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मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”

Posted By: kaashindia on March 6, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त है।
1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।
2 समाज को एक बृहद परिवार कहा जा सकता है। जिस तरह की संरचना परिवार की होती है वैसी ही समाज की भी होती है।
3 स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है तो सहजीवन और परिवार भावना विकसित करना उसका कर्तब्य ।
4 समाज मे कुछ परिवार अक्षम और कुछ सक्षम होते है। सक्षम परिवारो का कर्तव्य है कि वे अक्षम लोगो की सहायता करे।
5 वर्ण व्यवस्था के अनुसार वैश्य को छोडकर शेष तीन वर्ण के लोग आर्थिक दृष्टि से अक्षम माने जाते है। दान चंदा और भीख इन तीन वर्णो की व्यवस्था के आधार होते है।
6 कर्तव्य और अधिकार एक दूसरे के पूरक होते है। किसी के सामाजिक अधिकार तब तक पूरे नही हो सकते जब तक अन्य लोग कर्तव्य न करे।
7 वर्तमान समय मे दान चंदा और भीख का निरंतर दुरूपयोग हो रहा है। इसलिये इसपर नये तरीके से सोचने की आवश्यकता है। इन तीन मे भी चंदा अधिक बडा व्यवसाय बनता जा रहा है। दान चंदा और भीख अलग अलग अर्थ और प्रभाव रखते है । दान स्वेच्छा से और अपनी क्षमतानुसार दिया जाता है। दान पर दान लेने वाले का पूरा अधिकार होता है । देने के बाद देने वाले का कोई अधिकार या हस्तक्षेप नही होता। यहां तक कि देने वाला उसका कोई हिसाब भी नही पूछ सकता। दान बिना मांगे दिया जाता है और देने के बाद किसी भी परिस्थिति मे वापस नही लिया जा सकता। किसी भी प्रकार का दान देने वाला कर्तव्य भावना से देता है। चंदा और दान मे बहुत फर्क होता है। चंदा दिया और लिया नही जाता बल्कि इकठठा किया जाता है। चंदे पर देने वाले का पूरा अधिकार होता है । वह कभी भी हिसाब मांग सकता है और विशेष परिस्थिति मे वापस भी ले सकता है। चंदा एक आपसी समझौता है जिसे हम सहभागिता भी कह सकते है। भीख एक भिन्न प्रकार की प्रक्रिया है । भीख मांगने पर दी जाती है। आवश्यकता का आकलन करके दी जा सकती हैं तथा भीख पर देने वाले का कोई अधिकार नही होता। भीख आमतौर पर दया की भावना से दी जाती है। भीख भी दान की तरह स्वेच्छा से दी जाती है जिसका न कभी हिसाब लिया जा सकता है न ही वापस मांगा जा सकता हैं।
यदि हम भारत की पुरानी व्यवस्था का आकलन करे तो दान चंदा और भीख एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था के रूप मे माना जा सकता है। प्रत्येक सक्षम व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता है कि वह परिस्थिति अनुसार तीनो मे सहयोग करे। सरकार द्वारा लिया जाने वाला टैक्स भी चंदा की ही श्रेणी मे आता है। यदि हम भारत की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की समीक्षा करें तो दान चंदा और भीख का पूरी तरह दुरूपयोग हो रहा है। अधिकांश लोगो ने तीनो को अपना व्यवसाय बना लिया है। वास्तविक भिखारी तो अब शायद ही दिखते है । पेशेवर भिखारी ही मिलते है यहां तक कि शारीरिक दृष्टि से पूरी तरह अक्षम और कुछ सक्षम लोग भी इसे व्यवसाय समझ लिये है। मैने तो सुना है कि कुछ गरीब लोगो को भीख मांगने के लिये जान बूझकर अपाहिज बनाया जाता है और उससे यह व्यापार कराया जाता है। चंदा मांगना तो एक धंधा बन ही गया है। चंदे के नाम पर अधिकांश धूर्त अपनी दुकानदारी चला रहे है। मैने अपने 60 वर्षो के कार्यकाल मे अपने रामानुजगंज शहर मे जब भी चंदा करने वालो के कार्य का आकलन किया तो एक दो सामाजिक संस्थाओ को छोडकर बाकी सब जगह आर्थिक घपला मिला चाहे वह यज्ञ के नाम पर होता हो या मंदिर या पूजा के नाम पर । यहां तक कि राष्टीय सुरक्षा के नाम पर भी किये गये धन संग्रह मे कई प्रकार की गडबडी प्रमाणित हो गई । अच्छी अच्छी नामी संस्थाओ के नाम पर भी होने वाले धन संग्रह मे भ्रष्टाचार प्रमाणित हुआ। सरकारें जो टैक्स के रूप मे चंदा लेती है उनमे भ्रष्टाचार तो जग जाहिर है। इसी तरह दान के नाम पर भी दुर्गति देखी जा रही है। बडे बडे मठाधीश आम लोगो को दान के लिये प्रेरित करते है और उस प्राप्त दान का दुरूपयोग करते है। धर्म के नाम पर या समाज सेवा के नाम पर दान मांगना फैशन बन गया है। सिद्धान्त रूप से दान मांगा नही जाता किन्तु वर्तमान समय मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दान मांगने वालो की समाज मे भीड लगी हुई है।
