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मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा

Posted By: kaashindia on March 3, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक वह व्यक्ति है एक से अधिक होते ही वह समाज का अंग बन जाता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है किन्तु एक से अधिक होते ही सबकी स्वतंत्रता समान हो जाती है। 3. असीम स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है। यह सीमा वहां तक होती है जहां से किसी अन्य की स्वतंत्रता का उल्लंघन न होता हो। 4. प्राकृतिक रूप से कोई भी दो व्यक्ति किसी भी मामले मे समान नही होते । असमानता प्राकृतिक है और समानता के प्रयत्न करना षणयंत्र। 5. समान स्वतंत्रता प्राकृतिक सिद्धान्त है । समान करने का प्रयास ऐसी समानता को असमान बनाता है। 6. कमजोरो की मदद करना मजबूतो का कर्तब्य होता है, कमजोरो का अधिकार नही । राजनैतिक षणयंत्र इसे कमजोरो का अधिकार बताता है और निकम्मे लोग इस षणयंत्र को अपना हथियार बनाते हे। 7. व्यक्ति दो प्रकार के होते है भावना प्रधान और बुद्धि प्रधान । हर बुद्धि प्रधान बिल्लियो के बीच बंदर की भूमिका मे भावना प्रधान लोगो को ठगने के लिये समानता दूर करने के प्रयास को हथियार बनाते है । 8. हर बुद्धि प्रधान अपने से उपर वाले से स्वतंत्रता चाहता है और अपने से नीचे वालो को स्वतंत्रता नही देना चाहता। 9. गरीब अमीर उंच नीच छोटा बडा, कमजोर और मजबूत भ्रामक शब्द है । हर व्यक्ति अपने से मजबूत की अपेक्षा कमजोर और कमजोर की अपेक्षा मजबूत समझता है। यह सापेक्ष शब्द है निर्पेक्ष नही।वैसे तो पूरी दुनियां मे समानता के नाम पर बहुत बडा षणयंत्र चल रहा है किन्तु भारत मे इसका दूष्प्रभाव सबसे ज्यादा है। समानता लाने के नाम पर जो भी प्रयत्न किये जा रहे है वे सब हर मामले मे असमानता को बढा रहे है। इस मामले मे सबसे अधिक सक्रियता तंत्र से जुडे लोगो की है। ऐसे लोग आर्थिक सामाजिक असमानता दूर करने के नाम पर निरंतर राजनैतिक असमानता बढाते जाते है। यहां तक कि असमानता दूर करने के नाम पर ही तंत्र ने लोक को इतना गुलाम बना लिया है कि वोट देने के अतिरिक्त लोक के पास कोई ऐसी स्वतंत्रता नही बची है, जो तंत्र की दया पर निर्भर न हो। गली गली मे जाति प्रथा छुआछूत महिला उत्पीडन अमीरी और गरीबी रेखा के नाम पर दुकाने खुली हुई है और लगभग सबके तार राजनैतिक सत्ता के प्रयत्न से जुडे दिखते है। राजनीति के नाम पर अलग अलग गिरोह बने हुए है जो समाज के समक्ष तो आपस मे टकराने का नाटक करते है किन्तु खतरा दिखते ही सब एक हो जाते है। समझ मे नही आता कि जब प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता समान है तथा संवैधानिक अधिकार भी एक बराबर है तब ये राजनैतिक नेता और समाज सुधारक किस बात को बराबर करना चाहते है। जब व्यक्तिगत क्षमता प्राकृतिक रूप से असमान होती ही है और उसे किसी भी तरह समान नही किया जा सकता तो फिर समानता के प्रयत्नो का औचित्य क्या है? प्रष्न यह भी उठता है कि समान अधिकारो वाला व्यक्ति कैसे किसी दूसरे की असमानता दूर कर सकता है। किसी भी व्यक्ति या राज्य का यह अधिकार है कि वह किसी भी अन्य की किसी भी रूप मे मदद कर सकता है किन्तु किसी को यह अधिकार नही है कि वह किसी अन्य के अधिकार काटकर किसी अन्य को दे सके क्योकि अधिकार सबके समान होते है।समान स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है । इसमे किसी प्रकार का बदलाव न उचित है न संभव । बिना व्यक्ति की सहमति के इसकी स्वतंत्रता मे कोई कटौती नही की जा सकती। यह भी आवश्यक है कि उसकी सहमति के बाद भी उसकी स्वतंत्रता मे कोई मौलिक समझौता नही किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई समझौता उसकी सहमति के बाद भी तभी तक लागू रह सकता है जबतक उसकी सहमति है। अन्यथा वह समझौता समाज के लिये विचार का आधार बनेगा। ऐसी परिस्थिति मे राज्य समाज की सहमति से बनी हुई एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जो प्रत्येक व्यक्ति की उसकी असीम स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस तरह समानता की यह परिभाषा बनती है कि किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित सीमा रेखा से नीचे वालो को समान सुविधा तथा उपर वालो को समान स्वतंत्रता की गारंटी दी जानी चाहिये। स्वाभाविक है कि राज्य इस निमित्त सबसे अधिक उपयुक्त व्यवस्था है । समाज इस व्यवस्था मे सहायता कर सकता है। मेरे विचार मे किसी प्रकार की असमानता को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि समानता के लिये किये जाने वाले सारे प्रयत्न बंद कर दिये जाये क्योकि ये कानूनी प्रयत्न ही असमानता के प्रमुख कारण है। परिणाम स्वरूप अपने आप सबकी स्वतंत्रता समान हो जायेगी और किसी को कोई प्रयत्न नही करना होगा।

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