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मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’

Posted By: kaashindia on March 15, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »


कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्रधान। धर्म में नैतिकता प्रमुख होती है तो राजनीति में कूटनीति प्रमुख होती है
2.लोकतंत्र तानाशाही की तुलना में अच्छा तथा लोकस्वराज की तुलना में बुरा समाधान माना जाता है। लोकतंत्र में लम्बे समय बाद अव्यवस्था निश्चित होती है और उसका समाधान होता है तानाशाही
3.भारत की राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाशाही के रूप में कार्यकर रही है। तंत्र मालिक है और लोक गुलाम
4.स्वतंत्रता के बाद मनमोहन सिंह सबसे अधिक लोकतांत्रिक और सफल प्रधानमंत्री माने जाते है। पुत्रमोह में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को अस्थिर किया।
भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी के कार्यकाल से ही कांग्रेस पार्टी कोई राजनैतिक दल न होकर एक पारिवारिक सत्ता के रूप में स्थापित हो गयी थी जो आज तक यथावत है। जो लोग इसे दल मानते है वे पूरी तरह से भ्रम में है। किन्तु यदि नैतिकता और राजनीति के समन्वय की बात करे तो नेहरू और इंदिरा गांधी अधिक अनैतिक तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में माने जाते है जबकि राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल अपेक्षाकृत अधिक नैतिकता के पक्षधर। इंदिरा गांधी, पंडित नेहरू और संजय गांधी के व्यक्तिगत आचारण के साथ यदि राजीव और सोनिया के अचारण की तुलना की जाये तो जमीन आसमान का फर्क दिखता है। युवा अवस्था में विधवा होने के बाद भी सोनिया गांधी की प्रशंसा करनी चाहिये। यह प्रशंसा तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब सोनिया जी विदेशी संस्कार में पली बढी हैं। इस मामले में राहुल गांधी की भी प्रशंसा करनी चाहिये कि जहाॅ 16 से 20 वर्ष के बीच के भारतीय नवयुवक और धर्मगुरू अपने को सुरक्षित नही रख पा रहे हो वही 48 वर्ष का नौजवान अविवाहित राहुल गांधी अच्छा आचरण प्रस्तुत कर रहे हो। सोनिया जी ने जिस तरह प्रधानमंत्री पद का मोह छोडकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया वह उनकी राजनीति में नैतिकता की पराकाष्ठा कही जा सकती है किन्तु बाद में उन्होंने पुत्रमोह में पडकर जिस तरह मनमोहन सिंह को कमजोर किया वह उनकी नैतिकता के लिये एक अनैतिक आचरण ही माना जाना चाहिये। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी अव्यवस्था बढी उसका बडा भाग सोनिया गांधी की चालाकी से पैदा हुआ था। उस समय मैनें ज्ञान तत्व क्रमाॅक 279 और 282 में लिखकर सोनिया जी को सलाह दी थी कि वे राहुल को अभी आगे स्थापित करने की जल्दबाजी न करे अन्यथा नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना निश्चित हो जायेगा। मैंने यह भी लिखा था कि अभी राहुल गांधी शराफत के मामले में बहुत परिपक्व है किन्तु कूटनीति का अभाव है जो किसी राजनेता का अनिवार्य गुण माना जाता है। मेरी बात नहीं सुनी गयी और परिणाम जो होना था वह हुआ। यदि कोई उक्त अंक फिर से पढना चाहे तो मैं आवश्यकतानुसार फेसबुक या व्हाटसअप एप में डाल सकता हूॅ।
पांच वर्ष बीत चुके है और अभी भी मेरी धारणा वहीं बनी हुयी है कि राहुल गांधी में गांधी के गुण अधिक है और नेहरू के कम। राहुल गांधी सफलतापूर्वक कांग्रेस अध्यक्ष का कार्य तो कर सकते है किन्तु प्रधानमंत्री के पद के लिये अभी पूरी तरह अयोग्य है क्योंकि उनमें कूटनीति का अभाव है शराफत बहुत अधिक है। वैसे भी राजनैतिक सूझबुझ यही कहती है कि राहुल गांधी की जगह किसी अन्य विपक्षी नेता अथवा सत्तारूढ दल में से किसी को भी आगे करके पांच वर्षो के लिये राहुल गांधी को प्रतीक्षा करनी चाहिये। यह प्रतीक्षा देश हित में भी होगी, कांग्रेस पार्टी के हित में भी होगी और राहुल गांधी के हित में तो होगी ही।
वर्तमान समय में देश की राजनीति ठीक दिशा में जा रही है। नरेन्द्र मोदी बिल्कुल ठीक दिशा में जा रहे है। प्रतिपक्ष की भूमिका में भी नितिश कुमार और अखिलेश यादव तक राजनीति केन्द्रीत हो रही है। राहुल गांधी इस राजनैतिक ध्रुवीकरण के बीच अनावश्यक पैर फंसा रहे हैं। सत्ता के लालच में जाति संघर्ष अथवा क्षेत्रीयता का उभार अल्पकालिक लाभ दे सकता है किन्तु उससे दीर्घकालिक नुकसान संभावित है। गुजरात में अलपेष ठाकुर के माध्यम से जो लाभ उठाया गया उसका नुकसान भी स्वाभाविक है।
राहुल गांधी के आचरण से भारत की राजनीति मे आमूल चूल बदलाव दिख रहा है। अब तक भाजपा और संघ हिन्दुत्व के अकेले दावेदार थे। साथ ही मुस्लिम कट्टरवाद वोट बैंक के रूप में अन्य सभी राजनीतिक दलों की ढाल बना हुआ था। राहुल गांधी ने पहल करके इस समीकरण की पूरी तरह से बदल दिया है । अब भाजपा और संघ हिन्दू मुस्लमान के बीच ध्रुवीकरण करने में कठिनाई महसूस कर रहे है क्योंकि राहुल की पहल के बाद अन्य सभी राजनीतिक दलों ने भी हिन्दू वोट बैंक का महत्व समझ लिया है। मैं पांच वर्ष पहले भी स्पष्ट था और आज भी मानता हूॅ कि इस बदलाव में राहुल गांधी की कोई राजनैतिक योजना न हो कर यह उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो पहले स्पष्ट नहीं दिख रही थी। राहुल गांधी हिन्दू मंदिरों में अधिक जाकर कोई ढोंग नही कर रहे है क्योंकि राहुल गांधी मे दीर्घ कालिक ढोग की समझ ही नही है। राहुल के जीवन में वास्तविक हिन्दुत्व की धारणा मजबूत हो रही है।
इस हिन्दुत्व के नवजागरण मे भी राहुल गांधी से एक भूल हुई है। नरेन्द्र मोदी एक राजनीति के सफल खिलाडी हैे तो राहुल गांधी एक असफल अनाडी। एक वर्ष पहले तक यह स्पष्ट दिख रहा था कि संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी एक साथ नही रह सकेगे । टकराव अवश्य ही होगा और वह टकराव राहुल गांधी के लिये लाभदायक होगा । किन्तु राहुल गांधी ने जिस तरह अल्प कालिक लाभ के लिये संघ के समक्ष प्रवीण तोगडिया का सहारा लिया उसके कारण संघ और मोदी के बीच की दूरी समाप्त हो गयी। अब राहुल गांधी के सामने यह संकट हैे कि वे कट्टरवादी हिन्दुत्व और जातिय टकराव को एक साथ कैसे रख पायेगे । संघ ने तो पंद्रह दिन पूर्व मोहन भागवत के भाषण के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि वह नरेन्द्र मोदी के साथ नरम हिन्दुत्व की ओर बढेगे। राहुल गांधी के अलावा अन्य सभी विपक्षी दल भी नरम हिन्दुत्व की ओर जाने को लालायित है। राहुल गांधी मे इतनी समझ नही है कि वे कट्टरपंथी इस्लाम और कट्टरपंथी हिन्दुत्व की दो नावो की सवारी एक साथ कर सके। राहुल को चाहिये था किवे संघ परिवार और मोदी के बीच की दूरी को हवा दें। किन्तु ऐसा लगता है कि वे चूक गये। मैं अभी भी इस मत का हॅू कि सोनियां गांधी के आगे आकर यह घोषणा कर देनी चाहिये कि अगले पांच वर्ष के लिेय किसी भी परिस्थिति मे नेहरू इंदिरा परिवार का कोइ्र भी व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बनेगा। शायद यह घोषणा नरेन्द्र मोदी की सफलता मे बाधक बन सके। शायद पांच वर्ष बाद राहुल गांधी का नम्बर आ जाये अन्यथा अधिक सम्भावना यही दिखती है कि राहुल गांधी माया मिले न राम की तरह न गांधी जैसे संम्मानित स्थान पा सकेगे और न ही नेहरू और इंदिरा सरीखे राजनीतिक शक्ति पा सकेगें।

मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान

Posted By: kaashindia on March 14, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ निश्चित सिद्धान्त है।
1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है।
2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक परिभाषा से जुडी हुई है जबकि संघ परिवार साम्यवाद और इस्लाम संगठनात्मक परिभाषा से ।
3 हिन्दू बहुमत गुण प्रधान धर्म को महत्व देता है तो मुसलमान बहुमत संगठन प्रधान धर्म को।
4 दुनियां मे दो प्रकार के व्यक्ति होते है। 1 प्रेरक 2 प्रेरित। आम तौर पर प्रेरक संचालक होते है और प्रेरित संचालित।
5 दुनियां मे कुल मिलाकर जितने अपराध धर्म के नाम पर होते है उससे कई गुना कम अपराध वास्तविक अपराधियो द्वारा ।
6 धर्म की आदर्श परिभाषा संख्या विस्तार मे बाधक होती है और संगठन प्रधान परिभाषा बहुत लाभदायक।
7 गुण प्रधान धर्म राज्य की विचार धारा को प्रभावित करने तक सीमित रहता है जबकि संगठन प्रधान धर्म राज्य की सभी गतिविधियो पर सहभागिता करना चाहता है। मुसलमान इस मामले मे सबसे अधिक सक्रिय रहता है।
8 गुण प्रधान धर्म व्यक्ति के मौलिक अधिकार मानता है संगठन प्रधान धर्म मौलिक अधिकार को अमान्य करके व्यक्ति को सामाजिक अधिकार तक सीमित करता है।
9 संगठित इस्लाम संख्या वृद्धि के लिये सब प्रकार के साधनो का उपयोग करना धर्म समझता है चाहे साधन नैतिक हो या अनैतिक । दुनियां के अन्य धर्मो की तुलना मे मुसलमान इसे पहला दायित्व समझता है।
प्राचीन समय मे गुण प्रधान धर्म को ही एक मात्र मान्यता प्राप्त थी। इस्लाम ने इस मान्यता को बदलकर उसमे संगठन प्रधानता का समावेश कर दिया जो धीरे धीरे बढकर अब मुख्य आधार बन चुका है। इस्लाम का जो समूह जितना अधिक संगठित है वह उतनी ही अधिक तेज गति से विस्तार कर रहा है। यह संगठित समूह सबसे पहले राज्य पर नियंत्रण करने का प्रयास करता है। इन समूहो मे वर्तमान समय मे सुन्नी समुदाय सबसे आगे है जबकि सुफी गुण प्रधान होने के कारण सबसे कमजोर। 14गुण प्रधान इस्लाम 5
शिक्षाओ को ज्यादा महत्व देता है। एकेष्वर वाद, रोजा, नमाज, जकात, हज। संगठन प्रधान इस्लाम संख्या विस्तार बहु विवाह राज्य व्यवस्था पर अंकुश तथा हिंसा पर अधिक विश्वास करता है। 15गुण प्रधान इस्लाम भिन्न विचार धाराओ का भी सम्मान करता हैं तो संगठन प्रधान इस्लाम किसी अन्य के अस्तित्व को ही स्वीकृति नही देता। गुण प्रधान सहजीवन को महत्व देता है। संगठन प्रधान इस्लाम एकला चलो की नीति पर विश्वास करता है।
यदि हम संगठन प्रधान धर्म की उत्पत्ति पर विचार करे तो वह किसी व्यक्ति तथा किसी ग्रंथ पर अंतिम विश्वास के साथ शुरू होती है। धीरे धीरे संगठन विस्तार करता है और जब निरंतर विस्तार करता रहता है तब कुछ सौ वर्षो मे वह संगठन संप्रदाय का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। जब संप्रदाय भी कुछ सौ वर्षो तक बढता जाता है तब वह धीरे धीरे अपने को धर्म कहने लग जाता है। इस्लाम के साथ भी यही हुआ और अन्य संगठन प्रधान धर्मो के साथ भी। धीरे धीरे जैन बौद्ध और सिख भी विस्तार के साथ साथ धर्म बनते चले गये। आर्य समाज धर्म बनने मे पिछड गया तो संघ परिवार निरंतर विस्तार पर है। संगठन सफलता की सीढिया चढकर अपने को धर्म घोषित कर देता है जबकि वर्तमान समय मे हिन्दुत्व को छोडकर कोइ्र भी अन्य अपने को धर्म कहने का हकदार नही है क्योकि अन्य एक महापूरूष तथा एक ग्रन्थ को अंतिम सत्य मानते है और दूूसरो के अस्तित्व नही मानते जबकि हिन्दू इसके ठीक विपरीत है। इस तरह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व जीवन पद्धति है संगठन नही। हिन्दू संगठनो का समूह कहा जा सकता है ।
वर्तमान समय मे इस्लाम संगठन शक्ति के आधार पर जितनी तेज गति से आगे बढा उतनी ही तेज गति से बदनाम भी हुआ। 16मुसलमान और उसका एक मात्र धर्म ग्रन्थ कुरान प्रेरक है तो मुसलमान प्रेरित । कुरान मे ही गुण प्रधान धर्म की शिक्षाओ का भी विस्तृत विवरण है तो कुरान मे ही संगठन प्रधान धर्म को भी पूरी मान्यता दी गई है। मुसलमान जिस दिशा मे जाना चाहता है उस दिशा मे जाने की पूरी शिक्षाए कुरान मे उपलंब्ध है। 17मुसलमान आम तौर पर भावना प्रधान होता है, प्रेरित होता है, धर्म भीरू होता है और इमानदार होता है। मुसलमान संगठनात्मक विस्तार के लिये जो भी हिंसा और अपराध करता है उसकी प्रेरणा भी उसे कुरान से ही प्राप्त होती है। इसका अर्थ हुआ कि 18दुनियां मे मुसलमना यदि एक गंभीर समस्या के रूप मे स्थापित हो रहा है तो उसका कारण धर्म ग्रंथ कुरान है और उसके प्रमुख धर्म गुरू कुरान के उस खतरनाक अंश को मुसलमानो तक ज्यादा प्रयास करके पहुचाते है। कुरान मे चार शादी करने को अच्छा नही माना गया है। इसका अर्थ हुआ कि मुसलमान यदि चार से अधिक शादी करता है तब वह पतित होगा चार से कम मे नही। यदि कोई सरकार यह नियम बना ले कि उसके देश का मुसलमान एक से अधिक विवाह नही करेगा तो मुल्ले मौलवी इसे धर्म के विरूद्ध प्रचारित करते है क्योकि यह संख्या विस्तार के विरूद्ध जाता है जबकि कुरान ऐसा नही कहता। गोमांस भक्षण भी मुसलमान के लिये आवश्यक नही है। इस तरह अनेक ऐसे मामले है जो संगठन प्रधान इस्लाम के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाते है और उस प्रतिष्ठा के लिये कही न कही कुरान की आयते खोज ली जाती है जिस पर सभी मुसलमानो की गहरी आस्था है।
समस्या बहुत जटिल है क्योकि मुसलमान प्रेरित है और इस्लाम प्रेरक । प्रेरक कभी अपराध नही करता क्योकि प्रेरक तो सिर्फ प्रेरणा देने तक सीमित रहता है। प्रत्यक्ष क्रिया मे उसकी कोई भूमिका नही होती। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति मे दुनियां के निशाने पर मुसलमान ही होते है जो अपने धर्म गुरूओ और धर्म ग्रंथो की प्रेरणा से प्रभावित होकर समस्याए पैदा करते है। जबकि वास्तविक दोष धर्म ग्रंथो और धर्म गुरूओ का होता है। समाज के पास इसका कोई विकल्प नही दिखता क्योकि धर्म ग्रंथ मुसलमानो के लिये अंतिम सत्य है और वह उससे भिन्न कोई आचरण नही कर सकता । दुसरी ओर धर्म ग्रंथो मे किसी प्रकार का बदलाव संभव नही है। इसलिये समाधान बहुत सोच समझकर योजना बद्ध तरीके से करना होगा। मुसलमानो को धीरे धीरे व्यवहार के माध्यम से समझा बुझा कर धार्मिक दिशा मे मोडना होगा जिससे वे अपने संगठनात्मक ढाचे से दूरी बनावे । दूसरी ओर संगठनात्मक इस्लाम के साथ कुछ कठोर व्यवहार उचित होगा । वर्तमान समय मे संघ परिवार ने राष्टीय मुस्लिम मंच के नाम से जो नई पहल शुरू की है उसे और अधिक विस्तार दिये जाने की आवश्यकता हैं। यह पहल मुसलमानो के सहजीवन के साथ जुडने की प्रेरणा देगी। इस पहल से मुसलमान संगठन प्रधान इस्लाम से कुछ दुरी बना सकेगा और भारत दुनियां की इस खतरनाक प्रवृत्ति को बचने की पहल कर सकेगा। मेरा ऐसा मत है कि इस समय विशेष परिस्थिति मानकर तथा सब प्रकार के भेद भाव भूलकर राष्टीय मुस्लिम मंच का तेजी से विस्तार करना चाहिये।

मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’

Posted By: kaashindia on March 8, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ निष्कर्ष हैः-
1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं।
2. समाज में चार प्रकार के लोग होते है- मार्गदर्शक, रक्षक, पालक और सेवक। मार्गदर्शक और पालक को प्रवृत्ति में दयालु होना चाहिए जबकि रक्षक और सेवक को दयालु प्रवृत्ति प्रधान नहीं होना चाहिए।
3. न्यायाधीश को प्राप्त शक्ति तंत्र की अमानत होती है। न्यायाधीश को किसी भी मामले में किसी के साथ दया करने का अधिकार नहीं है।
4. मनुष्य को छोडकर किसी अन्य जीव को मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। पशु-पक्षी या पेड-पौधे का कोई मौलिक अधिकार नहीं होता।
5. समाज किसी भी पशु जीव पेड-पौधे को अवध्य घोषित कर सकता है किन्तु कोई वर्ग नहीं कर सकता। किसी वर्ग द्वारा घोषित किसी पशु पक्षी को सम्मान देना अन्य वर्ग की मजबूरी नहीं है।
6. जो लोग गाय को माता न समझ कर पशु समझते है उनकी स्वतंत्रता में तब तक बाधा नहीं पहुॅचाई जा सकती जब तक सम्पूर्ण समाज ने मान्य न किया हो।
7. सब प्रकार के जीवों के बीच संतुलन होना चाहिए। जीव दया का सिद्धांत असंतुलन पैदा करता है। दया या हिंसा करना व्यक्ति की स्वतंत्रता है, बाध्यता नहीं।
8. बंदर, कुत्ते और नील गायों की बढती संख्या अव्यवस्था फैलाती है। बंदर हनुमान का भी प्रतीक हो सकता है और बालि का भी।
9. भारत के वर्तमान कानूनों में दया का भाव अधिक होने के कारण अपराध भी बढ रहे है तथा आवारा पशुओं की संख्या भी अव्यवस्था फैला रही है। मेरा अपना अनुभव है कि जीव दया का सिद्धांत अधिक प्रभावी होने से अव्यवस्था फैलती है जैसा भारत में हो रहा है। सरकारों ने अनेक अनावश्यक कानून बना दिये है। पशुओं को किस प्रकार का कष्ट दिया जाये इसके भी नियम बनाये गये है। कोई व्यक्ति अमानवीय तरीके से अपने पशु को नहीं पीट सकता न हीं अमानवीय तरीके से काट सकता है। मुर्गे को काटा जा सकता है रेत-रेत कर जब्हा किया जा सकता है किन्तु ठूस-ठूस कर गाडी में नही भरा जा सकता क्योंकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता। जब मनुष्य को छोडकर किसी भी अन्य जीव को मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है तब सरकार ऐसे मामले में कानून कैसे बना सकती है। फिर भी सरकारे कानूनों का दखल बढा रही हैं। राज्य अनेक मामलों में दया करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता है जबकि राज्य की शक्ति समाज की अमानत है और समाज के निर्णय के बाद ही राज्य किसी के साथ दया कर सकता है, किन्तु वह करता है। यदि राज्य दया करने लग जायेगा तो समाज में अपराध और अव्यवस्था बढेगी ही वर्तमान समय में राज्य निरंतर ऐसा ही कर रहा है। मैं हिमाचल के एक गांव में गया था। मैंने देखा कि वहाॅ के आम लोग बंदरों से बहुत परेशान थे लेकिन वे धार्मिक भावना से बंदर को मार नहीं सकते थे और कानून भी उन्हें रोकता था। मैंने उन्हें सलाह दी कि आपको जो बंदर हनुमान सरीखा दिखे उसकी रक्षा किजिए और बालि सरीखा दिखे तो मार देना चाहिए क्योंकि भगवान राम ने भी ऐसे बंदर का वध किया था। बिहार और उत्तर प्रदेश में बडी संख्या में किसान नील गायों से परेशान है। मुख्यमंत्री नितिश कुमार ने इस समस्या को समझकर समाधान करना चाहा तो निकम्मे धर्म-प्रेमियों ने रोडा डालने का प्रयास किया। हमारे छत्तीसगढ के सरगुजा संभाग में हाथियों का उत्पात मचा हुआ है। जंगली हाथी प्रति वर्ष बडी मात्रा में फसलों को नुकसान करते है, ग्रामीणों के घर तोड देते है और सैकडों की संख्या में निरपराध लोगों की हत्या कर देते है। यदि ग्रामीण किसी आक्रामक हाथी की हत्या कर दे तो वह जेल में बंद कर दिया जायेगा किन्तु यदि हाथी किसी ग्रामीण की हत्या कर दे तो उसे सिर्फ दो लाख रूपये मुआवजा दिया जायेगा। दूसरी ओर ग्रामीण अगर किसी ट्रेन एक्सीडेंट में या दुर्घटना में मर जाये तो मुआवजा दो लाख से कई गुना अधिक मिल सकता है किन्तु हाथी के मारने पर दो लाख की भीख सरकार द्वारा दी जाती है। बडी संख्या में आवारा कुत्ते निर्दोष लोगों को काटते है और उसके लिये भारी संकट झेलना पडता है। मैं जब नगरपालिका का अध्यक्ष था तब मैंने आवारा कुत्तों को मरवाने का अभियान चलाया। अनेक तथाकथित दयालु लोग सामने आये कि कुत्तों को इस तरीके से निर्दयतापूर्वक मारना ठीक नहीं है। इन नासमझों ने कभी यह नहीं सोचा कि इन कुत्तों के काटे हुये लोग कितनी परेशानी झेल रहे है। जीव दया के नाम पर जिस प्रकार असंतुलन बढाया जा रहा है वह भारत के कृषि उत्पादन पर भी बहुत विपरीत प्रभाव डाल रहा है। मैं देख रहा हॅू कि गौ हत्या के नाम पर नर हत्या का भी समर्थन किया जा रहा है। गाय आपकी माता है, आवश्यक नहीं कि वह मेरी भी माता हो। गाय कोई धार्मिक प्रतीक नहीं है क्योंकि हिन्दू अपने को साम्प्रदायिक न मानकर समाज के रूप में मानता है अर्थात हिन्दुत्व जीवन पद्धति है सिर्फ पूजा पद्धति तक सीमित नहीं है। ऐसी स्थिति में गौ रक्षा का निर्णय समाज जब तक नहीं करता तब तक आप किसी को यह मजबूर नहीं कर सकते है कि वह गाय को माता माने। जीव दया के सिद्धांत में सबसे ज्यादा अव्यवस्था जैन लोगों ने की है। भगवान महावीर ने अपना वैचारिक और नैतिक प्रभाव डालकर दया और अहिंसा पाठ पढाया, कानून का सहारा कभी नहीं लिया। निकम्में दयावान लोग कानून के द्वारा दया भाव का विस्तार करना चाहते है जो एक गलत मार्ग है। अहिंसा और दया के एक पक्षीय प्रचार ने भारत का बहुत नुकसान किया। शत्रु के साथ कैसी दया कैसी अहिंसा? अहिंसा और दया भाव ज्ञान प्रधान तथा व्यवसायी प्रवृत्ति के लोगों तक सीमित रहना चाहिये। यदि राज्य भी अहिंसा और दया करने लगेगा तो गुलामी स्वाभाविक है। आज सारी दुनियां में यदि कट्टरवादी इस्लाम समस्या के रूप में खडा हो रहा है तो उसका मुख्य कारण यही अहिंसा और दया का भाव है। स्पष्ट नीति बननी चाहिेये कि राज्य का काम अहिंसा या दया करना नहीं है क्योंकि राज्य को दी गई शक्ति समाज की अमानत है और राज्य का दायित्व सुरक्षा और न्याय। उसके लिए आवश्यक है कि हिंसा और दया के बीच संतुलन हो। यदि असंतुलन होता है तो राज्य को ऐसा संतुलन बनाने के लिए समुचित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। जो विचारक या व्यवसायी हैं उन्हें दया और अहिंसा को अपनाना चाहिये किन्तु कभी राज्य पर दबाव नहीं बनाना चाहिये कि वह अहिंसा और दया को नीतियों का आधार बनाये। मेरे विचार से वर्तमान भारत में दयाभाव का विस्तार एक समस्या के रूप में विस्तार पा रहा है। इसे समाधान के रूप में आना चाहिए।

मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’