किसी महापुरूष ने कहा था कि जो मागने जाता है वह तो एक प्रकार से मर ही जाता है किन्तु जो मांगने पर भी नही देता उसकी मृत्यु मांगने वाले से भी पहले हो जाती है । आदर्श स्थिति मे इस कहावत का बहुत महत्व है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों मे यह कहावत बहुत अधिक हानिकारक है। हर धूर्त इस कहावत का पूरा पूरा दुरूपयोग करता है । इसलिये किसी अन्य महापुरूष को यह सलाह देनी पडी कि कुपात्र को दिया गया दान दाता को भी नर्क मे ले जाता है। इसका अर्थ हुआ कि दान बहुत ही सोच समझकर दिया जाना चाहिये क्योकि यदि दान का दुरूपयोग हुआ तो उसके पाप मे दान दाता भी हिस्सेदार माना जायेगा। इसी तरह चंदा भी बहुत सोच समझकर ही देना चाहिये। और दिये जाने के बाद उसपर अपनी नजर अवश्य रखनी चाहिये। क्योकि बिना सोचे समझे चंदा देना भी एक प्रकार से असामाजिक तत्वो का प्रोत्साहन माना जायेगा। भीख के मामले मे हम उस समय दया कर सकते है जब कोई अक्षम और अपंग हो और उसके पास अपने भरण पोषण का कोई अन्य मार्ग उपलब्ध न हो । वर्तमान समय मे सरकार सबको भरण पोषण के पर्याप्त साधन उपलब्ध करा रही है। मै नही समझता कि ऐसी परिस्थिति मे भीख मांगने का भी कोई औचित्य बचा है। दान चंदा या भीख न देना उतना हानिकर नही है जितना गलत व्यक्ति को देना। सरकार के टैक्स के मामले मे भी सतर्क रहने की आवश्यकता है । सरकारे मनमाना टैक्स लगाकर उसका भरपूर दुरूपयोग कर रही है। कोई ऐसी व्यवस्था सोची जानी चाहिये जिसमे सरकारी टैक्स पर भी कुछ अंकुश लग सके।
आजकल तो मतदान को भी दान कहकर प्रचारित किया जा रहा है। सिद्धान्त रूप से दान मांगा नही जाता किन्तु वोट के भिखारी दिन रात वोट मांगते भी है और उसे दान भी कहते है। वोट न तो दान है न ही भीख है । उसे आप चंदे की श्रेणी मे रख सकते है। मतदान का भी पूरा पूरा दुरूपयोग हो रहा है । इसे भी एक व्यवसाय बना दिया गया है। मेरा सुझाव है कि दान बहुत सोच समझकर दिया जाना चाहिये। दान और भीख की तुलना मे चंदा लेना देना अधिक घातक सिद्ध हो रहा है। चंदे का धंधा दान की प्रवृत्ति को भी निरूत्साहित कर रहा है। चंदा मांगना एक बुरी आदत है किन्तु बहुत बडे बडे लोग भी चंदा मांगकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते है। कहते है मालवीय जी ने चंदे के माध्यम से बनारस हिन्दू विश्व विधालय खडा कर दिया। यह बात सच होते हुए भी मै किसी भी प्रकार के चंदा लेने और देने के विरूद्ध हॅू क्योकि चंदा का कोई न तो हिसाब किताब रखा जाता है न ही किसी को दिखाया जाता है। यदि किसी कार्य के लिये धन संग्रह आवश्यक है और उसमे कोई घपला नही करना है तो उसे अधिकतम पारदर्शी होना चाहिये। साथ ही ऐसा धन संग्रह सिर्फ सहमत और सम्बंद्ध लोगो के बीच ही हो सकता है। दूसरे लोगो से नही मांगा जा सकता। वर्तमान समय मे दान चंदा और भीख के नाम पर जो खरपतवार खेतो मे पैदा हो गये है इन सबको नष्ट करने के लिये एक बार पूरे खेत की जुताई कर दी जाये और कोई बहुत आवश्यक पौधा हो तो उसे ही सुरक्षित रखा जाये । याद रखिये कि दान चंदा या भीख का दुरूपयोग आपके लिये भी घातक है और समाज के लिये भी ।

मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार

Posted By: kaashindia on March 5, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।
1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।
2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस इकाई के प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता अनिवार्य होती है। इकाई के सब लोग मिलकर भी किसी व्यक्ति को संविधान निर्माण से अलग नहीं रख सकते।
3. व्यवस्था चाहे कोई भी हो, कैसी भी हो, किन्तु वह संविधान के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।
4. वर्तमान समय में लोकतंत्र सबसे कम बुरी व्यवस्था है। इसे लोकस्वराज की दिशा में जाना चाहिए।
5. प्रत्येक व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकार होते हैं। इन अधिकारों को उसकी सहमति के बिना संविधान भी नहीं छीन सकता।
6. किसी भी संविधान में सर्वसम्मति से भी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी दीर्घकालिक कटौती का नियम नहीं बन सकता।
7. व्यक्ति समूह अर्थात समाज के अनुसार व्यवस्था कार्य करने के लिए बाध्य होती है और व्यवस्था के अनुसार व्यक्ति बाध्य होता है। व्यक्ति और व्यक्ति समूह के
बीच अंतर करना आवश्यक है।
8 संविधान व्यक्तियों की अपेक्षा सर्वोच्च होता है किन्तु व्यक्ति समूह की तुलना में सर्वोच्च नहीं होता। व्यक्ति समूह सर्वोच्च होता है। जब भारत का संविधान बन रहा था उस समय भी यह चर्चा मजबूती से उठी थी कि मतदान का अधिकार सिर्फ योग्य लोगों तक सीमित होना चाहिए और योग्यता का कोई एक मापदंड बनना चाहिए। अशिक्षित, अयोग्य, पागल या अपराधी यदि मतदान करेंगे तो संपूर्ण राष्ट्रीय व्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव निश्चित है। इस प्रकार का तर्क देने वालों में सरदार पटेल प्रमुख व्यक्ति थे। दूसरी ओर एक पक्ष ऐसा था जो बालिग मताधिकार का पक्षधर था और प्रत्येक व्यक्ति को व्यवस्था में समान रूप से भागीदार बनाना चाहता था चाहे किसी मापदंड के आधार पर अयोग्य ही क्यों न हो। इस पक्ष के प्रमुख पैरवीकार पंडित नेहरू को माना जाता है। बालिग मताधिकार को स्वीकार करते हुए सीमित