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मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक स...
महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 वर...
संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि
लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ...
मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि
मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ह...
मंथन क्यों? बजरंग मुनि
भावना और बुद्धि का संतुलन आदर्श स्थिति मानी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये भी यह संतुलन आवश्यक है तथा समाज के लिये भी। भावना त्याग प्रधान होती है तो बुद्धि ज्ञान प्रधान। भावना की अधिकता ...
मंथन क्रमांक- 4 की समीक्षा
आचार्य पंकज,वाराणसी,उ0प्र0 प्रश्न -मंथन क्रमांक 4 में विश्व की प्रमुख समस्याओं की विस्तृत चर्चा करते समय आपने आतंकवाद को शामिल नहीं किया,जबकि आतंकवाद भी एक बहुत बडी समस्या हंै। आप इस संबंध में ...
मंथन क्रमांक- 4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बीच ...
मंथन क्रमांक-3 की समीक्षा
ओम प्रकाश दुबे, नोएडा 1 प्रश्न- गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व मे क्या फर्क है? उत्तर-गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व का आशय एक ही है किन्तु गुणात्मक हिन्दुत्व और संगठनात्मक हि...
मंथन क्रमांक -2 बेरोजगारी
व्यक्ति को रोजगार प्राप्त कराना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है, दायित्व नहीं। क्योंकि रोजगार व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं होता,बल्कि संवैधानिक अधिकार मात्र होता है। रोजगार की स्वतंत्...
दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा
दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा में एक लेख लिखा है। उस लेख की समीक्षा में मैने एक उत्तर लिखा है जो इस प्रकार है- उत्तरः- आप सब जानते है कि मैं प्रतिद...

मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा

Posted By: kaashindia on November 19, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

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स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक से बढकर एक त्यागी ,तपस्वी लोग शामिल रहे, किन्तु तीनों संगठनों का कुछ मामलों में तालमेल नहीं हो सका। आर्य समाज मुख्य रुप से सामाजिक समस्याओं पर अधिक केन्द्रित रहा। आर्य समाज भावनाओं की अपेक्षा विचारों पर अधिक बल देता था। आर्यसमाज परिस्थिति अनुसार अपनी कार्यप्रणाली में संशोधन भी करता था। यही कारण था कि आर्य समाज ने स्वतंत्रता संघर्ष में सामाजिक कार्यो की अपेक्षा गुलामी से मुक्ति आन्दोलन में अधिक बढ़ चढकर हिस्सा लिया। आर्य समाज के बहुत से लोग गॉधी के मार्ग से भी जुडे रहे, तो दूसरी ओर बहुत से लोग गॉधी मार्ग से ठीक विपरीत क्रांतिकारियों के साथ भी जुडे रहे। मार्ग भले ही भिन्न भिन्न हो किन्तु लक्ष्य दोनों का स्वतंत्रता में सहयोग था। हेडगेवार जी तथा उनके द्वारा स्थापित संघ हिन्दू सुरक्षा तक सीमित था। संघ के लोग इस्लाम को हिन्दू धर्म के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक मानते थे और यह भी सच था कि मुसलमान राजाओं का इतिहास ऐसा ही कलंकित रहा है। मुसलमानों की अपेक्षा संघ परिवार अंग्रेजी शासन को कम खराब मानता था और इसलिए संघ परिवार की एकमात्र सम्पूर्ण शक्ति इस्लाम के विरुद्ध हिन्दू संगठन तक केन्द्रित रही। महात्मा गॉधी राष्ट्रीय गुलामी को सर्वाधिक खतरनाक मानते थे। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता संघर्ष में महात्मा गॉधी अहिंसक मार्ग पर चलने के लिए दृढ थे, तो क्रांतिकारी अहिंसक मार्ग को असफल मानते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति दोनों के बीच कोई विरोधाभास नहीं था। महात्मा गॉधी तथा क्रातिकारी इस्लाम की अपेक्षा गुलामी को पहला शत्रु मानते थे , तो संघ परिवार इस्लाम को पहला शत्रु मानता था। आर्य समाज भी इस्लाम को पहला शत्रु मानना बंद करके गुलामी को पहला शत्रु मानने लगा था। यही कारण है कि आर्य समाज प्रारंभ में इस्लाम के पूरी तरह विरुद्ध होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष के समय उस विरोध को प्राथमिकता नहीं दे रहा था। यही कारण था कि गॉधी पूरी तरह हिन्दू धर्म के पक्षधर होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष में इस्लाम को साथ लेकर चलना चाहते थे और संघ परिवार स्वतंत्रता भले ही देर से मिले या न भी मिले किन्तु वह इस्लाम से किसी भी प्रकार के समझौते के विरुद्ध था। यही कारण है कि संघ के इक्कादुक्का लोगों को छोडकर अन्य किसी कार्यकर्ता की स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही। बल्कि कहीं कहीं इस संघर्ष को विवादास्पद बनाने में भी सक्रियता देखी जा सकती है।
स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने यह मान लिया कि उसका काम पूरा हो गया और उसे अब पुनः अपने समाज सुधार के कार्य में लग जाना चाहिए और उसने पूरी तरह राजनीति से किनारा कर लिया। इसके ठीक विपरीत स्वतंत्रता के पूर्व संघ एक सांस्कृतिक संगठन तक सीमित था, किन्तु स्वतंत्रता मिलते ही वह पूरी तरह राजनीति में सक्रिय हो गया। स्वाभाविक था कि अधिकांश मुसलमान भारत के हिन्दुओं में अपना विश्वास खो चुके थे तथा संघ के लिए यह अच्छा अवसर था। यह अलग बात है कि संघ विचारों से प्रभावित कुछ अतिवादी हिन्दुओं ने गॉधी हत्या जैसा भावनात्मक और मूखर्तापूर्ण कृत्य करके उसका खेल बिगाड दिया। गॉधी हत्या के बाद सर्वोदय दो भागों में विभाजित हो गया। गॉधी को मानने वालो का एक भाग राजनीति के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन में लग गया जो बाद में अपनी अवस्था परिवर्तन में बदल गया, तो दूसरा सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन तक सीमित हो गया।
दुनिया में साम्यवादी सबसे अधिक चालाक और बुद्धिवादी माने जाते है, तो दूसरी ओर संघ परिवार सबसे अधिक शरीफ नासमझ और भावना प्रधान। सर्वोदय भी लगभग शरीफ नासमझ और भावनाप्रधान ही माना जाता है। किन्तु गॉधी हत्या ने सर्वोदय के मन में इतनी कटुता भर दी कि साम्यवादी और मुस्लिम संगठनों को सर्वोदय का साथ लेने में सुविधा हो गई। यदि हम सर्वोदय परिवार और संघ परिवार की तुलना करें तो दोनों में अनेक समानताओं के बाद भी दोनों में काफी असमानताएँ हैं। संघ एक संगठन का स्वरूप है जिसके नेता निर्णय करते हैं और कार्यकर्ता तदनुसार आचरण करते हैं। जबकि सर्वोदय का प्रत्येक कार्यकर्ता ही स्वयं में एक नेता है इसमें न तो एक नेतृत्व है, न ही प्रतिबद्ध अनुकरण कर्ता। संघ में पूरी तरह अनुशासन है तो संर्वोदय में पूरी तरह स्वशासन। संघ का एक स्पष्ट लक्ष्य है हिन्दू तुष्टीकरण के माध्यम से भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करना। सर्वोदय दिशाहीन है। उसका कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं। कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तो कभी स्वदेशी का नारा। कभी ग्राम स्वराज्य तो कभी साम्प्रदायिकता उन्मूलन। एक वर्ष के लिये भी इनके लक्ष्य टिकाऊ या स्पष्ट नहीं होते। संघ मुस्लिम संगठनों की क्रिया के विरूद्ध तीव्र योजनाबद्ध तथा परिणाम मूलक प्रतिक्रिया करता है। सर्वोदय संघ की प्रतिक्रिया के विरूद्ध लचर अविचारित तथा शक्ति प्रदर्शन के लिये प्रतिक्रिया करता हैं। संघ अन्य संगठनों का उपयोग करना जानता है जबकि सर्वोदय किसी संगठन का उपयोग नहीं कर सकता भले ही उसी का कोई उपयोग कर ले। संघ नेतृत्व पूरी तरह सतर्क सक्रिय और चालाक है। सर्वोदय नेतृत्व सक्रिय तो है किन्तु ढीला ढाला तथा शरीफ प्रवृति का है। संघ का उद्देश्य सत्ता प्रधान है, और परिणाम सफलता है जबकि सर्वोदय का उद्देश्य जनहित का है किन्तु परिणाम शून्य है।
मैंने दोनों संगठनों को निकट से देखा है। सर्वोदय की प्रत्येक चर्चा में गांधी हत्या की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सर्वोदय गांधी हत्या के लिए तो संघ को अक्षम्य दोषी मानता है किन्तु भारत विभाजन में मुसलमानों की भूमिका अथवा सम्पूर्ण विश्व में अन्य धर्मावलम्बियों से निरंतर टकराव में मुसलमानों की भूमिका को भूल जाने योग्य दोष से अधिक नहीं मानता। संघ प्रत्यक्ष रुप से बलप्रयोग का समर्थक है। उसकी कथनी करनी में फर्क नहीं। सर्वोदय प्रत्यक्ष रुप से अहिंसा की बात करता है किन्तु परोक्ष रुप से नक्सलवाद मुस्लिम आतंकवाद तक का समर्थन करता है। कथनी और करनी में आसमान जमीन का फर्क है।
मेरे विचार में सर्वोदय भटक रहा है। सन पचहत्तर में सर्वोदय ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरूद्ध एक निर्णायक पहल की। किन्तु सर्वोदय से भूल हुई कि उसने उक्त पहल करने में संघ तथा साम्यवादियों को मिलाकर एक मंच बना दिया। संघ और साम्यवादी उतने ही कटृर होते है जितने कि मुसलमान। ये व्यक्ति के रूप में तो कहीं भी रह सकते हैं किन्तु दल के रूप में ये पूरी तरह सतर्क और सक्रिय रहते हैं। सर्वोदय ने तानाशाही के विरूद्ध ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया किन्तु देश में कोई निर्णायक परिर्वतन नहीं आ सका। अब तो सर्वोदय लगभग चर्चा से भी बाहर हो रहा है। इस समापन काल मंे स्थिति यहॉ तक आ गई है कि सर्वोदय में ही सम्पत्ति और सत्ता की छीनाझपटी शुरु हो गई है। साम्यवाद के लगभग पतन और कांग्रेस के कमजोर होने के बाद सर्वोदय के सामने कोई अन्य मार्ग नहीं दिख रहा है जबकि संघ परिवार लगातार सशक्त हो रहा है तथा मुसलमानों की बढती अविश्वसनीयता संघ परिवार को और शक्ति प्रदान कर रही है। आर्य समाज की एक स्पष्ट दिषा रही है किन्तु अग्निवेश द्वारा साम्यवाद के समर्थन से आर्य समाज को भी कमजोर करने में बहुत सफलता मिली। यहॉ तक कि साम्यवाद कांग्रेस तथा कुछ विश्व स्तरीय संगठनों के समर्थन से अग्निवेश जैसे चालाक व्यक्ति आर्य संस्कारों के विरुद्ध होते हुए भी आर्य समाज के प्रधान बन बैठे थे।
पिछले दो वर्षो से स्थितियॉ बदली है वर्तमान समय में अधिकांश भावना प्रधान लोगो से भारतीय राजनीति का पिण्ड छूट गया है। तीनों संगठन अर्थात् सर्वोदय, आर्य समाज और संघ, मोदी के सामने समझदारी में बौने सिद्ध हो रहे है। साम्यवाद तो स्वयं ही समाप्त हो रहा था । आर्य समाज का आंशिक स्वरुप परिवर्तन होकर कुछ गायत्री परिवार, कुछ बाबा रामदेव के रुप में बिखर गया। संघ परिवार लगातार शक्तिशाली हो रहा है। स्पष्ट दिखता है कि परिवारवाद मुस्लिम साम्प्रदायिकता तथा आर्थिक कमजोरी से निपटते ही नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिकता से निपटने की पहल करेंगे। हो सकता है कि इस पहल की शुरुवात 2019 के आम चुनाव के बाद ही हो। किन्तु मुझे साफ दिखता है कि यह कार्य होगा अवश्य और ऐसी पहल का मुख्य निशाना संघ परिवार के वे बडबोले लोग और वह ना समझ विचार होगा जिन्हें न हिन्दुत्व का ज्ञान है, न समाज की चिंता है, न विश्वसनीयता की चिंता है बल्कि उन्हें तो अपने मुर्खतापूर्ण विचारों को टी बी और अखबारों में प्रसारित होने देने की तक चिंता है। मैं भारत में संगठनात्मक हिन्दुत्व की तुलना में गुणात्मक हिन्दुत्व के होने का पक्षधर रहा हॅू। मैं उम्मीद करता हॅू कि आर्य समाज तथा सर्वोदय भी वैचारिक तथा गुणात्मक हिन्दुत्व के समर्थन में अपनी पुरानी गलतियों की समीक्षा करेंगे।

महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 6, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं –
1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है।
2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है।
3 वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धुर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।
4 महिला सशक्तिकरण के प्रयत्नों का उद्देश्य वर्ग निर्माण मात्र होता है। लिग भेद के आधार पर महिला या पुरुष का संगठन बनना हमेशा घातक होता है। संस्था बनाई जा सकती है।
इस तरह हम कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण एक समस्या है जिसे समाज में समाधान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महिला और पुरुष अलग अलग व्यक्ति तक ही सीमित होते है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करें तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही महिलाये होगी क्योंकि अन्य महिलाये तो परिवार की सदस्य होती है। वे माॅ बहन बेटी पत्नी तो हो सकती हैं किन्तु महिला के रुप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता जब तक वे अकेली न हो । यदि किसी महिला या पुरुष द्वारा तीन पैर की दौड अनिवार्य है और उसमें भी एक महिला और एक पुरुष का जुडना आवश्यक है तो ऐसी दौड में किसी एक इकाई को पृथक महत्व देना नुकसानदायक होता है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उन दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र है। इसमें कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता। क्योंकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी है तथा वह चाहेगा कि दोनों कभी एक होकर तीन पैर की दौड न जीत सकें। जब महिला का अपवाद स्वरुप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्वहीन है या घातक।
जो धुर्त लोग महिला और पुरुष के रुप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते हैं वे दहेज, सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहु विवाह, देव दासी आदि अनेक पुरानी परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है मेरे विचार में समय समय पर देशकाल परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताए बदलती रहती हैं। किसी समय में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते को ध्येय वाक्य माना गया था तो किसी समय में ढोल गवार शूद्र पशु नारी को। ये वाक्य समय समय पर परिस्थिति अनुसार बदलते रहते है । वर्तमान में विकृति मानी जाने वाली दहेज ,सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहुविवाह, देव दासी आदि की परम्पराए पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराओं के रुप में विकसित किया गया था। ये परम्पराएं बाद में परिस्थितियों के बदलाव होने से टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष की कई पत्नियों के साथ माना जाता था। तो अब भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहु विवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले वाली व्यवस्था विकृति थी और न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जायेगी। विवाह,तलाक आदि व्यवस्थाएं आपसी सहमति से तथा सामाजिक मान्यताओं से चलती है,कानून से नहीं। नासमझ लोगों ने अनावश्यक इन परम्पराओं में कानून को घुसा दिया।
आमतौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि महिलाये पुरुषांे की काम वासना पूर्ति की साधन मात्र होती हैं। यह प्रचार पूरी तरह गलत है। सच्चाई यह है कि काम इच्छा पुरुषों की अपक्षा महिलाओं में अधिक मानी जाती है। यह अलग बात है कि प्राकृतिक कारणों से पति पत्नि के बीच पति को हमेशा आक्रामक स्वरुप में होना चाहिए और पत्नि को आकर्षक स्वरुप में। यह प्राकृतिक स्वरुप यदि दोनों में यथावत है तो इसे किसी का किसी पर अत्याचार नहीं कह सकते। यदि काम इच्छा महिलाओं में बहुत कम होती तो महिलाए एक उम्र के बाद पुरुष के अभाव में परेशान नहीं होतीं। महिलाओं पर समाज में भेदभाव का आरोप भी पूरी तरह गलत है। कानून में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है। समाज में महिलाओं को पुरुषो की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त है। परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पुरुष से कमजोर मानी जाती है लेकिन यह कमजोर भूमिका भी अत्याचार के रुप में नहीं कही जा सकती। एक कलेक्टर की पत्नी अपने दस पुरुष नौकरों पर अपना आदेश चलाती है। अनेक घरों में पुरुष महिलाओं को पीटते भी है तो अनेक घरों के पुरुष महिलाओं से मार भी खाते हैं। महिला और पुरुष का परिवार में कार्य विभाजन है और यह विभाजन सबकी सहमति से होता है। यदि परिवार में भोजन खराब बनेगा तो महिला डांट खाती है,और भोजन का अभाव है तो महिला पति को डाटती भी है। भारत में पिछले वर्षो में होने वाली लाखों किसान आत्महत्याओं में शायद ही एक दो महिलाओं ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि यह पुरुष का दायित्व माना जाता है। समाज में एक मान्यता है कि यदि अत्याचारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो अत्याचार पीडित प्रसन्न होता है। पति के मरने के बाद पत्नी जितना दुख व्यक्त करती है वह दुख उसका वास्तविक होता है, नाटक नहीं। मतलब साफ है कि यदि भले ही पति पत्नि के बीच पति अत्याचार करता हो किन्तु दोनों के बीच कोई ऐसी बात अवश्य है जो दोनों को जोडकर रखती है और इस जोड को कमजोर नहीं होने देना चाहती। यदि महिलाये यह जानती है कि पुरुष अत्याचारी होता है तो महिलाए सब कुछ समझते बूझते भी पति घर में स्वेच्छा से क्यों जाती है। यहाॅ तक कि यदि कभी कभी उनके जाने में विलम्ब हो जाये तो वे सारी मर्यादाये छोडकर भी जाती है। इसका अर्थ है कि महिला अत्याचार का प्रचार पूरी तरह सोचा समझा षडयंत्र है।
प्राचीन समय में महिलाओ और पुरुषों को कुल मिलाकर समान अधिकार प्राप्त थे। किन्तु वे अधिकार योग प्रधान थे अर्थात कुछ मामलों में महिलाओं को विशेष अधिकार थे तो कुछ मामलो में कम। किन्तु कुल मिलाकर समान थे। ये अधिकारों का विभाजन भी या तो परिवार स्वयं करता था या सामाजिक व्यवस्था। स्वतंत्रता के बाद कानूनी व्यवस्था ने सबको समान अधिकार घोषित कर दिया किन्तु सामाजिक व्यवस्था में पुरानी योग समान प्रणाली जीवित रही।
समाज में दो प्रकार के परिवार है 1 पारम्परिक परिवार 2 आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवार की महिलाओं की संख्या 98 प्रतिषत है और आधुनिक परिवारो की करीब दो प्रतिषत । ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये पूरे समाज का शोषण करना चाहती है। इन्हे सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी चाहिए। किसी आधुनिक महिला ने आज तक यह नहीं कहा कि उसे समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार यदि पूरे भारत का सर्वे किया जाये तो ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये अपने को 98 प्रतिषत पारम्परिक महिलाओं का प्रतिनिधि घोषित करती है। किन्तु यदि इनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डाले तो 98 प्रतिषत की तुलना में इन दो प्रतिषत का चारित्रिक मापदण्ड भी कमजोर होता है तथा पारिवारिक जीवन भी अधिक असंतोषप्रद होता है। यहाॅ तक कि तलाक के मामले का भी प्रतिषत इन दो प्रतिषत आधुनिक महिलाओं में अधिक होता है। ये दो प्र्रतिषत आधुनिक महिलाएं सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे ही स्वतंत्रता कहती है। यहाॅ तक कि ये महिलाये सारी सुविधाये भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती है। पति को सामान्य नौकरी तो पत्नी को आरक्षित नौकरी। पति सामान्यतया लोकसभा में तो पत्नी आरक्षित सीट पर । यदि यह नियम बन जाये कि एक परिवार का एक ही सदस्य राजनीतिक पद या सरकारी नौकरी पा सकता है तो ये आधुनिक महिलाये आसमान सर पर उठा लेगी किन्तु न ये ऐसा होने देंगी न इनके पति।
कुछ दशक पूर्व पुरुष सशक्तिकरण के नाम से समाज में विकृति आई थी और उसके भी दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा समस्या का समाधान न होकर नई समस्या पैदा कर रहा है। मैंने दिल्ली के राजघाट पर सरकार की तरफ से एक बडा बोर्ड देखा जिसमें लिखा है ‘‘महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है’’। मैं आज तक नहीं समझा कि क्या समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति पर अत्याचार करने की छूट प्राप्त है? ये महिलाओं शब्द लिखना वास्तव में बहुत घातक है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव सरीखे लोग कन्या भ्रुण हत्या को रोकने का अभियान चला रहे है। मेरे विचार में बालक की भ्रूण हत्या तो नगण्य होती है फिर पूरी भ्रूण हत्या को ही यदि रोक दिया जाये तो कैसे गलत होगा ? इतना अवश्य है कि यदि पूरी भ्रूण हत्या को रोका गया तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष खडा करके अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम नहीं हो पायेगा।
यदि इसी तरह महिला सशक्तिकरण का नारा विकसित होता रहा तो एक नई विकृति जन्म ले सकती है। कहा जाता है कि घरों में महिलाओं को दासी समझा जाता है। यदि भविष्य में यह प्रथा उलट जाये और घोषित रुप से दासी कहा जाने लगे तो क्या अन्तर होगा। यदि ऐसी विकृत प्रथा प्रचलित हो जाये कि पुरुष विज्ञापन देने लगे कि उन्हे एक ऐसी दासी चाहिए जो दिन में नौकरी का काम करे और रात में उसके साथ सोये भी। इस विज्ञापन के आधार पर वेतन भत्ते तय करने की प्रथा हो जाये तो आप सोचिये कि यह प्रथा कानून कैसे रोक पायेगा जबकि यह प्रथा वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था से अधिक बुरी होगी।
परिवार में पति पत्नि के बीच अविश्वास की दीवार खडी की जा रही है। यह दीवार कितनी लाभदायक होगी यह तो भविष्य बतायेगा किन्तु यह दीवार परिवार व्यवस्था को तोडेगी अवश्य । छोटे बच्चों के संस्कार खराब होगे। लाभ होना तो संदेहास्पद है किन्तु नुकसान होना निश्चित है । अब पुरानी परिवार और समाज व्यवस्था की ओर लौटना न तो संभव है न उचित किन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर परिवार तोडक समाज तोडक अभियान भी बंद होने चाहिए। परिवार में कौन सषक्त हो,कार्य विभाजन कैसा हो यह परिवार का आंतरिक मामला है उन्हें मिल बैठकर तय करने दीजिए। कोई कानून बनाना उचित नहीं। यदि उनमें आपसी सहमति नहीं है तो उन्हे अलग अलग मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता दीजिए। अलग होने में भी कोई कानूनी बंधन उचित नहीं। मेरे विचार में एक ही समाधान है कि भारत में व्यक्ति को एक इकाई माना जाये। सबको समान अधिकार माने जाये। कानून किसी को विशेष अधिकार न दे तथा देश सवा सौ करोड व्यक्तियों और परिवारों गांवो का संघ हो। धर्म, जाति, लिंग के आधार पर होने वाले सब प्रकार के भेद भाव मूलक कानून समाप्त कर दिये जाये।
नोटः- मंथन क्रमांक 7 का अगला विषय न्यायिक सक्रियता कितनी उचित कितनी घातक होगा।

संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 4, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ज्यादा है। पिछले कुछ दिनो से विपक्ष की गलत नीतियां संघ परिवार के इस उद्देश्य को पूरा करती दिखाई दे रही हैं।
अभी अभी मायावती जी ने यह कहा है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान एक जुट रहेगा । वह किसी भी अन्य दल के पास नही जायेगा । ऐसी ही कुछ सोच अन्य विपक्षी दलो की भी रही है। सबका यह मानना है कि हिन्दू तो आपस मे बंटेगा ही यदि मुसलमान का एक जुट वोट उसे मिल जाये तो वह हिन्दूओ के जाति के आधार पर किसी वर्ग को तोडकर शासन मे आ सकता है। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद धीरे धीरे हिन्दुओ का ध्रुवीकरण भी बढ रहा है तथा विपक्षी दलो की मुस्लिम एकत्रीकरण की नीति हिन्दुओ को और अधिक इकठठा होने मे सहायता कर रही है। मुस्लिम एकत्रीकरण उस समय तक तो लाभदायक रहता है, जब तक हिन्दू एक जुट न हो । किन्तु इसका यह अर्थ नही कि आप पूरी वेशर्मी के साथ मुसलमानो को एक जुट करने की आवाज लगाये और यह मान ले कि हिन्दुओ पर कभी भी किसी भी परिस्थिति मे इसकी प्रतिक्रिया होगी ही नही । मेरे विचार मे विपक्षी दलो का ऐसा मानना गलत है।
अभी अभी भोपाल मे सिमी के आठ आतंकवादी जेल से फरार होने के बाद मुठभेड मे मारे गये। दिग्विजय सिंह जी ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर क्या कारण है कि सिर्फ मुसलमान ही जेलो से भागते हैं। इसके पूर्व भी दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेता यह प्रश्न उठा चुके है कि आवादी के अनुपात मे मुसलमान ही जेलो मे अधिक बंद क्यो है? मै नही समझता कि मै इस मूर्खता या धूर्तता पूर्ण प्रश्न का क्या उत्तर दॅू। स्पष्ट है कि यह प्रष्न भी हिन्दुओ के ध्रुवीकरण मे सहायक होता है।
मै देख रहा हॅू कि आतंकवादियो के मारे जाने पर जो बहस छिडी है उसमे अधिंकांश विपक्षी नेता या मुसलमान प्रवक्ता एक स्वर से इस प्रश्न को अधिक महत्व दे रहे है कि मुठभेड फर्जी थी और बिना न्यायिक प्रक्रिया के उन्हे मार दिया गया, जो गलत था । मै भी ऐसा सोचता हॅू कि इन आठ लोगो को मार देना फर्जी हो सकता है और बिना न्यायिक प्रकृया के पूरी हुए किसी को पुलिस द्वारा मार देना गैर कानुनी है। फिर भी मै ऐसा सोचता हॅू कि जिन लोगो की हत्या हुई वे भले ही कानून के द्वारा अपराध सिद्ध न हो किन्तु मेरे विश्वास के अनुसार वे अपराधी थे और यदि न्यायालय अनंत काल तक ऐसे अपराधियो को अपराधी घोषित करके दंडित न कर सके तो क्या ऐसे लेागो से समाज को मुक्ति दिलाने मे अन्य इकाइयों को पहल नही करनी चाहिये? यदि वे अपराधी थे, जैसा कि मुझे भी विश्वास है, और न्यायालय उन्हे दंडित नही कर पा रहा है तो पुलिस ने ऐसे लोगो को मारकर अपनी नौकरी जोखिम मे डाली है। इसके लिये भले ही वे कानून से दंडित हो जाये किन्तु सामाजिक दृष्टि से ऐसे पुलिसकर्मी बधाई के पात्र हैं। न्यायपालिका प्रतिदिन जजो की कमी का रोना रोती है, किन्तु यह कभी नही सोचती कि उसकी प्राथमिकताए क्या है? न्यायालय को सेशन कोर्ट के योग्य गंभीर आपराधिक मामलो को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहिये था। किन्तु न्यायपालिका अन्य कम महत्वपूर्ण कार्यो को अपने हाथ मे लेकर ओभर लोडेड हो जाती है। परिणाम स्वरूप गंभीर अपराधी जेलो मे लम्बे समय तक निर्णय के अभाव मे पडे रहते है, तथा कभी कभी पुलिस ऐसे खतरनाक अपराधियो को फर्जी मुठभेड मे मारकर अपनी नौकरी खतरे मे डालती है। भोपाल के फर्जी मुठभेड का वास्तविक कारण न्यायिक प्रक्रिया मे भी खोजा जाना चाहिये। किन्तु यह मामला या तो सत्ता या विपक्ष के बीच खोजा जा रहा है, अथवा हिन्दू और मुसलमान के बीच। मैं समझता हॅू कि यदि मारे गये आठो लोग मुसलमान नही होते तो यह हल्ला निश्चित रूप से कम होता । मेरे विचार मे यह भोपाल कांड भी संघ परिवार के हिन्दू एकत्रीकरण मे सहायक हो रहा है।

मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 2, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ही बौद्धिक व्यायाम के साथ भी संभव है। मैं चाहता हॅू कि मेरा व्यायाम भी बंद न हो। जो लोग मंथन में बहुत कमजोर होते है वे मुझसे प्रश्न करने में हिचकिचाते है । जो लोग बहुत मजबूत होते है वे मंथन में मेरे साथ शामिल होने में अपना अपमान समझते है। मुझे व्यायाम की जरुरत है। मैं चाहता हॅू कि आप चाहे मजबूत हो या कमजोर आपको इस व्यायाम के साथ जुडना चाहिए। जो विषय घोषित होता है उस पर आप अपने विस्तृत विचार एक सप्ताह तक भेज सकते है मैं भी उस विषय पर अपने विचार भेजॅूगा। एक सप्ताह तक आये हुये विचारों पर अगले एक सप्ताह तक प्रश्नोंत्तर होगा और उसके बाद विषय बंद हो जायेगा। अब तक विचार मंथन के लिए हमारे साथियों की सलाह पर विषयों की सूची बनी है जो नीचे लिखी गई है। आप लोगों के और सुझाव आने के बाद अन्य विषय भी जोडे जा सकते है।
मैं स्पष्ट कर दूॅ कि इस विचार मंथन का उद्देश्य कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना नहीं है। वह तो अपने आप निकलता रहेगा। साथ ही आपसे यह भी निवेदन है कि आपको बहुत महत्वपूर्ण उपयोगी साथी मानकर इस मंथन में जोडा गया है। इसमें आप अनावश्यक कुछ लिखकर अपनी क्षमता का तथा मंथन प्रक्रिया का नुकसान न करें। दिवाली की शुभकामनाएॅ या अन्य संदेश या सुचनाएॅ आपकी प्रतिष्ठा को कम करेगा क्योंकि यह एकमात्र मंथन कार्यक्रम है। इसका किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग ठीक नहीं। इस कार्यक्रम का किसी भी प्रकार के विचार प्रचार या कोई निष्कर्ष निकालने से कोई संबंध नहीं है। विपरीत विचारों के लोग खुलकर और स्वतंत्रतापूर्वक किसी मंच पर अपने विचार रख सके इतना ही इसका उद्देश्य है। आपसे मेरी यह अपेक्षा है कि आप कुछ अन्य उपयोगी साथियों के नाम और फोन नंम्बर भी भेजे, जो इस दिशा में उपयोगी हो सकते है। उन्हें भी इस योजना से जोडा जायेगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरे इस प्रयत्न में सहभागी होंगे।
अब तक सम्पन्न विषयों की सूची-
मंथन क्रमांक-1 समाज और राज्य मे अहिंसा और सत्य की समीक्षा
मंथन क्रमांक-2 बेरोजगारी
मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
मंथन क्रमांक-4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
मंथन क्रमांक-5 परिवार व्यवस्था
मंथन क्रमांक -6 जो वर्तमान में चल रहा है- महिला सशक्तिकरण कितना उचित?
प्रस्तावित विषयांे की सूची
आपराधिक
(1)चोरी,डकैती,लूट
(2)आतंकवाद और समाधान (क) नक्सलवाद (ख) मुस्लिम आतंकवाद (ग) आपराधिक आतंकवाद
(3) अपराध गैर कानूनी और अनैतिक का फर्क
(4)अपराध वृद्धि कारण और निवारण
(5)शोषण अपराध या अनैतिक
(6)मृत्युदण्ड समीक्षा-
(7)मिलावट कमतौल कितना अपराध कितना अनैतिक
(8)जालसाजी धोखाधडी
(9)पुलिस की अति सक्रियता
महिलाओं से जुड़ी
(1)बलात्कार
(2)महिला आरक्षण समस्या या समाधान
(3)कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना नाटक
(4)दहेज प्रथा
(5)महिला उत्पीडन समीक्षा
(6)महिला वर्ग या परिवार का अंग
(7)पर्दा प्रथा
(8)सती प्रथा
(9)परम्परागत या आधुनिक महिलाएॅ
(10) लिब-इन रिलेशनशीप
आर्थिक
(1)आर्थिक असमानता
(2) नई अर्थ नीति
(3)श्रम शोषण
(4)गरीबी रेखा
(5)मंहगाई भ्रम या यथार्थ
(6) सभी आर्थिक समस्याओं का एक आर्थिक समाधान
(7) स्वतंत्र अर्थपालिका
(8)ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
(9) प्राकृतिक उर्जा और कृत्रिम उर्जा
(10) हमारी आदर्श कर प्रणाली
(11 ) राजनैतिक व्यवस्था पर सम्पन्नों और बुद्धिजीवियों का एकाधिकार
(12) किसान आत्महत्या
(13) नरेगा
(14) आर्थिक मंदी
(15) सरकारीकरण निजीकरण समाजीकरण
(16) कर्मचारी आन्दोलन
चारित्रिक
(1)भ्रष्टाचार
(2)चरित्र पतन व्यक्तिगत या व्यवस्थागत
(3) चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन
(4) भावना या विचार
(5)ज्ञान यज्ञ का महत्व और तरीका
(6) भौतिक या नैतिक उन्नति
धार्मिक
(1)धर्म और सम्प्रदाय
(2)जाति और वर्ण व्यवस्था
(3)जातीय आरक्षण
(4)धार्मिक आरक्षण
(5) इस्लाम अब तक और आगे
(6)धर्म और संस्कृति
(7)साम्प्रदायिकता और धर्म
(8)गाय,गंगा,मंदिर,मुददे समस्या और समाधान
(9)संगठन कितना उचित कितना अनुचित
(10)भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति का फर्क
(11)आर्य समाज सर्वोदय संघ समीक्षा
(12)संघ इस्लाम और साम्यवाद की समीक्षा
(13)बाबरी मस्जिद राम मंदिर के मुददे और समाधान
(14) धर्मान्तरण
(15) हिन्दू धर्म और इस्लाम ,शाहरुक की पीडा
(16) आश्रमों में बलात्कार
(17) साम्प्रदायिक दंगे समस्या या मजबूरी
संवैधानिक
(1)भारतीय संविधान समीक्षा
(2)मूल अधिकार
(3)ग्राम सभा सशक्तिकरण
(4)राइट टू रिकाल
(5)व्यक्ति और नागरिक का फर्क
(6)नई संवैधानिक व्यवस्था का स्वरुप
(7)लोक ससद
(8)राज्य के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का फर्क
(9) स्वतंत्रता महत्वपूर्ण या समानता
(10) संविधान संशोधन
सामाजिक
(1)समाज तब और अब
(2)व्यक्ति,परिवार ,समाज
(3)संयुक्त परिवार व्यवस्था में बाधाएॅ और समाधान
(4)वर्ग विद्वेश या वर्ग समन्वय
(5)साहित्य और विचार का अंतर
(6)विवाह पद्धति ,प्रेम विवाह,समलैंगिकता
(7)व्यक्ति, धर्म,समाज और राज्य,
(8)समाज निर्माण और समाज सुरक्षा
(9) पर्यावरण और मानवाधिकारवादी
(10) क्षेत्रियता
(11) सामाजिक अव्यवस्था और समाधान
(12) भय का व्यापार
राजनैतिक
(1)तानाशाही, लोकतंत्र ,लोक स्वराज्य
(2)संसदीय लोकतंत्र या सहभागी लोकतंत्र
(3)पॅूजीवाद,समाजवाद,साम्यवाद
(4)व्यवस्था परिवर्तन क्यों,क्या,कैसे
(5) समान नागरिक संहिता
(6) ग्राम स्वराज्य
(7) नरेन्द्र मोदी
(8) हिन्दू कोड बिल
(9) ग्लोबल वार्मिंग
(10) भारतीय राजनीति और लोकतंत्र
(11) राजनीति में अच्छे लोग
(12) मतदान
(13) गाय की रोटी कुत्ता खाये
न्यायिक
(1)न्यायिक प्रक्रिया कितनी उचित कितनी अनुचित
(2) पुलिस और न्यायालय के संबंधो की समीक्षा
(3) न्यायिक सक्रियता
(4) न्याय और व्यवस्था
अन्य
(1)हिंसा या अहिंसा
(2)गॉधी मार्क्स,अम्बेडकर
(3)गॉधी,भगतसिंह,सुभाष चंद्रबोस
(4)गॉधी और गोड्से
(5)नेहरु पटेल अम्बेडकर
(6)भारत का विभाजन भूल या मजबूरी
(7) कश्मीर समस्या
(8) चिंतन महत्वपूर्ण या क्रिया
(9)ज्ञान, शिक्षा और श्रम का महत्व
(10)भाषा कितनी वैचारिक कितनी भावनात्मक
(11)समीक्षा,आलोचना,विरोध,और संघर्ष का अंतर
(12)अमेरिका हमारा प्रतिद्वंदी, विरोधी या शत्रु
(13)दान चंदा और भीख का फर्क
(14)उपदेश , प्रवचन,भाषण और शिक्षा का फर्क
(15)स्वदेशी का प्रचार कितना आवश्यक
(16)सुख और दुख की उत्पत्ति
(17)भूत,प्रेत,तंत्र,मंत्र कितना भ्रम कितना वास्तविक
(18)निष्कर्ष निकालने में परिभाषाओं का महत्व
(19)समस्याओं के समाधान में हमारी प्राथमिकताएॅ
(20)शराफत,समझदारी, और धूर्तता में फर्क
(21)प्रशंसा , समर्थन, सहयोग, सहभागिता में अंतर
(22) आरक्षण
(23)शिक्षा सरकारी या शासन मुक्त
(24) बाबा रामदेव
(25) विकेन्द्रीयकरण या अकेन्द्रीयकरण
(26) कर्तव्य और अधिकार
(27) बालश्रम कानून
(28) विश्वस्तरीय समस्यायें
(29) गुटनिरपेक्षता
(30) मीडिया
(31) एन जी ओ

