो। विदेशो मे भी सस्ती कृत्रिम उर्जा का अविस्कार करके श्रम शोषण के अवसर खोज लिये गये । स्वतंत्रता के बाद भारत के बुद्धिजीवियो ने भी उसी का अनुसरण किया और कभी कृत्रिम उर्जा के मूल्य को नही बढने दिया। उसी तरह विदेशो की नकल करते हुए भारत मे एक शिक्षित बेरोजगारी शब्द प्रचलित कर दिया गया जिसके माध्यम से रोजगार के अवसरो मे भी बुद्धिजीवी अच्छे अवसर प्राप्त करने लग गये । इन लोगो ने शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित करने का भी पूरा प्रयत्न किया तथा गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओ पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर खर्च करना शुरू कर दिया। आज भी भारत का हर बुद्धिजीवी सस्ती कृत्रिम उर्जा षिक्षा पर बजट शिक्षित बेरोजगारी जैसे शब्दो का धडल्ले से प्रयोग करता है। आज भी भारत मे ऐसा कोई बुद्धिजीवी नही दिखता जो शिक्षा का बजट बढाने की बात न करता हो।
कोई भी शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार नही हो सकता। वह तो उचित रोजगार की प्रतीक्षा मे रहता है। श्रमजीवियों के पास रोजगार का एक ही माध्यम होता है शारीरिक श्रम जबकी शिक्षित व्यक्तियो के पास शारीरिक श्रम तो होता ही है साथ साथ शिक्षा उनके पास अतिरिक्त साधन के रूप मे होती है। मै आज तक नही समझा कि कोई भी व्यक्ति शिक्षित होने के बाद भी बेरोजागर कैसे हो सकता है। इन लोगो ने बेरोजगारी शब्द की भी एक नकली परिभाषा बना दी। एक भूखा व्यक्ति दो सौ रूपये मे काम करने को मजबूर है, किन्तु उसका नाम बेरोजगारो की सूची मे नही है। दूसरी ओर एक पढा लिखा व्यक्ति 200 रूपये मे काम करने को तैयार नही है। कुछ लोग तो हजार रूपये प्रतिदिन पर भी नौकरी न करके अच्छी नौकरी की खोज मे लगे रहते हैं किन्तु वे बेरोजगार की सूची मे है। विचार करिये कि ऐसे शोषक बुद्धिजीवियों को श्रमजीवी षिक्षा प्राप्त करने मे भी टैक्स दे ओर शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनके रोजगार की व्यवस्था करे किन्तु इन तथाकथित शिक्षित बेरोजगारो को कभी शर्म नही आती। और वे हमेशा समाज से और सरकार से कुछ न कुछ मांग करते रहते है।
यदि हम बेरोजगारी का सर्वेक्षण करे तो खेतो मे काम करने के लिये आदमी नही मिलते और सरकारी नौकरी के लिये इतनी भीड उमडती है क्योकि दोनो के बीच मे सुविधा और सम्मान का बहुत ज्यादा फर्क है। यही कारण है कि आज शिक्षा प्राप्त करने के लिये एंव षिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिये भाग दौड दिखाई देती है।
दुनियां मे पहली बार वर्तमान सरकारो ने इस विषय पर कुछ करने की हिम्मत दिखाई है । विहार मे नीतिश कुमार और उत्तर प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ ने परीक्षाओ मे नकल रोकने की पहल की। मै जानता हॅू कि इस पहल के विरूद्ध इन दोनो पर कितना दबाव पडा किन्तु ये अव तक अडिग है । इसी तरह पहली बार केन्द्र सरकार ने छोटे छोटे स्वतंत्र रोजगार को भी रोजगार कहने का खतरा उठाया। देश भर के बुद्धिजीवियो ने पकौडा पोलिटिक्स कहकर इस अच्छे प्रयास का मजाक भी उडाया और विरोध भी किया । ऐसा सिद्ध किया गया जैसे शिक्षित बेरोजगारो का अपमान किया जा रहा है। सच्चाई यह है कि आज तक जिस तरह लधु उद्योग और श्रम का अपमान किया जाता रहा उस अपमान पर मरहम लगाने की आवश्यकता थी। टीवी पर बहस सुनकर ऐसा लगा जैसे पकौडा बेचना बहुत नीचे स्तर का कार्य है और पकौडा बेचने वालो से टैक्स लेकर शिक्षा प्राप्त करना तथा शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिये भाग दौड करना बहुत अच्छा कार्य है। मेहनत करने वाला नीचे स्तर का आदमी है और कुर्सी पर बैठकर मेहनत करने वालो का रस चूसने वाला सम्मानित । शिक्षित बेरोजगारी के नाम पर ऐसे लोगो ने जिस तरह श्रम के साथ अन्याय किया वह बहुत ही कष्ट दायक रहा है। अब इस विषय पर कुछ सोचने की आवश्यकता है। मै तो धन्यवाद दूंगा मोदी जी को जिन्होने सारे खतरे और विरोध झेलकर भी पकौडा पोल्टिक्स का मूहतोड जबाब दिय। शिक्षित बेरोजगारी का हल्ला करने वालो का मुंह बंद हो गया।
आदर्श स्थिति यह होगी कि अब सम्पूूर्ण नीति मे बदलाव किया जाये और श्रम शोषण के सभी बुद्धिजीवी षणयंत्रो से श्रम को बचाया जाय । देश के विकास की गणना श्रम मूल्य वृद्धि के आधार पर होनी चाहिये। शिक्षा का पूरा बजट रोककर श्रमिको के साथ न्याय पर खर्च होना चाहिये। गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन, वन उत्पादन, पर से सारे टैक्स हटाकर कृत्रिम उर्जा पर लगा देनी चाहिये। जो शिक्षा प्राप्त लोग श्रमजीवियो की तुलना मे अधिक लाभ के पद पर है उन्हे अधिक टैक्स देना ही चाहिये। इसी तरह बेरोजगार की परिभाषा भी बदल देनी चाहिये। किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित न्यूनतम श्रम मूल्य पर योग्यतानुसार काम का अभाव बेरोजगारी की सही परिभाषा होती है। जो व्यक्ति न्यूनतम श्रममूल्य पर योग्यतानुसार काम नही करना चाहता वह उचित रोजगार की प्रतिक्षा मे है बेरोजगार नही। उसे प्रतिस्पर्धा के माध्यम से रोजगार की पूरी स्वतंत्रता है किन्तु उसे समाज और सरकार की दया की पात्रता नही है। श्रम के साथ अन्याय करने मे सबसे अधिक भूमिका साम्यवादियो की रही है। वे कभी कृत्रिम उर्जा का मूल्य नही बढने देते । वे कभी शिक्षित बेरोजगारी की परिभाषा नही बदलने देगे। वे कभी नही चाहते कि श्रम का मूल्य बढे । वे तो श्रम का का मूल्य इस प्रकार बढवाना चाहते है जिससे समाज मे श्रम की मांग घटे और श्रम जीवियो के हाथ से रोजगार निकल कर मषीनो के पक्षमे चला जाये। अब साम्यवाद से मुक्ति मिल रही है और साथ ही षिक्षित बेरोजगारी के बुद्धिजीवियो के षणयंत्र से भी मुक्ति मिलनी चाहिये।
मै मानता हॅू कि षिक्षा श्रम के अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु दोनो के बीच इतना असंतुलन नही होना चाहिये। शिक्षा को ज्ञान का माध्यम मानना चाहिये रोजगार का नही। शिक्षा को श्रम शोषण का आधार नही बनाया जा सकता जैसा कि आज हो रहा है। जिस तरह नौकरी की चाहत वालो ने श्रमिक रोजगार का मजाक उडाया और उसे कुछ राजनैतिक समर्थन मिला वह चिंता का विषय है। नौकर मालिक की गरीबी का पकौडा बेचने वाला कहकर मजाक उडावे यह गलत संदेष है। इस बात पर सोचा जाना चाहिये। मेरे विचार मे निम्नलिखित निष्कर्षो पर मंथन होना चाहिये।
1 प्राचीन समय से ही दुनियां मे श्रम के साथ बुद्धिजीवियो का षणयंत्र चलता रहा है । भारत मे भी निरंतर यही होता रहा है और आज भी हो रहा है। इसे बदलना चाहिये।
2 कोई भी शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार नही हो सकता क्योकि बेरोजगारी का संबंध शारीरिक श्रम से है और शिक्षित व्यक्ति के पास शारीरिक श्रम के अतिरिक्तशिक्षा भी एक अतिरिक्त माध्यम होता है।
3 गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर खर्च करना और फिर ऐसे शिक्षित लोगो को रोजगार देने का प्रयास श्रमजीवियों के साथ अन्याय है।
4 शिक्षित बेरोजगार शब्द श्रम शोषण का षणयंत्र है क्योकि इस षणयंत्र के अंतर्गत बुद्धिजीवियो ने बेरोजगारी की परिभाषा बदल दी है।
5 बेरोजगारी के अच्छी परिभाषा यह है कि किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित न्यूनतम श्रम मूल्य पर योग्यता नुसार काम का अभाव
6 शिक्षा या तो ज्ञान के लिये हे या रोजगार के लिये । यदि नौकरी के लिये होने लगे तो वह निकृष्ट प्रयत्न है।
7 दुसरो के टुकडो पर पलने वाले शिक्षार्थी तथा नौकरी मांगने वाले भिखारी स्वतंत्र श्रमिक की अवहेलना करने यह विदेशी मानसिकता है, भारतीय नही। इसे निरूत्साहित करने की आवश्यता है।
8 योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश मे कडाई से नकल रोकने तथा नरेन्द्र मोदी ने शिक्षित बेरोजगारी शब्द पर आक्रमण करके बहुत हिम्मत का काम किया है। इनका पूरा पूरा समर्थन करना चाहिये।
9 गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन वन उत्पादन आदि से सभी टैक्स हटाकर कृत्रिम उर्जा पर लगा देनी चाहिये। साथ ही शिक्षा का बजट पूरी तरह बंद करके उसे कृषि पर खर्च करना चाहिये।

मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक

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कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है
1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अनुशासन का नाम विवाह है।
2 प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है। उसकी सहमति के बिना उसकी कोई सीमा नही बनाई जा सकती। विवाह ऐसी सीमा बनाने का एक सहमत प्रयास है।
3 जब तक किसी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारो पर आक्रमण न हो तब तक राज्य को उसमे कोई हस्तक्षेप नही करना चाहिये।
4 यदि किसी व्यक्ति की कोई स्वतंत्रता समाज पर दुष्प्रभाव डालती है तब समाज उसे अनुशासित कर सकता है, किन्तु बाधित नही।
5 रक्त संबंधो के शारीरिक संबंधो से संतानोत्पत्ति पूरी तरह वर्जित है। फिर भी इसे अनुशासित ही कर सकते है प्रतिबंधित नही ।
6 चार उद्देश्य के संयुक्त लाभ के लिये विवाह व्यवस्था बनाई गई है 1 इच्छा पूर्ति 2 संतानोत्पत्ति 3 सहजीवन की ट्रेनिंग 4 वृद्ध माता पिता की कर्ज मुक्ति।
7 स्वतंत्रता, उच्चश्रृखलता तथा अपराध अलग अलग होते है । स्वतंत्रता असीम होती है, उच्चश्रृखलता को समाज अनुषासित कर सकता है, तथा अपराध रोकना राज्य का दायित्व है।
रक्त संबंधो के अंतर्गत संतानेत्पत्ति को सम्पूर्ण मानव समाज मे वर्जित किया गया है। मै नही कह सकता कि यह प्रतिबंध वैज्ञानिक है अथवा परम्परागत । किन्तु यह प्रतिबंध सारी दुनियां मे मान्यता प्राप्त है। प्राचीन समय मे शरीर विज्ञान जितना विकसित था उस आधार पर इस मान्यता को अस्वीकार करने का कोई आधार भी नही दिखता । इसलिये आवश्यक है कि भिन्न परिवारो के लडके और लडकियां के एक साथ रहने की सामाजिक व्यवस्था की जाये । भिन्न परिवारो के स्त्री पूरूषो को एक साथ जीने की व्यवस्था ही विवाह पद्धति है। विवाह के चार लक्ष्य निर्धारित है। शारीरिक इच्छा पूर्ति 2 संतानोत्पत्ति 3 सहजीवन की ट्रेनिग 4 माता पिता से ऋण मुक्त होना। प्राचीन समय मे शारीरिक इच्छा पूर्ति की तुलना मे अन्य तीन को अधिक प्राथमिकता प्राप्त थी। किन्तु पिछले कुछ वर्षो से शारीरिक इच्छा पूर्ति को अन्य तीन की तुलना मे अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इस बदलाव के कारण परिवार व्यवस्था भी टूट रही है तथा अनेक सामाजिक विकृतियां पैदा हो रही है। इस अव्यवस्था पूर्ण बदलाव मे साम्यवादी विचार की सबसे अधिक भूमिका पाई जाती है। जे एन यू संस्कृति उच्श्रृखलता को हमेशा प्रोत्साहित करती है। क्योकि वर्ग संघर्ष का विस्तार साम्यवाद का प्रमुख आधार है और जे एन यू संस्कृति उसकी प्रमुख संवाहक ।
पारंपरिक विवाह मे तीन का समिश्रण आवश्यक था 1 वर वधु की स्वीकृति 2 परिवार की सहमति 3 समाज की अनुमति । जब विवाह पद्धति मे कुछ विकृतियां आई और बाल विवाह को अधिक प्रोत्साहन दिया जाने लगा तब वर वधु की स्वीकृति की प्रथा बंद हो गई। यहां तक कि कई बार तो ब्राम्हण और ठाकुर ही मिलकर विवाह तय कर देते थे जिसे परिवार समाज तथा वर वधु को मानना पडता था। जब विवाह प्रणाली मे भ्रष्टाचार होने लगा तब परिवार के सदस्यो ने कमान संभाली और जब परिवार के सदस्य भी दहेज के लालच मे बेमेल विवाह कराने लगे तब यह कार्य वर वधु ने अपने हाथ मे ले लिया। किन्तु इस बदलाव के भी दुष्परिणाम देखने मे आये क्योकि अनेक मामलो मे वर वधुओ ने शारीरिक इच्छा पूर्ति को एक मात्र प्राथमिकता देनी शुरू कर दी । यह भी एक विकृति है जो बहुत जोर पकड रही है और इसके परिणाम स्वरूप समाज मे समस्याएं पैदा हो रही है। इस विकृति के कारण परिवार टूट रहे है बच्चो के संस्कार बिगड रहे है तथा वृद्ध माता पिता के साथ भी संबंध खराब हो रहे है।
यह स्पष्ट है कि वर्तमान विवाह प्रणाली बहुत दोष पूर्ण है क्योकि विवाह मे सिर्फ वर वधु ही एक साथ नही होते बल्कि दो परिवारो का मिलन होता है, तथा कुछ सामाजिक प्रभाव भी होता है । परिवार और समाज का अनुशासन पूरी तरह हट जाने से समाधान कम और समस्याए अधिक बढ रही है। फिर भी यह उचित नही होगा कि विवाह की पारंपरिक प्रणाली को ही आवश्यक कर दिया जाय। दोनो ही प्रणालियों मे अपने अपने गुण दोष है, इसलिये एक तीसरी प्रणाली को विकसित किया जाना चाहिये जिसके अनुसार वर वधु कोे विवाह मे स्वीकृति आवश्यक हो किन्तु परिवार की सहमति और सामाजिक अनुमति को भी किसी न किसी स्वरूप मे शामिल किया जाय। इसका अर्थ हुआ कि यदि कोई व्यक्ति इस अनुशासन को तोडकर विवाह करता है तो ऐसे विवाह को परिवार अस्वीेकृत कर सकता है और समाज भी बहिस्कृत कर सकता है। फिर भी परिवार और समाज को किसी भी रूप मे यह अधिकार नही होगा कि वह दोनो के संबंधो मे कोई बाधा उत्पन्न कर सके। हर प्रकार को प्रेम विवाह को स्वीकृति तो देनी ही होगी । भले ही आप उसे बहिस्कृत कर सकते है। वर वधु को पति पत्नी के रूप मे रहने की स्वतंत्रता है किन्तु यह बाध्यता नही हो सकती कि माता पिता बिना सहमति के सास ससुर मान लिये जाये। इस तरह समाज का और परिवार को यह कर्तब्य होगा कि वह प्रेम विवाह को निरूत्साहित करे, प्रोत्साहित नहीं जैसा कि वर्तमान मे हो रहा है। संपिड विवाह प्रत्येक व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता है किन्तु समाज द्वारा निषिद्ध है। इसका अर्थ हुआ कि रक्त संबंधो के अंतर्गत किसी भी विवाह को पूरी तरह अमान्य का देना चाहिये, किन्तु ऐसे संबंधो केा भी आप बल पूर्वक नही रोक सकते। उन्हे आप प्राथमिकता के आधार पर बहिस्कृत ही कर सकते है। वर्तमान परम्परागत परिवार व्यवस्था संपिड संबंधो पर नियंत्रण का एक बहुत ही अच्छा तरीका है जहां भाई बहन के बीच यौन आकर्षण को भावनात्मक रूप से विकर्षण के रूप मे बदल दिया जाता है । अर्थात बचपन से ही परंपरागत रूप से व्यक्ति के स्वभाव मे ऐसी भावना शामिल हो जाती है कि वह परिवार के सदस्यो के प्रति आमतौर पर आकर्षित नही होती। बल्कि आम तौर पर विकसित होती है।
विवाह प्रणाली कैसी हो और कैसे हो यह या तो वर वधु का विषय है अथवा परिवार का या विशेष स्थिति मे समाज का । इस मामले मे किसी भी रूप मे सरकारी कानून का कोई हस्तक्षेप नही होना चाहिये।
परम्परागत विवाहो की तीन मान्यताए है। 1 हिन्दूओ मे विवाह को जन्म जन्मांतर का संबंध माना गया है, तो इसाइयों मे स्त्री पूरूष के बीच आपसी समझौता और मुसलमानो मे पूरूष द्वारा महिलाओ का उपयोग। वर्तमान दुनियां मे भारतीय परम्पराये कमजोर पड रही है तथा इस्लामिक विवाह पद्धति को अमानवीय समझा जा रहा है। परस्पर समझौता की प्रणाली की ओर सारी दुनियां बढ रही है । मेरे विचार से यह व्यवस्था कोई गलत भी नही है। जिस प्रणाली के आधार पर परिवार व्यवस्था का सुचारू संचालन हो सके उस व्यवस्था को चलने देना चाहिये चाहे वह कोई भी व्यवस्था क्यो न हो। इसके बाद भी इस्लाम की व्यवस्था पूरी तरह गलत है क्योकि उस व्यवस्था मे स्वतंत्रता और समानता को पूरी तरह एक पक्षीय तरीके से बाधित किया गया है । पद्धति चाहे कोई भी हो, किसी भी प्रकार से चले किन्तु वह व्यक्ति परिवार और समाज तक ही सीमित हो सकती है। राज्य की उसमे किसी प्रकार की कोई भूमिका नही हो सकती । भारत की परंपरागत प्रणाली मे राज्य की किसी प्रकार की कोई भूमिका थी भी नही। यह तो अंग्रेजो के आने के वाद राज्य अपनी दादागीरी करने लगा। राज्य ने इस प्रणाली मे अनावष्यक छेडछाड की, प्रतिबंध लगाये और तोडफोड पैदा की। वाल विवाह, दहेज प्रथा, वैश्यावृति नियंत्रण, बारबाला प्रतिबंध, बहु विवाह प्रतिबंध, महिला सशक्तिकरण, युवा वृद्ध सशक्तिकरण सहित ऐसे कानून बना दिये गये जिन्होने इस सामाजिक व्यवस्था को विकृत कर दिया। जब प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक स्वतंत्रता है तब पति पत्नी को अलग अलग होने से राज्य कैसे रोक सकता है। कोई भी किन्ही दो व्यक्तियो को अलग अलग होने से किसी भी कानूुन के अंतर्गत नही रोक सकता किन्तु भारत मे तलाक के लिये भी सरकार की अनुमति लेनी पडती है । दो लोग आपसी सहमति से शारिरीक संबंध बनाते है तो इसमे सरकार का हस्तक्षेप क्यो? दो लोग विवाह करने के लिये आपस मे सहमति से पैसे का लेन देन करते है तो इसमे सरकर का दखल क्यो? निकम्मी सरकारे बलात्कार तो नही रोक सकती किन्तु वेष्या जैसे घृणित कार्य को रोकने के लिये पहरा करती है। हम किस उम्र मे विवाह करते है कितने विवाह करते है, कब संबंध विच्छेद करते है अथवा हम अपने परिवार मे महिला को सशक्त रखना चाहते है या पूरूष को ये सब परिवार के आंतरिक मामले है, कानून के नही । कानून अपने दायित्व पूरे नही कर पाता और महिला पूरूष के बीच सहमत और आंतरिक संबंधो मे हस्तक्षेप करता है । किसी भी प्रकार का कोई भी सरकारी हस्तक्षेप गलत है । आज कल की सरकारे तो प्रेम विवाह तक को प्रोत्साहित कर रही हैं जो पूरी तरह गलत है। प्रेम विवाह किसी भी स्थिति मे न तो प्रोत्साहित किया जा सकता है न ही उसे कानून से रोका जा सकता है। समाज इसे बल पूर्वक रोकना चाहता है और सरकार प्रोत्साहित करती है।
मेरे विचार से विवाह प्रणाली को परिवार और समाज के साथ अनुशसित होना चाहिये । प्रेम विवाह का प्रोत्साहिन बंद होना चाहिये। विवाह तलाक दहेज जैसे किसी भी मामले मे सरकार का हस्तक्षेप बंद होना चाहिये। सहमत सेक्स प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसे किसी भी परिस्थिति मे किसी कानून अथवा बल प्रयोग द्वारा नही रोका जा सकता ऐसी सामाजिक धारणा बननी चाहिये। साथ ही यह विचार भी आना चाहिये कि परिवार व्यवस्था सहजीवन की पहली पाठशाला है। उस पाठषाला मे प्रवेश करने के लिये विवाह व्यवस्था एक अच्छा समाधान है। यह बात भी आम लोगो को समझाई जानी चाहिये । परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के प्रति जो विरोध का वातावरण राजनेताओ तथा विषेष कर वाम पंथियो द्वारा समाज मे बनाया जा रहा है इसे भी पूरी तरह रोका जाना चाहिये और हर तरह का ऐसा प्रयत्न होना चाहिये जिसमे विवाह की पवित्रता बनी रहे।
आजकल न्यायालय भी इन मामलो मे बिना सोचे समझे निर्णय कर रहे है । लिव इन रिलेशन शिप व्यक्ति की स्वतंत्रता तो है किन्तु उसे सामाजिक मान्यता नही दी जा सकती। यदि न्यायालय लिव इन रिलेशन शिप को सामाजिक मान्यता दे देते है और विवाह प्रणाली पर कानूनी प्रावधान लागु करते है तो स्वाभाविक है कि विवाह प्रणाली निरूत्साहित होगी और लिव इन रिलेशनशिप प्रोत्साहित। स्वाभाविक है कि ऐसे प्रयत्नो से प्रेम विवाह प्रोत्साहित होगे और परिवार सहमति के विवाह निरूत्साहित। खाप पंचायत के आपराधिक आदेशो को रोका जा सकता है किन्तु गिने चुने आपराधिक हस्तक्षेप को माध्यम बनाकर खाप पंचायतो के सामाजिक प्रयत्नो को नही रोका जा सकता। आज कल देखने मे आ रहा है कि भारत के न्यायालय जब मन मे आता है तब कानून का सहारा ले लेते है और जब मन मे आता तब जनहित को परिभा शित करने लग जाते है। न्यायालयो को भी इस मामलो मे और अधिक गंभीर होना चाहिये विवाह संबंध दो व्यक्तियो के संबंध है, दो परिवारो के संबंध है और समाज व्यवस्था को ठीक ढंग से विकसित करने का एक बडा माध्यम है। उससे खिलवाड करना ठीक नही।

मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा

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कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।
1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तुलना मे अमीर।
2 राज्य का दायित्व सुरक्षा और न्याय तक सीमित होता है। अन्य जनकल्याणकारी कार्य राज्य के स्वैच्छिक कर्तब्य होते है, दायित्व नहीं
3 गरीबी और अमीरी शब्द का प्रचार वर्ग विद्वेश के उददेश्य से अधिक होता है, समाधान के लिये कम।
4 हर राजनेता आर्थिक समस्याओ को बहुत बढा चढाकर प्रस्तुत करता है जिससे समाज राजनैतिक असमानता के विषय मे कुछ न सोचे।
5 गरीबो की मदद करना समाज तथा राज्य का कर्तव्य होता है, गरीबो का अधिकार नही।
6. गरीब अमीर शब्द भ्रम मूलक हैं। सन्यासी या विद्वान आर्थिक मापदण्ड पर गरीब होता है और सुविधा सम्मान में अमीर।
राज्य का दायित्व होता है कि प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा मे किसी को भी किसी भी परिस्थिति मे किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करने दे। किन्तु जो लोग बिल्कुल अक्षम है और किसी भी प्रकार की कोई प्रतिस्पर्धा नही कर सकते उनकी जीवन सुरक्षा के लिये राज्य का कर्तव्य है कि वह उचित प्रबंध करे। मै स्पष्ट कर दूं कि कमजोरो की मदद करना राज्य का कर्तब्य होता है दायित्व नही । राज्य द्वारा किये गये ऐसे प्रबंध को ही गरीबी उन्मूलन कहते है। यह राज्य का स्वैच्छिक कर्तब्य होता है किन्तु राज्य इस कर्तब्य को दायित्व के समान पूरे करता है।
पूरी दुनियां मे प्रत्येक व्यक्ति के लिये गरीबी रेखा का एक निष्चित मापदंड बना हुआ है । उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम इतना भोजन अवश्य मिलना चाहिये जिससे उसे 2100 कैलोरी उर्जा मिल सके। भारत मे इस आधार पर गरीबी रेखा का न्यूनतम मापदंड 30 रूपया प्रति व्यक्ति प्रतिदिन निर्धारित किया गया है । इसका अर्थ हुआ कि यदि किसी व्यक्ति को पूरे प्रयत्न करने के बाद भी प्रतिदिन 30 रूपया से कम का भोजन प्राप्त होता है तो वह मानवीय आधार पर कम है और उसे गरीबी रेखा के नीचे मानना चाहिये। इस आधार पर यदि पूरे भारत का आकलन किया जाये तो करीब पंद्रह करोड लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते है, जिन्हे सरकारी सहायता से पूरा किया जाता है। इसका आकलन इस प्रकार किया गया है कि पांच व्यक्ति के एक परिवार की आय प्रतिदिन 150 रूपया से कम है तो वह गरीबी रेखा के नीचे है क्योकि परिवार मे औसत एक व्यक्ति कमाने वाला माना जाता है।
जिस तरह किसी जीवन स्तर से नीचे वाले के लिये गरीबी रेखा बनाई गई है उसी तरह कुछ लोग अमीरी रेखा की भी मांग करते है जो पूरी तरह गलत है। अमीरी रेखा का अर्थ यदि रेखा से उपर वालो से टैक्स वसूलने तक सीमित हो तो इस तरह की कोई रेखा मानी जा सकती हेै जिसके नीचे वाले कर मुक्त और उपर वाले करदाता होगे। किन्तु ऐसी कोई अमीरी रेखा नही बनाई जा सकती है जो किसी सीमा से उपर सम्पत्ति पर रोक लगा सके। क्योकि सम्पत्ति संग्रह प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है और कोई भी अन्य उसकी स्वतंत्रता मे बाधा नही पहुंचा सकता।
समाज मे अनेक लोग ऐसे है जो निरंतर गरीबी रेखा को 30 रूपये से आगे बढाने की मांग करते है। सुनने मे तो यह मांग बहुत आकर्षक दिखती है किन्तु है बहुत घातक । सरकार के पास गरीबी रेखा के नीचे वालो की मदद के लिये कुल मिलाकर जितना धन होता है उक्त धन की मात्रा बढाये बिना गरीबी रेखा का स्तर नही बढाया जा सकता है। यदि गरीबी रेखा का स्तर 30 रूपये से अधिक कर दिया गया तो जो वास्तविक गरीब है उन्हे प्राप्त सहायता मे कटौती करनी होगी। इसलिये ऐसी मांग बिल्कुल भी उचित नही है। आज भारत मे 30 रूपये से भी कम मे जीवन यापन करने वालो की संख्या जब करोडो मे है तब बिना साधनो के जुटाए इसे 30 रूपये से आगे बढाना बिल्कुल उचित नही है। पूरे देश मे यह बात भी प्रचारित कर दी गई है कि गरीबी रेखा के नीचे वालो का अधिकार है कि वे अपने भरण पोषण के लिये सरकार से सहायता ले सके । इस प्रचार ने बहुत नुकसान किया है । एक प्रकार से छीना झपटी की स्थिति पैदा हो जाती है। न्यायालय भी हस्तक्षेप करना शुरू कर देता है। राजनीति भी सक्रिय हो जाती है । जबकि स्पष्ट है कि कमजोरो की सहायता करना मजबूतो का कर्तब्य होता है कमजोरो का अधिकार नही। फिर भी इसे कमजोरो के अधिकार के रूप मे स्थापित कर दिया गया है। एक बात और विचारणीय है कि गरीबी रेखा का अधिक उचा मापदंड बना देने के बाद उसका श्रम पर भी दुष्प्रभाव पड सकता है। इसलिये संतुलन बनाना आवश्यक होगा।
मैने गरीबी रेखा पर बहुत विचार किया। 70 वर्षो के शासन काल मे हम भारत के गरीब लोगो को इतना भी आस्वस्त नही कर सके कि उन्हे भरपेट भोजन तो मिलेगा ही । जब भारत चांद पर जा सकता है बडे बडे उद्योग लगाये जा सकते है, तकनीकी आधार पर दुनियां से प्रतिस्पर्धा की जा सकती है, तो कुछ लोगो को गरीबी रेखा से बाहर करना कोई कठिन कार्य नही है। मेरे विचार मे बुद्धिजीवी और पूंजीपति राजनेताओ के साथ मिलकर गरीबी रेखा को इसलिये समाप्त नही करना चाहते कि इसी बहाने दुनियां से भारत को भीख मिलती रहेगी तथा उनकी राजनीति भी हमेशा चलती रहेगी । गरीबी रेखा एक दिन मे समाप्त की जा सकती है। यदि गरीबी रेखा से नीचे वालो को उतनी नगद राशि की प्रतिमाह सहायता कर दी जाय जितनी उन्हे कम हो रही है और पूरा पैसा कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढाकर ले लिया जाय तो यह काम कठिन नही। यदि हम गरीबी रेखा को वर्तमान मे 50 रूपया प्रति दिन प्रतिव्यक्ति निर्धारित कर दे और उक्त सारा धन कृत्रिम उर्जा से टैक्स रूप मे ले ले तो सारी समस्या अपने आप सुलझ सकती है। एक ही दिन मे भारत गरीबी रेखा के कलंक से मुक्त हो सकता है बल्कि गरीबी रेखा अर्थात 30 रूपया की तुलना मे हम 50 रूपया प्रतिदिन उपलब्ध करा सकते है। मै आज तक नही समझा कि भारत के योजना कार ऐसा करने मे क्यो हिचकते हे। अंत मे मेरा यही सुझाव है कि गरीबी किसी भी रूप मे भारत की समस्या नही है। बल्कि उसे समस्या बनाकर देश के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
आज भारत में गरीबी अमीरी शब्द का वर्ग संघर्श के उद्देश्य से हथियार के रूप में प्रयोग हो रहा है। हर सत्ता लोलुप कभी गरीबी हटाओं का नारा लगाता है तो कोई अमीरी हटाओं का जबकि दोनों शब्द महत्व हीन हैं। कोई व्यक्ति जन्म के समय भी गरीब नहीं होता क्योंकि यदि वह अपने अतिरिक्त अंग भी बेच दे तो उसे कई लाख रूपये मिल सकते है । इसी तरह कोई व्यक्ति मरते समय भी अमीर नहीं रहता क्योकि वह कुछ भी लेकर नही जा पाता । गरीबी और अमीरी आभाशी शब्द है, यथार्थ नही । इसलिये हमारा कर्तब्य है कि हम ऐसे वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष बढाने वाले विवादित शब्दो को अनावश्यक सिद्व कर दे तथा प्रयत्न करे कि न किसी के समक्ष ऐसी मजबूरी हो न ही उसका कोई दुरूपयोग कर सके।

मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा

Posted By: kaashindia on February 12, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-
1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
2 आत्महत्या प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। राज्य सहित कोई भी अन्य को इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
3 राज्य का स्वभाव होता है कि जब वह किसी समस्या का स्वतः समाधान होते देखता है तब वह श्रेय लेने के लिए कोई कानून बनाकर उसके बीच कूद पडता है।
4 भारत में वर्तमान अनेक समस्यायें अंग्रेजो द्वारा बनाई गई राजनैतिक व्यवस्था की नकल के दुष्परिणाम है।
बहुत प्राचीन समय में एक व्यवस्था के अन्तर्गत युद्ध में भी महिलाओं पर आक्रमण या हत्या सामाजिक अपराध माना जाता था दूसरी ओर युद्ध में पुरुष बडी संख्या में मारे जाते थे। परिणाम होता था कि जनसंख्या का अनुपात असंतुलित होकर पुरुषों की संख्या बहुत कम हो जाया करती थी। ऐसी परिस्थिति में स्थानीय स्तर पर कुछ कुरीतियां प्रचलित हो जाती थी जिसे एक बुरा समाधान मान लिया जाता था। ऐसी ही कुरीतियों में बहुविवाह, कन्या भ्रुण हत्या, विधवा विवाह प्रतिबंध, देवदासी प्रथा तथा सती प्रथा को भी माना जाता है। ये प्रथायें सोच समझकर किसी मान्यता प्राप्त व्यवस्थाओं के अन्तर्गत शुरु नहीं की गई किन्तु शुरु हो गई अवश्य । राजपूतों में आमतौर पर सती प्रथा को जौहर के रुप में प्रचलित थी। वैष्य समुदाय मे विशेष रूप से राजस्थान और बंगाल में यह प्रथा कुछ अधिक प्रचलित थी। राजस्थान में इस प्रथा को सामाजिक मान्यता अधिक प्राप्त थी और जोर जबरदस्ती कम, जबकि बंगाल में इस प्रथा में जोर जबरदस्ती का अधिक उल्लेख पाया जाता है।
एक सामाजिक विचारक डाॅ राममोहन राय ने इस प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई। राम माहन राय का संबंध बंगाल से अधिक था और बंगाल में ही सती प्रथा में जोर जबरदस्ती भी ज्यादा होती थी इसलिए डाॅ राय को सती प्रथा उन्मूलन के लिए देश भर में अधिक समर्थन मिला। ज्यों ज्यों सती प्रथा के पक्ष में खडे कटटरपंथियों ने डाॅ राय के साथ अत्याचार शुरु किये त्यों त्यों डाॅ राय का समर्थन भी बढता चला गया। अंग्रेज सरकार भारत की सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप के अवसर खोज रही थी और उसे सती प्रथा के नाम पर ऐसा सुअवसर प्राप्त हुआ कि उसने सती प्रथा उन्मूलन कानून बनाकर उसे लागू कर दिया। इस सफलता से प्रोत्साहित होकर डाॅ राममोहन राय ने ही बहुविवाह का भी विरोध करना शुरु किया जो बाद में भारतीय कानूनों में शामिल हुआ। मेरे विचार में सती प्रथा कानून अनावश्यक था और अनावश्यक है भी। आत्महत्या किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और आत्महत्या के लिए मजबूर करना हत्या के समान अपराध। मैं नहीं समझा कि जब आत्महत्या के लिए भी मजबूर करना गंभीर अपराध था ही तब अलग से कानून बनाने की आवष्यकता क्यों हैं। जो भी व्यक्ति सती प्रथा के समर्थन मे किसी प्रकार की जोर जबरजस्ती करते थे उन पर हत्या का मुकदमा संभव था।
मैंने पढा है कि एक राजा ने प्रतीज्ञा कर ली कि वह सुर्यास्त के पहले एक किले पर कब्जा कर लेगा उसने देखा कि वह कब्जा नहीं कर पा रहा है तब उसने अपने ही क्षेत्र में एक उसी नाम का नकली किला बनवाया और उस किले पर आक्रमण करके अपनी प्रतीज्ञा को पूरी हुआ मान लिया। अंग्रेजो ने सती प्रथा का कानून क्यों बनाया और डाॅ राय ने क्यों बनवाया यह मैं नहीं कह सकता। किन्तु स्वतंत्रता के बाद इस कानून का जिस तरह उपयोग किया गया उससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट दिखती है । स्वतंत्रता के बाद महिला और पुरुष का अनुपात अपने आप संतुलित होता गया और विधवा विवाह महिला उत्पीडन सती प्रथा अथवा बहुविवाह की घटनाए प्राकृतिक रुप से कम होने लगी। शायद ही दस पांच वर्षो में सती प्रथा का कोई उदाहरण मिलता हो। ज्यो ज्यों सती प्रथा समाज से बाहर होती गई त्यों त्यों भारत के राजनेताओं ने सती प्रथा कानूनों को अधिक से अधिक कठोर बल्कि कठोरतम करना शुरु कर दिया क्योंकि उददेष्य सती प्रथा को रोकना नहीं था बल्कि एक समाप्त होती प्रथा को समाप्त करने का श्रेय अपने उपर लेना था। यदि किसी भी राजनेता से स्वतंत्रता के बाद उसकी बडी सफलताओं के दस उदाहरण मांगे जाये तो ऐसे 10 में सती प्रथा उन्मूलन तथा सिर पर मैला ढोने की प्रथा का उल्लेख जरुर करते मिलेंगे। अन्य अनेक गंभीर समस्याए भले ही समाज के समक्ष बढ गई हो। समाज में हिंसा के प्रति निरंतर विश्वास बढ रहा है। सत्य के प्रति निष्ठा निरंतर घट रही है। किन्तु हमारे नेता सती प्रथा उन्मूलन और सिर पर मैला ढोने वाली प्रथा के उन्मूलन का राग आज भी आलापते मिल जायेंगे।
मेरा यह स्पष्ट मत है कि सती प्रथा न कोई आपराधिक प्रथा थी न ही उसे आपराधिक हस्तक्षेप योग्य प्रथाओं में शामिल करने की आवश्यकता थी। आपराधिक कानून इस प्रथा को कमजोर करने के लिए पर्याप्त थे अर्थात यदि कोई व्यक्ति सती प्रथा के नाम पर भी किसी को बलपूर्वक मरने के लिए मजबूर करता है तो उस पर हत्या का अपराध स्पष्ट रुप से बनता है। यदि अंग्रेजों ने कोई कानून न बनाकर इस कानून का ही सहारा लिया होता तब भी सती प्रथा का दुरुपयोग रुक जाता और सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का कलंक भी नहीं लगता। मैं स्पष्ट कर दॅू कि सती प्रथा एक गलत प्रथा थी और ऐसी गलत प्रथा का दूरुपयोग करके उसे आपराधिक स्वरुप दे दिया गया। जिसके परिणामस्वरुप राजा राम मोहन राय, जो इस्ट इंडिया कम्पनी के लिए बहुत वर्षो तक काम करते रहे, उनके प्रयास से अंग्रेजो को सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप का अवसर मिला। अब तो समय आ गया है कि सरकार ऐसे ऐसे अनावष्यक कानूनों को समाप्त कर दे जो सामाजिक कुरीति निवारण के रुप में बनाये गये थे और अब उनकी समाज में कोई आवश्यकता नहीं हैं।
मंथन का अगला विषय गरीबी रेखा होगा।

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