मताधिकार की मांग छोड दी गई फिर भी कभी-कभी इस तरह की मांग उठती रहती है और अब तक उठ रही है। यदि मताधिकार के लिए किसी योग्यता को आधार बनाया गया तो सबसे पहला प्रश्न यह खडा होता है कि इस आधार को बनाने का निर्णय कौन-सी इकाई करेगी और उस इकाई के चयन में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका होगी या नहीं। यदि इस इकाई ने गलत निर्णय लिए तो उसकी समीक्षा कौन करेगा? जो भी सर्वोच्च इकाई होगी उस सर्वोच्च इकाई के निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति भूमिका ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में संविधान का शासन होता है शासन का संविधान नहीं। संपूर्ण राजनैतिक व्यवस्था एक संविधान के द्वारा संचालित होती है और संविधान से उपर लोक होता है। जिसका अर्थ होता है भारत के प्रत्येक नागरिक का संयुक्त समूह। इस संविधान निर्माण या संशोधन से किसी भी नागरिक को अलग नहीं किया जा सकता चाहे वह कोई भी हो क्योंकि प्राकृतिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, समान स्वतंत्रता प्राप्त है और वह व्यक्ति मतदान द्वारा अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान में शामिल करके स्वयं को व्यक्ति से नागरिक घोषित करता है। यह सारा कार्य उसकी सहमति से होता है। तर्क दिया जाता है कि अशिक्षित लोग जब संविधान और व्यवस्था का अर्थ ही नहीं जानते तो उनके वोट देने का क्या लाभ है। ऐसे लोग किसी भी रुप में बहकाये जा सकते हैं जिसका दुष्परिणाम सब को भोगना पड़ता है। प्रश्न महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे लोग बहकाये जा सकते हैं किंतु एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा होता है कि यदि बहकाने की क्षमता रखने वाले लोग ही सर्वशक्तिमान हो जाए तब समाज का क्या होगा। जिनकी नीयत पर संदेह है उन्हें सारी शक्ति नहीं दी जा सकती। लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका के बीच भिन्न प्रकार की योग्यताओं का समन्वय होना चाहिए। विधायिका में सम्मिलित लोग सिर्फ संविधान और कानून बनाते हैं किंतु क्रियान्वित नहीं कर सकते इसलिए उनकी नीयत पर विश्वास अधिक महत्व रखता है। कार्यक्षमता कम महत्व की मानी जाती है। कार्यपालिका के लोगों की कार्यक्षमता विशेष महत्व रखती है। नीयत का कम महत्व माना जाता है। यदि विधायिका के चयन में भी कार्यपालिका के समान ही नीयत की तुलना में कार्यक्षमता को अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया तब चेक एंड बैलेंस का महत्व समाप्त हो जाएगा। हरियाणा सरकार तथा अन्य कई प्रदेशों में विधायकों के लिए न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान लागू किया गया है। यह प्रावधान पूरी तरह गलत है क्योंकि विधायिका सिर्फ कानून बनाने वाली इकाई है, क्रियान्वित करने वाली नहीं। विधायिका की नीयत सर्वोच्च मापदंड है कार्यक्षमता नहीं। यदि शिक्षा को मापदंड घोषित किया गया तब कबीर दास कभी विधायक या विधायिका के आगे नहीं बन सकते। यह भी साफ दिख रहा है कि समाज को बहकाने और ठगने में शिक्षित लोग अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे चालाक और धूर्त नीयत के लोगों को विधायिका में पहुॅचने की प्राथमिकता पूरी तरह घातक सिद्ध होगी। अब तक भारत में बालिग मताधिकार की छूट दी गई है। पागल को मताधिकार से वंचित किया गया है। अपराधी को भी चुनाव लड़ने से रोका गया है। मेरे विचार से यह सारे नियम आकर्षक दिखते हैं किंतु न्याय संगत नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त है चाहे वह पागल और अपराधी क्यों ना हो। कल्पना करिए कि यदि कुछ डॉक्टरों ने मिलकर किसी व्यक्ति को षड्यंत्र पूर्वक पागल घोषित कर दिया तब क्या उसकी स्वतंत्रता छीन ली जाएगी और ऐसी स्वतंत्रता छीनने का नियम कानून बनाने की व्यवस्था से भी उसे बाहर कर दिया जाएगा। बालिग मताधिकार भी क्यों न्याय संगत माना जाए? क्यों नहीं जन्म लेते ही मत का अधिकार दे दिया जाए। हो सकता है यह आंशिक रूप से अव्यावहारिक लगे किंतु इसका कोई बहुत बड़ा दुष्प्रभाव नहीं हो सकता। हो सकता है कि इस तरह की प्रणाली कुछ अधिक खर्चीली हो किंतु यह मताधिकार सर्वोच्च व्यवस्था अर्थात संविधान के लिए होता है, न कि सरकार के लिए। सरकार के लिए तो प्रति 5 वर्ष में चुनाव करा सकते हैं और उसके लिए मतदान के नियम अलग तरह के भी बना सकते हैं किंतु संविधान निर्माण अथवा संविधान संशोधन के लिए आप किसी व्यक्ति को मतदान से वंचित नहीं कर सकते। भारत में संविधान निर्माण और संशोधन में भी विधायिका की अंतिम भूमिका होती है इसलिए आवश्यक है कि चुनावों में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता पूर्वक भाग लेने का अधिकार दिया जाए। यदि आपने मतदाताओं की क्षमता पर संदेह व्यक्त किया तो यह उचित नहीं। भारत का मतदाता किसी अपराधी, पागल व