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मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”

Posted By: kaashindia on March 8, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य।
2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्याओ का निवारण समाज का दायित्व होता है और सरकार को उसमे सहयोग करना चाहिये।
3 दुनियां मे अपराध एक ही होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता मे किसी प्रकार से बाधा पहुंचाना। राज्य का दायित्व होता है, उस स्वतंत्रता को सुरक्षा देना।
4 भारत मे समस्याए तीन प्रकार की होती है- 1 आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक । इन तीनो प्रकार की समस्याओ का स्वरूप कृत्रिम होता है और समाधान कठिन नहीं है।
5 दुनियां मे समस्याएं तीन प्रकार की होती है। 1 प्राकृत्रिक 2 भूमंडलीय 3 कृत्रिम । कृत्रिम समस्याए भी तीन होती है। आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक।
6 आर्थिक समस्याए कई्र प्रकार की होती है। आर्थिक असमानता, मंहगाई, गरीबी, भूख, अशिक्षा, पर्यावरण प्रदूषण, श्रम शोषण, विदेशी कर्ज।
7 सामाजिक समस्याए कई होती है। जातिय भेदभाव, साम्प्रदायिकता, छुआछूत उॅच नीच, वर्ण व्यवस्था का विकृत होना।
8 राजनैतिक समस्याए कई है। किसी समस्या का ऐसा समाधान जिसमे नई समस्या पैदा हो, वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहन, समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये अधिक से अधिक कानून बनाना, अपनी गलतियां छिपाने के लिये समाज पर दोषारोपण, राष्ट्र को समाज से उपर सिद्ध करना।
सारी दुनियां अप्रत्यक्ष रूप से राजनैतिक सत्ता की गुलाम बनी हुई है। दुनियां के दो महा शक्तियों के राष्ट्राध्यक्ष आपस मे टकरा जाये तो दुनियां के पांच अरब लोग मिलकर भी विश्व युद्ध से नही बच सकते। यह सत्ता का केन्द्रियकरण बहुत दुखद है। भारत की राजनैतिक स्थिति भी इससे भिन्न नही है। भारत मे अपराध तेजी से बढ रहे है। अपराध रोकना सरकार का दायित्व है किन्तु सरकारे अपराध रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता न देकर सामाजिक आर्थिक समस्याओ का समाधान करते रहती है। यह समाधान भी इस प्रकार होता है कि उससे कुछ नई समस्याओ का विस्तार होते रहता है। समस्याये बढती रहती है और समाधान निरंतर जारी रहता है। अपराध बढते रहते है और सत्ता की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहती है। इसका अंतिम परिणाम होता है गुलाम मानसिकता का विस्तार। आर्थिक समस्याए, कई प्रकार की दिखती है। इनमे मंहगाई, गरीबी, अमीरो गरीबो के बीच बढती दूरी, बढता पर्यावरण प्रदूषण, भूख से मृत्यु, श्रम शोषण, विदेशो का बढता हुआ कर्ज, शहरी आबादी का बढना, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि अनेक समस्याए विकराल होती जा रही है जिनका कोई समाधान नही दिखता । यदि गंहराई से विचार किया जाये तो ये समस्याए या तो राज्य द्वारा गलत अर्थनीति के परिणाम है अथवा अस्तित्वहीन समस्याए है जिन्हे राज्य ने प्रत्यक्ष बनाकर रखा है। मंहगाई तो है ही नही । गरीबी अमीरी भी इसी तरह आभाषीय शब्द है। स्पष्ट नही है कि कौन गरीब है कौन अमीर। अन्य समस्याए भी कृत्रिम है ही । ऐसी सभी आर्थिक समस्याओ का सिर्फ एक समाधान हो सकता है कि कृत्रिम उर्जा अर्थात डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, कोयला गैस की भारी मुल्य वृद्धि कर दी जाये । सिर्फ इस अकेले प्रयास से सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का समाधान हो जायेगा । यह एक छोटा सा समाधान है किन्तु इस समाधन से सब प्रकार की आर्थिक समस्याए अपने आप सुलझ सकती है। किन्तु मै देख रहा हॅू कि कोई भी राजनेता इस समाधान के पक्ष मे नही है । क्योकि बुद्धिजीवियो, पूंजीपतियों और राजनेताओ को इस समाधान से यह स्पष्ट परिणाम दिखता है कि श्रम की मांग बढ जायेगी श्रम का मूल्य बढ जायेगा आर्थिक असमानता घट जायेगी गरीब अमीर का भेद कम हो जायेगा और उनका स्वयं के अहंकार को चोट लगेगी। इसलिये वे समाधान के अनेक प्रकार के नाटक तो करते रहते है किन्तु किसी भी कृत्रिम उर्जा की किसी भी मूल्य वृद्धि का सब मिलकर विरोध करते है। यहां तक कि सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मामले पर एक जुट हो जाते है।