मंथन क्यों? बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on October 31, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भावना और बुद्धि का संतुलन आदर्श स्थिति मानी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये भी यह संतुलन आवश्यक है तथा समाज के लिये भी। भावना त्याग प्रधान होती है तो बुद्धि ज्ञान प्रधान। भावना की अधिकता मूर्खता की दिशा मे ले जाती है तो बुद्धि की अधिकता धूर्तता की ओर। भावना की अधिकता असफलता की ओर ले जाती है तो बुद्धि की अधिकता सफलता की ओर। वर्तमान समय मे यह संतुलन गडबड हो गया है । भावना प्रधान व्यक्तियों की संख्या बढती जा रही है जिसका दुरूपयोग मुठठी भर धूर्त कर रहे हैं । भारत मे तो यह असंतुलन बहुत ही अधिक हो गया है । पुराने जमाने मे भारत विचारो का निर्यात करता था। दुर्भाग्य है कि आज भारत पष्चिम के विचारो की नकल करने को वाध्य है । भारत मे भी हर धूर्त प्रयत्न शील है कि आम लोगो मे भावनाएं बढती रहें जिससे धूर्तो की दुकानदारी चलती रहे । परिस्थिति चिन्ताजनक है।
बाबा रामदेव ने योग के माध्यम से दुनिया को शारीरिक व्यायाम की प्रेरणा दी । स्पष्ट है कि बाबा रामदेव के प्रयत्नो ने स्वास्थ की दिशा मे पर्याप्त सुधार किया है। दुनिया धीरे धीरे योग का आयात कर रही है। किन्तु पूरे विश्व मे वर्तमान समय मे बौद्धिक व्यायाम का कोई व्यवस्थित प्रयास नही हो रहा । भावनात्मक विकास की दुकाने तो आपको भारत मे भी गली गली मे खुली मिल जायेगी किन्तु बौद्धिक व्यायाम के लिये आपके पास कोई विकल्प नही है जबकि बौद्धिक व्यायाम के अभाव मे आमलोग इसी तरह ठगे जाते रहेगे जैसे आज।
मैने स्वयं करीब साठ वर्ष पूर्व सन पचपन मे मंथन नाम से बौद्धिक व्यायाम शुरू किया था। साठ वर्षो के प्रयत्नो से प्राप्त परिणामो से मै पूरी तरह संतुष्ट हॅू। मै यह दावा करने की स्थिति मे हॅू कि मै अपने जीवन मे सामान्यतया कभी आसानी से ठगा नही गया। मेरे परिवार के सदस्यों तथा निकट के मित्रो पर भी ऐसे बौद्धिक व्यायाम का आंषिक परिणाम देखा जा सकता है। मुझे महसूस होता है कि बौद्धिक व्यायाम प्रणाली का विस्तार भी समाज के लिये उतना ही लाभदायक है जितना बाबा रामदेव का शारीरिक व्यायाम। मै अपने सीमित संसाधनो द्वारा ज्ञानतत्व पाक्षिक के माध्यम से इस व्यायाम को विस्तार देने मे सक्रिय रहा। किन्तु अब जिस तरह आधुनिक संचार माध्यमों ने सुविधा प्रदान की है, उस आधार पर मै समझता हॅू कि सोशल मीडिया का लाभ उठाकर बौद्धिक व्यायाम की गति इतनी बढाई जा सकती है कि हम इस व्यायाम की पद्धति का भारत से भी आगे निर्यात कर सके। मै सन पचपन मे आर्य समाज से जुडा । मैने देखा कि आर्य समाज भी धीरे धीरे विचार मंथन की दिशा छोडकर विचार प्रचार की दिषा मे बढ रहा है जो अप्रत्यक्ष रूप से भावनाओं का ही विस्तार है। मै आर्य समाज के उपेक्षित स्वरूप ‘‘विचार मंथन‘‘ की दिशा मे बढा। प्रत्येक माह की तीस तारीख को अपने शहर के प्रबुद्ध लोगो की एक खुली बैठक होती थी । इस बैठक का एक पूर्व निश्चित विषय होता था तथा उस विषय पर सब लोग स्वतंत्रता पूर्वक अपने विचार रखते थे। प्रयत्न किया जाता था कि विपरीत विचारो के लोग उस मंच पर आकर विपरीत विचार प्रस्तुत करें। गलत बात बोलने की सबको स्वतंत्रता थी किन्तु भाषा गलत नही होनी चाहिये। मंथन का प्रारंभ किसी आधे घंटे के धार्मिक आयोजन से होता था जिसमे आमतौर पर तो यज्ञ होता था किन्तु किसी मुसलमान या अन्य धर्मावलम्बी के घर मे कार्यक्रम हुआ तो कुरान पाठ या अन्य धार्मिक रूप भी होता था। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह था कि उस कार्यक्रम मे कोई निष्कर्ष निकालने पर पूरी तरह रोक थी। कोई प्रस्ताव पारित नही हो सकता था न ही प्रस्ताव पर चर्चा संभव थी। श्र्रोता अलग अलग विचार सुनकर स्वतंत्र धारणा बना सकते थे । विषय सब तरह के होते थे, किसी एक तरह के नही। मै स्वयं बाद मे जनसंध से जुड गया किन्तु यह मंथन कार्यक्रम धर्म जाति राजनीति अमीर गरीब महिला पुरूष का कोई भेद नही करता था। कांग्रेसी जनसंघी साम्यवादी हिन्दू मुसलमान बडे अफसर व्यापारी मजदूर यहां तक हिंसक प्रवृत्ति के नक्सलवादी भी वहां स्वतंत्रता पूर्वक आते थे तथा अपना विचार रखते थे । इस तरह यह कार्यक्रम निरंतर चलता रहा। आज भी मेरे न रहने के बाद भी यह कार्यक्रम चल रहा है।
नोट- कल का विषय होगा- आप बौद्धिक व्यायाम कैसे कर सकते है? आप इसमे मेरी क्या सहायता कर सकते है ? मै आपकी क्या सहायता कर सकता हॅू। सोशल मीडिया का किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है । इसी तरह पुूरी योजना पर कल परसो तक व्यापक विचार मंथन आपको जाता रहेगा । आप अपनी प्रतिक्रिया सुझाव प्रश्न भेज सकते है।

मंथन क्रमांक- 4 की समीक्षा

Posted By: kaashindia on October 26, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

आचार्य पंकज,वाराणसी,उ0प्र0
प्रश्न -मंथन क्रमांक 4 में विश्व की प्रमुख समस्याओं की विस्तृत चर्चा करते समय आपने आतंकवाद को शामिल नहीं किया,जबकि आतंकवाद भी एक बहुत बडी समस्या हंै। आप इस संबंध में स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः-आतंकवाद पूरे विश्व की सबसे बडी समस्या के रुप में दिखता है किन्तु आतंकवाद उपर लिखी नौ समस्याओं का परिणाम है,कारण नहीं। यदि कोई बीमारी किसी कारण विशेष से होती है तो बीमारी को तत्काल रोकना उस बीमारी का समाधान न होकर, एक अल्पकालिक प्रयास होता है। यदि आतंकवाद को रोक भी लिया गया तो उपरोक्त नौ समस्याएॅ नहीं सुलझ जायेगी। किन्तु यदि नौ समस्याओं का समाधान हो जाये तो आतंकवाद पैदा ही नहीं होगा या अपने आप समाप्त हो जायेगा। दूसरी बात यह भी है कि इन नौ समस्याओं का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर पडता है। जबकि आतंकवाद का प्रभाव उस देश तक सीमित व्यक्तियों तक पडता है जो उस आतंकवाद की चपेट में रहते हैं। इसलिए मैंने आतंकवाद को प्रमुख समस्या न मानकर आतंकवाद सरीखी अनेक समस्याओं की जड को खोजने का प्रयास किया है। आप विचार करिये कि यदि-
(1) विचार प्रचार के स्थान पर विचार मंथन प्रभावी हो जाये ।
(2) लोक और तंत्र के बीच दूरी घट जाये तथा लोक नियुक्त तंत्र की जगह लोक नियंत्रित तंत्र हो जाये।
(3)राजनीति,धर्म और समाज सेवा का व्यापार बंद हो जाये।
(4)किसी व्यक्ति की योग्यता के आधार पर उसका टेस्ट लेकर उसे भौतिक पहचान देने की व्यवस्था हो।
(5) वर्ग विद्वेष, वर्ग समन्वय में बदल जाये।
(6)तंत्र सुरक्षा और न्याय को अपना दायित्व समझे तथा जनकल्याणकारी कार्यो में हस्तक्षेप बंद कर दे।
(7)लोक अपने को सुरक्षित महसूस करें तथा उसे कभी बल प्रयोग की आवश्यकता ही न पडे।
(8)व्यक्ति अपनी सीमायें समझे,और स्वार्थ भाव से मुक्त हो।
(9) धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हो जाये।
यदि इन नौ दिशाओं में बढना शुरु कर दिया जाये तो आतंकवाद रहेगा ही नहीं और यदि कहीं पर रहेगा भी तो नियंत्रित हो जायेगा। मेरा तो यह भी मानना है कि यदि दुनिया की शासन व्यवस्था में एक विश्व सरकार बनने की भी पहल हो जाये तो आतंकवाद रुक सकता है।