विदेशी को योग्य मानता हैं तब मतदाताओं की इच्छा को ही सर्वोच्च सक्षम मापदंड मानना चाहिए। मतदाताओं की इच्छा और क्षमता के उपर कोई अन्य नियम कानून या मापदंड नहीं बनाया जा सकता। यदि आप मतदाताओं की योग्यता का कोई भी मापदंड बनाते हैं तो वह पूरी तरह गलत होगा और भविष्य में इसका दुरुपयोग भी हो सकता है। हो सकता है कि उसका दुरूपयोग कभी लोकतंत्र को तानाशाही में बदल दे और आप इसे किसी भी रुप में न रोक सके। मैं तो इस मत का हूं कि सारी दुनियां के संचालन के लिए ऐसा संविधान बनना चाहिए जिसके बनाने में दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका हो अर्थात 6 अरब व्यक्ति मतदान द्वारा ऐसा संविधान बना सके। इस संविधान के आधार पर ही विश्व सरकार की कल्पना की जा सकती है जो सिर्फ राष्ट्रो का ही प्रतिनिधित्व नहीं करेगी बल्कि व्यक्ति से लेकर विश्व तक के बीच कार्य कर रही इकाईयों का संघ होगी। इसका अर्थ हुआ कि विष्व व्यवस्था एक अरब परिवारो, कुछ करोड गांवो और इसी तरह प्रदेशो और राष्ट्रो का संघ होगी। ऐसी व्यवस्था में नीचे से लेकर ऊपर तक बने हुए छोटे से बड़े सभी संविधानों की व्यवस्था का समावेश होगा। मैं स्पष्ट हूं कि मताधिकार को सीमित करने की मांग बहुत ही खतरनाक है और ऐसे प्रयत्न को पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए। मंथन का अगला विषय: दान, चंदा और भीख का फर्क

मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’

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कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं।

  1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।
  2. जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असंगठितों को अलग-अलग दबाते हैं या ठगते हैं और कभी इन असंगठितों को संगठित के रूप में ऐसा आभास हो जाता है तो संगठित अल्पसंख्यक लंबे समय के लिए अविश्वसनीय हो जाते हैं।
  3. असंगठित विश्व से संगठन की ताकत पर निरंतर लाभ उठाने वाला इस्लाम पूरी दुनियां में एक साथ अविश्वसनीय हो गया है।
  4. कोई भी व्यक्ति, व्यक्ति समूह या संगठन किसी विवाद के निपटारे के लिए सामाजिक न्याय या बल प्रयोग में से एक का ही सहारा ले सकता हैं दोनों का नहीं।
  5. भारत के 70 वर्षों के शासनकालों में अल्पसंख्यकों और सत्तारूढ़ो के बीच अघोषित समझौता होने के कारण कश्मीर समस्या फलती-फूलती रही।
  6. कश्मीर के संबंध में भारतीय मुसलमानों के बहुमत की निष्ठा या तो निष्क्रियता रही है या संदेहात्मक।
  7. भारत का मुसलमान भी दुनियां के मुसलमानों की तरह ही राष्ट्र की तुलना में संगठन को अधिक महत्वपूर्ण मानता है।
  8. यदि किसी अन्यायी के साथ कोई अन्य अन्याय करता है तो या तो हमें चुप रहना चाहिए या कमजोरों का साथ देना चाहिए। न्याय-अन्याय महत्वपूर्ण नहीं।
    कश्मीर समस्या का पुराना इतिहास रहा है। भारत के मुस्लिम बहुमत ने धर्म के आधार पर भारत के विभाजन की जिद्द की जिसे अंग्रेजों ने मान लिया। जहां-जहां अंग्रेजों का प्रत्यक्ष शासन था उन क्षेत्रों को भारत व पाकिस्तान में धर्म के आधार पर बांट दिया गया किन्तु जहां-जहां राजा थे उन क्षेत्रों के राजाओं को स्वतंत्र मान लिया गया कि वे भारत में या पाकिस्तान में चाहे तो मिल सकते हैं अन्यथा अलग भी रह सकते हैं। ऐसे करीब 500 स्वतंत्र राज्यों में से कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ को छोड़कर बाकी सबने भारत या पाकिस्तान में से किसी एक का चुनाव कर लिया। यह तीन टाल-मटोल करते रहे। जूनागढ़ पर भारत ने बलपूर्वक कब्जा कर लिया। हैदराबाद की जनता हिंदू थी, राजा मुसलमान। वहां आर्य समाज के नेतृत्व में हिंदुओं ने विद्रोह कर दिया और भारतीय सेना की सहायता से हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। कश्मीर में मुस्लिम बहुमत था और राजा हिंदू था। राजा भी भारत-पाकिस्तान में ना मिलकर स्वतंत्र रहने की सोच रहा था तभी पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और कश्मीर के राजा ने संभावित हार के डर से कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। इस तरह संवैधानिक आधार पर भारत में कश्मीर का विलय हो गया किंतु कुछ भाग पाकिस्तान के कब्जे में था और पाकिस्तान कश्मीर के विलय को मान्यता न देकर युद्धरत रहने का इच्छुक था। इसलिए यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में चला गया और राष्ट्र संघ ने जनमत संग्रह की सलाह दी जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया। उस समय कश्मीर की मुस्लिम आबादी हिन्दु राजा के पक्ष में थी और स्पष्ट दिखता था कि जनमत संग्रह में भारत का पक्ष मजबूत रहेगा। इसी बीच गांधी की हत्या हो जाती है और पाकिस्तान को यह अवसर मिलता है कि वह कश्मीर के मुसलमानों को हिन्दुओं के विरूद्ध लामबंद कर सके। धीरे-धीरे स्थितियॉ बदलती गयीं और जनमत संग्रह टलता गया। पाकिस्तान को चाहिए था कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिक जोर शोर से बात उठाता और उस पर पूरा विश्वास करता किंतु पाकिस्तान ने एक-दूसरा मार्ग भी अपनाया और भारत से बलपूर्वक कश्मीर छीनने का प्रयास किया। यहॉ से विश्व जनमत में पाकिस्तान का पक्ष कमजोर हुआ। न पाकिस्तान ताकत के बल पर कुछ हासिल कर पाया न ही विश्व -व्यवस्था के माध्यम से।
