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मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”

Posted By: kaashindia on March 3, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।
1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।
2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण कर्म स्वभाव के अनुसार होता है। चार वर्ण ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र मे से सिर्फ एक क्षत्रिय को ही हिंसा की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। अन्य तीन के लिये हिंसा प्रतिबंधित है। 3 इस्लाम और साम्यवाद हिंसा को पहला शस्त्र मानते है । इसाई और हिन्दू अंतिम शस्त्र। 4 जब किसी व्यक्ति के किसी मौलिक अधिकार पर हिंसक आक्रमण होता है और न्याय का कोई मार्ग उपलब्ध न हो तभी हिंसा की विशेष अनुमति होती है, अन्यथा नही। 5 किसी भी सरकार को छत्रिय प्रवृत्ति का माना जाता है। अर्थात न्याय और सुरक्षा के लिये उसे हिंसा को पहला शस्त्र मानने का अधिकार है। 6 किसी भी विद्वान व्यवसायी अथवा श्रमिक को कभी भी किसी भी परिस्थिति मे हिंसा का सहारा नही लेना चाहिये। 7 यदि पूरी तरह गुलामी हो ओर मुक्ति का मार्ग न दिखे तब हिंसा या अहिंसा के मार्ग मे से एक चुना जा सकता है । लोकतंत्र मे अहिंसा के अतिरिक्त कोई अलग मार्ग नही है। 8 क्रान्तिकारियो ने गुलामी काल मे हिंसा का मार्ग चुना था। वर्तमान समय मे वे हिंसा का पूरी तरह विरोध करते ।पूरी दुनियां मे हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है । सत्ता के दो केन्द्र इस प्रकार बन रहे है कि ये दो जब चाहे तब सारी दुनियां को विश्व युद्ध मे ले जा सकते है। सारी दुनिया के कई अरब लोग मिलकर भी इन्हे विश्व युद्ध से नही रोक सकते। लेकिन पुरी दुनिया की अपेक्षा भारत की स्थिति कुछ ऐसी है कि यहां सामाजिक वातावरण मे भी हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है। सफलता के लिये फर्स्ट अटैक इज वेल डिफेन्स को सिद्धान्त के रूप मे स्वीकार कर लिया गया है। किसी एक्सीडेन्ट मे आग लगाना तोड फोड करना और हिंसा करना गुंडागर्दी के स्थान पर मजबूरी माना जाने लगा है। हिंसा करने के उद्देश्य से गलतियो के बहाने खोजे जा रहे है। गंभीर मरीज अस्पताल मे आते ही मर जाये तो डाक्टरो और नर्सो के साथ हिंसक वर्ताव प्रतिदिन दिखता है। कानून का पालन करने वाले राजनेता प्रतिदिन हिंसक तरीके से कानून तोडते है किन्तु उसे गुडागर्दी नही कहा जाता । न्यायालयो मे कानून की दुहाई देने वाले वकील भी सडको पर घूम घूम कर कानून तोडना अपना अधिकार समझते है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी अब न्यायालय छोडकर मीडिया से अपनी शिकायत करने लगे है। अपराधी कई कई बार अपराध करने के बाद भी न्यायालय से निर्दोष या जमानत पर बाहर धूमते है और पूलिस ऐसे लोगो को कभी वास्तविक तो कभी फर्जी एनकाउंटर मे मार गिराती है। न्यायालय कानून की बात करते समय बाल की खाल निकालता है तो सरकारे सुरक्षा देने के लिये अधिक से अधिक एन्काउंटर करने को अपनी सफलता घोषित करती है। जब मौलिक अधिकारो पर हिंसक आक्रमण होता हो