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मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on May 7, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-

  1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;
  2. दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति सुख की इच्छा करता है और सुख मिलता है निरन्तर भौतिक विकास और संतुष्टि के समन्वय से;
  3. वर्तमान समय में पूरी दुनियां में पर्यावरण का संतुलन बिगड रहा है। मानव शरीर के पांचों मूल तत्व विकृत होते जा रहे है। इसका दुष्प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य से लेकर उसके स्वभाव पर भी स्पष्ट दिखता है।
  4. जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी अर्थात सभी पांचो मूल तत्व बहुत तेजी से विकृत हो रहे है। इसका प्रभाव संपूर्ण मानव एवं जीव जन्तु पर पड रहा है किन्तु भारत पर इसका प्रभाव और भी ज्यादा है;
  5. आकाश में खतरा ओजोन गैस का है। अग्नि को खतरा विनाशक हथियारों तथा बारूद का है। जल, पृथ्वी और वायु निरंतर प्रदूषित हो रहे है। प्लास्टिक का बढता उपयोग भी पृथ्वी के लिये समस्या बनता जा रहा है।
  6. पर्यावरण ताप वृद्धि बहुत बडी समस्या है और इस संबंध में निरन्तर चिंता भी हो रही है। किन्तु उससे भी ज्यादा खतरनाक समस्या है मानव स्वभाव ताप वृद्धि। दुर्भाग्य से इस खतरनाक समस्या पर पूरी दुनियां में कोई चिंता नहीं हो रही है;
  7. मानव स्वभाव ताप वृद्धि तथा मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि दुनियां की सबसे अधिक गंभीर समस्याएं है। किन्तु इस खतरे की गंभीरता को नहीं समझा जा रहा है।
  8. भारत में पर्यावरण और मानवाधिकार के नाम पर बने हुये पेशेवर संगठन पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुॅचा रहे है। ये संगठन विदेशो से धन लेकर भारत की सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था को असंतुलित करते है;
  9. पर्यावरण के नाम पर काम कर रहे पेशेवर संगठन अपनी दुकानदारी चलाने के लिये समाज में जागरूकता के नाम पर भय पैदा करने का काम करते है;
  10. कोई संगठन ओजोन गैस के नाम पर डर दिखाता है तो कोई दूसरा हिमयुग अथवा तापवृद्धि का। जबकि सामान्य जन जीवन पर इसका न कोई प्रभाव पडता है, न ही समाधान में भूमिका होती है।
    यह निर्विवाद सत्य है कि पर्यावरण बहुत तेजी से बिगड रहा है। सारी दुनियां के साथ-साथ भारत की गति औेर भी अधिक तेज है। प्राचीन समय में आबादी बहुत कम थी। लोग अशिक्षित, अविकसित और गरीब थे।
    समाज में कई कुरीतियाॅ थी किन्तु पर्यावरण के प्रति सजग थे। सामाजिक व्यवस्था में पानी को गंदा करना अनैतिक माना जाता था। वृक्षारोपण को बहुत महत्व दिया जाता था और पेडों तक की पूजा होती थी। वायु शुद्धि के लिये भी यज्ञ आदि करके एक भावनात्मक वातावरण विकसित किया जाता था। धीरे-धीरे हम विकास की दौड में आगे बढे किन्तु भौतिक विकास की गति बहुत तेज रही और नैतिक पतन बढता चला गया। विकास और नैतिकता का संतुलन बिगड गया। पर्यावरण के प्रति जो भावनात्मक श्रद्धा थी उसे अंधविश्वास के नाम पर समाप्त कर दिया गया। पेशेेवर लोग पर्यावरणवादी बनकर सामाजिक वातावरण को और अधिक नुकसान पहुॅचाते रहे। ये विदेशी दलाल विदेशों से धन या बडे-बडे सम्मान लेकर भारत के वातावरण को बिगाडते रहे। जो व्यक्ति पूरे जीवन में कभी एक भी पेड नहीं लगाया है वह भारत के पर्यावरण संरक्षकों में शामिल हो जाता है समाज में जागरूकता की जगह भय पैदा किया जाता है। कोई कहता है कि वातावरण इतना गरम हो जायेगा कि बर्फ पिघल जायेगी और नदियों में बाढ आ जायेगी तो दूसरा पर्यावरणवादी यह भी कहता है कि जल संकट आने वाला है और पानी की इतनी कमी हो जायेगी कि पानी के लिये मार-काट हो जायेगी। इस तरह की ऊल-जलूल बातें 60-70 वर्ष पूर्व भी सुनाई देती थी और आज भी सुनाई देती है लेकिन इन पेेशेवर लोगों का धंधा निरन्तर बढता जा रहा है।
    वर्तमान समय में भारत की आबादी तेज गति से बढी। उचित होता कि पर्यावरण संरक्षण के लिये कुछ विशेष व्यवस्था की जाती किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत। पर्यावरण संरक्षण की प्राचीन व्यवस्था को अंधविश्वास के नाम पर छोड दिया गया। अब कोई गंगा नदी में तांबे का पैसा डाल दे तो अंध विश्वास कहा जायेगा। फलदार वृक्षों की पूजा भी अंध विश्वास। यज्ञ करना अंध विश्वास। पानी में गंदगी डालना पाप मानना अंधविश्वास। पर्यावरण संरक्षण विकास की दौड की भेंट चढ गया। सारी दुनियां तेज विकास के लिये पर्यावरण का शोषण कर रही है इसलिये भारत भी पीछे क्यों रहे, इसे आवश्यकता मान लिया गया। पर्यावरण सुरक्षा समाज शास्त्र का विषय न रहकर पेशेवर पर्यावरण वादियों मानवाधिकार वादियों का व्यवसाय बन गया।
    परिणाम हुआ कि भारत में भी पंचतत्व बहुत तेज गति से प्रदूषित हुये। सबसे ज्यादा प्रदूषित हुई वायु। पेड कटे और वायु में डीजल पेट्रोल का प्रदूषण तेजी से बढा। भारत की आबादी सत्तर वर्षो में चार गुना बढी किन्तु डीजल पेट्रोल की खपत चालीस गुनी बढ गई। मनुष्य और पशु बेरोजगार बेकार घूम रहे हैं। सौर उर्जा के मामले में भारत सौभाग्य शाली है किन्तु बिजली के बिना कोई छोटा सा काम भी संभव नहीं और बिजली बनेगी कोयले से भले ही प्रदूषण कितना भी क्यों न हों। भारत का जल भी जहरीला बन गया। सारी मानवीय से लेकर औद्योगिक तक गंदगी नदियों में डालकर अब उस पानी को साफ करके उपयोग करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पृथ्वी तत्व भी लगातार प्रदूषित हो रहा है। रासायनिक खाद से लेकर प्लास्टिक तक को सस्ता किया जा रहा है। कृषि उत्पादन, वन उत्पादन पर टैक्स लगाकर रासायनिक खाद या प्लास्टिक का महत्व बढाया जा रहा है। अग्नि तथा आकाष के प्रदूषण में भारत की गति शेष दुनियां से कुछ कम है। सारी दुनियां जिस तरह रासायनिक हथियार तथा ओजोन परत को नुकसान कर रही है उस मामले में भारत अभी बहुत पीछे अवश्य है किन्तु प्रयत्नशील तो है ही।
