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मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा

Posted By: kaashindia on March 3, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धांत है

अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अहिंसा सर्व श्रेष्ठ धर्म माना गया है। धर्म की रक्षा करना राज्य का दायित्व होता है न कि धर्म पर आचरण करना। अहिंसा और कायरता मे बहुत फर्क होता है । हर कायर अपने को अहिंसक मानने की भूल करता है। बुद्ध और महावीर के पहले भारत मे अहिंसा और हिंसा के बीच सामाजिक संतुलन था। राज्य को छोडकर शेष पूरा समाज पूरी तरह अहिंसा का पक्षधर था। किसी भी प्रकार की हिंसा की न आवश्यकता थी न ही उसे नैतिक मार्ग माना जाता था। राज्य अहिंसक समाज रचना के लिये आवश्यक हिंसा करना अपना दायित्व समझता था। यह अलग बात है कि अलग अलग राज्य अपना कर्तब्य छोडकर आपस मे हिंसक टकराव शुरू कर देते थे जिसका परिणाम हमेशा बुरा होता था। बुद्ध और महावीर ने हिंसा और अहिंसा के बीच के संतुलन को बिगाडा। उन्होंने अहिंसा को मार्ग की जगह लक्ष्य मान लिया। इसका परिणाम हुआ कि राज्य मे उचित अनुचित का भ्रम पैदा हुआ और समाज में संतुलन की जगह कायरता का विकास हुआ। दुनियां के अन्य देशो में यहूदी हिंसा और अंहिसा के बीच सुतुलित थे। लेकिन ईशु मसिंह ने अहिंसा के पक्ष मे संतुलन बिगाडा। उसके बाद इस्लाम का उदय हुआ और इस्लाम नें एक पक्षीय अहिंसा के विरूद्ध एक पक्षीय हिंसा का समर्थन कर दिया। बुद्ध, महावीर और यीशु मसीह की कायरता प्रधान शिक्षाओ के परिणाम स्वरूप इस्लाम सारी दुनियां में बहुत तेजी से आगे बढा।
इस्लाम के विस्तार की चपेट में भारत भी आया और भारत कई सौ वर्षो तक विदेशीयों का गुलाम बना रहा। स्वतंत्रता के लिये भारत में दो मार्ग शुरू हुए उनमें भी सन 1857 से लेकर 1947 तक के 90 वर्षो मे अनवरत चले हिंसक मार्ग ने कोई सफलता नही की। दूसरी ओर गांधी के अहिंसक मार्ग ने बीस तीस वर्षो मे ही सफलता कर ली क्योकि भारत की गुलामी लोक तांत्रिक और अहिंसक अंग्रेजो के पास थी। यदि यह गुलामी मुसलमानो या साम्यवादियों की रही होती तो गांधी मार्ग किसी भी रूप मे सफल नही हो पाता।
शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिये राज्य को कभी भी अहिंसा को अपना मार्ग नही मानना चाहिये । यदि राज्य ऐसी भूल करता है तो उसके दुष्परिणाम होते है और समाज मे हिंसा की आवश्यकता बढती चली जाती है। स्वतंत्रता के समय गांधी हत्या के बाद गांधीवादियों ने भूल से अहिंसा को मार्ग की जगह लक्ष्य मान लिया। इसका अर्थ हुआ कि राज्य को भी उचित की जगह न्यूनतम हिंसा का उपयोग करना चाहिये। मार्ग को लक्ष्य मानने की गांधीवादी भूल का लाभ उठाया संघ परिवार ने, साम्यवादियों और कटटरपंथी मुसलमानो ने। इन तीनो ने मिलकर समाज मे हिंसा की आवश्यकता की भूख पैदा की। अहिंसा की पक्षधर गांधीवादी सरकारे अराजकता को नही रोक सकी। परिणाम स्वरूप समाज मे अराजकता से निपटने के लिये एक ऐसे राज्य की आवश्यकता महसूस की गयी जो अहिंसा की सुरक्षा के लिये हिंसा को एक उचित मार्ग मानता हो। हमे इस मामले मे नरेन्द्र मोदी से अधिक अच्छा व्यक्ति कोई नही मिला। परिणाम आज सबके सामने है।
जब भी संगठित हिंसा के विरूद्ध कायरता उबाल खाती है तो क्षणिक हिंसा का आक्रोश प्रकट होता है। भारत मे सिखो ने जब ऐसी ही भूल की तो देश भर मे ऐसा ही क्षणिक उबाल आया और हजारो निर्दोष सिख मारे गये। जब गोधरा कांड के समय ऐसा ही उबाल आया तो नरेन्द्र मोदी ने उसका नेतृत्व किया और हजारो निर्दोष मुसलमान मारे गये । लगता था कि इन घटनाओ से इन दोनो संगठनो पर दीर्घकालिक प्रभाव होगा और वे समाज मे सहजीवन और अहिंसा का महत्व समझेगे। लेकिन अब भी ऐसे कोई सुधार या पश्चाताप के लक्षण नही दिख रहे है भले ही परिस्थितियो की प्रतीक्षा क्यो न की जा रही हो।
इसके पूर्व भी नागासाकी और हिरोसिमा मे निर्दोष लाखो लोग मारे जा चुके है। आज तक यह तय नही हो पाया कि उन हत्याओ मे अमेरिका गलत था। साथ ही मुझे तो व्यक्तिगत रूप से महसूस होता है कि अमेरिका के पास उसके अतिरिक्त कोइ्र अन्य विकल्प नही था क्योकि अहिंसा की स्थापना के लिये समुचित बल प्रयोग करना उचित होता है और अमेरिका ने वह किया। यह अलग बात है कि अमेरिका के इस बर्बर आक्रमण से दुनियां ने सीख ली किन्तु अब भी भारत के सिख और मुसलमान अपनी दुविधा से दूर नही हो पा रहे है। उन्हे यह दुविधा दूर करके सहजीवन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करनी चाहिये । समाज मे हिंसा और संगठन का कोई औचित्य नही है और राज्य व्यवस्था मे अहिंसा का कोई औचित्य नही है । दोनो को अपनी अपनी सीमाए समझनी चाहिये । दोनो का घालमेल उचित नही। संघ परिवार मे हिंसा और अहिंसा के मामले मे मुसलमानो और साम्यवादियो के समान ही विचार रखता है। स्पष्ट है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था अहिंसा की जगह कायरता के रूप मे दिखती है। हिंसा समर्थक सभी संगठनो से एक साथ निपटना समाज के लिये कठिन है। इसलिये शत्रु का शत्रु मित्र होता है इस आधार पर अल्पकाल के लिये दो दिशाओ मे धु्रवीकरण हो रहा है । एक तरफ संघ परिवार के विरूद्ध संगठित इस्लाम और साम्यवाद है तो दूसरी तरफ है संगठित इस्लाम और साम्यवाद के विरूद्ध संगठित हिन्दुत्व जिसे हम संघ परिवार कहते है। मै तो पूरी तरह अहिंसा का पक्षधर हॅू और राज्य को अहिंसा से दूरी बनानी चाहिये । मै चाहता हूू कि वैचारिक तथा सामाजिक धरातल पर किसी भी प्रकार की हिंसक विचार धारा का विरोध करना चाहिये और राजनैतिक धरातल पर हिंसक प्रवृत्तियो के कुचलने के लिये किसी भी सीमा तक राज्य को मजबूत होना चाहिये। अहिंसा परम धर्म है और इस परम धर्म को परम धर्म के रूप मे स्थापित होना चाहिये। इस धार्मिक कार्य मे हम सबकी सह भागिता आवश्यक है।

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