    प्रशांत भूषण ने कश्मीर में जनमत संग्रह को न्याय संगत बताया। यह बात न्यायसंगत दिखती भी है किंतु प्रशांत भूषण की आवाज के विरूद्ध देश भर में विपरीत प्रतिक्रिया हुई क्योंकि प्रशांत भूषण तटस्थ व्यक्ति न माने जाकर वामपंथी अल्पसंख्यक पक्ष के वकील के रूप में माने जाते है। साथ ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कश्मीर समस्या दो देशो के बीच कोई बार्डर समस्या नहीं है बल्कि एक मुस्लिम विस्तारवादी संस्कृति से अन्य संस्कृतियों की सुरक्षा का प्रश्न है। मुसलमान जहॉ बहुमत में होता है वहॉ शरीया का शासन लागू करता है और जहॉ अल्पमत में होता है वहॉ या तो बराबरी का व्यवहार चाहता है या न्याय संगत। भारत अकेला ऐसा देश है जहॉ का मुसलमान अल्पसंख्यक होते हुए भी अपने लिए विशेषाधिकार की सुविधा प्राप्त करता रहा और संवैधानिक आधार पर प्राप्त सुविधाओं से हिन्दुओं को दुसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा। स्वाभाविक था कि कश्मीर के मुसलमानों का भी हौसला बढता रहा और वे भी उस दिन की प्रतीक्षा करते रहे जब भारत दारूल इस्लाम बन जायेगा। इस दारूल इस्लाम के संघर्ष में भले ही पाकिस्तान कश्मीरी मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष दिखता हो किन्तु कश्मीरियों को दुनियां भर के सांप्रदायिक मुसलमानों की सहानुभूति मिलती रही। मैं आपको स्पष्ट कर दूॅ कि मुस्लिम देश सांप्रदायिक नहीं होते है बल्कि सांप्रदायिक भावना व्यक्तिओं में होती है और वहीं सांप्रदायिक भावना संगठित होकर राष्ट्र की पहचान बन जाती है। यदि कोई मुस्लिम बहुल देश आम मुस्लिम धारणा के विरूद्ध न्याय की बात करने लगे तो वह लम्बे समय तक नहीं टिक पाता। भले ही राजनैतिक परिस्थितिओं के कारण बहुत से मुस्लिम देश भारत के पक्ष में रहे किन्तु उन देशो के कट्टरवादी मुसलमानों की सहानुभूति व सक्रियता कश्मीर के मामलों में भारत के विरूद्ध रही। 1500 वर्षो में आम मुसलमानों के बीच यह धारणा मजबूती से स्थापित है कि वे यदि टकराते रहेंगे तो अंतिम लडाई वहीं जीतेगे क्योंकि खुदा उनके साथ है। न्याय-अन्याय अथवा सामाजिक सोच उनके लिए कोई मतलब नहीं रखती। यही कारण है कि दुनियां के अन्य समूह लम्बे समय तक लडने के बाद हित-अहित का ऑकलन करते है और लडाई छोड देते है किन्तु मुस्लिम समूह बर्बाद होने तक भी लडते रहते है क्योंकि उन्हें विश्वास है कि जीतेगें वही। प्रशांत भूषण को यह बात समझनी चाहिए थी कि कश्मीर समस्या न तो बार्डर समस्या है न ही न्याय-अन्याय से जुडा कोई मामला। यदि कश्मीर पाकिस्तान को दे दिया जाए तब भी किसी समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि लडाई दारूल इस्लाम की धारणा से है। युद्ध का नया मैदान या तो कश्मीर से हटकर पंजाब की ओर बढ जायेगा अथवा आसाम में नया मोर्चा खुल जायेगा। जब युद्ध होना निश्चित ही है तब कश्मीर में न्याय-अन्याय की बात करना एक आत्मघाती और मूर्खतापूर्ण कदम होगा। 70 वर्षो तक भारत ने तृष्टिकरण का राजनैतिक खेल खेलकर कश्मीर समस्याओं को मजबूत होने दिया। अब ऐसी भूल नहीं दोहरानी चाहिए।
    सारी दुनियां के लिए कश्मीर एक लिटमस टेस्ट की तरह है। आजतक दुनियां में मुसलमानों ने कहीं भी हार नहीं मानी भले ही कितना भी लम्बा युद्ध क्यों न चला हो। कश्मीर में उनके अस्तित्व की लडाई है। यहॉ का वातावरण उनके लिए परिस्थितियों के विपरीत है। दुनियां भर में उनकी विश्वसनीयता घट रही है। राजनैतिक समीकरण उनके विरूद्ध जा रहे है। मुस्लिम देश आम मुस्लिम धारणाओं के विपरीत आपस में ही बंटे हुए है। ऐसी स्थिति में उनके समक्ष कश्मीर में हार जाने का खतरा मंडरा रहा है। यदि कश्मीर में वे हार मानकर सहजीवन स्वीकार कर लेते है तो उनका 1400 वर्षों का विश्वास चूर-चूर हो जायेगा कि खुदा उनके साथ है और अंतिम विजय उनकी होगी। दूसरी ओर भारत में आबादी की दृष्टि से भी वे बहुत कम है और सरकार भी अब बदल गयी है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के मुसलमानों में भी बहुत बडा वर्ग अब सहजीवन की आवष्यकताओं को भी समझने लगा है। वह मानने लगा है कि उसे भारत में ही रहना है और कश्मीर के नाम पर किसी प्रकार का विवाद न ही न्यायसंगत है न ही उसके हित में है। ऐसे बदले वातावरण में अब कुछ सांप्रदायिक तत्व बातचीत से समाधान की वकालत करते दिखते है। स्पष्ट मानिए कि जो लोग बातचीत से कष्मीर समस्या का समाधान करने की बात करते है वे पूरी तरह गलत है और निराश भी है। उन्हें साफ-साफ दिख रहा है कि कष्मीर की लडाई में भारत पक्ष सब ओर मजबूत हो रहा है और बातचीत का कोई मार्ग ही कुछ उम्मीद जिंदा रख सकता है।
    कष्मीर समस्या भारत की बडी समस्या है क्योंकि सारी दुनियां की शाति का भविष्य कश्मीर पर टिका हैं। जो लोग कश्मीर में अब भी भारत के विरूद्ध टकराव की उम्मीद लगाये बैठे है ऐसे लोगों को न्याय-अन्याय की परवाह किए बिना नष्ट कर देने का प्रयत्न कर देना चाहिए। जो लोग कश्मीर में शांति पूर्ण वार्ता की वकालत करते है ऐसे लोगों का सामाजिक बाहिष्कार होना चाहिए। साथ ही भारत के जो मुसलमान कश्मीर मामले में अब भी चुप है उन्हें खुलकर भारत के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। कष्मीर तो भारत में ही रहेगा। कहीं ऐसा न हो कि कश्मीर को ले जाते-ले जाते कुछ ओर भी क्षेत्र भारत में शामिल न हो जाये।
    मंथन का अगला विषय बालिग मताधिकार होगा

मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा

Posted By: kaashindia on March 3, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धांत है

अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अहिंसा सर्व श्रेष्ठ धर्म माना गया है। धर्म की रक्षा करना राज्य का दायित्व होता है न कि धर्म पर आचरण करना। अहिंसा और कायरता मे बहुत फर्क होता है । हर कायर अपने को अहिंसक मानने की भूल करता है। बुद्ध और महावीर के पहले भारत मे अहिंसा और हिंसा के बीच सामाजिक संतुलन था। राज्य को छोडकर शेष पूरा समाज पूरी तरह अहिंसा का पक्षधर था। किसी भी प्रकार की हिंसा की न आवश्यकता थी न ही उसे नैतिक मार्ग माना जाता था। राज्य अहिंसक समाज रचना के लिये आवश्यक हिंसा करना अपना दायित्व समझता था। यह अलग बात है कि अलग अलग राज्य अपना कर्तब्य छोडकर आपस मे हिंसक टकराव शुरू कर देते थे जिसका परिणाम हमेशा बुरा होता था। बुद्ध और महावीर ने हिंसा और अहिंसा के बीच के संतुलन को बिगाडा। उन्होंने अहिंसा को मार्ग की जगह लक्ष्य मान लिया। इसका परिणाम हुआ कि राज्य मे उचित अनुचित का भ्रम पैदा हुआ और समाज में संतुलन की जगह कायरता का विकास हुआ। दुनियां के अन्य देशो में यहूदी हिंसा और अंहिसा के बीच सुतुलित थे। लेकिन ईशु मसिंह ने अहिंसा के पक्ष मे संतुलन बिगाडा। उसके बाद इस्लाम का उदय हुआ और इस्लाम नें एक पक्षीय अहिंसा के विरूद्ध एक पक्षीय हिंसा का समर्थन कर दिया। बुद्ध, महावीर और यीशु मसीह की कायरता प्रधान शिक्षाओ के परिणाम स्वरूप इस्लाम सारी दुनियां में बहुत तेजी से आगे बढा।
इस्लाम के विस्तार की चपेट में भारत भी आया और भारत कई सौ वर्षो तक विदेशीयों का गुलाम बना रहा। स्वतंत्रता के लिये भारत में दो मार्ग शुरू हुए उनमें भी सन 1857 से लेकर 1947 तक के 90 वर्षो मे अनवरत चले हिंसक मार्ग ने कोई सफलता नही की। दूसरी ओर गांधी के अहिंसक मार्ग ने बीस तीस वर्षो मे ही सफलता कर ली क्योकि भारत की गुलामी लोक तांत्रिक और अहिंसक अंग्रेजो के पास थी। यदि यह गुलामी मुसलमानो या साम्यवादियों की रही होती तो गांधी मार्ग किसी भी रूप मे सफल नही हो पाता।
शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिये राज्य को कभी भी अहिंसा को अपना मार्ग नही मानना चाहिये । यदि राज्य ऐसी भूल करता है तो उसके दुष्परिणाम होते है और समाज मे हिंसा की आवश्यकता बढती चली जाती है। स्वतंत्रता के समय गांधी हत्या के बाद गांधीवादियों ने भूल से अहिंसा को मार्ग की जगह लक्ष्य मान लिया। इसका अर्थ हुआ कि राज्य को भी उचित की जगह न्यूनतम हिंसा का उपयोग करना चाहिये। मार्ग को लक्ष्य मानने की गांधीवादी भूल का लाभ उठाया संघ परिवार ने, साम्यवादियों और कटटरपंथी मुसलमानो ने। इन तीनो ने मिलकर समाज मे हिंसा की आवश्यकता की भूख पैदा की। अहिंसा की पक्षधर गांधीवादी सरकारे अराजकता को नही रोक सकी। परिणाम स्वरूप समाज मे अराजकता से निपटने के लिये एक ऐसे राज्य की आवश्यकता महसूस की गयी जो अहिंसा की सुरक्षा के लिये हिंसा को एक उचित मार्ग मानता हो। हमे इस मामले मे नरेन्द्र मोदी से अधिक अच्छा व्यक्ति कोई नही मिला। परिणाम आज सबके सामने है।
जब भी संगठित हिंसा के विरूद्ध कायरता उबाल खाती है तो क्षणिक हिंसा का आक्रोश प्रकट होता है। भारत मे सिखो ने जब ऐसी ही भूल की तो देश भर मे ऐसा ही क्षणिक उबाल आया और हजारो निर्दोष सिख मारे गये। जब गोधरा कांड के समय ऐसा ही उबाल आया तो नरेन्द्र मोदी ने उसका नेतृत्व किया और हजारो निर्दोष मुसलमान मारे गये । लगता था कि इन घटनाओ से इन दोनो संगठनो पर दीर्घकालिक प्रभाव होगा और वे समाज मे सहजीवन और अहिंसा का महत्व समझेगे। लेकिन अब भी ऐसे कोई सुधार या पश्चाताप के लक्षण नही दिख रहे है भले ही परिस्थितियो की प्रतीक्षा क्यो न की जा रही हो।
