Just another WordPress site

मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on May 5, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-

  1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।
  2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगाकर कमजोर लोगों को कर मुक्त करना चाहिये। वर्तमान समय में इसका उल्टा हो रहा है।
  3. आर्थिक विषमता बहुत बडी समस्या होती है। आर्थिक विषमता को कम किया जाना चाहिये।
  4. हजारों वर्षों से बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के अनेक तरीके खोजे और उनका लाभ उठाया। वर्तमान भारत में भी बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम शोषण के नये-नये तरीके खोजे जा रहे है।
  5. राज्य को सिर्फ सुरक्षा और न्याय तक सीमित रहना चाहिये राज्य को कभी समाज सुधार अथवा व्यापार नहीं करना चाहिये;
  6. भारत की संवैधानिक व्यवस्था में विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के समान ही एक स्वतंत्र अर्थपालिका भी होनी चाहिये जिस पर संविधान के अतिरिक्त किसी अन्य का नियंत्रण न हो।
  7. कोई भी बुद्धिजीवी श्रम के साथ न्याय के प्रयत्न नहीं करता। हर बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध करता है क्योंकि कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि श्रम की मांग और श्रम का मूल्य बढाने में सहायक है।
  8. सभी प्रकार के कर हटाकर एक सुरक्षा कर होना चाहिये जो सम्पत्ति कर के रूप में हो सकता है।
  9. किसी प्रकार की सुविधा के लिये सरकार को फीस लेने की व्यवस्था करनी चाहिये, टैक्स नहीं।
  10. राज्य की भूमिका सुरक्षा का वातावरण बनाने तक सीमित होती है। सुरक्षित रहना व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है।
  11. सुरक्षा में बाधा की स्थिति में राज्य को मुआवजा देना चाहिये। अन्य किसी प्रकार का मुआवजा बंद कर दिया जाये।
  12. सुरक्षा का अर्थ सुरक्षित रखना नहीं है बल्कि सुरक्षा की बाधाओं को दूर करना है। राज्य को कभी सुरक्षा नहीं देनी चाहिये बल्कि बाधाओं को दूर करना चाहिये।
    भारत में अर्थव्यवस्था पूरी तरह विपरीत दिशा में जा रही है। समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद जैसे दुनियां के अनेक वादों के चक्कर में भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है। समाजवादी और साम्यवादी अर्थव्यवस्था में सरकारीकरण को मजबूत किया तो पूंजीवाद ने सरकारीकरण को तो कमजोर किया किन्तु आर्थिक असमानता को मजबूत किया। आदर्श स्थिति में अर्थव्यवस्था न तो पूरी तरह सरकार के अधीन होनी चाहिए न ही पूरी तरह बाजार के अधीन।
    भारत में एक बडी समस्या श्रम शोषण की है। गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी और कृषि उत्पादन पर भारी कर लगाकर बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों, उपभोक्ताओं तथा शहरी लोगों ने आर्थिक विषमता भी बढाई है और श्रम शोषण भी किया है। इन दोनों समस्याओं से निपटना न्याय संगत है। इसके लिए राज्य को अल्पकाल के लिये विशेष प्रवाधान करना चाहिये जिसमें सब प्रकार के कर हटाकर एक कृत्रिम उर्जा कर इस प्रकार लगाया जाये ताकि उसका कोई भी धन सरकारी खजाने में न जाये। बल्कि वह प्रत्येक नागरिक में इस तरह बराबर-बराबर बाँट दिया जाये जिसके परिणामस्वरूप श्रम का मूल्य बढे, शहरी आबादी घटे, कृत्रिम उर्जा का उपयोग नियंत्रित हो जाये, विदेशी कर्ज घट जाये, पर्यावरण सुधर जावें। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य भारत में आपातकाल समझ कर ढाई गुना कर दिया जाये तो आर्थिक विषमता भी बहुत कम हो जायेगी अन्य अनेक समस्यायें अपने आप घटेगी।
    सरकार का काम न तो सुविधा देना होता है न ही सुरक्षित रखना। सरकार का सिर्फ एक काम होता है अपराध नियंत्रण जिसका अर्थ होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता में आने वाली किसी भी बाधा को दूर करना। राज्य वर्तमान समय में अपराध नियंत्रण छोडकर हर मामले में हस्तक्षेप करता है। वह व्यक्ति को सुरक्षा देता है और सुविधा भी देता है जो उसका काम नहीं है। इस तरह यदि राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेगा तो राज्य का बजट बहुत कम हो जायेगा और कर भी बहुत कम लगाना पडेगा। राज्य को सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में एक कर लेकर अन्य सारे कर समाप्त कर देना चाहिये। राज्य को पुलिस, सेना और न्याय का बजट सम्पत्ति कर के रूप में पूरा करना चाहिये क्योंकि राज्य प्रत्येक व्यक्ति के जान-माल की सुरक्षा की गांरटी देता है। अन्य किसी प्रकार का होने वाला खर्च फीस के रूप में लिया जा सकता है चाहे शिक्षा और स्वास्थ्य हो अथवा अन्य कोई भी सुविधा।