और न्याय प्राप्ति का कोई मार्ग उपलब्ध न हो तभी हिंसा मजबूरी मानी जा सकती है, अन्यथा नही। मार्ग भी दो प्रकार के है । सामाजिक 2 कानूनी। दोनो ही प्रकार के प्रयत्न किये जा सकते है। तानाशाही से मुक्ति के लिये कभी हिंसा का सहारा लिया जा सकता है। किन्तु लोकतंत्र मे कानून के अतिरिक्त किसी प्रकार की हिंसा का किसी भी परिस्थिति मे कोई औचित्य नही है क्योकि न्याय के सामाजिक तथा कानूनी मार्ग पूरी तरह उपलब्ध होते है। इसके बाद भी भारत मे लगातार हिंसा बढ रही है। भविष्य मे भी कम होने की कोई संभावना नही दिखती।भारत के आम नागरिको मे हिंसा का पक्ष मजबूत किया गया है। बार बार यह बात दुहराई जाती है कि कायरता की अपेक्षा हिंसा अच्छी होती है किन्तु कभी यह नही बताया जाता कि हिन्सा की अपेक्षा अहिंसा अच्छी होती है। कभी कायरता और अहिंसा को ठीक ढंग से परिभाषित भी नही किया गया। इस मामले मे भारतीय वातावरण को खराब करने मे गांधीवादियो का सबसे अधिक योगदान है। गांधीवादियो ने आजतक सिर्फ गांधी की नकल की लेकिन कभी गांधी को नही समझा। भारत का हर गांधीवादी लगभग कायर होता है । वह अहिंसा के पक्ष मे इस प्रकार खुलकर बोलता है कि जैसे वह सबसे बडा अहिंसा का पक्षधर हो किन्तु हिंसक नक्सलवादियों और उग्रवादी मुसलमानो के पक्ष मे सबसे पहले गांधीवादी ही खडे होते है। उन्हे इस्लाम और साम्यवाद की हिंसा नही दिखती किन्तु हिन्दुओ या संघ परिवार की हिंसा बहुत बडी समस्या के रूप मे दिखाई देती है। दुसरी बात यह भी है कि भारत मे तंत्र से जुडा हर व्यक्ति सामाजिक हिंसा का समर्थन करता है। महिलाओ को अपनी सुरक्षा के लिये हिंसा का सहारा लेने के लिये बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है। गरीबो अछूतों आदिवासियो तक को कानून की तुलना मे प्रत्यक्ष मुकाबला करने की सलाह दी जाती है। पारिवारिक वातावरण से भी बचपन मे ही हिंसा की ट्रेनिंग मिलने लगती है। बच्चो को सिखाया जाता है कि गलत बात बर्दास्त नही करनी चाहिये। उन्हे यह ट्रेनिंग नही दी जाती कि गलत बात का विरोध करने का सामाजिक और संवैधानिक क्या तरीका है और विरोध करने की सीमाएं क्या है। बचपन से ही बच्चे को गाय और शेर की प्रवृत्ति मे शेर बनना अधिक अच्छा बताया जाता है । गाय को कायरता का और शेर को बहादुरी का मापदंड घोषित किया जाता है। विचार परिवर्तन के लिये विचार मंथन की जगह विचार प्रचार का सहारा लिया जाता है। एक झूठ को बार बार बोलकर सच सिद्ध कर दिया जाता है। किसी भी हिंसा को कभी भी मजबूरी के रूप मे बदलकर न्योचित बता देना आम बात हो गई है।आम नागरिक राज्य से सुरक्षा और न्याय की उम्मीद करता है। जब उसे राज्य से सुरक्षा और न्याय नही मिलता तब वह सुरक्षा और न्याय के लिये व्यक्तिगत प्रयास करता है और व्यक्तिगत प्रयास ही धीरे धीरे हिंसक वातावरण मे बदल जाते हेै। समाज मे हिंसा के बढते वातावरण का मुख्य कारण राज्य मे अहिंसा का बढता प्रभाव माना जाना चाहिये। राज्य यदि समुचित बल प्रयोग न करके न्यूनतम बल प्रयोग का सहारा लेगा तब परिणाम स्वरूप समाज मे हिंसा बढेगी ही। वर्तमान समय मे भारत विचारो के अभाव का देश बन गया है। जो भारत पहले दुनिया को