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मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’

Posted By: kaashindia on March 8, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः-
1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपूर्ण होती हैं।
2। परिवार में महिला या पुरूष एक-दूसरे के पूरक होते हैं। परिवार की आंतरिक व्यवस्था में महिलाए तथा बाह्य में पुरूष प्रधान होते हैं किन्तु कुल मिलाकर सब बराबर हैं।
3। सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों से कम तथा सम्मान सुरक्षा पुरूषों से अधिक होती है।
4। परंपरागत परिवारों में आयी विकृतियों के कारण महिलाए पारम्परिक व्यवस्था की अपेक्षा आधुनिकता की ओर तेजी से बढ रही हैं।
5। पुरूष प्रधान व्यवस्था विकृति नहीं बल्कि व्यवस्था है किन्तु परिवार का प्रमुख, परिवार प्रमुख तक सीमित रहना चाहिये, मालिक नहीं। वर्तमान पारंपरिक परिवारों में मुखिया मालिक बन गये जो एक मुख्य विकृति है।
6। परंपरागत परिवारों की महिलाओं में घुटन अधिक है टूटन कम। आधुनिक महिलाओं में परिवार के प्रति टूटन अधिक है घुटन कम। दोनों स्थितियां ठीक नहीं।
7। अनुशासन और नियंत्रण अलग-अलग होते हैं। परंपरागत परिवारों में अनुशासन की जगह नियंत्रण बढा और आधुनिक परिवारों में अनुशासन की जगह उच्श्रृंखलता।
8। परंपरागत महिलाए परिवार के सुचारू संचालन, सन्तानोत्पत्ति तथा बच्चों के नैतिक विकास को अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं तो आधुनिक महिलाए स्वतंत्रता, सेक्स तथा बच्चों के भौतिक विकास को अधिक महत्तवपूर्ण मानती हैं।
9। परंपरागत महिलाए सहजीवन को भौतिक विकास की तुलना में अधिक महत्व देती हैं तो आधुनिक महिलाए भौतिक विकास को सहजीवन की तुलना में अधिक महत्व देती हैं।
10। परंपरागत परिवार व्यवस्था में सुधार तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था पर अंकुश आवश्यक है। परंपरागत या आधुनिक परिवार की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था एकमात्र समाधान है।
परिवार समाज व्यवस्था की पहली संगठनात्मक इकाई है। सेक्स की भूख, सन्तानोत्पत्ति, सहजीवन की ट्रेनिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य एक साथ सम्पन्न होने की पहली कार्यशाला है परिवार। परिवार के सभी उद्देश्य ठीक-ठाक पूरे हों इसके लिये महिला और पुरूष का एक साथ एकाकार स्वरूप में रहना आवश्यक है। अब तक भारत की परंपरागत परिवार व्यवस्था को दुनियां में सर्वाधिक सफल माना गया किन्तु धीरे-धीरे उसमें आयी कुछ विकृतियों के कारण अब उसका स्थान पाश्चात्य परिवार व्यवस्था लेती जा रही है। महिलाओं की भूमिका परिवार व्यवस्था के सफल संचालन में बहुत महत्वपूर्ण होती है और वर्तमान समय में महिलाओं में परंपरागत परिवार की अपेक्षा आधुनिक परिवार की ओर तेजी से कदम बढ रहे हैं इसलिये इसके कारण, लक्षण, परिणाम और समाधान की चर्चा आवश्यक है।
परंपरागत और आधुनिक महिलाओं के रहन-सहन, प्राथमिकताए तथा जीवन प्रणाली में कई अन्तर स्पष्ट हैं।
1। परंपरागत महिलाए कर्तव्य प्रधान होती हैं। वे कभी समान अधिकार की भी मांग नहीं करतीं। वे परिवार में होने वाले अपने शोषण के विरूद्ध चुप रहती हैं। आधुनिक महिलाए समान अधिकार से भी संतुष्ट नहीं। उन्हें समान अधिकार भी चाहिये तथा विशेष अधिकार भी चाहिये। परंपरागत महिलाए त्याग प्रधान होती हैं, आधुनिक महिलाए संग्रह प्रधान होती हैं।
2। परंपरागत महिलाए सेक्स की तुलना में सन्तानोत्पत्ति को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाओं में सन्तानोत्पत्ति के प्रति अरूचि और सेक्स के प्रति अधिक आकर्षण होता है।
3। परंपरागत महिलाए सहजीवन को अधिक महत्वपूर्ण मानकर संयुक्त परिवार को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देकर परिवारों को छोटे से छोटा करने को महत्वपूर्ण मानती हैं।
4। परंपरागत महिलाए भावना प्रधान अधिक होती हैं बुद्धि प्रधान कम। आधुनिक महिलाए बुद्धि प्रधान अधिक होती हैं, भावना प्रधान कम।
5। परंपरागत महिलाए नैतिकता को भौतिकता की तुलना में अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाए भौतिक उन्नति के लिये नैतिकता से जल्दी समझौता करने को तैयार रहती हैं।
6। परंपरागत महिलाए अन्य पुरूषों से आवश्यकता से अधिक दूरी बना कर रखती हैं। यदि इनके साथ कोई साधारण छेडछाड की आपराधिक घटना हो तो या तो छिपाती हैं या सामाजिक स्तर से निपटाना चाहती हैं। आधुनिक महिलाए अन्य पुरूषों के साथ कम से कम दूरी बनाने की कोशिश करती हैं तथा मामूली छेडछाड की घटना में आसमान सर पर उठा लेती हैं।