    एक तरफ पूरे भारत में तेज गति से भौतिक विकास की आवाज उठाई जा रही है तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण के कारण भौतिक विकास में बाधाएं भी पैदा करने का प्रयत्न निरन्तर जारी है। भौतिक विकास की मांग करने वाले और विरोध करने वाले अपने रोजी-रोटी की व्यवस्था कर लेते है और शेष भारत उन धूर्तो से ठगा जाता है। एक धूर्त कहता है सबको जमीन दो तो दूसरा कहता है अधिक से अधिक पेड लगाओं, तीसरा कहता है खेती का रकबा बढाओं और चैथा कहता है गांव-गांव में कुएं और तालाब बने और सिंचाई के साधन हो। एक तरफ आबादी बढने के कारण जमीन की कमी हो रही है तो दूसरी ओर मुसलमानों को मरने के बाद भी जमीन पर कव्जा चाहिये। मैं नही समझता कि ये सभी बैठकर एक साथ तय क्यों नहीं कर लेते कि जमीन का बंटवारा किस तरह हो। जब जमीन बढाई नही जा सकती यह सभी जानते है तो मिल बैठकर निर्णय करने अथवा सुझाव देने के अपेक्षा मांग करने का औचित्य क्या है? एक सामाजिक शुभचिंतक भारत को अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न बनने की मांग करता है तो दूसरा वैसा ही शुभचिंतक भारत को हिंसक शास्त्रों से दूर रहने की बात भी करता है ऐसे विपरित विचारों के लोग पर्यावरण के लिये सबसे बडी समस्या है।
    सब मानते है कि यदि आबादी बढेगी तो पर्यावरण प्रदूषण बढेगा। यदि भौतिक विकास तेज होगा तब भी पर्यावरण प्रदूषण बढेगा लेकिन इनके संतुलन की किसी कोशिश को महत्व नहीं दिया जा रहा है। आबादी वृद्धि की बात छोड दीजिए। आबादी का घनत्व भी शहरों की ओर बढाकर लगातार असंतुलित किया जा रहा है किन्तु इस विषय पर आज तक भारत में कोई समाधान नहीं खोजा गया।
    भारत में चार प्रकार की समस्याएं है। 1. व्यक्तिगत 2. सामाजिक 3. आर्थिक और 4. राजनैतिक। व्यक्तिगत समस्याओं का एक मात्र समाधान अपराध नियंत्रण की गारंटी से है, जो राज्य को देना चाहिए। सामाजिक समस्याओं का एक मात्र समाधान समान नागरिक संहिता है। इसी तरह राजनैतिक समस्याओं का एक मात्र समाधान लोक स्वराज्य प्रणाली से है। हम वर्तमान समय में पर्यावरण की समस्याओं की चिंता कर रहे है और पर्यावरण में समस्याओं की वृद्धि का मुख्य कारण तीव्र भौतिक विकास है।
    इसका समाधान आर्थिक ही हो सकता है और भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का एक-मात्र समाधान है, कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि। आश्चर्य व दुख होता है कि जब भी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि की बात आती है तब सभी पेशेवर, पर्यावरणवादी, मानवाधिकारवादी और अन्य एक जुट होकर इस मांग का विरोध करते है। यदि कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि हो गयी तो भौतिक विकास की गति भी अपने आप बढ जायेगी और पर्यावरण भी अपने आप ठीक हो जायेगा। शहरी आबादी कम हो जायेगी वातावरण में जहर नहीं घुलेगा। पानी अषुद्ध नहीं होगा लेकिन पेशेवर पर्यावरणवादियों की दुकानदारी बंद हो जायेगी क्योंकि उन्हें गांव में जाकर पेड़ लगाने पडेंगे। खेती करनी पड़ेगी अथवा कोई अन्य व्यवसाय करना पड़ जायेगा।
    यदि किसी परिवार में पारिवारिक वातावरण प्रदूषित है और वह परिवार चिन्ता नहीं कर रहा है तो उसकी चिंता पूरे समाज को क्यों करनी चाहिए। जब तक वह समस्या गांव की न हो तब तक गांव को चिंता नहीं करनी चाहिए। यहाॅ तो स्थिति यह हो गई है कि जो काम नगरपालिका और नगर निगम को करना चाहिए वह काम भी सुप्रीम कोर्ट करने लगा है। किसी शहर में किसी मकान की उंचाई कितनी हो यह उसी शहर पर क्यो न छोड दिया जाये? क्यों उसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप करे? ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से असंतुलन पैदा होता है। किसी नदी का पानी गंदा है तो उस गंदगी की चिंता उस नदी का पानी उपयोंग करने वाले मिलकर बैठकर करे और या तो साफ करने की व्यवस्था करे या गंदा करने वालो पर रोक लगावे। यह चिंता करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। पेशेवर पर्यावरण वादी ऐसे मामलों में न्यायालय को घसीटते है और न्यायालय को भी अपना आवश्यक काम छोडकर ऐसा करने में आनंद आता है।
    मैं मानता हूॅ कि आकाश , जल, अग्नि पृथ्वी और हवा का प्रदूषित होना एक बहुत बढी समस्या है। इसका मानव जीवन पर दूरगामी प्रभाव पडेगा। किन्तु मैं यह भी समझता हूॅ कि इस प्राकृतिक संकट की तुुलना में मानव स्वभाव में ताप और स्वार्थ वृद्धि कई गुना बडी समस्या है। मानव स्वभाव तापवृद्धि इस प्रकार के पर्यावरणीय संकट में भी एक बडी भूमिका निभाती है। मानव स्वभाव तापवृद्धि हथियारों के संग्रह का भी एक प्रमुख कारण है। दुर्भाग्य से जितनी चर्चा ओजोन परत, बढते तापमान, वायु और जल प्रदूषण की हो रही है उसका एक छोटा सा हिस्सा भी मानव स्वभाव मे बढते आक्रोश ओर स्वार्थ के समाधान के लिये नहीं हो रहा। दिल्ली में वायु प्र्रदूषण रूके इसके लिये सुप्रीम कोर्ट बहुत चिंतित है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज तक यह चिंता नहीं की कि दिल्ली के लोगो में इतनी तेजी से हिंसा और स्वार्थ के प्रति आकर्षण क्यों बढ रहा है। क्यों दिल्ली की आबादी इतनी तेजी से बढ रही है और क्यों इतनी प्रदूषित वायु होते हुये भी भारत के लोग भाग-भाग कर दिल्ली आ रहे है। हमारे पर्यावरण की चिंता करने वाले सारे भारत को पानी बचाओं बिजली बचाओं का संदेश देते है तो दिल्ली का वायु प्रदुषण दूर करने के लिये सडकों और पेडों पर जल छिडकाव की व्यवस्था की जाती है। क्यों ऐसा प्रदूषित वातावरण बन गया है कि जहाॅ शुद्ध हवा है वहाॅ से भागकर लोग गंदी जगह में आ रहे है और उस गंदी हवा को साफ करने के लिय मुख्य सकडों के बीचोबीच पेड लगाने का नाटक कर रहे है। पर्यावरण प्रदूषण के लिये इतना नाटक ओर ढोंग करने की अपेक्षा क्यों नहीं कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि कर दी जाये कि शहरों की आबादी अपने आप कम हो जायेगी और न रहेगा बाँस न बजेगी बांसुरी।
    मैं तो इस मत का हूँ कि भारत की पर्यावरण संबंधी सभी समस्याओं के समाधान में कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि की एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है ओैर इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। पर्यावरण का बढता प्रदूषण मानव अस्तित्व के लिये एक गंभीर संकट है। इसके समाधान के चैतरफा प्रयास करने होंगे। विकास की प्रतिस्पर्धा और संतुष्टि के बीच तथा भावना और बु़िद्ध के बीच समन्वय करना होगा। पर्यावरण को प्रदूशित करके उसे साफ करने की अपेक्षा प्रदूषण बढाने वालों के प्रयत्नों को निरूत्साहित करना होगा। पर्यावरण प्रदूषण कम करने का सारा दायित्व सरकारों पर न छोडकर उसमें जन जन से लेकर स्थानीय संख्याओं की सहभागिता जोडनी होगी। शहरी आबादी वृद्धि एक बडी समस्या है। उसका समाधान करना ही होगा। प्लास्टिक तथा कृत्रिम उर्जा की इस सीमा तक मूल्य वृद्धि करनी होगी कि इनका उपयोग निरूत्साहित हो। पेषेवर पर्यावरणवादियों को सिर्फ रोजगार से हटकर प्रदूषण कम करने की दिशा में वास्तविक सक्रियता की दिशा में प्रेरित करना होगा।
    पर्यावरण प्रदूषण कोई प्राकृतिक समस्या न होकर मानवीय समस्या है। छोटे-छोटे व्यावहारिक बदलाव इस समस्या से मुक्ति दिला सकते हैं।

मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि

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कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः

  1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;
  2. धर्म शब्द के अनेक अर्थ प्रचलित है। व्यक्ति के दुसरों के हित में किये जाने वाले निस्वार्थ कार्य को भी धर्म कहते है तो समाज को उचित मार्गदर्शन करने वाली प्रणाली भी धर्म कही जाती है;
  3. धर्म के दस लक्षणों में ईश्वर अथवा कोई पूजा पद्धति शामिल नहीं है। धर्म गुण प्रधान जीवन पद्धति हैं तो सम्प्रदाय संख्या विस्तार प्रधान संगठन होता है;
  4. हिन्दु विचार तर्क और श्रद्धा के समन्वय से आगे बढता है, ईसाई प्रेम, सेवा, करूणा, सहायता और सदभाव से और इस्लाम संगठन शक्ति से;
  5. धर्म जीवन पद्धति है सम्प्रदाय संख्या विस्तार। धर्म में न्याय प्रधान होता है सम्प्रदाय में अपनत्व प्रधान । धर्म का चरित्र संस्थागत होता है सम्प्रदाय का संगठनात्मक;
  6. धर्म कर्तव्य प्रधान होता है सम्प्रदाय अधिकार प्रधान, धर्म समाज व्यवस्था का सहयोगी होता है सम्प्रदाय समाज का सहभागी;
  7. धर्म किसी विचार अथवा धर्मग्रन्थ को अतिंम सत्य नहीं मानता, देश काल परिस्थिति अनुसार संशोधन सम्भव है। सम्प्रदाय में संशोधन सम्भव नहीं है;
  8. धर्म का न कोई प्रारम्भकर्ता होता है न कोई प्रारंभिक समय। धर्म शास्वत चलता है। सम्प्रदाय किसी व्यक्ति अथवा किसी धर्म ग्रन्थ द्वारा किसी खास समय से शुरू होता है;
  9. धर्म व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मान्यता देता है, सम्प्रदाय ऐसी मान्यता नही देता। सम्प्रदाय व्यक्ति को अपनी संगठनात्मक सम्पत्ति मानता है;
  10. धर्म में अनुशासन अनिवार्य नही है और विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सम्प्रदाय में अनुशासन भी अनिवार्य है और वैचारिक स्वतंत्रता भी नहीं है;
  11. धर्म समाज को सर्वोच्च मानता है और राज्य का मार्ग दर्शन करता है। सम्प्रदाय संगठन को सर्वोच्च मानता है और राज्य पर नियंत्रण करता है;
  12. धर्म का मूल स्रोत दर्शन है तो सम्प्रदाय का संस्कृति। हिन्दु धर्म का अधिकांश आज भी दर्शन को महत्व देता है तो इस्लाम में दर्शन को महत्व देने वाले सूफी लगातार कमजोर किये जा रहे हैं। ईसाईयत में लगभग बीच की स्थिति है;
  13. धर्म में आस्था पर विज्ञान भारी होता है। परिस्थिति अनुसार आस्था में संशोधन संभव है। सम्प्रदाय में आस्था विज्ञान पर भारी होती है और आस्था में संशोधन संभव नही है;
  14. धर्म के नाम पर पूरी दुनियां में सम्प्रदायों ने जितनी हिंसा और अत्याचार किये है उतना अपराधियोें ने भी नहीं किये।
    सम्प्रदाय का तो अर्थ कठिन नहीं किन्तु धर्म की व्याख्या बहुत कठिन हेै। धर्म के अनेक अर्थ हैैं। धर्म के अर्थ परम्परागत भी होते हैं और शास्त्र सम्मत भी। धर्म का अर्थ व्यक्तिगत, पारिवारिक या राष्ट्र के लिये किये जाने वाले कर्तव्य से भी जुड सकता है तो सम्पूर्ण मानव समाज से भी। धर्म वर्ण आश्रम व्यवस्था के परिपालन से भी जुड सकता है। यही कारण है कि धर्म का कोई निश्चित अर्थ नहीं निकल पाता और सम्प्रदाय भी धर्म शब्द के साथ स्वयं को जोडने में सफल हो जाता है।
    वर्तमान दुनियां में हम पिछले तीन हजार वर्षो की समीक्षा करे तो दो ही धर्म सनातन दिखते है एक आर्य सनातन हिन्दू जीवन पद्धति दूसरा पाश्चात्य व यहूदी जीवन पद्धति। हिन्दू जीवन पद्धति से कुछ संगठन निकलकर तेजी से बढे जो प्रारम्भ में संगठन रहे, जब उनका विस्तार कई वर्षो तक जारी रहा तब वे सम्प्रदाय कहे जाने लगे और ऐसे सम्प्रदाय जब कई हजार वर्षो तक विस्तार करते रहे तो उन्होंने अपने को धर्म कहना शुरू कर दिया। ऐसे सम्प्रदायों में ही जैन, बौद्ध अथवा सिख माने जाते है। इसी तरह की प्रक्रिया यहूदियों में भी दोहरायी गयी और कालांतर से उसी तरह ईसाई और इस्लाम नामक सम्प्रदाय धर्म के रूप में आगे आये। हिन्दू और यहूदी मान्यताएं अलग-अलग प्रवृत्तियों में समन्वय को महत्व देती थी और सम्प्रदाय समन्वय की जगह किसी एक दिशा को अधिक महत्व देने लगे। जैन और बौद्ध ने अहिंसा को अधिक महत्व दिया तो सिखों ने हिंसा को, उसी तरह ईसाईयों ने अंहिसा को अधिक महत्व दिया तो इस्लाम ने हिंसा को। इन विपरित विचारधाराओं के वैचारिक टकराव ने हिन्दू और यहूदियों की धार्मिक समन्वय की नीतियों को गंभीर क्षति पहुॅचायी। गुण प्रधान धर्म कमजोर होता गया और संगठन प्रधान धर्म मजबूत होता रहा।
    ऐसे ही कालखण्ड में एक नये धर्मविहीन संगठन का ’साम्यवाद’ के नाम से उदय एवं प्रवेश हुआ। उसने वर्ग संघर्ष और ईश्या, द्वेष को मुख्य आधार बनाकर बहुत तेजी से विस्तार किया। यद्यपि उतनी ही तेजी से साम्यवाद का पतन भी हुआ और वह संगठन से आगे बढकर धर्म का नाम ग्रहण नहीं कर सका। आज मजबूरी में साम्यवाद यहूदियों के इस्लाम और हिन्दुओं के गांधीवाद का सहारा लेकर अपना अस्तिव बचा रहा है।
    पूरी दुनियां में धर्म और सम्प्रदाय इतने समानार्थी हो गये है कि दोनों के बीच अंतर करना ही कठिन हो गया है। गुण प्रधान धर्म संकट में है और संगठन प्रधान सम्प्रदाय समाज से लेकर राज्य व्यवस्था तक में धर्म के नाम पर स्थापित हो गया है। भारत की स्थिति तो और भी जटिल है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर भारत में सम्प्रदायों ने हिन्दुत्व प्रधान धर्म व्यवस्था को ही संकट में डालना शुरू कर दिया है। यदि धर्म का अर्थ गुण प्रधान है तो कोई भी राजनीतिक व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती। किन्तु यदि धर्म का अर्थ साम्प्रदायिक संगठन से जुडा हो, पूजा पद्धति अथवा किसी संस्कृति को आधार मानता हो तो उस आधार पर राज्य व्यवस्था को पूरी तरह ही धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये। धर्म के दोनों विपरीत अर्थ यह निष्कर्ष नही निकलने देते कि राज्य को धर्मप्रधान होना चाहिए अथवा धर्मनिरपेक्ष। यह टकराव लम्बे समय से जारी है और अब वास्तविक धर्म के समक्ष संकट के रूप में खडा है। साम्प्रदायिक समूह आपस में एक-दूसरे से हिंसा टकराव करते है और परिणाम स्वरूप बीच मे रहने वाले वास्तविक धार्मिक लोग उसका नुकसान उठाते है। परिणामस्वरूप गुण प्रधान धर्म कमजोर होता है और साम्प्रदायिकता मजबूत।
    वर्तमान दुनियां में इस्लाम सर्वाधिक खतरनाक सम्प्रदाय के रूप में चिन्हित हो रहा है। सूफी सरीखे धार्मिक मान्यता वाले संत किनारे किये जा रहे हैं। इस्लाम की धार्मिक पांच प्रतिबद्धताओं की जगह विवादास्पद साम्प्रदायिक प्राथमिकताएं मजबूत हो रही हैं। हिन्दू धर्म वाले भी असमंजस के शिकार हैं कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये संघ परिवार की बात मानकर संगठनात्मक साम्प्रदायिकता के मार्ग की ओर बढ जावें अथवा गुण प्रधान हिन्दुत्व के मार्ग पर चलते हुए संगठनात्मक इस्लाम से मुक्ति के प्रयत्न को मजबूत करें। जिस तरह संगठित इस्लाम की आशा की एकमात्र किरण चीन ने इनके खिलाफ अमानवीय कदम उठाये हैं तथा जिस तरह सारी दुनियां में संगठित इस्लाम के समक्ष धार्मिक मार्ग पर लौटने या समाप्त होने का स्पष्ट विकल्प दिखने लगा है उससे स्पष्ट दिखता है कि गुण प्रधान हिन्दुत्व को धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिये। वैसे भी हिन्दुओं के सामान्य जनजीवन में सहजीवन का धार्मिक पाठ इतने अन्दर तक प्रवाहित है कि उन्हें बदलना आसान नहीं। ऐसी स्थिति में हिन्दुओं को अपनी सनातन धर्म की विचार धारा को छोडकर साम्प्रदायिक होने की जल्दबाजी क्यों करनी चाहिये? अच्छा होगा कि हम साम्प्रदायिकता के विरूद्ध जारी विश्वव्यापी प्रयत्नों के साथ तालमेल करें।
    फिर भी सतर्कता आवश्यक है। अब तक मानवता के नाम पर साम्प्रदायिकता के खतरनाक सांपों को दूध पिलाया गया उन्हें अब जहर देने की जरूरत है। जो साम्प्रदायिक तत्व किसी संकट के कारण विदेशों से भारत का रूख करते हैं वैसे धर्म विरोधियों से मानवता का व्यवहार कैसा? सरकारों को मजबूर किया जाये कि वे अब पुनः वैसी भूल न करें।
    धर्म एक पवित्र शब्द है जिसे साम्प्रदायिकता ने कलंकित कर दिया है। साम्प्रदायिकता से मुक्ति भारत के प्रमुख लक्ष्य में से एक होना चाहिये। मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने जिस तरह धार्मिक हिन्दुत्व के समक्ष असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है उससे मुक्ति के किये भारत सरकार को तत्काल पहल करनी चाहिये।
  15. सम्पूर्ण भारतीय संविधान से धर्म शब्द को निकालकर समान नागरिक संहिता लागू कर देना चाहिये। राज्य के समक्ष व्यक्ति एक इकाई हो। कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक न हो;
  16. धर्म परिवर्तन कराने के प्रयत्नों को दण्डनीय अपराध घोषित किया जाये;
  17. जो मुसलमान संगठनात्मक इस्लाम से हटकर धार्मिक इस्लाम की ओर बढें उन्हें सम्पूर्ण संरक्षण दिया जाना चाहिये;
  18. विदेशों से चोरी छिपे आये लोगों को अमानवीय तरीके से भारत से बाहर करके दुनियां को स्पष्ट संदेश दिया जाये कि भारत मानवता के नाम पर अपने सहजीवन को खतरे में नहीं डाल सकता।
    जो मित्र धैर्य छोडने की बात कर रहे है उनसे मेरा निवेदन है कि वे अपना धर्म छोडने की गलती करने की अपेक्षा साम्प्रदायिक तत्वों को साम्प्रदायिकता छोडने के लिये मजबूर करने हेतु राज्य को प्रेरित करें। जिस तरह राहुल, ममता, अखिलेश ने हिन्दुत्व के पक्ष में यू टर्न लिया है उससे आशा की किरण मजबूत होती है कि धर्म की जडे पाताल तक हैं और रहेंगी।

मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि

Posted By: kaashindia on May 6, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ निष्कर्ष हैं।

  1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;
  2. आदर्श वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की उपलब्धियां सीमित होती है । मार्गदर्शक की सीमा सर्वोच्च सम्मान तक, रक्षक की सर्वोच्च शक्ति तक, पालक की सर्वोच्च सुविधा एवं धन संपत्ति तक तथा सेवक की सर्वोच्च सुख तक होती है ;
  3. आदर्श वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्तियां भी अलग-अलग होती हैं। मार्ग दर्शक अर्थात ब्राह्मण मर सकता है मार नहीं सकता, हृदय परिवर्तन कर सकता है डरा नहीं सकता, सत्य छुपा सकता है किन्तु झूठ नहीं बोल सकता;
  4. आदर्श वर्ण व्यवस्था में रक्षक अर्थात क्षत्रिय कूटनीति का प्रयोग कर सकता हैं बल प्रयोग कर सकता हैं किन्तु उपदेश अथवा प्रवचन नहीं दे सकता। मरने और मारने के लिये तैयार होता है ;
  5. आदर्श वर्ण व्यवस्था में पालक अर्थात वैश्य जनहित में सच छुपा भी सकता हैं और झूठ भी बोल सकता हैं। मरने से भी बचेगा और मारने से भी बचेगा। लालच दे सकता हैं शत्रु को धोखा भी दे सकता हैं किन्तु प्रवचन उपदेश अथवा डर भय नहीं दिखा सकता;
  6. वर्तमान भारतीय राजनीति में कोई अच्छा व्यक्ति चुनाव में नहीं जीत सकता। यदि अपवाद स्वरूप जीत भी गया तो अच्छा नहीं रहेंगा और यदि कोई फिर भी अच्छा रह गया तो जल्दी ही निकाल दिया जायेगा;
  7. नीति निर्धारण में विचार महत्वपूर्ण होते हैं चरित्र नहीं। क्रियान्वन में चरित्र का महत्व हैं विचारों का नही;
  8. जो कुछ पुराना हैं वह सब सही हैं अथवा जो कुछ पुराना हैं सब गलत हैं ऐसी धारणा उचित नहीं हैं अतिवादी लोग ऐसी धारणा बनाकर उसे स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं;
  9. भारत की प्राचीन राजतंत्र प्रणाली आदर्श नहीं हैं, राजतंत्र या तानाशाही की तुलना में लोकतंत्र अधिक अच्छा हैं किन्तु अपर्याप्त और असफल हैं। लोकतंत्र की जगह लोक स्वराज अधिक अच्छी प्रणाली हैं;
  10. प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को अधिक सम्मान प्राप्त था। मध्यकाल में राजशक्ति और धनशक्ति ने ज्ञान और त्याग को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। दस वर्ष पूर्व तक भारत में गुण्डा शक्ति सर्वोच्च स्थान पर थी जो अब कमजोर हो रही हैं;
  11. व्यवसाय के माध्यम से तीन प्रकार के लोग आगे बढते हैंः-1. जो सेवा के उद्देश्य से बिना लाभ हानि के लागत मूल्य पर व्यापार करते हैं 2. जो उचित लाभ लेकर तथा नैतिकता के आधार पर व्यापार करते हैं 3. जो मिलावट और कमतौल के माध्यम से अनैतिक व्यापार करते हैं।
    राजनीति में भी तीनों प्रकार के लोग होते हैं। कुछ लोग बिना लाभ-हानि के राजनीति करते हैं। कुछ लोग भ्रष्टाचार की राजनीति करते हैं तो कुछ लोग राजनीति में हत्या, डकैती जैसे अपराधों का भी सहारा लेते हैं। भारतीय राजनीति में वर्तमान समय मे तीसरे प्रकार के लोग अधिक आगे बढते देखे गये हैं। पहले प्रकार के लोगों की असफलता को देखकर अब राजनीति में अच्छे लोगों का आकर्षण खत्म हो गया हैं क्योंकि व्यापार और राजनीति अथवा धन और सत्ता का पूरी तरह घालमेल हो गया हैं। सत्ता धन के साथ सामंजस्य बिठाकर चल रही हैं तो पूंजीपति भी सत्ता को अपने हाथ में रखने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।
    भ्रष्टाचार करना राजनेताओं की कुछ मजबूरी भी बन गया हैं। चुनाव में बेतहाशा खर्च करना पडता हैं। कार्यकर्ता आधारित चुनाव व्यवस्था होने के कारण कार्यकर्ताओं को भी खुश रखना पडता हैं। उन पर खर्च भी करना पडता हैं और उनके अवैध कार्य को संरक्षण देना भी मजबूरी बन गया हैं। परिवार,रिश्तेदार और मित्र भी बहुत अपेक्षा रखते हैं। इसलिये बिरले लोग ही स्वयं को भ्रष्टाचार से मुक्त रख पाते हैं। मैंने स्वयं देखा हैं कि चालीस वर्ष पूर्व जब मैं राजनीति में अच्छे पदों पर था तब मेरे साथ सक्रिय साथियों की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। हमारे जिले के लोग विकास में बहुत पीछे होते हुए भी संतुष्ट थे। फिर भी हमारे सब साथी पूरी तरह ईमानदार रहे। आज उसी तरह के राजनीतिक पद रखने वालों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हैं क्षेत्र भी बहुत विकसित हुआ हैं फिर भी शायद ही कोई ईमानदार हो। यहाॅ तक कि पार्टी के लिये बेइमानी करने को ईमानदारी ही माना जाता हैं किन्तु ऐसा भी व्यक्ति मिलना मुश्किल हैं। बाद मे मैनें स्वयं प्रयोग किया और रामानुजगंज शहर का नगरपालिका अध्यक्ष बना तब मेरे सामने भी ऐसी ही मजबूरी आयी मैंने भी अपने मतदाताओं से सलाह लेकर दस प्रतिशत भ्रष्टाचार की छूट प्रदान की। सोचा जा सकता हैं कि राजनेताओं के सामने भी कुछ मजबूरियाॅ हैं और मतदाताओं के सामने भी। यदि किसी साधारण भ्रष्ट को किसी तरह हटने के लिये सहमत भी कर लिया जाये तो आगे आने वाला उससे कई गुना अधिक भ्रष्ट होना निश्चित दिखता हैं। ऐसे में मतदाता के पास क्या विकल्प हैं।
    मैंने सन 55 से 84 तक पच्चीसों बार चुनावों का संचालन किया हैं और हर चुनाव में मतदाताओं को पैसा, शराब अथवा अन्य किसी प्रकार से उपकृत करना पडा हैं। मैंने तो एक बार मतदाताओं को सलाह दी थी कि यदि राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गयी हैं तो आप किसी अच्छे या कम भ्रष्ट को प्राथमिकता दे। यदि ऐसा न हो तो ऐसा कोई चुने जो आपका अच्छा परिचित हो और सुख दुख के समय में काम आ सके और फिर भी कोई नही हैं तो तत्काल जो भी मिले तो वह ले लेना कोई अपराध नहीं हैं क्योंकि जब राजनीति व्यवसाय हैं तब मुफ्त में वोट देने की मूर्खता क्यों की जाये। इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि किसी अपराधी या हत्यारें को किसी भी परिस्थिति में वोट न दिया जाये। वोट की सौदेबाजी कोई गलत कार्य नहीं हैं।
    मेरे विचार से भारत की राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गयी हैं और सबसे खतरनाक इसका अपराधीकरण की तरफ बढना हैं। अपराध मुक्त करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं फिर भी यह स्थिति आदर्श नही हैं और इसे पूरी तरह बदलना चाहिये। जो लोग मतदाताओं को बदलना चाहते हैं वे भी कहीं न कही नासमझ हैं जो लोग राजनेताओं को बदलना चाहते हैं वे भी या तो ढोंग कर रहैं हैं या गलती। न मतदाता बदल सकता हैं न ही राजनेता। हमें तो पूरी राजनीति को बदलना पडेगा और जब तक पावर इकठ्ठा होता रहेगा तब तक राजनीति का व्यवसायीकरण नहीं रोका जा सकता। यदि राजनेताओं की संवैधानिक शक्ति विकेन्द्रित हो जाये तो सारी समस्याओं का एक साथ समाधान हो सकता हैं न राजनेताओं को सुधारना पडेगा और न मतदाताओं को। इसलिये मेरा मत हैं कि हमे अन्य सब कार्य छोडकर राजनीतिक सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की दिशा में आगे बढना चाहिये।
    राजनीति बन गयी तवायफ नेता हुये दलाल,
    ऐसे में क्या होगा भैया इस समाज का हाल,
    संसद को एक पलंग समझ कर उस पर शयन किया
    संविधान को मानकर चादर खींचा ओढ़ लिया
    अब तक हमने बहुत सहा अब सहेंगे नहीं हम, चुप रहेंगे नहीं चादर हटा देंगे हम, सब कुछ दिखा देंगे हम, कचरा जला देंगे हम !!!!!

मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि

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कुछ निष्कर्ष हैं।

  1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;
  2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अनैतिक हैं न करने योग्य कार्य करना अपराध होता हैं;
  3. प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यवस्था से संचालित होता हैं और व्यवस्था व्यक्ति समूह से जिस समूह में वह स्वयं शामिल होता हैं;
  4. व्यवस्था पारिवारिक, समाजिक तथा राजनीतिक होती हैं। तीनों व्यवस्थायें अगल-अगल होते हुये भी एक-दूसरे की पूरक होती हैं;
  5. स्वतंत्रता, अनुशासन और शासन का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता हैं। स्वतंत्रता व्यक्ति की व्यक्तिगत होती हैं, किसी अन्य से जुडते ही वह अनुशासन में बंध जाती हैं। स्वतंत्रता शासन व्यवस्था से बाध्य होती हैं;
  6. प्रत्येक व्यक्ति का यह स्वभाव होता हैं कि वह स्वयं दूसरों से अधिकाधिक स्वतंत्रता चाहता हैं और दूसरों को कम से कम स्वतंत्रता देना चाहता हैं;
  7. सारी दुनियां में व्यवस्था का केन्द्रीयकरण हो रहा हैं। राजनीतिक सत्ता समाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले रही हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी संकुचित होती जा रही हैं;
  8. परंपरागत परिवार व्यवस्था दोषपूर्ण हैं उससे व्यक्ति पर व्यवस्था का अनुशासन तो हैं किन्तु व्यवस्था पर व्यक्ति समूह का नियंत्रण नहीं हैं;
  9. साम्यवादी तथा इस्लामिक व्यवस्थायें व्यक्ति को स्वतंत्रता को न मानने के कारण त्यागने योग्य हैं। भारतीय परिवार व्यवस्था संशोधन योग्य हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था अनुकरणीय हैं;
  10. व्यवस्था से चरित्र बनता हैं। चरित्र से व्यवस्था नही। जो लोग व्यवस्था में चरित्र को महत्वपूर्ण मानते हैं वे गलत हैं क्योंकि व्यवस्था व्यक्ति से नहीं व्यवस्था से व्यक्ति संचालित होता हैं;
  11. नीति निमार्ण में विचार महत्वपूर्ण होता हैं और क्रियान्वय में चरित्र की भूमिका प्रमुख होती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति-निमार्ण विधायिका का और क्रियान्वन कार्यपालिका का कार्य माना जाता हैं;
  12. संघ परिवार चरित्र को हर मामले में महत्वपूर्ण मानता हैं तो साम्यवाद किसी मामले में चरित्र को महत्वपूर्ण नहीं मानता मेरे विचार से दोनो गलत हैं;
  13. यदि व्यवस्था ठीक हो तो हमें चरित्र निमार्ण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये यदि अव्यवस्था या कुव्यवस्था हो तो चरित्र निमार्ण को रोक कर व्यवस्था परिवर्तन का कार्य करना चाहिये;
  14. यदि अपराध अनियंत्रित हो तो शराब, जुआ, वैष्यावृत्य जैसे अनैतिक कार्यो करने वालों से दूरी घटा लेनी चाहिये। चरित्र निमार्ण के प्रयत्न घातक होते हैं;
  15. यदि गाडी का ड्राइवर गलत हो तब भी अव्यवस्था होगी और गाडी खराब हो तो भी। वर्तमान समय मेें व्यवस्था रूपी गाडी ही गडबड हैं इसलिये गाडी ठीक करना आवश्यक हैं।
  16. क्या करना चाहिये इसका निर्णय व्यक्ति के चरित्र पर निर्भर करता हैं। न करने योग्य कार्य करने से रोकने का काम व्यवस्था का हैं। चरित्र व्यक्तिगत होता हैं और व्यवस्थाा सामुहिक होती हैं;
    वैसे तो सारे विश्व की ही व्यवस्था गडबड हैं क्योंकि जब तक साम्यवाद और इस्लाम से व्यवस्था मुुक्त नहीं होती तब तक व्यवस्था में सुधार सम्भव नहीं। सौभाग्य से भारत की व्यवस्था इन दोनों से बहुत कम प्रभावित हैं फिर भी पिछले समय में जो अव्यवस्था विकसित हुयी हैं उसे व्यवस्था परिवर्तन से ही सुधारा जा सफल हैं चरित्र निमार्ण से नहीं। क्योंकि तानाशाही में चरित्र से व्यवस्था सुधरती हैं और लोकतंत्र में व्यवस्था से चरित्र सुधरता हैं। भारत सैकडो वर्षो तक गुलाम रहने के कारण व्यक्ति के नेतृत्व से व्यवस्था के संचालन का अभयस्त हो गया हैं जो उचित नहीं हैं। व्यवस्था निरंतर प्रभावहीन होती जा रही हैं दूसरी ओर अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, संघ परिवार, गायत्री परिवार या आर्य समाज पूरी ईमानदारी और सक्रीयता से चरित्र निमार्ण के कार्य में लगे हुये हैं किन्तु औसत चरित्र गिरता जा रहा हैं क्योंकि व्यवस्था दोषपूर्ण हैं और जितनी गति से चरित्र निमार्ण हो रहा हैं उसकी तुलना में कई गुना अधिक चरित्रपतन राजनीतिक व्यवस्था कर रही हैं। कुल मिलाकर चरित्र गिर रहा हैं किन्तु हमारा दुर्भाग्य हैं कि हम व्यवस्था परिवर्तन के महत्व को नहीं समझ पा रहैं हैं। व्यवस्था में भी पारिवारिक आर्थिक, समाजिक व्यवस्था को राजनीतिक व्यवस्था ने इतना गुलाम बना लिया हैं कि सब प्रकार की व्यवस्थाये राजनीतिक अव्यवस्था से प्रभावित हो रही हैं। राजनीतिक व्यवस्था को ठीक किये बिना चरित्र पतन रूक नही सकता भले ही हम चरित्र निमार्ण द्वारा आंशिक रूप से उस पतन को गति को कम कर सके। इसके बाद भी व्यवस्था परिवर्तन के महत्व को न समझकर चरित्र निमार्ण पर अधिकतम शक्ति लगाना ना समझी का कार्य हैं जो हम लगातार किये जा रहैं हैं। राजनीतिक व्यवस्था में भी हमने कई बार ड्राइवर बदलने का प्रयास किया किन्तु गाडी आगे बढकर पीछे ही जा रही हैं क्योंकि हम समझ ही नहीं रहैं हैं कि गाडी खराब हैं ड्राइवर नहीं।
    आवश्यकता इस बात की हैं कि महत्वपूर्ण लोगो को चरित्र निमार्ण की तुलना में व्यवस्था परिवर्तन पर अधिक शक्ति लगानी चाहिये और समझना चाहिये कि लोकतंत्र में चरित्र से व्यवस्था नहीं बल्कि व्यवस्था से चरित्र बनता हैं। जब यह अंतिम सत्य हैं कि व्यक्ति के उपर व्यवस्था और व्यवस्था के उपर व्यक्ति समूह अर्थात समाज होता हैं तब हम उल्टी दिशा में चलकर समाज के उपर व्यवस्था और व्यवस्था के उपर व्यक्ति का प्रयोग क्यों करें। उचित होगा कि इस वर्तमान प्रणाली को पलटकर व्यक्ति के उपर व्यवस्था और व्यवस्था और व्यवस्था के उपर समाज का प्रयोग करें।

मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि

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कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है।
1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये।
2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमजोर तथा धूर्तता को मजबूत करता है।
3 आरक्षण सिर्फ व्यक्ति की प्रवृत्ति के आधार पर दिया जाना चाहिये। कानून का पालन करने वालो को सुरक्षा का आश्वासन ही एक मात्र आरक्षण दिया जाना चाहिये।
4 आरक्षण हमेशा घातक होता है। स्वतंत्रता पूर्व का जातीय अथवा परिवार व्यवस्था मे पुरूषो को प्राप्त सामाजिक आरक्षण भी घातक था और स्वतंत्रता के बाद का संवैधानिक आरक्षण भी घातक है।
5 संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त है । आरक्षण उस समानता को अ समान बना देता है।
6 जातीय आरक्षण, महिला आरक्षण, धार्मिक आरक्षण अथवा गरीबी आरक्षण के दुष्परिणाम स्वाभाविक होते है। भारत इन दुष्परिणामो की चपेट मे है।
7 किसी भी प्रकार के अन्य आरक्षण की तुलना मे महिला आरक्षण अधिक घातक है। अन्य आरक्षण समाज को तोडते है और महिला आरक्षण परिवार को ।
8 स्वतंत्रता के पूर्व भी श्रम के विरूद्ध बुद्धिजीवियो ने आरक्षण प्राप्त कर लिया था तथा स्वतंत्रता के बाद भी श्रमजीवियो के खिलाफ बुद्धिजीवियो का आरक्षण जारी रहा । यह आरक्षण अंबेडकेर जी का षणयंत्र था।
9 भारतीय राजनैतिक व्यवस्था मे सबसे अधिक घातक भूमिका अम्बेडकर जी की रही है। उन्होने निरंतर जान बूझकर सत्ता की लालच मे समाज को खंड खंड करने का काम किया ।
10 वर्तमान समय मे सवर्णो द्वारा आरक्षण का विरोध स्वार्थ पूर्ण है, क्योकि वे सिर्फ जातीय आरक्षण का विरोध करते है। महिला आरक्षण धार्मिक आरक्षण आर्थिक आरक्षण का नही करते है।
हजारो वर्षो से पूरी दुनियां मे श्रम शोषण के नये नये तरीके बुद्धिजीवियो द्वारा खोजे जाते रहे है। भारत मे भी यह प्रकृया लम्बे समय से चलती रही है और आज भी जारी है। स्वतंत्रता के पूर्व बुद्धिजीवियो ने जन्म के आधार पर वर्ण और जाति बनाकर श्रमशोषण का रास्ता खोला था। इसी तरह पूरूष प्रधान व्यवस्था भी मजबूत की गई थी । स्वतंत्रता के बाद भी बुद्धिजीवियो का उददेष्य श्रम शोषण ही रहा किन्तु स्वरूप बदल दिया गया। बुद्धिजीवियो ने अम्बेडकर जी के नेतृत्व मे श्रम के विरूद्ध सफल षणयंत्र किया और सवर्ण बुद्धिजीवी तथा अवर्ण बुद्धिजीवी के बीच समझौता कराकर जातीय आरक्षण का एक नया कानून लागू कर दिया गया। श्रम के प्रति न्याय होता तो श्रम मूल्य वृद्धि के प्रयत्न होते किन्तु ऐसे प्रयत्नो को रोकते हुए जातीय आरक्षण लागु कर दिया गया। इस आरक्षण को लगातार आज भी जारी रखा जा रहा है। एक नया आरक्षण महिलाओ के नाम से लाने का प्रयत्न हो रहा है। उचित होता कि महिलाओ को पारिवारिक व्यवस्था मे समान भूमिका दे दी जाती तथा परिवार की संपूर्ण सम्पत्ति मे भी बराबर का अधिकार दे दिया जाता। सारे विवाद खत्म हो जाते । किन्तु महिला आरक्षण के नाम पर कुछ न कुछ समस्याओ के विस्तार का षणयंत्र चलता रहता है। हिन्दू मुसलमान के नाम पर भी आरक्षण की आवाज उठती रहती है। यदि सबको समान अधिकार मिल जाता तो यह समस्या पैदा ही नही होती । गरीबो की सहायता के नाम पर भी आर्थिक आरक्षण की बात उठती रहती है। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढा दिया जाता तो गरीब अमीर की खाई अपने आप खत्म हो जाती और श्रम का मूल्य बढ जाता । ग्रामीण उधोग मजबूत हो जाते और शहरी आबादी अपने आप संतुलित हो जाती किन्तु आर्थिक आरक्षण के नाम पर यह षणयंत्र भी अब तक जारी है। भारत का हर बुद्धिजीवी किसी न किसी आधार पर आरक्षण का समर्थन करता है। क्योकि आरक्षण के नाम पर कमजोरो का शोषण करने का बुद्धिजीवियो को अप्रत्यक्ष लाभ भी होता है तथा साथ ही कमजोरो की मदद करने से उनकी सहानुभूति का प्रत्यक्ष लाभ भी मिलता है । यही कारण है कि भारत का हर बुद्धिजीवी किसी न किसी रूप मे भीम राव अंबेडकर का प्रशंसक है, क्योकि सब प्रकार के आरक्षण के मार्ग खोलने का पहला श्रेय भीम राव अम्बेडकर को जाता है। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी तथा संघ परिवार भी अंबेडकर के प्रशंसक बन गये है। किसी भी प्रकार का आरक्षण वर्ग विद्वेष का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। वर्ग विद्वेष को योजना पूर्वक बढाया जाता है और उसके दुष्परिणामो से सुरक्षा का ढोंग भी साथ साथ किया जाता है। यदि वर्ग विद्वेष पैदा ही न हो तो किसी प्रकार के समाधान की आवश्यकता ही नही है। किसी भी प्रकार का आरक्षण हमेशा धूर्तता और अपराधो का विस्तार करता है। जिस वर्ग को आरक्षण प्राप्त होता है उस वर्ग के धूर्त भिन्न वर्ग के शरीफो का शोषण करने का अधिकार प्राप्त कर लेते है। इस तरह शराफत कमजोर होती जाती है और धूर्तता मजबूत। आज भारत का हर बुुद्धिजीवी अधिक से अधिक चालाक होने का प्रयत्न कर रहा है जिससे वह मजबूतो के शोषण से बच भी सके और कमजोरो का शोषण कर भी सके। व्यवस्था लगातार टूट रही है धूर्तता मजबूत हो रही है। कुछ लोग जातीय आरक्षण का विरोध कर रहे है। ये लोग सब प्रकार के आरक्षण का विरोध न करके सिर्फ जातीय आरक्षण का विरोध करते है क्योकि स्वतंत्रता के पूर्व उन्हे शोषण का एकाधिकार प्राप्त था । स्वतंत्रता के बाद उस एकाधिकार मे से थोडा सा हिस्सा अवर्णो के खाते मे चला गया। ऐसे लोग समान नागरिक संहिता के लिये कोई आंदोलन नही करते न ही कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि के लिये करते है। ऐसे लोग महिला आरक्षण गरीबो का आरक्षण धार्मिक आरक्षण का भी खुला विरोध नही करते। कुछ लोग हिन्दू राष्ट की मांग करते हे तो कुछ अन्य लोग मुसलमानो का आरक्षण देना चाहते है। अनेक लोग महिला सशक्तिकरण का नारा लगाते है तो अनेक लोग गरीबो को आर्थिक आरक्षण देने की वकालत करते है । जबकि स्पष्ट दिखता है कि किसी भी प्रकार का आरक्षण हमेशा घातक होता है । अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है। किसी को भी विशेष अधिकार देते है तो समानता का सिद्धान्त अपने आप खंडित हो जाता है। किसी विशेष स्थिति मे किसी की सहायता की जा सकती है और की जानी चाहिये किन्तु अधिकार किसी को अलग से नही दिये जा सकते । मै लम्बे समय से आरक्षण का विरोधी रहा हूॅ और आज भी हॅू । मै अपने व्यक्तिगत जीवन मे प्र्रयत्न करता हॅू कि जो अवर्ण जातीय आरक्षण का समर्थन करते है उन्हे अछूत मानू और उनसे दूरी बनाकर रखू । इसी तरह जो महिलाएं महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण का समर्थन करती है उन्हे अपने घर मे न घुसने दूं क्योकि वे समाज के लिये गंभीर समस्या है । जो हिन्दू या मुसलमान धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग करते है उनसे भी अधिक से अधिक दूरी बनाकर रखता हॅू। जो लोग गरीब और अमीर के बीच मे समाज को विभाजित करना चाहते है उन्हे भी मै खतरनाक मानता हॅू। मेरे विचार से सब प्रकार के आरक्षण समाप्त करके नयी व्यवस्था शुरू होनी चाहिये, जिसमे 1 समान नागरिक संहिता हो । व्यक्ति एक ईकाई हो। धर्म जाति, गरीब अमीर, महिला पूरूष का भेद न हो। 2 कृत्रिम उर्जा की भारी मुल्य वृद्धि करके सब प्रकार के टैक्स तथा सबसीडी समाप्त कर दी जाये। 3 परिवार की आर्थिक और पारिवारिक व्यवस्था परंपरागत की जगह लोकतांत्रिक हो । परिवार मे व्यक्ति का सम्पत्ति अधिकार सामूहिक हो और सम्पूर्ण सम्पत्ति मे सिर्फ परिवार छोडते समय उसे बराबर का हिस्सा दिया जाये। इन सब सुधारो मे भी समान नागरिक संहिता तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि विशेष महत्व रखते है। जो बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि या समान नागरिक संहिता का विरोध करते है ऐसे श्रम शोषक बुद्धिजीवियो से दूरी बनाकर रखनी चाहिये। अंत मे मेरा यह सुझाव है क किसी भी प्रकार के आरक्षण का पूरी तरह विरोध करना चाहिये। मै ऐसे विरोध का पक्षधर हॅू।

मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on May 5, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-

  1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।
  2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगाकर कमजोर लोगों को कर मुक्त करना चाहिये। वर्तमान समय में इसका उल्टा हो रहा है।
  3. आर्थिक विषमता बहुत बडी समस्या होती है। आर्थिक विषमता को कम किया जाना चाहिये।
  4. हजारों वर्षों से बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के अनेक तरीके खोजे और उनका लाभ उठाया। वर्तमान भारत में भी बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम शोषण के नये-नये तरीके खोजे जा रहे है।
  5. राज्य को सिर्फ सुरक्षा और न्याय तक सीमित रहना चाहिये राज्य को कभी समाज सुधार अथवा व्यापार नहीं करना चाहिये;
  6. भारत की संवैधानिक व्यवस्था में विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के समान ही एक स्वतंत्र अर्थपालिका भी होनी चाहिये जिस पर संविधान के अतिरिक्त किसी अन्य का नियंत्रण न हो।
  7. कोई भी बुद्धिजीवी श्रम के साथ न्याय के प्रयत्न नहीं करता। हर बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध करता है क्योंकि कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि श्रम की मांग और श्रम का मूल्य बढाने में सहायक है।
  8. सभी प्रकार के कर हटाकर एक सुरक्षा कर होना चाहिये जो सम्पत्ति कर के रूप में हो सकता है।
  9. किसी प्रकार की सुविधा के लिये सरकार को फीस लेने की व्यवस्था करनी चाहिये, टैक्स नहीं।
  10. राज्य की भूमिका सुरक्षा का वातावरण बनाने तक सीमित होती है। सुरक्षित रहना व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है।
  11. सुरक्षा में बाधा की स्थिति में राज्य को मुआवजा देना चाहिये। अन्य किसी प्रकार का मुआवजा बंद कर दिया जाये।
  12. सुरक्षा का अर्थ सुरक्षित रखना नहीं है बल्कि सुरक्षा की बाधाओं को दूर करना है। राज्य को कभी सुरक्षा नहीं देनी चाहिये बल्कि बाधाओं को दूर करना चाहिये।
    भारत में अर्थव्यवस्था पूरी तरह विपरीत दिशा में जा रही है। समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद जैसे दुनियां के अनेक वादों के चक्कर में भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है। समाजवादी और साम्यवादी अर्थव्यवस्था में सरकारीकरण को मजबूत किया तो पूंजीवाद ने सरकारीकरण को तो कमजोर किया किन्तु आर्थिक असमानता को मजबूत किया। आदर्श स्थिति में अर्थव्यवस्था न तो पूरी तरह सरकार के अधीन होनी चाहिए न ही पूरी तरह बाजार के अधीन।
    भारत में एक बडी समस्या श्रम शोषण की है। गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी और कृषि उत्पादन पर भारी कर लगाकर बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों, उपभोक्ताओं तथा शहरी लोगों ने आर्थिक विषमता भी बढाई है और श्रम शोषण भी किया है। इन दोनों समस्याओं से निपटना न्याय संगत है। इसके लिए राज्य को अल्पकाल के लिये विशेष प्रवाधान करना चाहिये जिसमें सब प्रकार के कर हटाकर एक कृत्रिम उर्जा कर इस प्रकार लगाया जाये ताकि उसका कोई भी धन सरकारी खजाने में न जाये। बल्कि वह प्रत्येक नागरिक में इस तरह बराबर-बराबर बाँट दिया जाये जिसके परिणामस्वरूप श्रम का मूल्य बढे, शहरी आबादी घटे, कृत्रिम उर्जा का उपयोग नियंत्रित हो जाये, विदेशी कर्ज घट जाये, पर्यावरण सुधर जावें। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य भारत में आपातकाल समझ कर ढाई गुना कर दिया जाये तो आर्थिक विषमता भी बहुत कम हो जायेगी अन्य अनेक समस्यायें अपने आप घटेगी।
    सरकार का काम न तो सुविधा देना होता है न ही सुरक्षित रखना। सरकार का सिर्फ एक काम होता है अपराध नियंत्रण जिसका अर्थ होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता में आने वाली किसी भी बाधा को दूर करना। राज्य वर्तमान समय में अपराध नियंत्रण छोडकर हर मामले में हस्तक्षेप करता है। वह व्यक्ति को सुरक्षा देता है और सुविधा भी देता है जो उसका काम नहीं है। इस तरह यदि राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेगा तो राज्य का बजट बहुत कम हो जायेगा और कर भी बहुत कम लगाना पडेगा। राज्य को सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में एक कर लेकर अन्य सारे कर समाप्त कर देना चाहिये। राज्य को पुलिस, सेना और न्याय का बजट सम्पत्ति कर के रूप में पूरा करना चाहिये क्योंकि राज्य प्रत्येक व्यक्ति के जान-माल की सुरक्षा की गांरटी देता है। अन्य किसी प्रकार का होने वाला खर्च फीस के रूप में लिया जा सकता है चाहे शिक्षा और स्वास्थ्य हो अथवा अन्य कोई भी सुविधा।
    मैं जानता हूॅ कि भारत का कोई पूंजीपति सम्पत्ति कर से सहमत नहीं होगा भले ही उसे कुछ भी करना पडे। इसी तरह भारत का कोई भी बृद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से भी सहमत नही होगा क्योंकि ये दोनों सुझाव दोनों प्रकार के लोगों अर्थात पूंजीपतियों, बुद्धिजीवियों के लिये घातक है। इस सुझाव के आधार पर आवागमन मंहगा हो जायेगा शहरी उद्योग गांव की ओर चले जायेगें मशीनीकरण घट जायेगा तथा श्रम बहुत मंहगा हो जायेगा जो न कोई बुद्धिजीवी चाहता है न ही पूंजीपति। भारत का हर बुद्धिजीवी गरीबी दूर करने और अमीर-गरीब के बीच टकराव वर्धक सुझाव पर विश्वास करता है लेकिन समाधान की चर्चा नहीं करता है। क्योंकि समाधान उनकी सुविधाओं में कटौती कर देगा और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर प्रश्न चिन्ह खडा करेगा। भारत का हर समाजवादी प्रशासनिक तरीके से आर्थिक समस्याओं के समाधान की बात करता है और किसी भी प्रकार के निजीकरण के विरूद्ध होता है। इसी तरह भारत का हर वामपंथी पूंजीवाद का विरोध करता है, श्रमजीवियों के समर्थन का नाटक करता है, अमीरी रेखा और गरीबी रेखा के लिये आंदोलन करता है, किन्तु कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि के विरोध में सबसे आगे रहता है क्योंकि समस्या का जीवित रहना ही उसके अस्तित्व के लिये आवश्यक है। सभी राजनैतिक दल आर्थिक समस्याओं का प्रशासनिक समाधान करना चाहते है, आर्थिक नहीं।
    मेरा सुझाव है कि 1-राज्य का सारा खर्च सुरक्षा और न्याय तक सीमित करके सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में पूरा किया जाना चाहिये। 2-एक स्वतंत्र अर्थपालिका होनी चाहिये जो राज्य के आय-व्यय की समीक्षा करे और उसका बजट बनावें। 3-श्रम के साथ न्याय हो इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये और इसके लिये कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि होनी चाहिये तथा देश का निर्यात इतना अधिक बढाया जाये कि उपभोक्तावाद पर अकुंश लगे और उत्पादक सुखी हो। 4-समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद जैसी बुराईयों से पिंड छुडाकर हमें समाजीकरण की दिशा में बढना चाहिये जिसका अर्थ है प्रत्येक गांव को संवैधानिक, राजनैतिक और आर्थिक स्वतंत्रता। मेरे विचार से यह सुझाव आदर्श अर्थव्यवस्था के लिये मील का पत्थर बन सकता है।
    आदर्श स्थिति तो सम्पूर्ण समाजीकरण ही है जिसमें अन्य मामलों के अतिरिक्त आर्थिक स्वतंत्रता से भी राज्य का हस्तक्षेप समाप्त हो कर समाज का नियंत्रण होना चाहिये किन्तु व्यावहारिक रूप से अभी तत्काल ऐसी संभावना नही है। इस लिये तात्कालिक रूप से हमें ऐसी नीति बनानी चाहिये जिससे आर्थिक मामलों में राज्य का हस्तक्षेप और शक्ति कम होती चली जाये। जो लोग अमीरी या गरीबी रेखा के नाम पर राज्य को अधिक शक्तिशाली बनाने के पक्षधर है वे गलत है। सम्पत्ति कर के नाम पर राज्य को मनमानी करने के अधिकार देना भी उचित नहीं है तथा कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करके राज्य अपना खजाना भरता रहे ऐसी मांग का समर्थन भी करना उचित नहीं है। राज्य के आर्थिक अधिकार समाज नियंत्रित होने चाहिये और राज्य सम्पत्ति कर तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से प्राप्त धन किसी स्वतंत्र अर्थपालिका के निर्देशानुसार खर्च करने को वाध्य हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये। अभी तात्कालिक रूप से अधिकतम निजीकरण का समर्थन और राज्य की शक्तियों का आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप कम होना ही व्यावहारिक दृष्टिकोण होना चाहिये।

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