इसके पूर्व भी नागासाकी और हिरोसिमा मे निर्दोष लाखो लोग मारे जा चुके है। आज तक यह तय नही हो पाया कि उन हत्याओ मे अमेरिका गलत था। साथ ही मुझे तो व्यक्तिगत रूप से महसूस होता है कि अमेरिका के पास उसके अतिरिक्त कोइ्र अन्य विकल्प नही था क्योकि अहिंसा की स्थापना के लिये समुचित बल प्रयोग करना उचित होता है और अमेरिका ने वह किया। यह अलग बात है कि अमेरिका के इस बर्बर आक्रमण से दुनियां ने सीख ली किन्तु अब भी भारत के सिख और मुसलमान अपनी दुविधा से दूर नही हो पा रहे है। उन्हे यह दुविधा दूर करके सहजीवन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करनी चाहिये । समाज मे हिंसा और संगठन का कोई औचित्य नही है और राज्य व्यवस्था मे अहिंसा का कोई औचित्य नही है । दोनो को अपनी अपनी सीमाए समझनी चाहिये । दोनो का घालमेल उचित नही। संघ परिवार मे हिंसा और अहिंसा के मामले मे मुसलमानो और साम्यवादियो के समान ही विचार रखता है। स्पष्ट है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था अहिंसा की जगह कायरता के रूप मे दिखती है। हिंसा समर्थक सभी संगठनो से एक साथ निपटना समाज के लिये कठिन है। इसलिये शत्रु का शत्रु मित्र होता है इस आधार पर अल्पकाल के लिये दो दिशाओ मे धु्रवीकरण हो रहा है । एक तरफ संघ परिवार के विरूद्ध संगठित इस्लाम और साम्यवाद है तो दूसरी तरफ है संगठित इस्लाम और साम्यवाद के विरूद्ध संगठित हिन्दुत्व जिसे हम संघ परिवार कहते है। मै तो पूरी तरह अहिंसा का पक्षधर हॅू और राज्य को अहिंसा से दूरी बनानी चाहिये । मै चाहता हूू कि वैचारिक तथा सामाजिक धरातल पर किसी भी प्रकार की हिंसक विचार धारा का विरोध करना चाहिये और राजनैतिक धरातल पर हिंसक प्रवृत्तियो के कुचलने के लिये किसी भी सीमा तक राज्य को मजबूत होना चाहिये। अहिंसा परम धर्म है और इस परम धर्म को परम धर्म के रूप मे स्थापित होना चाहिये। इस धार्मिक कार्य मे हम सबकी सह भागिता आवश्यक है।

मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”

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कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।

1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापित कर दिया जाता है। 2 दुनियां मे परिभाषाओ को विकृत करने का सबसे अधिक प्रयास साम्यवादियो ने किया और सबसे कम मुसलमानो ने। 3 दुनियां मे योजना पूर्वक पचासो परिभाषाए पूरी तरह बदल दी गई है। इनमे मंहगाई बेरोजगारी गरीबी महिला उत्पीडन आदि अनेक परिभाषाए शामिल है। 4 गुलामी के बाद भारत मे अपना चिंतन बंद हो गया और भारत सिर्फ नकल करने लगा। साम्यवाद और पश्चिम की विकृत परिभाषाओ को भारत मे सत्य के समान मान लिया गया जो अब तक जारी है। 5 मंहगाई सेन्सेक्स बेरोजगारी जी डी पी रूपये का मूल्य ह्रास आदि से सारा भारत चिंतित है जबकि उनमे से किसी का भारत की सामान्य जनता पर अब तक कोई अच्छा बुरा प्रभाव नही पडा। 6 मंहगाई जी डी पी बेरोजगारी रूपये का मूल्य ह्रास सेन्सेक्स आदि का सामान्य अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पडने का प्रचार काल्पनिक है यथार्थ नही। अपने 65 वर्षो के लगातार चिंतन के बाद भी मै कभी नही समझा कि मंहगाई बेरोजगारी जी डी पी का भारत के सामान्य जन जीवन पर क्या और कितना अच्छा बुरा प्रभाव पडा। स्वतंत्रता के बाद मंहगाई कितनी बढी और उसका क्या प्रभाव पडा यह बताने वाला कोई नही। कौवा कान ले गया और अपना कान न देखकर कौवे के पीछे पूरा भारत भाग रहा है। भारत मे आवश्यक वस्तुओ मे मंहगाई स्वतंत्रता के बाद करीब 60 गुनी बढी है और औसत जीवन स्तर इसके बाद भी सुधर कर करीब चार गुना बढ गया। सेन्सेक्स घटने बढने का तो प्रभाव कुछ समझ मे ही नही आता। जी डी पी भी हर साल घटते बढते रहता है लेकिन न कभी अच्छा प्रभाव दिखा न कभी बुरा। बेरोजगारी घटने बढने का भी कोई अच्छा बुरा प्रभाव आज तक स्पष्ट नही हुआ क्योकि इन सबकी जान बुझकर परिभाषाए बदलने मे पश्चिम की नकल की गई । जब परिभाषा ही बदल दी गई तब वास्तविक अर्थ का पता ही नही चलेगा। यदि आपको दो और दो पांच लगातार पढाया जाये तो उससे आपके निष्कर्ष गलत होना स्वाभाविक है। दोष निष्कर्ष निकालने वाले का नही है बल्कि गलत परिभाषा का है। भारत मे डालर की तुलना मे रूपये के गिरते मूल्य की बहुत चिंता हो रही है। देश का हर आदमी चिंता कर रहा है कि रूपये का मूल्य गिरकर 70 रूपये के आस पास हो गया है। मै तो भावनात्मक रूप से इन सारे प्रचार को षणयंत्र मानता हॅू क्योकि यदि वास्तव मे डालर की तुलना मे रूपया स्वतंत्रता के बाद 70 गुना गिर गया तो उसका प्रभाव भारत की अर्थ व्यवस्था पर अब तक कितना पडा यह बताने वाला कोई नही है। आर्थिक दृष्टि से जो भी लोग अखबारो मे या इस मूल्य ह्रास की चर्चा करते है वे पश्चिम की कितावे पढकर उस गलत परिभाषा के आधार पर परिस्थितियो का आकलन करते है जबकि परिभाषा गलत होने से सारे परिणाम भी गलत हो जाते है । मै दशको से सुनता रहा हूॅ कि डालर की तुलना मे रूपया गिर गया