7। परंपरागत महिलाए परिवार या रिश्तेदारी तक आकर्षक तथा बाहर में अनाकर्षक पोषाक, हावभाव, बोलचाल का प्रयोग करती हैं। आधुनिक महिलाए परिवार में अनाकर्षक तथा बाहर में आकर्षक पोषाक, हावभाव तथा बोलचाल व्यवहार करती हैं।
एक अनुमान के अनुसार अब भी भारत में लगभग अठान्नवे प्रतिशत महिलाए पारंपरिक जीवन पद्धति में शामिल हैं तो दो प्रतिशत अति आधुनिक प्रणाली में। भौतिक विकास के आकलन में भी ये दो प्रतिशत आधुनिक परिवार अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो नैतिक पतन में भी। परिवार तोडने, तलाक, असंतोष, नैतिक पतन तथा सामाजिक अव्यवस्था विस्तार में भी ये दो प्रतिशत महिलाए अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो परिवार की भौतिक उन्नति, शिक्षा विस्तार, अधिकारों के लिये संघर्ष, में भी इन दो प्रतिशत आधुनिक महिलाओं का परंपरागत की तुलना में कई गुना अधिक योगदान है। परंपरागत महिलाए प्राचीन संस्कारों को आख मूंदकर चलने पर अधिक विश्वास करती है तो आधुनिक महिलायें प्राचीन संस्कारों को बिना विचारे आख मूंदकर तोडने और छोडने पर अधिक विश्वास करती है। परंपरागत महिलाए वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष को घातक मानती है तो आधुनिक महिलाए वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को महत्व देती है।
यह स्पष्ट है कि महिलाए परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के टूटने में आधुनिक महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है किन्तु यह भी मानना होगा कि परम्परागत परिवार व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो आधुनिक परिवार व्यवस्था को न रोका जा सकता है न सुधारा जा सकता हैं क्योंकि महिलाए ही अब इतनी जागरूक है कि वे घुटन की अपेक्षा टूटन को अधिक महत्व दे रही है। साथ ही भारत की संवैधानिक राजनैतिक व्यवस्था इस टूटन को अधिक विस्तार दे रही है। एक तरफ तो संवैधानिक व्यवस्था महिलाओं को समान अधिकार देना नही चाहती तो दूसरी ओर उन्हें विशेष अधिकार का लालच देकर आधुनिक बनने की ओर प्रेरित कर रही है। किसी तरह का कानूनी दबाव न तो परम्परागत परिवार व्यवस्था को बचा सकता है न ही आधुनिक व्यवस्था को रोक सकता है। यदि हम महिलाओं को आधुनिकता की अंधी दौड से रोकना चाहते है तो हमें परम्परागत परिवार व्यवस्था में आयी कमजोरियों को दूर करना चाहिए। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार व्यवस्था के संचालन में महिला पुरूष का भेद किया जाए या सम्पत्ति के अधिकार में दोनों की भूमिका अलग-अलग हो। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार से अलग होने के लिए महिलाओं को किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता है। महिला पुरूष के बीच भेद करने वाले सब प्रकार के कानून हटाकर सबको बराबर का अधिकार दे देना चाहिए। परम्परागत परिवार व्यवस्था तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था की परिवार तोडक भूमिका को बदलकर लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था प्रारंभ होनी चाहिए जिसका अर्थ है परिवार और समाज के संचालन तथा आर्थिक मामलों में भी महिलाओं के समान संवैधानिक कानूनी तथा परिवारिक अधिकार होना।
मैं समझता हूॅ कि लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का सुझाव न तो परम्परागत महिलाओं को पसंद आएगा। न ही आधुनिक महिलाओं को। परम्परागत महिलाएं इतनी डरी हुई है कि उन्हें लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था के लिए पुरूष वर्ग सहमत होने देगा न ही आधुनिक महिलाए इस दिशा कदम आगे बढने देगी क्योंकि ऐसा होते ही उनके विशेषाधिकार भी खत्म हो जाऐंगे तथा उनका न्यूसेंस वेंल्यू भी कम हो जाऐगा। किन्तु समाज व्यवस्था के सफल संचालन के लिए ऐसी परम्परागत महिलाओं को विचार प्रचार द्वारा सहमत करना होगा तथा आधुनिक महिलाओं को नियंत्रित करना होगा। मैं समझता हूॅ कि विषय बहुत गंभीर है तथा इस विषय पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि भारत की टूटती परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था का कारण क्या है और समाधान क्या है? मेरा सुझाव है कि परम्परागत महिलाओं को परिवार व्यवस्था में अधिक छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान समय में यह उचित होगा कि सरकार परिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने वाले कानून हटा लें। साथ ही परिवारों को इस प्रकार के सामाजिक और कानूनी निर्णय की स्वतंत्रता दी जाए की वे स्वंय मिल बैठकर इस बात का निर्णय कर ले कि उन्हें परम्परागत व्यवस्था में चलना है, आधुनिक मार्ग पकडना है अथवा लोकतांत्रिक मार्ग। मैं लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का पक्षधर हूॅ।

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