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कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तरह बनी हुयी है। संगठन विचारों की कब्र होता है। संगठन महापुरूष के विचारों को दीर्घकालिक बनाता है, रूढ बनाता है और किसी संशोधन के विरूद्ध उसी तरह टकराता है जिस तरह उक्त महापुरूष को टकराना पडा था। संगठन मृत महापुरूषों के विचार समाज तक पहुॅचाने का सबसे सफल और घातक माध्यम होता है इसलिए मृत महापुरूषों के विचार बिना विचारे कभी अक्षरशः स्वीकार नहीं करना चाहिए। जब वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित होती है तब महाजनों येन गतः स पन्थाः का आंख मूंदकर अनुकरण करना चाहिए और जब जन्म पर आधारित हो तब बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहिए। गांधी समस्याओं के समाधान कर्ता थे और विनोबा संत। गांधी समझदार थे और विनोबा शरीफ। गांधी ने स्वतंत्रता दिलाई और विनोबा ने राजनेताओं की गुलामी। गांधी और लोहिया में बहुत फर्क था राजनैतिक मामलों में लोहिया गांधी के समान सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के पक्षधर थे और आर्थिक मामलों में सत्ता के केन्द्रीयकरण केे जबकि गांधी दोनों मामलों में अकेन्द्रीयकरण चाहते थे। जयप्रकाश, विनोबा और लोहिया में बहुत फर्क था। विनोबा सत्ता से बाहर रह कर आचार्य कुल के माध्यम से राजनीति पर अंकुश रखने तक सीमित रहना चाहते थे तो जयप्रकाश सत्ता के साथ तालमेल करके उसका शुद्धिकरण चाहते थे और लोहिया उसमें घुसकर। नाथुराम गोडसे और नेहरू में बहुत फर्क था। एक ने गांधी की शरीर की हत्या कर दी तो दूसरे ने विचारों की। गोडसे का मार्ग गलत था और नेहरू की नीयत। गोडसे यदि गलत विचारों से प्रभावित न होता गांधी के साथ जुडा होता तो नेहरू की तुलना में अच्छा प्रधानमंत्री बन सकता था। गोडसे का कार्य समाज के लिये घातक और अक्षम्य अपराध था साथ ही हिन्दू धर्म के लिए कलंक भी था।
जब भी समाज में कोई विचारक गंभीर विचार मंथन के बाद कुछ निष्कर्ष निकालता है तो वह निष्कर्ष समाज की प्रचलित मान्यताओं से कुछ भिन्न होता है। यदि उक्त निष्कर्ष समाज की तात्कालिक समस्याओं के समाधान में निर्णायक परिणाम देता है तो उक्त विचारक महापुरूष बन जाता है। उक्त महापूरूष के निष्कर्षो को सामान्य लोग बिना विचार किये ही स्वीकार करने लग जाते है। विचारक से महापुरूष बनने तक के बीच के कालखंड में विचारों को समाज तक पहुंचाने के लिये एक संगठन की आवश्यकता होती है। ऐसा संगठन उक्त विचारक के जीवन काल में भी बन सकता है और जीवन पश्चात भी। संगठन विचारों को समाज तक पहुॅचाने की व्यवस्था करता है और जब उक्त विचार सफल प्रमाणित हो जाता है तब उक्त विचार को धीरे-धीरे रूढ बनाकर उन पर संगठन कुन्डली मारकर बैठ जाता है। इस तरह संगठन विचारों की कब्र होता है। संगठन के माध्यम से विचार सुरक्षित, अदृष्य, दीर्घकालिक और अनुपयोगी हो जाते है। संगठन विचारों को पुनर्विचार से दूर कर देते है। तात्कालिक समस्याओं के समाधान के लिये जब कोई नया विचार सामने आता है तो उक्त संगठन के महापुरूष को आक्रमण झेलने पडते है। प्रत्येक संगठन अपने महापुरूष के साथ किये गये दुर्ष्यवहार को अत्याचार घोषित करता है जबकि वह स्वयं भी आगे वाले विचारकों के साथ बिल्कुल वैसा ही अत्याचार करना शुरू कर देता है।
महात्मा गांधी ने गुलाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। उन्होंने इस संग्राम के लिये सत्य और अंहिंसा को मुख्य मार्ग घोषित किया। विदेशी वस्तु बहिष्कार उनका सहायक मार्ग था। धार्मिक, सामाजिक, जातीय एकता उक्त संग्राम के उपमार्ग थे, चर्खा, खादी और गांधी टोपी उक्त संग्राम की पहचान स्वरूप थे. लक्ष्य सिर्फ एक था, बिल्कुल स्पष्ट और सर्वमान्य था राष्ट्रीय स्वराज्य। स्वराज्य के लिये उन्होने मार्ग, सहायक मार्ग, उपमार्ग, सहायक उपमार्ग आदि तय किये और तदनुसार ही वे इन मार्गों की उपयोगिता भी मानते थें। गांधी जी ने सत्य और अंहिसा से कभी समझौता नहीं किया क्योंकि यह उनका मुख्य मार्ग था। चर्खा, खादी, गांधी टोपी से वे समझौते के लिये तैयार थे। यदि कोई व्यक्ति भिन्न वस्त्र टोपी या भिन्न संगठन वाला भी हो तो वे उसका बहिष्कार नहीं करते थें। गांधी के आन्दोलन में सब प्रकार के लोग शामिल थे चाहे वे गांधी जी के बताये कुछ उप मार्गो से असहमत ही क्यो न हों। गांधी जी ने अपने जीवन में किसी को अछूत नहीं माना क्योंकि उनके विचारों में अछूत कार्य होता है कर्ता नहीं। उन्होंने नारा दिया पाप से घृणा करो पापी से नहीं। गांधी जी ऐसे ऐसे बीमारों की भी सेवा करते थे जिनकी बीमारी गांधी जी को नुकसान कर सकती थी किन्तु उन्होंने ठीक करने का भरसक प्रयास किया।
गांधीजी के बाद उनके विचारों ने गांधीवाद का स्वरूप ग्रहण किया। गांधीवाद की एक सर्वमान्य परिभाषा थी तत्कालीन समस्याओं का सत्य और अंहिसा के मार्ग से समाधान का प्रयत्न। इसमें तत्कालीन समस्याओं का समाधान लक्ष्य था और सत्य अंहिंसा मार्ग। गांधी के बाद गांधीवाद विचारों से दूर होने लगा और धीरे-धीरे विचारों से हटकर संस्कार बन गया। अब उसकी परिभाषा बदल कर हो गई सत्य औेर अहिंसा के आधार पर ही समस्याओं के समाधान का प्रयत्न। सत्य और अंहिसा लक्ष्य बन गया, समाधान गौण। समस्याओं की पहचान के लिये तात्कालिक परिस्थियों के साथ कोई तालमेल नहीं रहा और धीरे-धीरे गांधी से दूर होता चला गया।
गांधी की मृत्यु के बाद राजनेताओं ने पंडित नेहरू के नेतृत्व में गांधीवाद के दुरूपयोग की योजना बनाई। गांधी संस्थाओं के पक्षधर थे और नेता संगठन बनाना चाहते थे। उन लोगों ने सीधे-साधे विनोबा को धोखा देकर एक सर्व-सेवा-संघ नाम से गांधीवादियों का संगठन बना दिया। बिचारे विनोबा जीवन भर समाज सुधार का कार्य करते रहे और देशभर के राजनेता सारे हिन्दुस्तान को राजनैतिक आधार पर गुलाम बनाने में सफल हो गये। सर्वोदय के लोग आज भी देशभर में समाज सेवा के उच्चकीर्ति मान बनाते देखे जाते है और सारा मालमलाई 70 वर्षो से देश के नेता खा रहे है लेकिन सर्वोदय के लोगों की या तो आंख बंद है या असहाय है अथवा हो सकता है जूठन से संतुष्ट हो।
इसमें शामिल अधिकांश लोग बहुत त्यागी चरित्रवान पद और धन के प्रलोभन से दूर उच्च संस्कारवान है किन्तु उनमें विचार एवं चिन्तन शक्ति का सर्वथा अभाव है। वे समस्याओं का ठीक-ठीक आकलन नहीं कर पातें। वे समस्याओं के समाधान के लिये अहिंसा को शस्त्र के रूप में प्रयोग न करके अपने पलायन की ढाल के रूप में उपयोग करते है। वे विपरित विचार वालों से तर्क नहीं कर सकते। विचार मंथन इनके आचरण में दूर-दूर तक नहीं है।
गांधी विपरीत विचार रखने वाले को अछूत नहीं मानते थें गांधीवादी उन्हें अछूत मानकर घृणा करते है। गांधी जी स्वयं को इतना दृढ मानते थे कि उन पर असत्य के प्रभावी होने का कोई भय नहीं था परिणाम स्वरूप वे सबके बीच अपनी वात रखने का साहस करते थें। गांधीवादी इतने भयभीत है कि वे दुसरों के विचारों से प्रभावित होने के डर से उनसे दूर भागते है। गांधी जी वैचारिक विस्तार के पक्षधर थे। गांधीवादी संगठन की सुरक्षा में ही परेशान रहते है। गांधी जी इस्लाम के खतरे को भली भांति समझते हुए भी एक रणनीति के अन्तर्गत उनसे समझौता करते थे। गांधीवादी इस्लाम के खतरे को न समझते है न समझना चाहते है। गांधी जी पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थे। वे साम्प्रदायिकता को कभी स्वीकार नहीं करते थे। गांधीवादी धर्मरिपेक्षता का एक ही अर्थ समझते है संघ का विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण। गांधी जी साम्यवाद को घातक विचार मानते थे गांधीवादी साम्यवाद को समझते ही नहीं। मुझे तो आश्चर्य होता है कि हिंसा का सैद्धान्तिक रूप से भी और व्यावहारिक रूप से भी समर्थन करने वाले साम्यवादियों और आतंकवादी मुसलमानोें के विरूद्ध गांधीवादियों का न कभी प्रत्यक्ष विरोध दर्ज होता है और न परोक्ष। किन्तु यदि प्रशासन इनके विरूद्ध कोई कठोर कदम उठाता है तो गांधीवाद अवश्य ही विरोध में हल्ला करना शुरू कर देते है। गांधी जी सरकारीकरण के बिल्कुल विरूद्ध थे और समाजीकरण के पक्षधर थे गांधीवादी सरकारीकरण के पक्षधर है और समाजीकरण को समझते ही नहीं। वे तो व्यापारीकरण के स्थान पर सरकारीकरण की वकालत तक करते है। गांधी जी निजीकरण के स्थान पर समाजीकरण चाहते थे। गांधीवादी निजीकरण का विरोध तो करते है परन्तु वे सरकरी कारण को या तो समझते नहीं या उनके संस्कार उनकी समझदारी में बाधक है।
आज देश में ग्यारह समस्याएँ बढ रहीें है। भारत के सभी राजनैतिक दल इन ग्यारह समस्याओं के समाधान की अपेक्षा दस प्रकार के नाटकों में संलग्न है। इन राजनैतिक दलो की नीतियाँ तो गलत है ही नीयत भी गलत है। साम्यवादी भी अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये इन दस नाटकों को प्रोत्साहित करते रहते हैं। संघ परिवार की नीयत अर्ध राजनैतिक है। उसकी नीतियाँ साम्प्रदायिकता से भी प्रभावित है और पूूँजीवाद से भी। परिणाम स्वरूप वे सात समस्याओं के तो समाधान की चिन्ता करते है किन्तु आर्थिक असमानता और श्रम शोषण पर नियंत्रण की वे कभी नहीं सोचतें। मिलावट की रोकथाम के विषय में भी वे चुप ही रहते है। क्योंकि मिलावट और व्यापार का चोली दामन का संबंध बन गया है। सबसे दुखद है कि संघ परिवार साम्प्रदायिकता के विषय में भी स्पष्ट नहीं है। उसके अनेक कार्य तो साम्प्रदायिकता को मजबूत करने मे ही सहायक होते है। गांधीवादियों का वर्ग ही एक ऐसी जमात है जो राजनीति से संबंध नहीं रखती किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि इनकी नीयत ठीक होते हुए भी नीतियाँ देश की सभी ग्यारह समस्याओं के विस्तार में सहायक हो रही है। राजनीतिज्ञ जानबूझकर नाटक करते रहते हे और गांधी वादी अनजाने में उसके पात्र बन जाते हैं। मेरा यह आरोप अत्यन्त ही गंभीर हैं और हो सकता हैं कि यह गलत ही हो किन्तु अब तक मैंने जो समझा वह ऐसा ही है और यदि इस संबंध में कोई बहस छिडती है तो मैं उसका स्वागत ही करूँगा।
मैंने गांधी को बहुत सुना और समझा है। गांधीवाद को भी प्रयोग करके पूरी तरह सफल होता देखा है और गांधीवादियों से भी खूब चर्चा की हैं। गांधीवादी तर्क से बहुत भागते है। वे स्वयं को अन्य लोगों से अधिक श्रेष्ठ और आचरणवान मानकर दुसरों से घृणा करते है। किसी भी मामले मे अपनी बात कहीं नहीं कहते बल्कि जो भी कहते है उसमें गांधी, विनोबा, जयप्रकाश का नाम जोडे बिना न एक लाईन लिख सकते है, न बोल सकते है और न भाषण दे सकते हेै। उन्होंने गांधी, विनोबा, जयप्रकाश को कभी समझने का प्रयास किया हो तब तो वे उनकी बात को अपने शब्दों में वर्तमान स्थितियों के साथ जोडकर कह पातें। उन्हे तो सभी समस्याओं के समाधान के रूप में गांधी, विनोबा, जयप्रकाश के उस समय की परिस्थितियों में कहे गये शब्दों के आधार पर बने उनके संस्कार ही पर्यात्त दिखते है और यही आज की सबसे बडी समस्या है। अधिकांश गांधीवादी इन बातों को समझते भी है और गुप्त रूप से चर्चा भी करते है किन्तु संस्कारित गांधीवादियों के समक्ष वैचारिक गांधीवादी हमेशा भयभीत रहते है। कितनी चिंता की बात है कि जो गांधी गुजरात से अहिंसा की शिक्षा लेकर सारी दुनियां का मार्गदर्शन करने में सफल हुआ उसी गुजरात से हिंसा का पाठ सीखकर नरेन्द्र मोदी सारी दुनियां में लगातार सफल होते जा रहे है। क्योंकि सर्वोदय के पास मृत गांधी, विनोबा, जयप्रकाश का नाम मात्र है, अपने विचार नहीं। वे संघ की आलोचना तक सीमित है, विकल्प नहीं बता सकते। चितंन का विषय है कि जो गांधी अंहिसा और सत्य को सर्वोच्च स्थान देते थे वहीं गांधीवादी अब नक्सलवादियों और मुस्लिम उग्रवादियों के पक्ष में खडे दिखते है। जिस गांधी को हिन्दुओं के बहुमत का समर्थन प्राप्त था उन हिन्दुओं को गांधीवादियों ने धक्का देकर संघ परिवार के पक्ष में खडा कर दिया क्योंकि गांधी के पास मौलिक चिंतन था और सर्वोदय के पास मात्र नकल। गांधी के पास समझदारी थी तो सर्वोदय के पास शराफत। सर्वोदय के लोग साम्यवादियों के जाल में फॅसकर इतने अंधे हो गए थे कि उन्हें साम्यवादी गांधी व विनोबा के समान दिखते थे। एक बाद ठाकुरदास बंग, सिदराज ढडडा आदि ने इस संगठनात्मक ढाॅचे को तोडने का प्रयास किया तो कुमार प्रशांत ने आगे आकर साम्यवादियों के पक्ष में इस सुधार का भरपूर विरोध किया और सफलता पायी।
मैं महसूस करता हूँ कि स्वतंत्रता के बाद जिन ग्यारह समस्याओं का विस्तार हुआ है उसका समाधान सिर्फ गांधीवाद के पास है। न तो इसका समाधान पूंजीवाद के पास है न ही साम्यवाद के पास। ये दोनों ही या तो समस्याओं को बढा सकते है या उससे लाभ उठा सकते हैं। गांधीवाद ही इनके समाधान का मार्ग निकाल सकता है और आज की समस्याओं के समाधान के निमित्त गांधीवाद को कोई गांधी ही परिभाषित कर सकता है गांधीवादी नहीं। क्योंकि गांधी दाण्डी यात्रा समस्या के समाधान के लिये करते थे और ये गांधी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए नकल करते है। गांधी जी के वस्त्र किसी पूर्व महापुरूष की नकल न होकर भारत के आम निवासियों के दुख दर्द की असल थें। ये लोग नकल करके गांधी चश्मा,उनके कपडे और उनकी दाण्डी यात्रा करके गांधी बनना चाहते हैै। ये गांधी को कभी समझे नहीं तो गांधीवाद को क्या समझेगें। इस लिए आज भारत को एक गांधी की जरूरत है, एक ऐसे गांधी की जो अपना नाम गांधी रखे या कोई और, वह चाहे खादी पहने या कुछ और, वह दाण्डी यात्रा करे या कोई और यात्रा करे यह महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि वह गांधी के सत्य और अहिंसा का डण्डा ओर झण्डा उठाकर ग्यारह समस्याओं के समाधान के लिए निकल पडे और भारत की सभी हिंसक, साम्प्रदायिक, जातीय स्वार्थान्ध, राजनैतिक शक्तियों को एकसाथ चुनौती देकर घोषणा करें कि अब तक हमने बहुत सहा अब सहेगें नही, हम चुप रहेंगे नहीं, झंडा उठा लेगे हम।
मै जानता हूँ कि स्थापित संगठन ऐसे विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकते। यदि किसी गांधी ने आकर गांधीवाद को इस ढंग से परिभाषित किया तो उक्त विचारक गांधी को सबसे पहले टकराव संस्कारित गांधीवादियों का ही झोलना पडेगा और वह टकराव किसी भी सीमा तक जा सकता है। यदि गांधी ने इन संस्कारित गांधीवादियों को समझाकर कोई मार्ग निकाल लिया तब तो उसके जीते जी ग्यारह समस्याओं के समाधान का मार्ग निकल सकता हे अन्यथा उनका भी वही हाल होगा जो इशुमसीह का हुआ गांधी का हुआ और तब उनके बाद उनके नाम से एक नया संगठन नयावाद खडा होगा औंर दुनियां में वादों के साथ एक नया वाद जुडकर वाद-विवाद में सहायक बन जायेगा।

मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’

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कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः-
1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपूर्ण होती हैं।
2। परिवार में महिला या पुरूष एक-दूसरे के पूरक होते हैं। परिवार की आंतरिक व्यवस्था में महिलाए तथा बाह्य में पुरूष प्रधान होते हैं किन्तु कुल मिलाकर सब बराबर हैं।
3। सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों से कम तथा सम्मान सुरक्षा पुरूषों से अधिक होती है।
4। परंपरागत परिवारों में आयी विकृतियों के कारण महिलाए पारम्परिक व्यवस्था की अपेक्षा आधुनिकता की ओर तेजी से बढ रही हैं।
5। पुरूष प्रधान व्यवस्था विकृति नहीं बल्कि व्यवस्था है किन्तु परिवार का प्रमुख, परिवार प्रमुख तक सीमित रहना चाहिये, मालिक नहीं। वर्तमान पारंपरिक परिवारों में मुखिया मालिक बन गये जो एक मुख्य विकृति है।
6। परंपरागत परिवारों की महिलाओं में घुटन अधिक है टूटन कम। आधुनिक महिलाओं में परिवार के प्रति टूटन अधिक है घुटन कम। दोनों स्थितियां ठीक नहीं।
7। अनुशासन और नियंत्रण अलग-अलग होते हैं। परंपरागत परिवारों में अनुशासन की जगह नियंत्रण बढा और आधुनिक परिवारों में अनुशासन की जगह उच्श्रृंखलता।
8। परंपरागत महिलाए परिवार के सुचारू संचालन, सन्तानोत्पत्ति तथा बच्चों के नैतिक विकास को अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं तो आधुनिक महिलाए स्वतंत्रता, सेक्स तथा बच्चों के भौतिक विकास को अधिक महत्तवपूर्ण मानती हैं।
9। परंपरागत महिलाए सहजीवन को भौतिक विकास की तुलना में अधिक महत्व देती हैं तो आधुनिक महिलाए भौतिक विकास को सहजीवन की तुलना में अधिक महत्व देती हैं।
10। परंपरागत परिवार व्यवस्था में सुधार तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था पर अंकुश आवश्यक है। परंपरागत या आधुनिक परिवार की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था एकमात्र समाधान है।
परिवार समाज व्यवस्था की पहली संगठनात्मक इकाई है। सेक्स की भूख, सन्तानोत्पत्ति, सहजीवन की ट्रेनिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य एक साथ सम्पन्न होने की पहली कार्यशाला है परिवार। परिवार के सभी उद्देश्य ठीक-ठाक पूरे हों इसके लिये महिला और पुरूष का एक साथ एकाकार स्वरूप में रहना आवश्यक है। अब तक भारत की परंपरागत परिवार व्यवस्था को दुनियां में सर्वाधिक सफल माना गया किन्तु धीरे-धीरे उसमें आयी कुछ विकृतियों के कारण अब उसका स्थान पाश्चात्य परिवार व्यवस्था लेती जा रही है। महिलाओं की भूमिका परिवार व्यवस्था के सफल संचालन में बहुत महत्वपूर्ण होती है और वर्तमान समय में महिलाओं में परंपरागत परिवार की अपेक्षा आधुनिक परिवार की ओर तेजी से कदम बढ रहे हैं इसलिये इसके कारण, लक्षण, परिणाम और समाधान की चर्चा आवश्यक है।
परंपरागत और आधुनिक महिलाओं के रहन-सहन, प्राथमिकताए तथा जीवन प्रणाली में कई अन्तर स्पष्ट हैं।
1। परंपरागत महिलाए कर्तव्य प्रधान होती हैं। वे कभी समान अधिकार की भी मांग नहीं करतीं। वे परिवार में होने वाले अपने शोषण के विरूद्ध चुप रहती हैं। आधुनिक महिलाए समान अधिकार से भी संतुष्ट नहीं। उन्हें समान अधिकार भी चाहिये तथा विशेष अधिकार भी चाहिये। परंपरागत महिलाए त्याग प्रधान होती हैं, आधुनिक महिलाए संग्रह प्रधान होती हैं।
2। परंपरागत महिलाए सेक्स की तुलना में सन्तानोत्पत्ति को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाओं में सन्तानोत्पत्ति के प्रति अरूचि और सेक्स के प्रति अधिक आकर्षण होता है।
3। परंपरागत महिलाए सहजीवन को अधिक महत्वपूर्ण मानकर संयुक्त परिवार को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देकर परिवारों को छोटे से छोटा करने को महत्वपूर्ण मानती हैं।
4। परंपरागत महिलाए भावना प्रधान अधिक होती हैं बुद्धि प्रधान कम। आधुनिक महिलाए बुद्धि प्रधान अधिक होती हैं, भावना प्रधान कम।
5। परंपरागत महिलाए नैतिकता को भौतिकता की तुलना में अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाए भौतिक उन्नति के लिये नैतिकता से जल्दी समझौता करने को तैयार रहती हैं।
6। परंपरागत महिलाए अन्य पुरूषों से आवश्यकता से अधिक दूरी बना कर रखती हैं। यदि इनके साथ कोई साधारण छेडछाड की आपराधिक घटना हो तो या तो छिपाती हैं या सामाजिक स्तर से निपटाना चाहती हैं। आधुनिक महिलाए अन्य पुरूषों के साथ कम से कम दूरी बनाने की कोशिश करती हैं तथा मामूली छेडछाड की घटना में आसमान सर पर उठा लेती हैं।
7। परंपरागत महिलाए परिवार या रिश्तेदारी तक आकर्षक तथा बाहर में अनाकर्षक पोषाक, हावभाव, बोलचाल का प्रयोग करती हैं। आधुनिक महिलाए परिवार में अनाकर्षक तथा बाहर में आकर्षक पोषाक, हावभाव तथा बोलचाल व्यवहार करती हैं।
एक अनुमान के अनुसार अब भी भारत में लगभग अठान्नवे प्रतिशत महिलाए पारंपरिक जीवन पद्धति में शामिल हैं तो दो प्रतिशत अति आधुनिक प्रणाली में। भौतिक विकास के आकलन में भी ये दो प्रतिशत आधुनिक परिवार अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो नैतिक पतन में भी। परिवार तोडने, तलाक, असंतोष, नैतिक पतन तथा सामाजिक अव्यवस्था विस्तार में भी ये दो प्रतिशत महिलाए अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो परिवार की भौतिक उन्नति, शिक्षा विस्तार, अधिकारों के लिये संघर्ष, में भी इन दो प्रतिशत आधुनिक महिलाओं का परंपरागत की तुलना में कई गुना अधिक योगदान है। परंपरागत महिलाए प्राचीन संस्कारों को आख मूंदकर चलने पर अधिक विश्वास करती है तो आधुनिक महिलायें प्राचीन संस्कारों को बिना विचारे आख मूंदकर तोडने और छोडने पर अधिक विश्वास करती है। परंपरागत महिलाए वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष को घातक मानती है तो आधुनिक महिलाए वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को महत्व देती है।
यह स्पष्ट है कि महिलाए परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के टूटने में आधुनिक महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है किन्तु यह भी मानना होगा कि परम्परागत परिवार व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो आधुनिक परिवार व्यवस्था को न रोका जा सकता है न सुधारा जा सकता हैं क्योंकि महिलाए ही अब इतनी जागरूक है कि वे घुटन की अपेक्षा टूटन को अधिक महत्व दे रही है। साथ ही भारत की संवैधानिक राजनैतिक व्यवस्था इस टूटन को अधिक विस्तार दे रही है। एक तरफ तो संवैधानिक व्यवस्था महिलाओं को समान अधिकार देना नही चाहती तो दूसरी ओर उन्हें विशेष अधिकार का लालच देकर आधुनिक बनने की ओर प्रेरित कर रही है। किसी तरह का कानूनी दबाव न तो परम्परागत परिवार व्यवस्था को बचा सकता है न ही आधुनिक व्यवस्था को रोक सकता है। यदि हम महिलाओं को आधुनिकता की अंधी दौड से रोकना चाहते है तो हमें परम्परागत परिवार व्यवस्था में आयी कमजोरियों को दूर करना चाहिए। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार व्यवस्था के संचालन में महिला पुरूष का भेद किया जाए या सम्पत्ति के अधिकार में दोनों की भूमिका अलग-अलग हो। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार से अलग होने के लिए महिलाओं को किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता है। महिला पुरूष के बीच भेद करने वाले सब प्रकार के कानून हटाकर सबको बराबर का अधिकार दे देना चाहिए। परम्परागत परिवार व्यवस्था तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था की परिवार तोडक भूमिका को बदलकर लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था प्रारंभ होनी चाहिए जिसका अर्थ है परिवार और समाज के संचालन तथा आर्थिक मामलों में भी महिलाओं के समान संवैधानिक कानूनी तथा परिवारिक अधिकार होना।
मैं समझता हूॅ कि लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का सुझाव न तो परम्परागत महिलाओं को पसंद आएगा। न ही आधुनिक महिलाओं को। परम्परागत महिलाएं इतनी डरी हुई है कि उन्हें लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था के लिए पुरूष वर्ग सहमत होने देगा न ही आधुनिक महिलाए इस दिशा कदम आगे बढने देगी क्योंकि ऐसा होते ही उनके विशेषाधिकार भी खत्म हो जाऐंगे तथा उनका न्यूसेंस वेंल्यू भी कम हो जाऐगा। किन्तु समाज व्यवस्था के सफल संचालन के लिए ऐसी परम्परागत महिलाओं को विचार प्रचार द्वारा सहमत करना होगा तथा आधुनिक महिलाओं को नियंत्रित करना होगा। मैं समझता हूॅ कि विषय बहुत गंभीर है तथा इस विषय पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि भारत की टूटती परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था का कारण क्या है और समाधान क्या है? मेरा सुझाव है कि परम्परागत महिलाओं को परिवार व्यवस्था में अधिक छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान समय में यह उचित होगा कि सरकार परिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने वाले कानून हटा लें। साथ ही परिवारों को इस प्रकार के सामाजिक और कानूनी निर्णय की स्वतंत्रता दी जाए की वे स्वंय मिल बैठकर इस बात का निर्णय कर ले कि उन्हें परम्परागत व्यवस्था में चलना है, आधुनिक मार्ग पकडना है अथवा लोकतांत्रिक मार्ग। मैं लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का पक्षधर हूॅ।

मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”

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1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य।
2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्याओ का निवारण समाज का दायित्व होता है और सरकार को उसमे सहयोग करना चाहिये।
3 दुनियां मे अपराध एक ही होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता मे किसी प्रकार से बाधा पहुंचाना। राज्य का दायित्व होता है, उस स्वतंत्रता को सुरक्षा देना।
4 भारत मे समस्याए तीन प्रकार की होती है- 1 आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक । इन तीनो प्रकार की समस्याओ का स्वरूप कृत्रिम होता है और समाधान कठिन नहीं है।
5 दुनियां मे समस्याएं तीन प्रकार की होती है। 1 प्राकृत्रिक 2 भूमंडलीय 3 कृत्रिम । कृत्रिम समस्याए भी तीन होती है। आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक।
6 आर्थिक समस्याए कई्र प्रकार की होती है। आर्थिक असमानता, मंहगाई, गरीबी, भूख, अशिक्षा, पर्यावरण प्रदूषण, श्रम शोषण, विदेशी कर्ज।
7 सामाजिक समस्याए कई होती है। जातिय भेदभाव, साम्प्रदायिकता, छुआछूत उॅच नीच, वर्ण व्यवस्था का विकृत होना।
8 राजनैतिक समस्याए कई है। किसी समस्या का ऐसा समाधान जिसमे नई समस्या पैदा हो, वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहन, समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये अधिक से अधिक कानून बनाना, अपनी गलतियां छिपाने के लिये समाज पर दोषारोपण, राष्ट्र को समाज से उपर सिद्ध करना।
सारी दुनियां अप्रत्यक्ष रूप से राजनैतिक सत्ता की गुलाम बनी हुई है। दुनियां के दो महा शक्तियों के राष्ट्राध्यक्ष आपस मे टकरा जाये तो दुनियां के पांच अरब लोग मिलकर भी विश्व युद्ध से नही बच सकते। यह सत्ता का केन्द्रियकरण बहुत दुखद है। भारत की राजनैतिक स्थिति भी इससे भिन्न नही है। भारत मे अपराध तेजी से बढ रहे है। अपराध रोकना सरकार का दायित्व है किन्तु सरकारे अपराध रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता न देकर सामाजिक आर्थिक समस्याओ का समाधान करते रहती है। यह समाधान भी इस प्रकार होता है कि उससे कुछ नई समस्याओ का विस्तार होते रहता है। समस्याये बढती रहती है और समाधान निरंतर जारी रहता है। अपराध बढते रहते है और सत्ता की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहती है। इसका अंतिम परिणाम होता है गुलाम मानसिकता का विस्तार। आर्थिक समस्याए, कई प्रकार की दिखती है। इनमे मंहगाई, गरीबी, अमीरो गरीबो के बीच बढती दूरी, बढता पर्यावरण प्रदूषण, भूख से मृत्यु, श्रम शोषण, विदेशो का बढता हुआ कर्ज, शहरी आबादी का बढना, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि अनेक समस्याए विकराल होती जा रही है जिनका कोई समाधान नही दिखता । यदि गंहराई से विचार किया जाये तो ये समस्याए या तो राज्य द्वारा गलत अर्थनीति के परिणाम है अथवा अस्तित्वहीन समस्याए है जिन्हे राज्य ने प्रत्यक्ष बनाकर रखा है। मंहगाई तो है ही नही । गरीबी अमीरी भी इसी तरह आभाषीय शब्द है। स्पष्ट नही है कि कौन गरीब है कौन अमीर। अन्य समस्याए भी कृत्रिम है ही । ऐसी सभी आर्थिक समस्याओ का सिर्फ एक समाधान हो सकता है कि कृत्रिम उर्जा अर्थात डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, कोयला गैस की भारी मुल्य वृद्धि कर दी जाये । सिर्फ इस अकेले प्रयास से सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का समाधान हो जायेगा । यह एक छोटा सा समाधान है किन्तु इस समाधन से सब प्रकार की आर्थिक समस्याए अपने आप सुलझ सकती है। किन्तु मै देख रहा हॅू कि कोई भी राजनेता इस समाधान के पक्ष मे नही है । क्योकि बुद्धिजीवियो, पूंजीपतियों और राजनेताओ को इस समाधान से यह स्पष्ट परिणाम दिखता है कि श्रम की मांग बढ जायेगी श्रम का मूल्य बढ जायेगा आर्थिक असमानता घट जायेगी गरीब अमीर का भेद कम हो जायेगा और उनका स्वयं के अहंकार को चोट लगेगी। इसलिये वे समाधान के अनेक प्रकार के नाटक तो करते रहते है किन्तु किसी भी कृत्रिम उर्जा की किसी भी मूल्य वृद्धि का सब मिलकर विरोध करते है। यहां तक कि सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मामले पर एक जुट हो जाते है।
सामाजिक समस्याओ के रूप मे भी कई समस्याए समाज मे व्याप्त दिखती है। जातीय टकराव साम्प्रदायिकता, छुआछूत, उंच नीच का भेदभाव, विकार ग्रस्त वर्ण व्यवस्था इनमे से प्रमुख दिखती है। इन समस्याओं के समाधान मे भी राज्य निरंतर सक्रिय रहता है। ये समस्याए हमेशा बढती ही चली जाती है और समाज मे इतना असंतोष बढाती है कि वह यदा कदा टकराव का रूप ग्रहण कर ले । इस पूरी समस्या का एक साधारण समाधान है समान नागरिक संहिता । व्यक्ति एक इकाई होगा और संवैधानिक स्वरूप मे धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर, किसान मजदूर का कोई संवैधानिक या कानूनी भेदभाव नही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को बराबर के संवैधानिक अधिकार होगे। यह एक छोटा सा प्रयत्न इन सब समस्याओ का समाधान हो सकता है। किन्तु किसी भी राजनैतिक सामाजिक संगठन की इसमे कोई रूचि नही है क्योकि यदि ऐसा हो जायेगा तो वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष को नुकसान होगा। समाज मे अनेक समाज सुधारको के ऐसे संगठन बने हुए है जिनकी रोजी रोटी इन्ही समस्याओ पर निर्भर करती है। ये संगठन भी कभी नही चाहते कि समान नागरिक संहिता लागू हो । संघ परिवार बात तो समान नागरिक संहिता की करता है किन्तु चाहता है कि समान नागरिक संहित के नाम से समान आचार संहिता लागु हो और मुसलमान ऐसी आचार संहिता का विरोध करे। संघ परिवार भी सबको बराबर का अधिकार देने के पक्ष मे नही है। महिला संगठन भी बात समानता की करते है किन्तु महिलाओ को विशेष अधिकार उन्हे अवश्य चाहिये क्योकि समान नागरिक संहिता लागु होते ही सबकी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
राजनैतिक असमानता भी निरंतर बढती जा रही है। नये नये कानून बन रहे है और राज्य पर निर्भरता भी बढती जा रही है। परिवार के पारिवारिक और गांवो के गांव संबंधी आंतरिक मामलो मे भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। नये नये संगठन बन रहे है और ये संगठन शक्तिशाली होकर पूरे समाज को असमान कर रहे है। ये संगठन जब चाहे तब राज्य के सहायक भी बन जाते है और व्लैकमेलर भी। राज्य भी ऐसे समाज तोडक संगठनो को प्रश्रय देता रहता है। क्योकि ये संगठन वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष, के विस्तार सहायक होते है और जब विपरीत समूह आपस मे टकराते है तब राज्य उसमें पंच की भूमिका मे खडा होकर हस्तक्षेप करता है। ये सब समस्याए राज्य और राज्य द्वारा घोषित सामाजिक राजनैतिक धार्मिक संगठनो द्वारा पैदा की जाती है और ये सब मिलकर समाज को अशान्त किये रहते है। इन सभी समस्याओ का सीधे एक समाधान है सहभागी लोक तंत्र। इसमे राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेता है तथा परिवार गांव जिला प्रदेश को अधिकतम अधिकार बाटकर सिर्फ पुलिस सेना वित्त विदेश न्याय अपने पास रख लेता है। मै जानता हॅू कि यदि लोक स्वराज्य अर्थात सहभागी लोकतंत्र आ जाये तो अपने आप कानून कम हो जायेग, राज्य की आवश्यकता कम हो जायेगी, साथ ही राज्य पर निर्भरता भी कम हो जायेगी, राज्य पोशित अनेक समूह अपने आप समाप्त हो जायेगे। लेकिन ऐसे परिजीवी लोक स्वराज्य आने नही देंगे क्योकि ऐसा होना वे भी नही चाहते और राजनीति से जुडे लोग भी ऐसा बिल्कुल नही चाहते। उनकी भी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
मै स्पष्ट हॅू कि सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का एक समाधान है कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण, सामाजिक समस्याओ का एक समाधान है समान नागरिक संहिता और राजनैतिक समस्याओ का एक समाधान है, लोक स्वराज्य। यदि इन तीन समाधानो पर आगे बढा जाये तो भारत की लगभग सभी समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी और राज्य पूरी ताकत से अपराध नियंत्रण की दिषा मे सक्रिय हो सकता है। हम सबके लिये उचित होगा कि हम इन तीनो समस्याओ के एक एक समाधान की दिशा मे आगे बढे। हम लोगो का कर्तब्य है कि हम इन समस्याओ के वास्तविक समाधान पर पूरे देश मे जन जागरण मजबूत करे। जो संगठन इन समस्याओ से हटकर अन्य समाधानो का नाटक करते रहते है इन संगठनो की वास्तविकता समाज के समझ प्रकट होने दे। देश की समस्याए भी अपने आप सुलझ जायेगी और अपराध नियंत्रण भी अपने आप हो जायेगा।

मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’