विचारो का निर्यात करता था। वही भारत अब दुनियां से विचारो की नकल करता है। यहां तक कि भारत का संविधान भी पूरी तरह नकल पर आधारित है। भारत की न्यायपालिका इस प्रकार विदेशो की नकल करती है कि चाहे निन्यानवे अपराधी छूट जाये किन्तु किसी निरपराध को दंडित नही होना चाहिये। अपने को निर्दोष सिद्ध करने का दायित्व अपराधी पर न डालकर पुलिस पर डाल दिया जाता है। पुलिस द्वारा घोषित अपराधी को संदिग्ध अपराधी न मानकर निर्दोष माना जाता है। पुलिस और न्यायालय ओभर लोडेड कर दिये गये है किन्तु इन दोनो विभागो के खर्चे का कुल बजट एक प्रतिशत से भी कम रहता है जबकि शिक्षा पर ही छ प्रतिशत का बजट लग जाता है। सरकारे भी न्याय और सुरक्षा के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार करती है। बलात्कार की तुलना मे वैष्या वृत्ति मिलावट की तुलना मे मूल्य नियंत्रण और अपराध नियंत्रण की जगह शराब बंदी मांस बंदी जैसे कानून बनाने के प्रयास किये जाते है। जीव दया जैसे अनावश्यक कानून भी भारत मे बनाकर रखे जाते है। आपराधिक मुकदमे भले ही बीस तीस वर्ष तक चलते रहे किन्तु महिलाओ से छेडछाड या हरिजन आदिवासी अत्याचार के मुदकमे त्वरित निपटाने के प्रयास किये जाते है। तंत्र से जुडे तीनो भाग अपराधियों के प्रति लोक तांत्रिक बने रहने का शत प्रतिशत प्रयत्न करते है किन्तु अपराध पीडित व्यक्ति को न्याय के लिये समाज पर छोड देते है। किसी अपराधीके साथ अन्याय न हो इस बात की पूरी कोशिश की जाती है। भले ही वह न्याय किसी निरपराध के प्रति अन्याय ही क्यो न हो। परिणाम होता है कि समाज महसूस करने लगता है कि कानून मे असीमित विलंब है, न्याय की कोई उम्मीद नही है, भीड ही उसे सुरक्षा दे सकती है इसलिये वह हिंसा पर विश्वास करने लग जाता है। छोटे से छोटे गांव से शहर तक लोग अपनी सुरक्षा के लिये किसी स्थानीय दबंग के साथ इसलिये जुड जाते हे कि वह दबंग कम से कम उसके साथ अन्याय नही करेगा और दूसरे से होने वाले अन्याय मे उसे सुरक्षा भी देगा। इस तरह सरकार और कानून की तुलना मे उसे दबंगो से अधिक सुरक्षा की गारंटी भी मिलती है।समाधान बहुत कठिन है। समस्या विश्व व्यापी तो है ही किन्तु भारत के लिये तो नासूर का रूप ले चुकी है। कुछ कठोर कदम उठाने होगे। कानून पर विश्वास बढे इसके लिये कानून को मजबूत और परिणाम मूलक बनाना होगा । सुरक्षा और न्याय या तो राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बनायी जाय अथवा इसके लिये एक अलग से विभाग हो जिसे कोई अन्य कार्य न दिया जाये। अपराध को ठीक ढंग से परिभाषित किया जाये । कानूनी या अनैतिक कार्यो को अपराध से बाहर कर दिया जाये। न्यायपालिका इतनी मजबूत हो कि वास्तविक या फर्जी एनकाउंटर की आवश्यकता न पडे। विशेष समस्या ग्रस्त जिलो मे गुप्त मुकदमा प्रणाली के रूप मे विशेष न्यायिक प्रावधान लागु किये जाये जिससे दबंग लोगो के अंदर डर पैदा हो। स्वाभावि़क है कि गुप्त मुकदमा प्रणाली का डर समाज मे कानून के प्रति विश्वास पैदा करेगा । ये छोटे छोटे दो तीन कार्य समाज मे बढते हिंसा के प्रति विश्वास से मुक्ति दिला सकते है।

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