मंथन क्रमांक- 4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान

Posted By: kaashindia on October 23, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बीच की दूरी बहुत तेजी से बढ़ रही है किन्तु समुचे विश्व में भी दूरी बढती ही जा रही है, भले ही इसकी गति कम ही क्यों न हो। सारे विश्व में जितनी हत्याएॅ या अन्य अपराध अपराधियों के द्वारा हो रहे हंै,उससे कई गुना अधिक धर्म अथवा राज्य व्यवस्थाओं के आपसी टकराव से हो रहे हंै। मानवता की सुरक्षा के नाम पर जितनी सुरक्षा हो रही है उससे कई गुना ज्यादा मानवता का हनन हो रहा है। वैसे तो सम्पूर्ण विश्व में अनेक प्राकृतिक सामाजिक राजनैतिक समस्याएॅ व्याप्त हैं किन्तु उन सब में भी कुछ महत्वपूर्ण समस्याएॅ चिन्हित की गई हंै जिनके समाधान का कोई मार्ग खोजना आवश्यक है। मैं स्पष्ट कर दॅू कि पिछले कई दशकों से ये समस्याएॅ सम्पूर्ण विश्व में बढी ही है तथा लगातार बढती जा रही है-
(1)निष्कर्ष निकालने में विचार मंथन की जगह प्रचार का अधिक प्रभावकारी होना।
(2)संचालक और संचालित के बीच बढती दूरी ।
(3)राजनीति, धर्म और समाज सेवा का व्यवसायीकरण।
(4)भौतिक पहचान का संकट।
(5)समाज का टूटकर वर्गो में बदलना।
(6)राज्य द्वारा दायित्व और कर्तव्य की परिभाषाओं को विकृत करना।
(7)मानव स्वभाव तापवृद्धि।
(8) मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि।
(9)धर्म और विज्ञान के बीच बढती दूरी।
1)आज सम्पूर्ण विश्व मंे प्रचार करने की होड़ मची हुई है। अनेक असत्य सत्य के समान स्थापित हो गये है, तथा लगातार होते जा रहे है। भावनाओं का विस्तार किया जा रहा है तथा विचार मंथन को कमजोर या किनारे किया जा रहा है। विचार मंथन तथा विचारकों का अभाव हो गया है और प्रचार के माध्यम से तर्क को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। संसद तक मंे विचार मंथन का वातावरण नहीं दिखता। कभी कभी तो संसद में भी बल प्रयोग की स्थिति पैदा होने लगी है। इसके समाधान के लिए उचित होगा कि विचार, शक्ति, व्यवसाय और श्रम के आधार पर योग्यता रखने वालो को बचपन से ही अलग अलग प्रशिक्षण देने की व्यवस्था हो। प्रवृत्ति और क्षमता का अलग अलग टेस्ट हो। विधायिका, अनुसंधान आदि के क्षेत्र विचारको के लिए आरक्षित कर दिया जाये।
(2)सारी दुनिया मंे राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन बिगडता जा रहा है। समाज के आंतरिक मामलों में भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। परिवार, गाॅव की आतंरिक व्यवस्था में भी राज्य निरंतर हस्तक्षेप करने का अधिकार अपने पास समेट रहा है। लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदलकर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित की जा रही है। संविधान तंत्र और लोक के बीच पुल का काम करता है किन्तु संविधान संशोधन में भी तंत्र निरंतर लोक को बाहर करता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में मेरा सुझाव है कि लोकतंत्र की जगह सम्पूर्ण विश्व में लोक स्वराज्य की दिशा में बढा जाये। लोक स्वराज्य लोक और तंत्र के बीच बढती दूरी को कम करने में बहुत सहायक हो सकता है। इस कार्य के लिए सबसे पहला कदम यह उठना चाहिए कि किसी भी देश का संविधान तंत्र अकेले ही संशोधित न कर सके। या तो लोक द्वारा बनाई गई किसी अलग व्यवस्था से संशोधित हो अथवा दोनो की सहमति अनिवार्य हो। उसके साथ साथ परिवार तथा स्थानीय इकाईयों को भी सम्प्रभुता सम्पन्न मानने के बाद कुुछ थोडे से महत्वपूर्ण अधिकार तंत्र के पास रहने चाहिए।
(3)सारी दुनिया में समाज व्यवस्था की जगह पॅूजीवाद का विस्तार हो रहा है। प्राचीन समय में विचारकों और समाज सेवियों को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था,राजनेताओं से भी उपर। किन्तु वर्तमान समय में विचारको और समाज सेवियों का अभाव हो गया है। यहाॅ तक कि धर्मगुरु,समाज सेवी राजनेता सभी किसी न किसी रुप में धन बटोरने में लग गये है। समाज सेवा के नाम पर एन जी ओ के बोर्ड लगाकर धन इकटठा किया जा रहा है। सारी दुनिया के राजनेताओं मंे धन संग्रह की प्रवृत्ति बढती जा रही है। इस बढती जा रही समस्या के समाधान के लिए हमें यह प्र्रयत्न करना चाहिए कि सम्मान,शक्ति,सुविधा कही भी एक जगह किसी भी रुप में इक्टठी न हो जाये। जो व्यक्ति इच्छा और क्षमता रखता है, वह सम्मान शक्ति और सुविधा मंे से किसी एक का चयन कर ले किन्तु यह आवश्यक है कि उसे अन्य दो की इच्छा त्यागनी होगी।इन तीनों के बीच खुली और स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा हो सकती है। किन्तु श्रमजीवियों को मूलभूत आवश्यकताओं की गारण्टी व्यवस्था दे। यह व्यवस्था कुछ कठिन अवश्य है किन्तु इसके अतिरिक्त कोई अन्य समाधान नहीं है।
(4)प्राचीन समय में गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वर्ण व्यवस्था बनाकर व्यक्तियों की अलग अलग पहचान बनाई गई थी। यह पहचान यज्ञोपवीत के माध्यम से अलग अलग होती थी। संन्यासियों के लिए भी अलग वेशभूषा का प्रावधान था। विवाहित,अविवाहित की भी पहचान अलग थी। यहाॅ तक कि समाज बहिष्कृत लोगों को भी अलग से पहचाना जा सकता था। दुनिया के अनेक देशो में अधिवक्ता,पुलिस,न्यायाधीश आदि की भी ऐसी अलग अलग पहचान होती थी कि कोई अन्य भ्रम में न पड़ सके। यदि बिना किसी व्यवस्था के इस प्रकार की नकली पहचान सुविधाजनक हो जाये तो अव्यवस्था फैलना स्वाभाविक है। वर्तमान समय में धीरे धीरे ये ही हो रहा है। अब विद्वान, संन्यासी ,फकीर, समाज सेवी बिना किसी योग्यता और परीक्षा के नकली पहचान बनाने में सफल हो जा रहे है। एन जी ओ का बोर्ड लगाकर कोई मानवाधिकारी हो जा रहा है, तो कोई पर्यावरणवादी जिनका दूर दूर तक न मानवाधिकार से कोई संबंध है, न ही पर्यावरण से। ऐसे लोग व्यवस्था को ब्लैकमेल भी करने लगे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए ऐसी पहचान को तब तक प्रतिबंधित कर देना चाहिए जब तक कि उसने किसी स्थापित व्यवस्था से प्रमाण पत्र प्राप्त न किया हो,साथ ही नकली प्रमाण पत्रों पर भी कठोर दण्ड की व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए।
(5)पूरे विश्व में वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष,वर्ग संघर्ष की आंधी चल रही है। वर्ग समन्वय लगातार टूट रहा है तथा वर्ग विद्वेष बढ़ रहा है। प्रवृत्ति कि आधार पर दो ही वर्ग हो सकते है-(1) शरीफ (2) बदमाश । इस सामाजिक वर्ग निर्माण की जगह धर्म-जाति, भाषा, राष्ट्र, उम्र,लिंग, गरीब-अमीर,किसान-मजदूर ,गाॅव-शहर जैसे अन्य अनेक वर्ग बन रहे है तथा बनाये जा रहे है। बिल्लयों के बीच बंदर के समान हमारी शासन व्यवस्था वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष के माध्यम से समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके अपने को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। यह प्रयास बहुत घातक है। समाज को चाहिए कि वह प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार के वर्ग निर्माण को तत्काल अवांछित घोषित कर दे। साथ ही वर्तमान समय में बन चुके वर्गो में भी वर्ग समन्वय की भावना विकसित की जाये।
(6)प्राकृतिक रुप से दो ही कार्य करने आवश्यक होते है-(1) व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा तथा (2) व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग। राज्य का दायित्व होता है कि वह व्यक्ति की न्याय और सुरक्षा के माध्यम से स्वतंत्रता को सुरक्षित करे। समाज का दायित्व होता है कि वह व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग दे। पूरी दुनिया में राज्य दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का अंतर या तो भूल गया अथवा जानबूझकर भूलने का नाटक कर रहा है। जनकल्याणकारी कार्य राज्य के स्वैच्छिक कर्तव्य होते है,दायित्व नहीं। राज्य समाज को गुलाम बनाकर रखने के उद्देश्य से जनकल्याणकारी कार्यो को अपने दायित्व घोषित करता है। इस भ्रम निर्माण से सुरक्षा और न्याय पर भी विपरीत प्रभाव पडता है। सुरक्षा और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार होता है जबकि राज्य द्वारा दी गई अन्य सुविधायें व्यक्ति का अधिकार नहीं होता किन्तु राज्य द्वारा जनकल्याणकारी कार्यो को अपना दायित्व मान लेने से आम नागरिक इन सुविधाआंे को अपना अधिकार समझने लगते है। इस भ्रम के कारण ही समाज में अनेक टकराव उत्पन्न हो रहे है। आम लोग राज्य के मुखापेक्षी हो गये है। क्योंकि सुविधा लेना प्रत्येक व्यक्ति ने अपना अधिकार मान लिया है।
समाधान के लिए राज्य को सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो जाना चाहिए। जनकल्याण के अन्य कार्य राज्य अतिरिक्त कर्तव्य के रुप में चाहे तो कर सकता है किन्तु यह उसका दायित्व नहीं होगा और न ही राज्य उसके लिए समाज पर कोई बाध्यकारी टैक्स लगा सकता है।
(7) लगातार मानव स्वभाव आवेश,हिंसा,प्रति हिंसा की दिशा में बढ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का वास्तविक आशय मानवस्वभाव तापवृद्धि होता है जो पूरी दुनिया में बढ रहा है। किन्तु हम मानव स्वभाव तापवृद्धि के स्थान पर पर्यावरणीय तापवृद्धि को अधिक महत्व दे रहे है। पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए किन्तु मानव स्वभाव को तापवृद्धि की तुलना में पर्यावरण को अधिक महत्वपूर्ण मानना गलत है। इस तापवृद्धि के कारण सारी दुनिया में हिंसक टकराव बढ रहे है। पश्चिमी जगत ऐसे टकरावों से अपने आर्थिक लाभ उठाकर संतुष्ट हो जाता है। इस समस्या के समाधान के लिए हमें चाहिए कि सुरक्षा और न्याय के अतिरिक्त अन्य सारी व्यवस्था राज्य से लेकर परिवार,गाॅव,जिला,प्रदेश तथा केन्द्रिय समाज तक बांट दी जावें। इससे राज्य सफलतापूर्वक न्याय और सुरक्षा को संचालित कर सकेगा, तथा अन्य कार्य भी सामाजिक ईकाइयाॅ राज्य मुक्त अवस्था में ठीक से कर पायेंगी।
(8)सम्पूर्ण विश्व में मानव स्वभाव में स्वार्थ बढ रहा है। स्वार्थ के कारण अनेक प्रकार के टकराव बढ रहे है। स्वार्थ के दुष्प्रभाव से ही परिवार व्यवस्था भी छिन्न भिन्न हो रही है तथा समाज व्यवस्था में भी लगातार टूटन आ रही है। स्वार्थ लगातार मानव स्वभाव में बढता जा रहा है। कमजोरों का शोषण आम बात हो गई है। आमतौर पर व्यक्ति अपने मानवीय कर्तव्यों को भी भूल रहा है। स्वार्थ के कारण ही सम्पत्ति के झगडे पैदा हो रहे है।
मानव स्वभाव में स्वार्थ के बढने का महत्वपूर्ण कारण है पश्चिम का सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार। अभी तक सम्पत्ति की तीन व्यवस्थाएॅ मानी गई है-(1) व्यक्तिगत सम्पत्ति (2) सार्वजनिक सम्पत्ति जो साम्यवाद का सिद्धांत है तथा असफल हो चुका है। (3) गाॅधी जी का ट्रस्टीशिप जो अभी तक अस्पष्ट है। यही कारण है कि व्यक्तिगत सम्पत्ति का सिद्धांत लगातार बढ रहा है। इस समस्या का समाधान संभव है। व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा ट्रस्टीशिप को मिलाकर एक नया सिद्धांत बना है जिसमें सम्पत्ति परिवार की मानी जायेगी तथा परिवार में रहते हुए व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का ट्रस्टी मात्र होगा,मालिक नहीं। इस संशोधन से स्वार्थ वृद्धि पर अंकुश लगना संभव है।
(9)धर्म और विज्ञान के बीच भी दूरी लगातार बढती जा रही है। जब से धर्म ने गुणात्मक स्वरुप छोडकर संगठनात्मक स्वरुप ग्रहण किया है तब से उसमें लगातार रुढिवाद बढता जा रहा है। रुढिवाद धर्म को विज्ञान से बहुत दूर ले जाता है। रुढिवाद के कारण ही भावनाओं का विस्तार होता है तथा विचार शक्ति घटती है। जबकि विज्ञान विचार के माध्यम से निष्कर्ष निकालता है तथा गलत को सुधारने की प्रक्रिया मेें लगा रहता है। इसके कारण भी पूरे विश्व में अनेक समस्याएॅ पैदा हो रही है। पहले तो इस्लाम ही रुढिवाद का एकमात्र पोषक था किन्तु अब तो धीरे धीरे यह बीमारी हिन्दुओं में भी बढती जा रही है।
इसके समाधान के लिए रुढिवाद की जगह यथार्थवाद को प्रोत्साहित करना होगा। यथार्थवाद और विज्ञान के बीच तालमेल होने से इस समस्या का समाधान संभव है।
उपरोक्त नौ समस्याओं के अतिरिक्त भी समाज में अनेक समस्याएॅ व्याप्त है जो परिवार से लेकर सारे विश्व तक को प्रभावित करती है किन्तु मैंने उनमें से कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं को इंगित करके समाधान का प्रयास किया है। समाधान में से भी कई बाते एक दूसरे से जुडी हुई है। लोकतंत्र की जगह लोकस्वराज्य ,व्यक्तिगत सम्पत्ति की जगह पारिवारिक सम्पत्ति,परम्परागत परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था,जन्मना वर्ण व्यवस्था की जगह प्रवृत्ति अनुसार वर्ण व्यवस्था तथा संविधान संशोधन के असीम अधिकारों को संसद से निकालना जैसे कुछ महत्वपूर्ण सुधार विश्व समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकते है।