    मैं जानता हूॅ कि भारत का कोई पूंजीपति सम्पत्ति कर से सहमत नहीं होगा भले ही उसे कुछ भी करना पडे। इसी तरह भारत का कोई भी बृद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से भी सहमत नही होगा क्योंकि ये दोनों सुझाव दोनों प्रकार के लोगों अर्थात पूंजीपतियों, बुद्धिजीवियों के लिये घातक है। इस सुझाव के आधार पर आवागमन मंहगा हो जायेगा शहरी उद्योग गांव की ओर चले जायेगें मशीनीकरण घट जायेगा तथा श्रम बहुत मंहगा हो जायेगा जो न कोई बुद्धिजीवी चाहता है न ही पूंजीपति। भारत का हर बुद्धिजीवी गरीबी दूर करने और अमीर-गरीब के बीच टकराव वर्धक सुझाव पर विश्वास करता है लेकिन समाधान की चर्चा नहीं करता है। क्योंकि समाधान उनकी सुविधाओं में कटौती कर देगा और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर प्रश्न चिन्ह खडा करेगा। भारत का हर समाजवादी प्रशासनिक तरीके से आर्थिक समस्याओं के समाधान की बात करता है और किसी भी प्रकार के निजीकरण के विरूद्ध होता है। इसी तरह भारत का हर वामपंथी पूंजीवाद का विरोध करता है, श्रमजीवियों के समर्थन का नाटक करता है, अमीरी रेखा और गरीबी रेखा के लिये आंदोलन करता है, किन्तु कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि के विरोध में सबसे आगे रहता है क्योंकि समस्या का जीवित रहना ही उसके अस्तित्व के लिये आवश्यक है। सभी राजनैतिक दल आर्थिक समस्याओं का प्रशासनिक समाधान करना चाहते है, आर्थिक नहीं।
    मेरा सुझाव है कि 1-राज्य का सारा खर्च सुरक्षा और न्याय तक सीमित करके सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में पूरा किया जाना चाहिये। 2-एक स्वतंत्र अर्थपालिका होनी चाहिये जो राज्य के आय-व्यय की समीक्षा करे और उसका बजट बनावें। 3-श्रम के साथ न्याय हो इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये और इसके लिये कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि होनी चाहिये तथा देश का निर्यात इतना अधिक बढाया जाये कि उपभोक्तावाद पर अकुंश लगे और उत्पादक सुखी हो। 4-समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद जैसी बुराईयों से पिंड छुडाकर हमें समाजीकरण की दिशा में बढना चाहिये जिसका अर्थ है प्रत्येक गांव को संवैधानिक, राजनैतिक और आर्थिक स्वतंत्रता। मेरे विचार से यह सुझाव आदर्श अर्थव्यवस्था के लिये मील का पत्थर बन सकता है।
    आदर्श स्थिति तो सम्पूर्ण समाजीकरण ही है जिसमें अन्य मामलों के अतिरिक्त आर्थिक स्वतंत्रता से भी राज्य का हस्तक्षेप समाप्त हो कर समाज का नियंत्रण होना चाहिये किन्तु व्यावहारिक रूप से अभी तत्काल ऐसी संभावना नही है। इस लिये तात्कालिक रूप से हमें ऐसी नीति बनानी चाहिये जिससे आर्थिक मामलों में राज्य का हस्तक्षेप और शक्ति कम होती चली जाये। जो लोग अमीरी या गरीबी रेखा के नाम पर राज्य को अधिक शक्तिशाली बनाने के पक्षधर है वे गलत है। सम्पत्ति कर के नाम पर राज्य को मनमानी करने के अधिकार देना भी उचित नहीं है तथा कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करके राज्य अपना खजाना भरता रहे ऐसी मांग का समर्थन भी करना उचित नहीं है। राज्य के आर्थिक अधिकार समाज नियंत्रित होने चाहिये और राज्य सम्पत्ति कर तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से प्राप्त धन किसी स्वतंत्र अर्थपालिका के निर्देशानुसार खर्च करने को वाध्य हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये। अभी तात्कालिक रूप से अधिकतम निजीकरण का समर्थन और राज्य की शक्तियों का आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप कम होना ही व्यावहारिक दृष्टिकोण होना चाहिये।

Leave a Reply

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

  •  
  •  
  •  

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

Categories

Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal