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मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”

Posted By: kaashindia on March 6, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपालिका न्याय की।
2. सुरक्षा और न्याय पूरा होने के लिए आवश्यक है कि पुलिस और न्यायालय एक-दुसरे के पूरक और समन्वयक हो।
3. यदि न्यायपालिका न्याय देने में असफल हो जाती है तब पुलिस की मजबूरी हो जाती है कि वह सुरक्षा देने के लिए असंवैधानिक तरीकों का भी प्रयोग करे।
4. वर्तमान भारत में न्यायपालिका न्याय देने में भी असफल है और पुलिस के काम में निरंतर बाधा भी पहुॅचाती है।
5. न्याय और सुरक्षा देना राज्य का लक्ष्य होता है और कानून उसका मार्ग। यदि कानून का पालन कराना लक्ष्य मान लिया गया तो अव्यवस्था निश्चित है।
6. यदि न्याय और कानून के बीच दूरी बढ जाती है तब कानून की समीक्षा की जाती है न्याय की नहीं।
7. लोकतंत्र में विधायिका न्याय को परिभाषित करती है न्यायपालिका उस परिभाषा के अनुसार समीक्षा करती है और कार्यपालिका इसे क्रियान्वित करती है।
8. समाज में अपराधियों में पुलिस का भय होना चाहिए और निरपराध लोगों में विश्वास होना चाहिए। वर्तमान समय में उलटा हो रहा है।
9. सूचना और शिकायत में अंतर करने की आवश्यकता है। न्यायपालिका इन दोनो के बीच का फर्क और उसके कारण बढ रही अव्यवस्था के विषय में नही सोचती। पिछले 70 वर्षो में न्यायपालिका ने समाधान कम किए और समस्याएं अधिक पैदा की। न्यायपालिका को समझना चाहिए था कि वह कानून के अनुसार न्याय घोषित करने तक सीमित है न्याय को परिभाषित विधायिका करती है और क्रियान्वित कार्यपालिका। न्यायालय न्याय को परिभाषित करने पर भी सक्रिय हो गया और क्रियान्वित करवाने में भी। न्यायालय यह सिद्ध करने में जुट गया कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है जबकि यह सोच पूरी तरह गलत है। परिणाम हुआ कि अपराधियों को या तो दंड मिलने में विलम्ब होने लगा या दंड महत्वहीन हुआ। परिणाम हुआ कि भारत की आम जनता में प्रत्यक्ष हिंसक और अराजक दंड देने के प्रति विश्वास बढ रहा है। इन परिस्थिति को देखते हुए पुलिस विभाग भी सुरक्षा देने के लिए सक्रिय हुआ। उसमे भी अपराधियों को पकड-पकड कर अवैधानिक तरीके से मारना शुरू हुआ क्योंकि पुलिस के लिए न्याय की तुलना में सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है और यदि न्यायालय पुलिस के कार्य में लगातार बाधक बनता है तो पुलिस के समक्ष इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं बचता की वह झूठ का सहारा लेकर अपराधियों को सीधे दंडित करने का प्रयास करे। सोहराबुद्दीन हत्या इशरत जहां का प्रकरण स्पष्ट उदाहरण है जब पुलिस ने इस प्रकार की सुरक्षा के लिए गैरकानूनी कार्य किए और सम्पूर्ण समाज का विश्वास अर्जित किया भले ही न्यायालय ने उसमें कितने भी रोडे़ अटकाये हो। पंजाब में आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पुलिस की अतिसक्रियताही कारगार हो सकी। छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित उत्तरी हिस्से को नक्सलवाद से मुक्त करवाने में भी पुलिस की अतिसक्रियता की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। जिस पुलिस अफसर ने यह कार्य किया उसे आज भी उस क्षेत्र के लोग भगवान सरीखे मानते है। उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्श में पुलिस की अतिसक्रियता के कारण जितने अपराधी मारे गये है उस आधार पर पुलिस की विश्वसनीयता बढी है। मैंने पुलिस की अतिसक्रियता के अच्छे भी परिणाम देखे है और बुरे भी। महाराष्ट्र के एक न्यायालय से एक बडे अपराधी को बाहर निकाल कर कुछ महिलाओं ने हत्या कर दी थी उन महिलाओं को बहुत प्रशंसा मिली। इसी तरह अम्बिकापुर शहर में महिलाओं का चैन लूटकर भाग रहे पेशेवर लूटेरो को एक बार पकडे जाने पर भीड ने उनमें एक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पकडने वाले को वहाॅ के नागरिकों ने और पुलिस विभागों ने भी सम्मानित किया। एक विपरीत घटना में हमारे जिले में एक व्यक्ति अपनी पत्नी को पीछे बैठाकर मोटर साइकिल से जा रहा था स्पीड ब्रेकर के उछलने के कारण पत्नी गिरकर मर गयी और पुलिस ने उस मामले में उस मोटरसाइकिल चालक पति पर मुकदमा कर दिया। कुछ ही वर्ष बीते है कि यदि आज महाराष्ट्र और अम्बिकापुर की कानून तोडकर भीड द्वारा दिए गए दंड की आज समीक्षा हो तो कुछ वर्ष पूर्व जिन्हें सम्मानित किया गया था आज लिचिंग के अपराध में हत्या का मुकदमा झेल रहे होते। समझ में नही आता कि न्याय की परिभाषा सुविधानुसार बदली जा रही है। यदि कोई अपराध होता है और अपराध के पीछे कोई व्यक्तिगत उद्देश्य नहीं है, भूल है या उद्देश्य जनहित है तो ऐसे कार्य को गैरकानूनी माना जाना चाहिए अपराध नहीं। दोनों के दंड में भी अंतर होना चाहिए। एक पुलिस वाले ने जनहित की भावना से किसी अपराधी की हत्या कर दी या भूल से किसी निर्दोष की हत्या कर दी तथा यदि व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर किसी अपराधी या निर्दोष की हत्या कर दी तो यह तीनों घटनाएं भिन्न-भिन्न परिणाम रखती है। कानून और न्यायालय को इन सब में भिन्नता देखनी चाहिये। आश्चर्य होता है कि न्यायपालिका इतने स्पष्ट अंतर को भी नहीं समझ पाती। गैरकानूनी और अपराध बिल्कुल अलग-अलग होते है और अलग-अलग समझे जाने चाहिये। अपराध में अपराधी की नीयत अवश्य परिभाषित होनी चाहिए किन्तु हम देखते है कि जो न्यायालय बीस-तीस हत्याएं करने के बाद भी अपराधी को दंडित नहीं कर पाती या निर्दोष घोषित कर देता है उस अपराधी को कोई पुलिस वाला अवैध तरीके से मार दे तब न्यायिक सक्रियता देखते ही बनती है। विचित्र स्थिति है कि भारत में अनेक अपराधियों ने हत्या और अपराध को अपना व्यवसाय बना लिया है। भारत की न्यायपालिका को ऐसी खुली हुई दुकाने कभी विचलित नहीं करती। उसकी प्राथमिकता क्या है? न्यायपालिका तो लिचिंग रोकना अथवा बलात्कार को रोकना सबसे अधिक प्राथमिक कार्य समझती है। पेशेवर अपराधी भले ही दंडित न हो किन्तु किसी अल्पवयस्क कन्या के साथ किए गए बलात्कार के लिए न्यायालय बहुत सक्रिय हो जाता है और 40 दिन में फाॅसी का आदेश देकर अपनी पीठ थपथपाता है। मैं स्पष्ट हूॅ कि न्यायपालिका को अपनी प्राथमिताएं समझनी चाहिये। अपराधियों की खुली दुकाने सम्पूर्ण भारत के लिए बहुत बडा कलंक है। जिन पर आजतक कोई नियंत्रण नहीं होता है। लोकतंत्र में कोई एक इकाई व्यवस्था की ठेकेदार नहीं होती। 20-30 वर्ष पूर्व विधायिका अपने को ठेकेदार समझने लगी थी और पिछले कुछ वर्षाे से न्यायपालिका समझने लगी है, दोनो ही गलत है। न्यायपालिका को अपना काम छोड कर जनहित याचिकाएं निपटारा करने में मजा आने लगा है। परिणाम हुआ कि पुलिस को भी न्यायालय से हटकर सीधा न्याय देने में मजा आना शुरू हो गया है। यह टकराव पूरी तरह घातक है लेकिन इस टकराव में न्यायपालिका की भूमिका बहुत अधिक गलत दिखती है। अपराधी पुलिस के सामने सरेंडर करने की अपेक्षा न्यायालय के पास जाना अधिक सुरक्षित समझने लगे है। अपराधियों में पुलिस का भय घट रहा है और न्यायपालिका पर विश्वास बढ रहा है। यह अच्छी स्थिति नहीं है। न्यायपालिका को अच्छी तरह समझना चाहिये कि अपराध नियंत्रण में उसकी भी भूमिका एक सहयोगी की है। न्यायपालिका सिर्फ व्यक्ति पुलिस के बीच पूरी तरह तटस्थ भूमिका में नहीं रह सकती। यह सिद्धान्त भी गलत है कि जब तक कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा अपराधी सिद्ध न हो जाये तब तक वह निर्दोष है। होना तो यह चाहिए कि यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध कर देती है तो वह व्यक्ति निर्दोष न होकर संदिग्ध अपराधी है। उसे निर्दोष नहीं माना जाना चाहिये। यदि कोई असम्बद्ध व्यक्ति कोई शिकायत करता है तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उस शिकायत को सूचना समझकर कार्यवाही करे शिकायत समझ कर नहीं। वर्तमान समय में ऐसी सूचनाओं को शिकायत मान लेने के कारण अनेक ऐसे परजीवी व्यक्ति या संगठन खडे हो गये है जिनका ऐसी शिकायत करना एक व्यवसाय बन गया है और वे दिन रात न्यायालय के इर्द-गिर्द रहकर ही अपनी रोजी-रोटी चलाते है।पुलिस की अतिसक्रियता एक अल्पकालिक मजबूरी हो सकती है किन्तु पुलिस को ऐसी भौतिक या नैतिक छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपना काम छोडकर जनहित का काम करने लग जाए। इस समस्या का सिर्फ एक ही समाधान है कि न्यायालय स्वयं को न्याय तक सीमित कर ले तथा सुरक्षा और न्याय के बीच खीचतान को समाप्त करके दोनों में समन्वय करे। यदि कानून और न्याय मिलकर एकाकर हो जाऐगे पुलिस की सक्रियता अपने आप बंद हो जाऐगी अथवा सब मिलकर उसे अपनी सक्रियता छोडने के लिए मजबूर कर देगे।

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