मंथन क्रमांक-3 की समीक्षा

Posted By: kaashindia on October 21, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

ओम प्रकाश दुबे, नोएडा

1 प्रश्न- गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व मे क्या फर्क है?
उत्तर-गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व का आशय एक ही है किन्तु गुणात्मक हिन्दुत्व और संगठनात्मक हिन्दुत्व अलग अलग होते हैं। दुनिया मे हिन्दू एक मात्र समूह है जो मूलतः किसी भी रूप मे संगठन पर विश्वास नही करता। दूसरी ओर इस्लाम अकेला समूह है जो सिर्फ संगठन पर ही विश्वास करता है। गांधी, आर्य समाज, गायत्री परिवार आदि की सोच धार्मिक कही जा सकती है। इनकी धर्म की व्याख्या गुण प्रधान है। संघ परिवार इस्लाम साम्यवाद की सोच संगठनात्मक है, धार्मिक नहीं। इनकी व्याख्या पहचान प्रधान होती है। गांधी ,आर्य समाज, गायत्री परिवार आदि हिन्दुत्व की पहचान जीवन पद्धति से मानते हंै जिसमे सहजीवन, सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम का भाव महत्वपूर्ण रहता है; अहिंसा और सत्य को महत्वपूर्ण माना जाता है; दूसरी ओर संगठनात्मक हिन्दुत्व मे चोटी धोती गाय गंगा मंदिर को अन्य गुणो की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। गुणात्मक हिन्दुत्व का नेतृत्व ब्राम्हण प्रवृत्ति प्रधान विचारको के हाथ मे होता है तो संगठनात्मक हिन्दुत्व का नेतृत्व क्षत्रिय प्रवृत्ति प्रधान राजनेताओ के हाथ मे। गुणात्मक हिन्दुत्व संख्या विस्तार को महत्वहीन मानता है, तो संगठनात्मक हिन्दुत्व संख्या विस्तार को पहली प्राथमिकता मानता है।

2 प्रश्न आजादी के बाद संघ का राजनीति मे आने का उद्देश्य मुसलमानो को रोकना मात्र था या कुछ और?
उत्तर- संस्था हमेशा समाज के साथ जुडकर रहना चाहती है और संगठन हमेशा सत्ता के साथ जुडकर। संघ एक संगठन है संस्था नही। संघ उग्रवादी विचारो का रहा है आतंकवादी नहीं । किन्तु उग्रवादी विचारो मे से आतंकवाद पैदा होता है । प्रारंभ मे यदि आतंकवाद को उग्रवाद ने नही रोका तो वही उग्रवाद का काल बन जाता है । ऐसा ही साम्यवाद के साथ हुआ है, ऐसा ही इस्लाम के साथ हो रहा है तथा ऐसा ही संध के साथ भी होना संभव है। स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान बंट चुका था तब कोई कारण नही था कि स्वतंत्र भारत मे गांधी का इतना विरोध हो किन्तु संघ परिवार, जिसकी सदस्य हिन्दू महा सभा भी थी, इन सबने मिलकर स्वतंत्रता पूर्व गांधी की ऐसी विपरीत छवि बना दी थी की वे इतने कम समय मे उन धारणा को बदल नही सके। मेरे विचार से संघ और हिन्दू महासभा की कार्य प्रणाली अलग अलग थी । संभव है कि गांधी हत्या मे हिन्दू महासभा की कार्य प्रणाली का समावेष हो। आज भी दोनो की कार्यप्रणाली मे फर्क देखा जा सकता है।
स्वतंत्रता के बाद भी यदि संघ ने गांधी का विरोध जारी रखा होगा तो वह विरोध राजनैतिक कारणो से हो सकता है, इस्लाम समर्थन के कारण नही क्योकि पाकिस्तान बंट चुका था। इस्लाम उस समय भारत की प्रमुख समस्या नही था। गांधी संघ के राजनैतिक प्रतिद्वंदी कभी नहीं थे किन्तु नेहरू संघ के प्रतिद्वदी रहे और नेहरू जी गांधी जी की छत्र छाया मे ही थे । मै नही कह सकता कि संध नेतृत्व की वास्तविक सोच क्या रही होगी।

राहुल शर्मा मुरैना म0प्र0
2 प्रश्न- यदि मोदी जी दो हजार उन्नीस के पूर्व संघ परिवार को नाराज कर दंे तो चुनावों पर क्या प्रभाव पड सकता है?
उत्तर-संघ परिवार और इस्लाम की कार्य प्रणाली लगभग एक समान है। ये कभी भी किसी मजबूत शक्ति के विरूद्ध एक जुट हो सकते है। वर्तमान समय मे नरेन्द्र मोदी को कई अलग अलग ताकतो से लडना है। मोदी विरोधी मुहबाये खडे हंै कि कोई उनके साथ आ जाये, भले ही वह राष्ट विरोधी या समाज विरोधी ही क्यो न हो । इनमे से कई लोग तो पाकिस्तान तक की वफादारी करते देखे जा सकते हैं, साम्प्रदायिक मुसलमानो की चापलूसी मे तो सभी एक दूसरे को पछाडने में लगे ही है। ऐसे अवसर पर न तो नरेन्द्र मोदी संघ को नाराज करना चाहेंगे न ही ऐसा करना उचित है। इसलिए नरेन्द्र मोदी जी के लिए यही उचित होगा कि पहले अपराध वाद, परिवारवाद, साम्यवाद और मुस्लिम आतंकवाद को निपटा ले उसके बाद जैसी परिस्थिति होगी वैसा कदम उठाना चाहिए।

डी सी सरण शिमला
3 प्रश्न-संघ परिवार की सबसे बडी कमी है कि भारत की तीन जातियों को छोडकर लगभग 95 प्रतिशत लोगो को संध यह विश्वास कभी नही दिला पाया कि यह संगठन आपका है। आप कही भी सर्वे कर ले तो आपको यह सच्चाई मिल जाएगी।
उत्तरः- मेरे विचार में संघ एक साम्प्रदायिक संगठन है, जातिवादी नहीं। संघ हिन्दु परिवार की जातियों के टकराव के विरुद्ध है। यह अलग बात है कि वह हिन्दू समाज के अंदर व्याप्त उच नीच छूआ छूत गरीब अमीर के भेद भाव दूर करने जैसे सामाजिक कार्य को कम महत्व देकर इस्लाम से टकराव को अधिक महत्व देता है। इस्लाम और साम्यवाद हिन्दू धर्म के अंतर्गत भेद भाव उच नीच को अधिक हाइलाइट करके इसे मुख्य मुददा बनाते है। भाजपा को छोडकर अन्य राजनैजिक दलो को यह अंदर तक विश्वास हो गया कि हिन्दू कभी संगठित नही हो सकता जबकि मुसलमान तो जन्म से मृत्यु तक संगठित ही रहता है। यही कारण है कि सभी राजनैतिक दलो ने मुसलमानो और साम्यवादियो को इतना सिर पर चढा लिया कि आज संघ परिवार के समर्थन से मोदी सरकार चल रही है। यह सही है कि कभी भी संघ को हिन्दूओ का व्यापक समर्थन नही मिला किन्तु वह भी सही है कि लाचारी मे हिन्दूओ को संध समर्थन का जहर का घूट पीना पडा और आज यह समर्थन निरंतर बढता ही जा रहा है।