सामाजिक समस्याओ के रूप मे भी कई समस्याए समाज मे व्याप्त दिखती है। जातीय टकराव साम्प्रदायिकता, छुआछूत, उंच नीच का भेदभाव, विकार ग्रस्त वर्ण व्यवस्था इनमे से प्रमुख दिखती है। इन समस्याओं के समाधान मे भी राज्य निरंतर सक्रिय रहता है। ये समस्याए हमेशा बढती ही चली जाती है और समाज मे इतना असंतोष बढाती है कि वह यदा कदा टकराव का रूप ग्रहण कर ले । इस पूरी समस्या का एक साधारण समाधान है समान नागरिक संहिता । व्यक्ति एक इकाई होगा और संवैधानिक स्वरूप मे धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर, किसान मजदूर का कोई संवैधानिक या कानूनी भेदभाव नही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को बराबर के संवैधानिक अधिकार होगे। यह एक छोटा सा प्रयत्न इन सब समस्याओ का समाधान हो सकता है। किन्तु किसी भी राजनैतिक सामाजिक संगठन की इसमे कोई रूचि नही है क्योकि यदि ऐसा हो जायेगा तो वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष को नुकसान होगा। समाज मे अनेक समाज सुधारको के ऐसे संगठन बने हुए है जिनकी रोजी रोटी इन्ही समस्याओ पर निर्भर करती है। ये संगठन भी कभी नही चाहते कि समान नागरिक संहिता लागू हो । संघ परिवार बात तो समान नागरिक संहिता की करता है किन्तु चाहता है कि समान नागरिक संहित के नाम से समान आचार संहिता लागु हो और मुसलमान ऐसी आचार संहिता का विरोध करे। संघ परिवार भी सबको बराबर का अधिकार देने के पक्ष मे नही है। महिला संगठन भी बात समानता की करते है किन्तु महिलाओ को विशेष अधिकार उन्हे अवश्य चाहिये क्योकि समान नागरिक संहिता लागु होते ही सबकी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
राजनैतिक असमानता भी निरंतर बढती जा रही है। नये नये कानून बन रहे है और राज्य पर निर्भरता भी बढती जा रही है। परिवार के पारिवारिक और गांवो के गांव संबंधी आंतरिक मामलो मे भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। नये नये संगठन बन रहे है और ये संगठन शक्तिशाली होकर पूरे समाज को असमान कर रहे है। ये संगठन जब चाहे तब राज्य के सहायक भी बन जाते है और व्लैकमेलर भी। राज्य भी ऐसे समाज तोडक संगठनो को प्रश्रय देता रहता है। क्योकि ये संगठन वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष, के विस्तार सहायक होते है और जब विपरीत समूह आपस मे टकराते है तब राज्य उसमें पंच की भूमिका मे खडा होकर हस्तक्षेप करता है। ये सब समस्याए राज्य और राज्य द्वारा घोषित सामाजिक राजनैतिक धार्मिक संगठनो द्वारा पैदा की जाती है और ये सब मिलकर समाज को अशान्त किये रहते है। इन सभी समस्याओ का सीधे एक समाधान है सहभागी लोक तंत्र। इसमे राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेता है तथा परिवार गांव जिला प्रदेश को अधिकतम अधिकार बाटकर सिर्फ पुलिस सेना वित्त विदेश न्याय अपने पास रख लेता है। मै जानता हॅू कि यदि लोक स्वराज्य अर्थात सहभागी लोकतंत्र आ जाये तो अपने आप कानून कम हो जायेग, राज्य की आवश्यकता कम हो जायेगी, साथ ही राज्य पर निर्भरता भी कम हो जायेगी, राज्य पोशित अनेक समूह अपने आप समाप्त हो जायेगे। लेकिन ऐसे परिजीवी लोक स्वराज्य आने नही देंगे क्योकि ऐसा होना वे भी नही चाहते और राजनीति से जुडे लोग भी ऐसा बिल्कुल नही चाहते। उनकी भी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
मै स्पष्ट हॅू कि सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का एक समाधान है कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण, सामाजिक समस्याओ का एक समाधान है समान नागरिक संहिता और राजनैतिक समस्याओ का एक समाधान है, लोक स्वराज्य। यदि इन तीन समाधानो पर आगे बढा जाये तो भारत की लगभग सभी समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी और राज्य पूरी ताकत से अपराध नियंत्रण की दिषा मे सक्रिय हो सकता है। हम सबके लिये उचित होगा कि हम इन तीनो समस्याओ के एक एक समाधान की दिशा मे आगे बढे। हम लोगो का कर्तब्य है कि हम इन समस्याओ के वास्तविक समाधान पर पूरे देश मे जन जागरण मजबूत करे। जो संगठन इन समस्याओ से हटकर अन्य समाधानो का नाटक करते रहते है इन संगठनो की वास्तविकता समाज के समझ प्रकट होने दे। देश की समस्याए भी अपने आप सुलझ जायेगी और अपराध नियंत्रण भी अपने आप हो जायेगा।

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