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कुछ मान्य धारणाएं हैः-
(1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है।
(2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे वह इकाई परिवार हो, गांव हो अथवा देश।
(3) देश या राष्ट्र व्यवस्था की अंतिम इकाई नहीं होते हैं क्योंकि संपूर्ण विश्व-समाज ही व्यवस्था की अंतिम इकाई होता है। वर्तमान समय में विश्व व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने से राष्ट्र को संप्रभुता संपन्न इकाई मान लिया गया है।
(4) किसी अन्य देश का नागरिक यदि अपना देश छोड़कर किसी अन्य देश में जाता है तो उसके तीन कारण हो सकते हैंः-
(क) जीवन पर संकट (ख) सुविधाओं का अंतर (ग) राजनीतिक सामाजिक षड्यंत्र।
(5) दुनियां में मुसलमान अकेला ऐसा समुदाय है जो अन्य समुदायों की तुलना में सामाजिक धार्मिक षड्यंत्रों के आधार पर दूसरे देश में अधिक पलायन करता है।
(6) अन्य सभी सम्प्रदायों की तुलना में मुसलमान सहजीवन सर्व-धर्म समभाव की अपेक्षा संगठन और धार्मिक संख्या-विस्तार को अधिक महत्व देता है।
(7) वर्तमान समय में पूरी दुनियां के समक्ष संगठित इस्लाम सबसे बड़ी समस्या है। भारत के लिए तो यह समस्या खतरनाक स्वरुप धारण कर चुकी है।
भारत में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है कि वे शरणार्थी हमारे अस्थाई मेहमान हैं या घातक शत्रु? जो लोग किसी तरह की वैधानिक सहमति या स्वीकृति लेकर भारत में आए हैं उनके संबंध में हम कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं। हम तो चर्चा सिर्फ उन लोगों की कर रहे हैं जो बिना अनुमति के, छिपकर चोरी से भारत में घुस आए हैं और रह रहे हैं। स्वाभाविक है कि सामान्य रूप से ये सब घुसपैठिए ही माने जाएंगे किन्तु यदि गहराई से विचार किया जाए तो उनमें से कुछ लोग ऐसे होंगे जो किसी खतरे से बचाव के लिए भारत में प्रवेश किए होंगे। कुछ ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिन्हें बांग्लादेश की तुलना में भारत में अधिक भौतिक सुविधाएं मिल रही हों तथा कुछ अल्प संख्या ऐसे भी लोगों की हो सकती है जो भारत में किसी षड्यंत्र के अंतर्गत आए हो।
यदि सामान्यतः देखा जाए तो जो भी हिंदू बांग्लादेश से भागकर भारत आए है वेे किसी न किसी संकट के कारण यहां आए हैं। स्पष्ट है कि वे या तो वहां से भगाए गए हैं या डर कर भाग आए हैं जो भी मुसलमान भागकर आए हैं उनमे शायद ही कोई ऐसा हो जो किसी भय के कारण भारत आया हो। आमतौर पर वह सुविधाओं के लालच में भारत आया है लेकिन यह बात भी साफ है कि वह भारत में कुछ समय तक रह जाने के बाद भारत के संगठित मुसलमानों के साथ जुड़ जाता है धार्मिक मुसलमानों के साथ बिल्कुल नहीं जुड़ता। इस तरह यह बात लगभग निश्चित है कि वह भारत के लिए साम्प्रदायिक समस्याओं के विस्तार में सहयोगी बन जाता है समाधान नहीं।
स्पष्ट है कि बाहर से आए हुए अवैध हिन्दू भारत में शरणार्थी माने जाने चाहिए और उन्हें बिना जांच-पड़ताल किए नागरिकता प्रदान कर देनी चाहिए क्योंकि वे या तो भगाए जाने के कारण आये हैं अथवा डरकर। जो भी मुसलमान आए हैं उन लोगों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए और यदि उनमें से किसी के विषय में यह प्रमाणित हो जाता है कि उसको कोई खतरा था तब उस पर परिस्थितियों के अनुसार विचार किया जा सकता है. किंतु जो मुसलमान सुविधाओं के लालच में भारत आए हैं उन्हें पूरी तरह घुसपैठिया मानकर देश से निकाल देना चाहिए. क्योंकि भविष्य में वे भारत की सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाएंगे ही। इस संबंध में यदि कोई कानूनी या संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पड़े तो वह भी करना चाहिए। यह समस्या सिर्फ आसाम तक सीमित नहीं है बल्कि भारत के हर क्षेत्र में गांव-गांव तक इस समस्या का विस्तार हुआ है।
पूरी दुनियां के लिए संगठित इस्लाम हिंसा और आतंक का पर्याय बन गया है चाहे पश्चिम के देश हो अथवा साम्यवादी रूस और चीन। सभी इस खतरे को दुनियां का सबसे बड़ा खतरा समझ रहे हैं। भारत के लिए यह खतरा और भी अधिक गंभीर है। यदि वर्तमान स्थिति का ठीक-ठीक आकलन किया जाए तो संगठित और हिंसक इस्लाम भारत की सबसे बड़ी समस्या है और इसे आपातकाल मानकर सारी शक्ति इस समस्या के समाधान में लगनी चाहिए। यह खतरा इसलिए और भी अधिक गंभीर हो जाता है कि भारत के मजबूत पड़ोसी देशों की भारत को अस्थिर करने में गंभीर रूचि है और भारत का संगठित इस्लाम उनके लिए सहायक हो सकता है। मरता हुआ भारत का साम्यवाद इस संगठित इस्लाम को अपना संरक्षक समझकर उसके साथ मजबूती से खड़ा हुआ है। इन दोनों का तालमेल पूरा प्रयत्न कर रहा है कि येन केन प्रकारेण अन्य समुदायों को विभाजित करके उन्हें टुकड़ों में बांट दिया जाए। वे अन्य समुदायों के बीच सवर्ण-अवर्ण, हिंदू-ईसाई-सिख आदि के नाम पर मतभेद पैदा करके विभाजन के लिए दिन-रात सक्रिय रहते हैं। दूसरी ओर हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐसी अस्पष्ट भाषा बोलते हैं जिससे साम्यवादी व संगठित इस्लाम के गठजोड़ को अप्रत्यक्ष सहायता मिलती है। वर्तमान समय चुनावों के हिसाब से निर्णायक वर्ष है और काफी सोच समझकर निष्कर्ष निकालने की आवश्यकता है।
वर्तमान चुनावों में साफ-साफ धु्रवीकरण होना चाहिए जिसमें एक तरफ वे लोग हों जो संगठित इस्लाम और साम्यवादीे गठजोड़ को सबसे बड़ा खतरा समझते हैं तो दूसरी ओर वे लोग हों जो इस गठजोड़ को अपनी राजनीतिक सत्ता के लिए सहायक मानते हों। जो लोग कश्मीर के संबंध में ढुलमुल हो, बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति रखकर हिंदू शरणार्थियों को भी उन्हीं की श्रेणी में रखने की भाषा बोलते हों, म्यामार से आए मुस्लिम शरणार्थियों को मानवीय आधार पर भारत में रखे जाने की वकालत करते हों, भारत में समान नागरिक संहिता का विरोध करके अल्पसंख्यक बहुसंख्यक धारणा को मजबूत करते हों, या कश्मीर के संबंध में बातचीत की वकालत करते हो इस प्रकार के लोगों से पूरा सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि ऐसे लोग या तो खतरे को ठीक से समझ नहीं रहे अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए जयचंद की भूमिका निभा रहे हैं। साथ-साथ ऐसे लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है जो वर्तमान समय में सवर्ण-अवर्ण का मुद्दा उठाकर अप्रत्यक्ष रूप से संगठित इस्लाम व साम्यवादी गठजोड़ को लाभ पहुंचा रहे हैं। ऐसे नासमझ लोगों को भी समझाने की आवश्यकता है।
खतरा बहुत बड़ा है और भारत के लिए इस पार या उस पार का निर्णायक समय है। वर्तमान समय यह विचार करने का नहीं है कि राफेल डील में भ्रष्टाचार हुआ कि नहीं नोटबंदी से फायदा हुआ कि नुकसान, न्याय पालिका चुनाव आयोग आदि संस्थाओं की स्वायत्तता पर खतरा है कि नहीं, विपक्षी दलों के अस्तित्व पर संकट है या नहीं, अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही है या रसातल में जा रही है। वर्तमान समय तो सिर्फ एक प्रश्न का उत्तर खोजने में है कि भारत में साम्यवादी व संगठित इस्लाम के संभावित खतरे से कौन निपट सकता है और उसके लिए कौन प्रयत्नशील हो सकता है। वर्तमान समय में भारत के लोकतंत्र को कोई खतरा है या नहीं यह प्रश्न भी महत्व नहीं रखता है क्योंकि साम्यवादी व संगठित इस्लाम का गठजोड़ अव्यवस्था का विस्तार करेगा, वर्ग समन्वय की जगह वर्ग विद्वेष पैदा करेगा, व गृह युद्ध की परिस्थितियां पैदा करेगा जिसका निश्चित परिणाम तानाशाही है। चाहे वह तानाशाही शरीयत की हो या साम्यवादी हम किसी भी परिस्थिति में इस प्रकार के खतरे को नहीं झेल सकते हैं. अंत में मेरा सुझाव है- 1400 वर्षों के बाद दुनिया को यह महसूस हुआ है कि संगठित इस्लाम दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है. इस खतरे से निपटने में भारत का अपना भी हित निहित है और विश्व का भी. इस संकट काल में किसी भावना में बह कर मानवता के नाम पर अथवा, राजनीतिक स्वार्थ में की गई उनकी कोई भूल देश व संपूर्ण विश्व -समाज को निर्णायक नुकसान पहुंचाएगी, इसके प्रति सावधान होकर निर्णय करना चाहिए।

मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’

Posted By: kaashindia on March 6, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जुला स्वरूप होता है।
2. गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर यदि आॅकलन किया जाये तो चार अलग-अलग क्षमताओं के लोग मिलते है। इन्हें हम विचारक, प्रबंधक, व्यवस्थापक और श्रमिक के रूप में विभाजित कर सकते है। इस विभाजन को ही प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था कहा जाता था।
3. भारत की वर्ण व्यवस्था दुनियाॅ की एक मात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो आदर्श है। यदि यह व्यवस्था विकृत होकर योग्यता की जगह जन्म का आधार नहीं ग्रहण करती तो अब तक सारी दुनियां इसे स्वीकार कर चुकी होती।
4. बहुत लम्बे समय के बाद सामाजिक व्यवस्थाएं रूढ होकर विकृत हो जाती है और उसके दुष्परिणाम उस पूरी व्यवस्था को ही सामाजिक रूप से अमान्य कर देते है।
5. वर्ण और जाति अलग-अलग व्यवस्था है। जातियाॅ सिर्फ कर्म के आधार पर बनती है तो वर्ण गुण, कर्म, स्वभाव को मिलाकर। प्रत्येक वर्ण में कर्म के आधार पर अलग-अलग जातियाॅ बनती है।
6. वर्ण व्यवस्था से विकृति दूर करने की अपेक्षा वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना अव्यवस्था का प्रमुख कारण है।
7. स्वामी दयानंद महात्मा गांधी सरीखे महापुरूष वर्ण व्यवस्था की विकृतियों को दूर करना चाहते थे। भीमराव अम्बेडकर, नेहरू आदि ने वर्ण व्यवस्था की विकृतियों पर अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का प्रयास किया। उसका दुष्परिणाम भारत भोग रहा है।
8. वर्ण व्यवस्था में योग्यता और क्षमतानुसार कार्य का विभाजन होता है और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग वर्ण को अलग-अलग उपलब्धियाॅ भी प्राप्त होती है।
9. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था है। उसका राजनीति से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं। सामाजिक व्यवस्था में राजनीति का प्रवेष जितना ही बढता है उतनी ही अव्यवस्था बढती है जैसा भारत में हो रहा है।
10. वर्ण व्यवस्था में विचारक को सर्वोच्च सम्मान, प्रबंधक को शक्ति, व्यवस्थापक को अधिकतम आर्थिक सुविधा और श्रमिक को अधिकतम सुख की गारंटी और सीमा निर्धारित होती है। प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण विचार प्रधान होता था, क्षत्रिय शक्ति प्रधान, वैश्य कुशलता तथा श्रमिक सेवा प्रधान जाना जाता था। सबके गुण और स्वभाव के आधार पर वर्ण निर्धारित होते थे। जन्म के अनुसार सबको शून्य अर्थात शुद्र माना जाता था और धीरे-धीरे जन्म पूर्व के संस्कार पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश के आधार पर वह अपनी योग्यता सिद्ध करता था तब उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य का विशेष वर्ण दिया जाता था। ऐसी भी बात सुनी जाती है कि आठ वर्ष की उम्र में जो बालक ब्राह्मण की योग्यता की परीक्षा पास कर लेता था उसे ब्राह्मण का यज्ञोपवीत देकर ब्राह्मण घोषित किया जाता था। वह भविष्य में ब्राह्मण की पढाई विशेष रूप से करता था और उस एक दिशा में ही निरंतर आगे बढता जाता था। दस वर्ष की उम्र में शेष बच्चों की एक अलग तरह की परीक्षा होती थी। उस परीक्षा में उत्तीर्ण बच्चों को क्षत्रिय का यज्ञोपवीत दिया जाता था। बारह वर्ष की उम्र में वैश्य की परीक्षा होती थी और ऐसे बालक वैश्य का यज्ञोपवीत लेते थे। जो बालक तीन परीक्षाओं में पास नहीं होते थे उन्हें श्रमिक माना लिया जाता था और उन्हें यज्ञोपवीत से वंचित कर दिया जाता था। ब्राह्मणों के लिए जीवन पद्धति क्रियाकलाप तथा उपलब्धियाॅ सीमित होती थी। जो ब्राह्मण सम्मान के अतिरिक्त धन या राजनैतिक सत्ता की ओर प्रयत्न करता था उसे असामाजिक मान लिया जाता था अथवा उसका वर्ण बदल भी दिया जाता था। इसी तरह अन्य वणों के लिए भी था यदि कोई बढी उम्र में भी कोई विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता था तो उसका वर्ण बदलने की भी व्यवस्था थी। इसी तरह क्षत्रिय को ब्राह्मण की तुलना में कम सम्मान और सामान्य धन के आधार पर जीवन बिताना पडता था। वैश्य को सबसे कम सम्मान तथा राजनैतिक शक्ति शून्य पर संतोष करना था। श्रमिक को सर्वोच्च सुख की सुविधा प्राप्त थी उसे सम्मान, पाॅवर और धन से मुक्त होकर सेवा के माध्यम से अधिकतम सुख की व्यवस्था थी। उसकी सामान्य जीवन उपयोगी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने की गारंटी थी। ब्राह्मण को दान या भीख, क्षत्रिय को टैक्स, वैश्य को व्यापार तथा शुद्र को श्रम के आधार पर अपनी सुविधाएं इकठ्ठी करने की सीमाएं बनी हुयी थी। इन सीमाओं को न कोई तोड सकता था न ही उनकी तोडने की मजबूरी थी क्योंकि सामाजिक व्यवस्था इतनी मजबूत और सुचारू ढंग से चल रही थी कि किसी के सामने कोई संकट या मजबूरी कभी आती ही नही थी। कार्य विभाजन सबका अलग-अलग था और व्यवस्थित था। कोई किसी दूसरे के कार्य में न हस्तक्षेप करता था न प्रतिस्पर्धा करता था। कोई भी व्यक्ति एक से अधिक कार्य अपने पास केन्द्रीत नहीं कर पाता था। परिणामस्वरूप किसी भी वर्ण में बेरोजगारी का खतरा नही था। महिलाओं के संबंध में उच्च वर्ण के पुरूष निम्न वर्ण की महिलाओं के साथ विवाह और संतान उत्पत्ति कर सकते थे। निम्न वर्ण के पुरूष द्वारा उच्च वर्ण की महिलाओं से विवाह या संतान उत्पत्ति वर्जित था। यह सब सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक संरचना के आधार पर चल रही थी। जब यह रूढ बनी और बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के उद्देश्य से इस वर्ण व्यवस्था में आरक्षण लागू किया और योग्यता की परीक्षा की अपेक्षा जन्म के आधार पर वर्ण निश्चित करना शुरू कर दिया तब इसका दुरूपयोग शुरू हुआ और अव्यवस्था असंतोष बढने लगा। जब मूर्ख लोग ब्राह्मण बनकर ज्ञान और सम्मान के केन्द्र बनने लगे तब स्वाभाविक ही था कि समाज में असंतोष बढे। स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी ने इस वर्ण व्यवस्था की विकृति को ठीक करने का प्रयास शुरू किया और उसके बहुत अच्छे परिणाम आये लेकिन स्वतंत्रता के बाद नेहरू और भीमराव अम्बेडकर ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस विकृति का लाभ उठाना चाहा और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को तोडकर जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की पूरी-पूरी कोशिश की। परिणाम हुआ कि वे कोई नई व्यवस्था तो नहीं बना सके किन्तु पुरानी बनी हुई विकृत या अच्छी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। वर्तमान समय में समाज व्यवस्था को तोडकर राज्य व्यवस्था को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का उनका षणयंत्र सफल हो गया। धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर हो रही है, टूट रही है और राज्य व्यवस्था अधिक से अधिक शक्तिशाली होती जा रही है। मैं अच्छी तरह समझता हूॅ कि समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए वर्ण व्यवस्था से अच्छी कोई अन्य व्यवस्था नहीं हो सकती किन्तु वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के नाम से संशोधित या प्रचलित करना न संभव है न उचित। कुछ नये नामों पर विचार करके फिर से वर्ण व्यवस्था को सक्रिय और प्रभावी बनाने का प्रयास होना चाहिए। ब्राह्मण की जगह विचारक विद्वान या मार्गदर्शक नाम दिया जा सकता है। क्षत्रिय की जगह सुरक्षाकर्मी, प्रबंधक, राजनैतिक, राजनेता सरीखे नाम दिया जा सकता है। वैश्य की जगह व्यापारी, व्यवस्थापक या और नाम दे सकते है। शुद्र की जगह श्रमिक उपयुक्त नामकरण है किन्तु वर्ण व्यवस्था नये ढंग से विकसित होनी चाहिये और वह जन्म के आधार पर न होकर गुण और स्वभाव के आधार किसी परीक्षा के बाद घोषित होनी चाहिए। ऐसी कोई सामाजिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिये जो फिर से सम्मान, शक्ति, सुविधा और सेवा को योग्यता और क्षमतानुसार अपनी-अपनी सीमाओं में बिना किसी राजनैतिक कानून के दबाव में बांधने और संचालित करने में सक्षम हो सके। मैं पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के पक्ष में हूॅ। मैं समझता हूॅं कि ऐसी कोई नई व्यवस्था बनाना बहुत कठिन कार्य है किन्तु इसकी शुरूआत इस तरह हो सकती है कि वर्तमान समय में बने हुए व्यावसायिक बौद्धिक राजनैतिक या श्रमिक समूहों को मान्यता देकर उन्हें अपनी आंतरिक व्यवस्था को मान्यताएं दी जाये। इसका अर्थ हुआ कि अधिवक्ता समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था स्वयं तय करे तो वस्त्र व्यवसायी अपनी स्वयं । इसी तरह संत समाज के लोग भी अपने आंतरिक व्यवस्था स्वयं बना ले श्रमिक समूह भी बना सकते है। शिक्षक समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था और नियमावली स्वयं बना सके। मैं तो इस मत का हूॅ कि विवाह शादी तथा अन्य सामाजिक संबंधो में भी यदि जाति और वर्ण को प्राथमिकता दी जाए तो व्यवस्था और अच्छी होगी यदि वकील लडके का विवाह वकील लडकी से हो और श्रमिक का विवाह श्रमिक कन्या से हो तो इसमें लाभ ही होगा हानि नहीं। इस तरह धीरे-धीरे नये तरह की आदर्श वर्ण व्यवस्था एक स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सरकार को भी ऐसे समूहों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”

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कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपालिका न्याय की।
2. सुरक्षा और न्याय पूरा होने के लिए आवश्यक है कि पुलिस और न्यायालय एक-दुसरे के पूरक और समन्वयक हो।
3. यदि न्यायपालिका न्याय देने में असफल हो जाती है तब पुलिस की मजबूरी हो जाती है कि वह सुरक्षा देने के लिए असंवैधानिक तरीकों का भी प्रयोग करे।
4. वर्तमान भारत में न्यायपालिका न्याय देने में भी असफल है और पुलिस के काम में निरंतर बाधा भी पहुॅचाती है।
5. न्याय और सुरक्षा देना राज्य का लक्ष्य होता है और कानून उसका मार्ग। यदि कानून का पालन कराना लक्ष्य मान लिया गया तो अव्यवस्था निश्चित है।
6. यदि न्याय और कानून के बीच दूरी बढ जाती है तब कानून की समीक्षा की जाती है न्याय की नहीं।
7. लोकतंत्र में विधायिका न्याय को परिभाषित करती है न्यायपालिका उस परिभाषा के अनुसार समीक्षा करती है और कार्यपालिका इसे क्रियान्वित करती है।
8. समाज में अपराधियों में पुलिस का भय होना चाहिए और निरपराध लोगों में विश्वास होना चाहिए। वर्तमान समय में उलटा हो रहा है।
9. सूचना और शिकायत में अंतर करने की आवश्यकता है। न्यायपालिका इन दोनो के बीच का फर्क और उसके कारण बढ रही अव्यवस्था के विषय में नही सोचती। पिछले 70 वर्षो में न्यायपालिका ने समाधान कम किए और समस्याएं अधिक पैदा की। न्यायपालिका को समझना चाहिए था कि वह कानून के अनुसार न्याय घोषित करने तक सीमित है न्याय को परिभाषित विधायिका करती है और क्रियान्वित कार्यपालिका। न्यायालय न्याय को परिभाषित करने पर भी सक्रिय हो गया और क्रियान्वित करवाने में भी। न्यायालय यह सिद्ध करने में जुट गया कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है जबकि यह सोच पूरी तरह गलत है। परिणाम हुआ कि अपराधियों को या तो दंड मिलने में विलम्ब होने लगा या दंड महत्वहीन हुआ। परिणाम हुआ कि भारत की आम जनता में प्रत्यक्ष हिंसक और अराजक दंड देने के प्रति विश्वास बढ रहा है। इन परिस्थिति को देखते हुए पुलिस विभाग भी सुरक्षा देने के लिए सक्रिय हुआ। उसमे भी अपराधियों को पकड-पकड कर अवैधानिक तरीके से मारना शुरू हुआ क्योंकि पुलिस के लिए न्याय की तुलना में सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है और यदि न्यायालय पुलिस के कार्य में लगातार बाधक बनता है तो पुलिस के समक्ष इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं बचता की वह झूठ का सहारा लेकर अपराधियों को सीधे दंडित करने का प्रयास करे। सोहराबुद्दीन हत्या इशरत जहां का प्रकरण स्पष्ट उदाहरण है जब पुलिस ने इस प्रकार की सुरक्षा के लिए गैरकानूनी कार्य किए और सम्पूर्ण समाज का विश्वास अर्जित किया भले ही न्यायालय ने उसमें कितने भी रोडे़ अटकाये हो। पंजाब में आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पुलिस की अतिसक्रियताही कारगार हो सकी। छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित उत्तरी हिस्से को नक्सलवाद से मुक्त करवाने में भी पुलिस की अतिसक्रियता की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। जिस पुलिस अफसर ने यह कार्य किया उसे आज भी उस क्षेत्र के लोग भगवान सरीखे मानते है। उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्श में पुलिस की अतिसक्रियता के कारण जितने अपराधी मारे गये है उस आधार पर पुलिस की विश्वसनीयता बढी है। मैंने पुलिस की अतिसक्रियता के अच्छे भी परिणाम देखे है और बुरे भी। महाराष्ट्र के एक न्यायालय से एक बडे अपराधी को बाहर निकाल कर कुछ महिलाओं ने हत्या कर दी थी उन महिलाओं को बहुत प्रशंसा मिली। इसी तरह अम्बिकापुर शहर में महिलाओं का चैन लूटकर भाग रहे पेशेवर लूटेरो को एक बार पकडे जाने पर भीड ने उनमें एक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पकडने वाले को वहाॅ के नागरिकों ने और पुलिस विभागों ने भी सम्मानित किया। एक विपरीत घटना में हमारे जिले में एक व्यक्ति अपनी पत्नी को पीछे बैठाकर मोटर साइकिल से जा रहा था स्पीड ब्रेकर के उछलने के कारण पत्नी गिरकर मर गयी और पुलिस ने उस मामले में उस मोटरसाइकिल चालक पति पर मुकदमा कर दिया। कुछ ही वर्ष बीते है कि यदि आज महाराष्ट्र और अम्बिकापुर की कानून तोडकर भीड द्वारा दिए गए दंड की आज समीक्षा हो तो कुछ वर्ष पूर्व जिन्हें सम्मानित किया गया था आज लिचिंग के अपराध में हत्या का मुकदमा झेल रहे होते। समझ में नही आता कि न्याय की परिभाषा सुविधानुसार बदली जा रही है। यदि कोई अपराध होता है और अपराध के पीछे कोई व्यक्तिगत उद्देश्य नहीं है, भूल है या उद्देश्य जनहित है तो ऐसे कार्य को गैरकानूनी माना जाना चाहिए अपराध नहीं। दोनों के दंड में भी अंतर होना चाहिए। एक पुलिस वाले ने जनहित की भावना से किसी अपराधी की हत्या कर दी या भूल से किसी निर्दोष की हत्या कर दी तथा यदि व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर किसी अपराधी या निर्दोष की हत्या कर दी तो यह तीनों घटनाएं भिन्न-भिन्न परिणाम रखती है। कानून और न्यायालय को इन सब में भिन्नता देखनी चाहिये। आश्चर्य होता है कि न्यायपालिका इतने स्पष्ट अंतर को भी नहीं समझ पाती। गैरकानूनी और अपराध बिल्कुल अलग-अलग होते है और अलग-अलग समझे जाने चाहिये। अपराध में अपराधी की नीयत अवश्य परिभाषित होनी चाहिए किन्तु हम देखते है कि जो न्यायालय बीस-तीस हत्याएं करने के बाद भी अपराधी को दंडित नहीं कर पाती या निर्दोष घोषित कर देता है उस अपराधी को कोई पुलिस वाला अवैध तरीके से मार दे तब न्यायिक सक्रियता देखते ही बनती है। विचित्र स्थिति है कि भारत में अनेक अपराधियों ने हत्या और अपराध को अपना व्यवसाय बना लिया है। भारत की न्यायपालिका को ऐसी खुली हुई दुकाने कभी विचलित नहीं करती। उसकी प्राथमिकता क्या है? न्यायपालिका तो लिचिंग रोकना अथवा बलात्कार को रोकना सबसे अधिक प्राथमिक कार्य समझती है। पेशेवर अपराधी भले ही दंडित न हो किन्तु किसी अल्पवयस्क कन्या के साथ किए गए बलात्कार के लिए न्यायालय बहुत सक्रिय हो जाता है और 40 दिन में फाॅसी का आदेश देकर अपनी पीठ थपथपाता है। मैं स्पष्ट हूॅ कि न्यायपालिका को अपनी प्राथमिताएं समझनी चाहिये। अपराधियों की खुली दुकाने सम्पूर्ण भारत के लिए बहुत बडा कलंक है। जिन पर आजतक कोई नियंत्रण नहीं होता है। लोकतंत्र में कोई एक इकाई व्यवस्था की ठेकेदार नहीं होती। 20-30 वर्ष पूर्व विधायिका अपने को ठेकेदार समझने लगी थी और पिछले कुछ वर्षाे से न्यायपालिका समझने लगी है, दोनो ही गलत है। न्यायपालिका को अपना काम छोड कर जनहित याचिकाएं निपटारा करने में मजा आने लगा है। परिणाम हुआ कि पुलिस को भी न्यायालय से हटकर सीधा न्याय देने में मजा आना शुरू हो गया है। यह टकराव पूरी तरह घातक है लेकिन इस टकराव में न्यायपालिका की भूमिका बहुत अधिक गलत दिखती है। अपराधी पुलिस के सामने सरेंडर करने की अपेक्षा न्यायालय के पास जाना अधिक सुरक्षित समझने लगे है। अपराधियों में पुलिस का भय घट रहा है और न्यायपालिका पर विश्वास बढ रहा है। यह अच्छी स्थिति नहीं है। न्यायपालिका को अच्छी तरह समझना चाहिये कि अपराध नियंत्रण में उसकी भी भूमिका एक सहयोगी की है। न्यायपालिका सिर्फ व्यक्ति पुलिस के बीच पूरी तरह तटस्थ भूमिका में नहीं रह सकती। यह सिद्धान्त भी गलत है कि जब तक कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा अपराधी सिद्ध न हो जाये तब तक वह निर्दोष है। होना तो यह चाहिए कि यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध कर देती है तो वह व्यक्ति निर्दोष न होकर संदिग्ध अपराधी है। उसे निर्दोष नहीं माना जाना चाहिये। यदि कोई असम्बद्ध व्यक्ति कोई शिकायत करता है तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उस शिकायत को सूचना समझकर कार्यवाही करे शिकायत समझ कर नहीं। वर्तमान समय में ऐसी सूचनाओं को शिकायत मान लेने के कारण अनेक ऐसे परजीवी व्यक्ति या संगठन खडे हो गये है जिनका ऐसी शिकायत करना एक व्यवसाय बन गया है और वे दिन रात न्यायालय के इर्द-गिर्द रहकर ही अपनी रोजी-रोटी चलाते है।पुलिस की अतिसक्रियता एक अल्पकालिक मजबूरी हो सकती है किन्तु पुलिस को ऐसी भौतिक या नैतिक छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपना काम छोडकर जनहित का काम करने लग जाए। इस समस्या का सिर्फ एक ही समाधान है कि न्यायालय स्वयं को न्याय तक सीमित कर ले तथा सुरक्षा और न्याय के बीच खीचतान को समाप्त करके दोनों में समन्वय करे। यदि कानून और न्याय मिलकर एकाकर हो जाऐगे पुलिस की सक्रियता अपने आप बंद हो जाऐगी अथवा सब मिलकर उसे अपनी सक्रियता छोडने के लिए मजबूर कर देगे।

मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन

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कुछ सिद्धान्त है।
1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है।
2 किसी भी प्रकार की सत्ता हमेशा वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष का प्रयत्न करती है। वर्ग संघर्ष सत्ता के सशक्तिकरण का मुख्य आधार होता है। इसे ही बांटो और राज करो कहा जाता है।
3 साम्यवाद खुलकर वर्ग संघर्ष का प्रयत्न करता है, समाजवाद अप्रत्यक्ष रूप से तथा पूंजीवाद आंशिक रूप से।
4 लोकतंत्र मे संगठन वर्ग संघर्ष का आधार होता है और वर्ग संघर्ष विभाजन की स्थितियां पैदा करता है।
5 मुसलमान चाहे जिस देश मे रहे वह संगठन भी बनायेगा ही और वर्ग विद्वेष बढाकर विभाजन भी करायेगा ही । विभाजन उसका लक्ष्य होता है मजबूरी नही।
6 हिन्दू कभी संगठन नही बनाता और यदि अन्य लोग संगठित हो तब भी वर्ग समन्वय का प्रयत्न करता है।
स्वतंत्रता के बहुत पूर्व धर्म के आधार पर राजनैतिक संगठन की शुरूआत मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने की । किसने किसकी प्रतिक्रिया मे की यह अलग विषय है किन्तु लगभग साथ साथ दोनो बातें उठी । एक तीसरी शक्ति के रूप मे संघ आया और चौथी शक्ति के रूप मे गांधी। हिन्दू महासभा की यह मान्यता थी कि भारत हिन्दू राष्ट होना चाहिये। मुसलमान इसके विरोधी थे और मुस्लिम राष्ट्र का सपना देख रहे थे। उनका मानना था कि भारत की सत्ता मुस्लिम राजाओ से अंग्रेजो ने छीनी है इसलिये मुसलमानो का उस पर पहला अधिकार है। हिन्दू महासभा का मानना था कि हिन्दुओ से मुसलमानो और मुसलमानो से अंग्रेजो ने सत्ता छीनी इसलिये भारत की सत्ता पर मूल रूप से हिन्दुओ का अधिकार है। संघ ने बीच का मार्ग अपनाया और माना कि अंग्रेजो की तुलना मे मुसलमान अधिक घातक है इसलिये सारा विरोध मुसलमानो के खिलाफ केन्द्रित होना चाहिये। गांधी का मानना था कि हम पहले अंग्रेजो की गुलामी से मुक्त हो जाये और शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक हो जिसमे हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न करके या तो प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो या यदि मजबूरी हो तो वर्ग समन्वय हो वर्ग संघर्ष नही। इस चार समूहो मे से किसी भी समूह ने किसी के साथ कोई समझौता नही किया और चारो अलग अलग तरीके से सक्रिय रहे । आर्य समाज कभी संगठन नही रहा बल्कि संस्था के रूप मे रहा। यही कारण था कि आर्य समाज ने मुसलमानो को छोडकर शेष तीनो से मिलकर स्वतंत्रता संघर्ष का साथ दिया तथा स्वतंत्रता के बाद भी आर्य समाज ने अपने को सत्ता संघर्ष से अलग कर लिया। स्वतंत्रता संघर्ष मे संघ लगभग निर्लिप्त रहा इसलिये उसने अपने को सांस्कृतिक संगठन घोषित कर लिया । लेकिन सतर्कता पूर्वक संलिप्तता संता के मामले मे इस तरह रही कि मुसलमान किसी भी रूप मे कमजोर रहे । गांधी के लिये स्वतंत्रता पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट और संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत। इसी बीच अम्बेडकर के रूप मे एक पांचवे समूह का उदय होता है और उसने आदिवासी हरिजन को एक वर्ग बनाकर अलग सत्ता की मांग शुरू कर दी। विभाजन रोकने के लिये गांधी अम्बेडकर की उस मांग से ऐसा समझौता करने को मजबूर हुए जो आजतक भारत की अखंडता की कीमत चुका रहा है। गांधी चाहते थे कि जिन्ना और पटेल के बीच भी कोई समझौता हो जाये किन्तु दोनो अपनी अपनी जिद पर अडे थे। जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ मानने को तैयार नही थे तो पटेल मुसलमानो को अलग वर्ग के रूप मे भी नही मानना चाहते थे । पटेल किसी भी रूप मे मुसलमानो को किसी तरह का विशेष महत्व नही देना चाहते थे भले ही विभाजन क्यो न हो जाये । गांधी को छोडकर राजनैतिक स्वरूप के जितने भी लोग स्वतंत्रता संघर्ष मे शामिल थे उनमे से कोई भी ऐसा नही निकला जिसने विभाजन का विरोध करने मे गांधी का खुंलकर साथ दिया हो। विभाजन मे अंग्रेजो की भी रूचि थी । हिन्दू मुस्लिम आदिवासी संघर्ष समाप्त न हो इसलिये वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सबकी पीठ थपथपाते थे। अंत मे सत्ता लोलुप नेहरू पटेल अम्बेडकर तथा अन्य सबने मिलकर विभाजन स्वीकार कर लिया । स्पष्ट है कि विभाजन की नींव वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत मे मुसलमानो के द्वारा प्रारंभ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बडा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये। इसी तरह विभाजन का एक मात्र विरोधी सिर्फ गांधी को माना जाना चाहिये क्योकि वे किसी भी रूप मे विभाजन के विरोधी थे। यदि बीच के पटेल नेहरू और अम्बेडकर की बात करे तो इन सबकी विभाजन के प्रति पूरी सक्रियता रही। कांग्रेस पार्टी मे सरदार पटेल का बहुमत था और नेहरू को पता था कि गांधी जी नेहरू को ही प्रधान मंत्री स्वीकार करेंगे । अम्बेडकर आगे स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक सत्ता के सपने देख रहे थे और तीनो ने मिलकर अन्य सबकी सहमति ले ली जिसके कारण गांधी भी विभाजन के लिये मजबूर हो गये।
राजनैतिक सत्ता बहुत चालाक होती है । वह षणयंत्र स्वयं करती है और दोषारोपण दूसरे पर करती है। वह अपने चाटुकारो को प्रचार माध्यमो मे लगाकर वे गुनाह को गुनाहगार प्रमाणित कर देती है। संघ स्वतंत्रता के पूर्व भले ही निर्लिप्त रहा हो किन्तु राजनैतिक सत्ता से उसकी दूरी कभी रही नही । स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान अलग हुआ और भारतीय सत्ता पर संघ की पकड मजबूत हो इसके लिये विभाजन का दोषी गांधी को सिद्ध करना आवश्यक था। संघ ने जान बूझकर गांधी को टारगेट किया क्योकि गांधी की छवि उसके संगठित वर्ग निर्माण मे बहुत बडी बाधा थी। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा। कोई भी वर्ग कभी नही चाहता कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जबतक वह कमजोर होता है तो न्याय की बात करता है और मजबूत होता है तब व्यवस्था की बात करता है। इसलिये संघ ने गांधी के जीवित रहते से लेकर आज तक बेगुनाह गांधी को विभाजन का दोषी प्रमाणित करने मे अपनी सारी ताकत लगा दी और विभाजन के प्रमुख दोषी सरदार पटेल को साफ बचा लिया। कांग्रेस पार्टी सत्ता लोलुप थी। नेहरू स्वयं गांधी की छवि का लाभ उठाना चाहते थे किन्तु गांधी की विचार धारा से उनका जीवन भर विरोध रहा । इसलिये कांग्रेस पार्टी ने संघ के इस गांधी विरोधी प्रचार से अपने को किनारे कर लिया। गांधीवादी धीरे धीरे साम्यवादियो के चंगुल मे फंस गये इसलिये वे संघ का विरोध करते रहे किन्तु गांधी विचारो का समर्थन नही कर सके। विभाजन मे गांधी की भूमिका विरोधी की थी यह बात स्पष्ट करने वाला कोई नही बचा था इसलिये विभाजन का सारा दोष निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया गया।
यदि आज भी भारत पाकिस्तान बंगलादेश को एक राष्ट्र के रूप मे मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा। भारत के मुसलमान इससे पूरी तरह सहमत हो जायेगे। आज अखंड भारत का लगातार राग अलाप रहे संघ के लोग अब एक भारत कभी नही चाहेंगे क्योकि वर्तमान मे सोलह प्रतिशत की मुस्लिम आबादी यदि इतनी बडी समस्या के रूप मे बनी हुई है और पाकिस्तान बंगलादेश मिल जाने के बाद यह आबादी पचीस प्रतिशत होगी तब शक्ति संतुलन और बिगड सकता है। इसलिये अखंड भारत का नारा संघ परिवार का नाटक मात्र है और कुछ नही।
मै इस मत का हॅू कि अब विभाजन का दोषी कौन इसकी खोज बंद कर देनी चाहिये और यह खोज तभी बंद हो सकती है जब इसके वास्तविक दोषी को सामने खडा कर दिया जाये जिससे विभाजन विरोधी गांधी पर आक्रमण अपने आप बंद जो जाये और यह चर्चा पूरी तरह समाप्त हो जाये। मै स्पष्ट हॅू कि यदि वर्ग निर्माण और संगठनो की मान्यता को अब भी नही रोका गया तो नये विभाजनो का खतरा बना रहेगा । भविष्य मे विभाजन न हो इसका सिर्फ एक ही समाधान है और वह है समान नागरिक संहिता । सबको मिलकर इस दिशा मे काम करना चाहिये।

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