सोनू देवरानी दिल्ली
4 प्रश्न-संघ परिवार ,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार अंततः समाज सशक्तिकरण मे ही लगे हुए है और भविष्य में भी लगे रहेंगे। क्या तीनो एक साथ आ सकते है।
उत्तर- शरीफ लोग कभी स्वयं संचालित नहीं होते। शराफत के कंधे पर ही चढकर धूर्तता आगे बढती है। ये तीनों शरीफ प्रवृत्ति के है जिसके परिणाम स्वरुप तीनों ही कुछ चालाक लोगो के हाथों में खेलते रहते है। संघ परिवार तो किसी अन्य के हाथों में न खेलकर स्वयं ही राजनैतिक मोह जाल में फसा हुआ है । आर्य समाज स्वामी अग्निवेश के चक्रव्यूह से नही निकल पा रहा। सर्वोदय परिवार भी साम्यवाद और इस्लामिक कटटरवाद के चंगुल में अंदर तक फसा हुआ है। ऐसी स्थिति में तीनो के एक साथ आने की संभावना न के बराबर है। मैंने कुछ प्रयत्न किया था किन्तु संघ परिवार और सर्वोदय के लोगो ने अस्वीकार कर दिया।
संघ परिवार युद्ध उन्मादी प्रवृत्ति का माना जाता है तो सर्वोदय परिवार कायरों की जमात। न हेडगेवार कभी युद्ध उन्मादी रहे न ही गाॅधी कभी कायर प्रवृत्ति के। लेकिन दोनों के जाने के बाद दोनों की दिशा बदल गयी।

सुरेश कुमार नोएडा
5 प्रश्न-क्या संध के अतिरिक्त विश्व पर इस्लामिक खतरे को लेकर कोई अन्य संगठन भी चिंतित है? इस्लाम के मानव विरोधी चरित्र को रोकने का उपाय क्या है? हम संध का आंख मुदकर समर्थन क्यो न करे।
उत्तर- जिस समय संघ की स्थापना हुई थी उस समय भारत मे इस्लाम सर्वाधिक खतरनाक माना जाता था। संध का निर्णय समयोचित था। यदि मै भी होता तो हो सकता है कि मै उस निर्णय का समर्थन करता। किन्तु बहुत बाद मे जब स्वतंत्रता संघर्ष चरम पर था तब संध को अल्प काल के लिये अपनी योजना को स्थगित करना चाहिये था। संध की कार्य प्रणाली अस्पष्ट है, नीयत नही । संध को चार पांच प्रश्नों पर विचार करना चाहिये। 1 संघ राष्ट और हिन्दुत्व का घालमेल क्यो करता है? धर्म प्रमुख है या राष्ट यह बात साफ होनी चाहिये। 2 मनुष्य के प्राकृतिक अर्थात मौलिक अधिकारो के विषय मे संघ की नीति क्या है? 3 संघ इस्लाम को भारत तक के लिये खतरनाक मानता है या विश्व स्तर के लिये? 4 सारी दुनियां मे इस्लाम एक बडा शक्ति शाली संगठन है। संघ सिर्फ शक्ति प्रयोग तक ही उसका समाधान सोचता है अथवा साम दाम और भेद का उपयोग भी आवश्यक मानता है। 5 संघ हिन्दूत्व के मूल तत्व सहजीवन धर्म निरपेक्षता वसुधैव कुटुम्बकम सर्व धर्म समभाव तथा गाय गंगा मंदिर आदि मे से किसे अधिक महत्वपूर्ण मानता है।
मैरे विचार से संघ यदि मिल बैठकर इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर खोज ले तो संघ इस्लाम का एक उपयुक्त समाधान हो सकता है।

अन्य प्रश्न
1 प्रश्न- क्या मुस्लिम राजाओ का इतिहास इतना कलंकित रहा है कि उन्हे राष्ट्रीय गुलामी की तुलना मे अधिक महत्वपूर्ण खतरा माना जाय?
उत्तर- अधिकंाश मुस्लिम राजाओ का इतिहास उससे भी अधिक कलंकित रहा है जो सीमा हम समझते है। पुराना इतिहास क्या रहा उसे तो भूल जाइये किन्तु वर्तमान मे भी पाकिस्तान मे इश निंदा के लिये पत्थर मारने का रिवाज और फांसी देने का कानूनी प्रावधान यह प्रमाणित करता है कि जब मुसलमान भारत के शाासक थे तो वे किस सीमा तक मुल्ला मौलवीयो से डरते होगे। आज भी मुस्लिम महिलाओं मे इतनी हिम्मत नही आयी है, कि वे इन मुल्ला मौलवीयों का खुलकर विरोध कर सकंे । इसलिये मुस्लिम राजाओ के अत्याचार की कहानियां अतिरंजित होते हुए भी सत्य जैसी महसूस होने लगती है।
2 प्रश्न– आप कैसे कह सकते है कि संघ अंग्रेजी शासन के पक्ष मे था?
उत्तर – स्वामी दयानंद और विवेकानंद लगभग समकालीन रहे होगे । स्वामी दयानंद ने अंगे्जी शासन का आंशिक विरोध करते हुए स्वराज्य की बात कही किन्तु स्वामी विवेकानंद ने नहीं कही। स्वामी दयानंद के षिष्यो ने समाज सुधार का तथा मुस्लिम विरोध का काम रोककर स्वतंत्रता संघर्ष मे भाग लिया। किन्तु संघ परिवार ने स्वतंत्रता संघर्ष से दूरी बनाकर इसके ठीक विपरीत हिन्दु मुसलमान मे टकराव बढाने का ही काम किया। आज तक 70 वर्ष बीतने के बाद भी ंसंघ के लोग स्वतंत्रता को उतना महत्व नही देते जितना विभाजन को गाली देते है। संघ परिवार विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता का पक्षधर कभी नही रहा बल्कि यदि गृह युद्ध होता तो संघ परिवार उसमे भी सहमत हो जाता और गृह युद्ध के माध्यम से अंग्रेजो की इच्छा पूरी कर देता। अर्थात स्वतंत्रता और कुछ वर्षो के लिये टल जाती।
3 प्रश्न- आपने लिखा है कि गांधीवादियो का एक भाग सुधार मे लग गया और दूसरा अवस्था परिवर्तन मे। अवस्था परिवर्तन शब्द को अधिक स्पष्ट करे । क्या समाज सुधार मे लगे लोगो का मार्ग ठीक था?
उत्तर भारत के स्वतंत्र होते ही तथा गांधी हत्या के तत्काल बाद सत्ता लोलुप गांधी वादियों और सामाजिक गांधी वादियों की संयुक्त बैठक सेवाग्राम मे हुई। बैठक मे समाज सेवियो को सत्ता लोलुप लोगो के समझा दिया कि आप समाज सुधार कीजिये और हम व्यवस्था परिवर्तन करेंगे । ये विचारे अपना झोला डंडा उठाकर ग्राम सुधार मे लग गये और राजनेताओ को खुला छोड दिया कि वे चाहे जितना भ्रष्टाचार करे, चाहे जिस सीमा तक समाज को गुलाम बनालंे । किसी गांधी वादी ने कभी यह नही सोचा कि गाय की रोटी कुत्ता खा रहा है और हम गांधीवादी पूरी इमानदारी से गाय के लिये आटा पीसने मे आंख पर पटटी बांधकर निरंतर सक्रिय है। यहा तक कि जय प्रकाश जी ने जब प्रयत्न भी किया तो गांधी वादी दो फाड हो गये । वाद मे ठाकुर दास जी बंग सिद्ध राज ढढ्ढा ने प्रयत्न किया तो अधिकांश गांधीवादियों ने एक जुट होकर उनका विरोध किया । क्योकि उन्हे कुत्ते और गांय से कुछ लेना देना नही था। उन्हे तो गाय के लिये इमानदारी के आटा पीसना था। भले ही कुत्ता खाता रहे।
4 प्रश्न– संघ नेतृत्व पूरी तरह चालाक सक्रिय सतर्क और सफल है जबकि सर्वोदय का ढीला ढाला शरीफ असफल दूसरी ओर आपने ही पहले भाग मे संध के लोगो को शरीफ और भावना प्रधान लिखा है । बाद मे विपरीत क्यो?
उत्तर- मैने संघ के लोगो को शरीफ भावना प्रधान लिखा है और नेतृत्व को चालाक। मेरी दोनों ही बाते सही है। सर्वोदय मे नेत्त्व नही होता, जबकि संध मे नेतृत्व होता है। संघ एक पूरी तरह अनुशासित संगठन है जबकि सर्वोदय मे उपर से नीचे तक अनुशासन कही देखने को भी नही मिलेगा। इसलिये मेरा यह मानना है कि संध मे शासक और शासित की कार्य प्रणाली है जो सर्वोदय मे नही है। शासक यदि चालाक नही हो तो वह न तो कभी अनुशासन कायम कर सकता है न ही वह सफलता की ओर बढ सकता है। संध पूरी तरह अनुशासित है और सफलता की ओर बढ रहा है। इसलिये मेरे विचार मे शरीफ और चालाक लिखना उपयुक्त प्रतीत होता है।

सोनू देवरानी
5 प्रश्न-आपने मंथन क्रमांक 3 में लिखा है कि दुनिया में साम्यवादी सबसे अधिक चालाक और बुद्धिवादी और सफल माने जाते है,तो दूसरी ओर संघ परिवार सबसे अधिक शरीफ नासमझ ,भावना प्रधान और असफल है तो क्या कारण है कि साम्यवाद का पतन हो रहा है और संघ परिवार सशक्त बन रहा है। कृपया विस्तार में बताइये।
उत्तरः-साम्यवाद एक विचारधारा है और साम्यवादी उस पर चलने वाले व्यक्ति। साम्यवाद विचारधारा के रुप में असफल हुआ है लेकिन साम्यवादी अभी भी असफल नहीं हुये हैं। आज भी अधिकांश गाॅधीवादी अहिंसा के पुजारी होते हुए भी नक्सलवाद का समर्थन करते हैं। आर्य समाज के प्रमुख स्वामी अग्निवेश सब काम छोडकर नक्सलवाद के समर्थन में खडे दिखाई देते हैं। साम्यवादियों ने बडी चालाकी से इस्लाम को अपनी ढाल बना लिया हैै और भारत के मुसलमान हर जगह साम्यवादियों का बचाव करते दिखते है।संघ परिवार भी साम्यवादियों की तुलना में मुसलमानों का अधिक विरोध करता है। मेरे एक साम्यवादी मित्र राकेश रफीक को मैने इतना चालाक पाया कि वे सर्वोदय की बैठकों में भी निर्णायक प्रमुख के रुप में उपस्थित रहते है तो बाबा रामदेव के बगल में भी निर्णायक सलाहकार के रुप में बैठे देखे जा सकते है । मैंने उन्हे अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे के अलग अलग होने के बाद भी दोनों की महत्वपूर्ण सलाहकार समितियों में बैठते देखा है। यहाॅ तक कि आचार्य पंकज के सतर्क करने के बाद भी और उन्हें साम्यवादी जानते हुये भी मैंने उन्हें अपना प्रमुख सलाहकार बनाकर रखने की भूल कर दी थी। मैं अब भी मानता हॅू कि साम्यवादी सबसे अधिक चालाक होते है भले ही साम्यवाद के असफल होने के कारण उनकी स्थिति कुछ कमजोर हो रही हो।
यह सच है कि वर्तमान समय में संघ सफल हो रहा है। ऐसी ही सफलता चैदह सौ वर्षो तक इस्लाम को भी मिल चुकी है और अब सारे विश्व में उसकी दुर्दशा की शुरुवात भी स्पष्ट है। प्रतीक्षा कीजिए और देखिए कि इस्लाम के बाद भारत में संघ परिवार का ही नम्बर आयेगा।

मंथन क्रमांक -2 बेरोजगारी

Posted By: kaashindia on October 9, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

ब
व्यक्ति को रोजगार प्राप्त कराना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है, दायित्व नहीं। क्योंकि रोजगार व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं होता,बल्कि संवैधानिक अधिकार मात्र होता है। रोजगार की स्वतंत्रता व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है। हमारे संविधान विशेषज्ञों की नासमझी के कारण कभी कभी रोजगार को मौलिक अधिकार कह कर संविधान में शामिल कर लिया जाता है।

रोजगार देना राज्य का दायित्व न होते हुए भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानी जाती है। क्योंकि मूलभूत आवश्यक्तओ की पूर्ति के अभाव में व्यक्ति कभी कभी अपराध करने को मजबूर हो जाता है। ऐसे अपराध राज्य के लिए समस्या पैदा करते है। इसलिए राज्य का महत्वपूर्ण कार्य है कि वह अभावग्रस्त लोगों की मजबूरी को दूर करे। ऐसी मजबूरी यदि मुफ्त में बांटकर दूर की जायेगी तो वह एक नई समस्या पैदा करेगी। इसलिए राज्य बेरोजगारी को एक समस्या मानकर उसे दूर करने का प्रयास करता है।

पिछले कई सौ वर्षो से समाज व्यवस्था पर बुद्धिजीवियों का विशेष हस्तक्षेप रहा है। किन्तु स्वतंत्रता के बाद तो भारत की सम्पूर्ण संवैधानिक व्यवस्था में बुद्धिजीवियों तथा पॅूजीपतियों का एकाधिकार हो गया है। वैसे तो दुनिया के अन्य अनेक देशों में भी ऐसा है किन्तु भारत में तो यह स्थिति विशेष रुप से दिखती है। बुद्धिजीवियों ने सबसे पहले बेरोजगारी शब्द की परिभाषा बदल दी। आज बेरोजगारी की क्या परिभाषा है, यही अब तब स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि योग्यतानुसार कार्य का अभाव बेरोजगारी है। प्रश्न उठता है कि एक श्रमिक भूख की मजबूरी में 100 रु में कहीं दिनभर काम कर रहा है,और एक इन्जीनियर 500 रु प्रतिदिन में भी काम न करके बेरोजगार बैठा है क्योकि 500 रु प्रतिदिन उसकी योग्यता की तुलना में बहुत कम है। सच्चाई तो यह है कि एक सीमा से नीचे श्रम मुल्य पर काम करने वाले मजबूर श्रमिक को बेरोजगार माना जाये तथा उससे उपर प्राप्त करने की प्रतिक्षा में बेरोजगार बैठे इन्जीनियर को बेरोजगार न मानकर उचित रोजगार की प्रतिक्षा में माना जाये। किन्तु बुद्धिजीवियों ने धुर्ततापूर्वक रोजगार की ऐसी परिभाषा बना दी कि मजबूरी में काम कर रहे को रोजगार प्राप्त तथा उचित रोजगार की प्रतिक्षा मैं बैठे को बेरोजगार घोशीत कर दिया। बेरोजगारी की वर्तमान भ्रमपूर्ण परिभाषा को बदलने की जरुरत है। किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोशित न्युनतम श्रम मुल्य पर योग्यतानुसार कार्य का अभाव ही बेरोजगारी की ठीक परिभाषा हो सकती है। किन्तु मैं जानता हॅू कि इस परिभाषा को न बुद्धिजीवी स्वीकार करेंगे, न ही सरकार।

व्यक्ति के भरण पोषण के लिए तीन माध्यम होते है- 1 शारीरिक श्रम 2 बुद्धि 3 धन। श्रम तो सबके पास होता है किन्तु बुद्धि प्रधानता कुछ लोगो के पास होती है तथा धन प्रधानता तो और भी कम लोगों के पास होती है। एक व्यक्ति के पास जीवनयापन के लिए सिर्फ श्रम है। दूसरे के पास श्रम और बुद्धि भी है। तीसरे के पास श्रम बुद्धि और धन भी है । मैं आज तक नहीं समझा कि शिक्षित बेरोजगार कैसे माना जा सकता है क्योंकि उसके पास तो श्रम और बुद्धि दोनों रहना प्रमाणित है। सच्चाई यह है कि बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए चार सिद्धांत बनाये है-1 कृत्रिम उर्जा मुल्य नियंत्रण 2 शिक्षित बेरोजगारी को मान्यता 3 श्रम मुल्य वृद्धि की सरकारी घोषणाएॅ 4 जातीय आरक्षण। स्पष्ट है कि भारत की बुद्धि प्रधान अर्थव्यवस्था श्रम शोषण के लिए चारों सिद्धांतो पर पूरी इमानदारी से अमल करती है। यह स्पष्ट है कि न्यायपूर्ण तरीके से बेरोजगारी दूर करने का एकमात्र माध्यम है, श्रम की मांग बढे किन्तु हमारे देश के आर्थिक विशेषज्ञ सारी शक्ति लगाकर श्रम की मांग नहीं बढने से रोकने का प्रयत्न करते रहते है। 70 वर्ष की स्वतंत्रता के बाद भारत दुनिया के देशो से आर्थिक प्रतिस्पर्धा की चुनौती दे रहा है। तो दूसरी ओर भारत में आज भी ऐसे बेरोजगारों की संख्या करीब 15 प्रतिशत है, जो 30रु प्रतिदिन से कम पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर है। आज भी भारत सरकार ने 5 व्यक्ति को परिवार मानकर 160 रु प्रतिदिन का न्यूनतम श्रममूल्य घोशित किया है। किन्तु इस श्रम मूल्य पर भी सरकार सबको रोजगार की गारण्टी नहीं दे पा रही। मुझे जानकारी है कि सरकारी बेरोजगारों की सूची में ऐसे वास्तविक बेरोजगारों का नाम शामिल नहीं है। दूसरी ओर इस सूची में उन सब लोगों के नाम शामिल है जो उचित रोजगार की प्रतिक्षा में काम करने के अभाव में घर बैठे है।

श्रम की मांग बढे बिना न तो बेरोजगारी दूर हो सकती है, न ही न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था कही जा सकती है। यदि भारत सरकार वास्तव में वास्तविक बेरोजगारी को दूर करना चाहती है तो उसे कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्यवृद्धि कर देनी चाहिए। साथ ही उसे शिक्षा पर लगने वाला पूरा खर्च बंद करके कृषि की ओर स्थानान्तरित कर देना चाहिए। तीसरी बात यह भी है कि उसे श्रम के वास्तविक मूल्य से अधिक बढाकर घोषणा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि एक मान्य सिद्धांत है कि किसी वस्तु का मूल्य बढता है तो मांग घटती है और मांग घटती है तो मूल्य घटता है। जब श्रम मूल्य वृद्धि की घोषणा होती है तथा उस वृद्धि के अनुसार रोजगार की गारण्टी नहीं होती, तब दो प्रकार के श्रम मूल्य प्रचलित हो जाते है। ऐसी स्थिति में श्रम की मांग घटती है और बेरोजगारी बढती है।
मेरे विचार से बेरोजगारी की परिभाषा बदल देनी चाहिए। कृत्रिम उर्जा की मूल्यवृद्धि कर देनी चाहिए तथा भारत की अर्थव्यवस्था पर बुद्धिजीवियों के एकाधिकार को समाप्त कर देना चाहिए। तब भारत बहुत कम समय में ही बेरोजगारी से मुक्त होने का दावा कर सकेगा। जब तक भारत में वास्तविक बेरोजगारी है, तब तक हमारी कितनी भी आर्थिक उन्नति,हमारी सर गर्व से उंचा करने में बाधक बनी रहेगी।

दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा

Posted By: kaashindia on October 8, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »


दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा में एक लेख लिखा है। उस लेख की समीक्षा में मैने एक उत्तर लिखा है
जो इस प्रकार है-

उत्तरः- आप सब जानते है कि मैं प्रतिदिन समसामयिक घटनाओं पर कुछ न कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता हॅू। किन्तु पिछले एक दो माह से मैंने पाकिस्तान और कश्मीर के संबंध में कुछ भी नहीं लिखा। यहॉ तक कि मैंने उडी घटना के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तथा सर्जिकल स्ट्राइक के
बाद भी नहीं। क्योंकि यह विषय ऐसा है जिसके सत्य तक पहॅुचना मेरे लिए संभव नहीं था। कौन सच बोल रहा है,कौन झूठ यह कैसे लिखा जाये। दूसरी बात यह भी है कि वर्तमान स्थितियों में पाकिस्तान को शत्रु माना जाये या विरोधी तक सीमित रखा जाये। जिस तरह पाकिस्तान का व्यवहार है उस
अनुसार तो वह सिर्फ भारत सरकार के शत्रु तक सीमित न होकर सम्पूर्ण भारत के लिए शत्रु माने जाने योग्य है क्योंकि उसके आतंकी भारत में कहीं भी किसी की भी हत्या करे और पाकिस्तान की सरकार उसको संरक्षण दे तथा पाकिस्तान के नागरिक ऐसी सरकार का समर्थन करे यह शत्रुता पूर्ण कार्य है। फिर भी मुझे विश्वास था कि उचित परिस्थितियों में भारत सरकार उचित निर्णय लेगी और इसलिए मुझे अनावश्यक कोई सलाह नहीं देनी चाहिए। मैं एक विचारक हॅू कोई साहित्यकार ,किसी का चारण या प्रशंसक नहीं। न तो मुझे किसी प्रकार वातावरण को गरम करने में कोई भूमिका अदा करनी चाहिए, न ही ठंडा करने में। इसलिए मैं चुप रहा और चुप हॅू।

आपने पाकिस्तान के नागरिको की चर्चा की । पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है जहॉ इस्लामिक कानून चलता है। हम पाकिस्तान के नागरिको के व्यवहार की बात तो बाद मंे करेंगे किन्तु पहले हम कश्मीर के मुस्लिम बहुमत के विचारों का परीक्षण तो कर ले। कश्मीरी मुसलमानों का व्यवहार पाकिस्तान के लोगों के लिए एक नमुना बन सकता है। अभी तो यहॉ तक स्थिति है कि भारत का मुसलमान भी अभी दुविधा में है। बहुत से लोग अब
भी चुप है और प्रतिक्षा कर रहे है कि उन्हें खुलकर क्या कहना चाहिए। भारत के बहुत से मुसलमान पाकिस्तान के मामले में तो भारत की सरकार को सलाह देने के लिए आगे आ जाते है किन्तु वे कभी पाकिस्तान की सरकार की आलोचना में उतने आगे नहीं दिखते। मेरे विचार में इस समय भारत
सरकार को नरम या गरम मामलों में कोई विशेष सलाह न देकर या तो समर्थन करना चाहिए या चुप रहना चाहिए। तब तक जब तक कोई विशेष और स्पष्ट घटना न हो जाये।

मैं मनमोहन सिंह अथवा अटल जी की आलोचना को भी अप्रासंगिक मानता हॅू। उस समय तक न तो विश्व में पाकिस्तान इतना बदनाम हुआ था न ही मुस्लिम आतंकवाद इतना अलग थलग पडा था। उस समय पश्चिमी देशों का भी रुख इतना साफ नहीं था। मुझे लगता है कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए उस समय की सरकारों ने ठीक ही निर्णय लिये होंगे।

अंत में मैं भारत और कश्मीर के मुसलमानों से विशेष आग्रह करता हॅू कि वे वर्तमान परिस्थितियों का लाभ उठाकर यह हिम्मत करें कि अब धर्म के आधार पर संगठित होने का अवसर समाप्त हो चुका है तथा हम जहॉ भी है उन सबके साथ सहजीवन जीने की आदत डाल ले। धर्म सर्वोच्च नहीं, राष्ट्र भी सर्वोच्च नहीं, सर्वोच्च तो समाज होता है और समाज में सर्वोच्च आवश्यकता है सहजीवन की अवधारणा जिसमे निश्चित ही औसत हिन्दुओं की तुलना में औसत मुसलमान कमजोर दिख रहा है।

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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