और उसके प्रभाव से भारत पर विदेशों का कर्ज बढ गया । लेकिन मै आज तक नही समझा कि कर्ज बढा या नही और यदि बढा तो कितना बढा और उसका भारत की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव क्यो नही दिखा। सन 47 मे एक डालर का मूल्य एक रूपये के बराबर था जो आज करीब 70 रूपये के बराबर हो गया है तो क्या भारत पर विदेशों का कर्ज 70 गुना बढ गया । मैने इस संबंध मे जब अपनी परिभाषाओ के आधार पर सोचना समझना शुरू किया तो मुझे स्पष्ट दिखा कि ये सब कुछ भ्रम पैदा करने का प्रभाव है । न तो भारत पर कोई कर्ज बढा है न कोई उसका प्रभाव पडा है। एक आकलन के अनुसार स्वतंत्रता के बाद भारत मे अपने रूपये का आंतरिक मूल्य करीब 95 रूपये के बराबर हो गया है । इसका अर्थ हुआ कि भारत मे जो औसत वस्तुए उस समय एक रूपये मे मिलती थी वे यदि आज 95 रूपये मे मिलती है तो इस प्रकार का कोई बदलाव नही हुआ है। न कोई चीज सस्ती हुई है न मंहगी। स्पष्ट है कि इस आधार पर भारत मे डालर का मूल्य भी 95 रूपये होना चाहिये था जो अभी 70 रूपये के आस पास है। इसका भी एक कारण है भारत मे स्वतंत्रता के बाद औसत मूल्य वृद्धि साढे छ प्रतिशत वार्षिक की है । प्रत्येक 10 वर्ष मे रूपये की किमत आधी हो जाती है अमेरिका मे डालर का मूल्य 10वर्षो मे 10 प्रतिशत के आसपास ही घटता है । यही कारण है कि जहां रूपये का आंतरिक मूल्य 10 वर्षो मे दो गुना हो जाता है वही डालर की तुलना मे रूपये का मूल्य 12 वर्षो मे दो गुना होता है। अर्थात यदि सन 47 मे डालर एक रूपया के बराबर था तो बारह वर्षो के बाद दो के बराबर चालिस वर्षो के बाद करीब आठ के बराबर और अब सत्तर वर्षो के बाद करीब 75 रूपये के बराबर होना चाहिये था जो अभी 70 के आस पास है। स्पष्ट है कि रूपया अब भी डालर की तुलना मे कुछ मजबूत है। यह अलग बात है कि मनमोहन सिंह के कार्य काल मे डालर को साठ होना चाहिये था किन्तु 44 पर रूका था। स्पष्ट है कि आर्थिक मामलो मे मनमोहन सिंह बहुत अधिक सिद्ध हस्त थे। विदेशी कर्ज रूपये के आधार पर कभी घटता बढता नही है। कल्पना करिये कि सन 47 मे शक्कर एक रूपया अर्थात डालर की दो किलो उपलब्ध थी। यदि हम पर 100 डालर का कर्ज था तो उसके बदले हमे दो सौ किलो शक्कर देनी पडेगी। आज भी यदि हम पर 100 डालर का कर्ज है और शक्कर 70 रूपये के बराबर है तो हमे 200 किलो ही शक्कर देनी है। रूपया वस्तु का स्थान नही ले सकता । बल्कि वह तो सिर्फ एक विनिमय माध्यम है। रूपये के आंतरिक मूल्य घटने बढने का विदेशी लेने देन पर कोई अच्छा बुरा प्रभाव तब तक नही होता जब तक लेन देन विदेशी मुद्रा मे न होकर भारतीय मुद्रा मे न हो । आम लोगो को आर्थिक मामलो मे धोखा देने के लिये घाटे का बजट जान बूझकर बनाया जाता है जिससे मंहगाई मुद्रा स्फीति और अन्य अनेक आर्थिक भ्रम फैलाने मे सुविधा हो । आयात निर्यात भी इसमे बहुत प्रभाव डालता है। यदि आयात अधिक होगा और निर्यात कम तो अर्थ व्यवस्था पर प्रभाव पडना निश्चित है। सरकारे राजनैतिक लाभ के लिये कभी नही चाहती हैं कि आयात निर्यात का संतुलन हो । क्योकि यदि आयात कम होगा तो सुविधाएं घटेगी। झुठे वादे और यथार्थ के बीच अंतर बढ जायेगा। इसका राजनैतिक दुष्प्रभाव स्वाभाविक है। स्पष्ट दिखता है कि डीजल पेट्रोल का आयात सबसे बडी समस्या है। वर्तमान समय मे इसे कम करने का किसी तरह का कोई प्रयास नही हो रहा है क्योकि खाडी देशों से संबंध भी सुधारने है । साथ ही डीजल पेट्रोल के आयात के खेल मे दो नम्बर का भी काम बहुत होता है और आयात कम करने से आवागमन मंहगा होगा जिससे मध्यम उच्च वर्ग का आक्रोश झेलना पडेगा। इसलिये कोई भी सरकार सब कुछ कर सकती है किन्तु डीजल पेट्रोल का आयात घटने नही देगी। आवागमन कभी मंहगा नही होने देगी। मैन यह लेख मंथन के अंतर्गत लिखा गया है कोई अंतिम निष्कर्ष नही है । मै नही कह सकता कि मेरे लेख मे सभी निष्कर्ष सही होंगे किन्तु मै अपने साथियो से जानना चाहता हूॅ के मेरे चिंतन मे कहां गलत है और क्या गलत है । यदि कोई बात गलत होगी तो मै सुधारने के लिये सहमत हॅू। मेरी हार्दिक इच्छा है कि विदेशो की नकल करके असत्य को सत्य के समान स्थापित करने की भारतीय आदत को चुनौती देनी चाहिये । इसी उद्देश्य से मंथन के अंतर्गत यह लेख लिखा गया है। नोट- मंथन का अलगा विषय हिंसा या अहिंसा होगा।

मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा

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कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है
1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2. लोकतंत्र दो तरह का होता है। 1 आदर्श और विकृत । आदर्श लोकतंत्र मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार प्रकृत्ति प्रदत्त होते है और विकृत लोकतंत्र मे मौलिक अधिकार संविधान देता है और ले सकता है। 3. दुनियां मे लोकतंत्र कई प्रकार का है । संसदीय लोकतंत्र, राष्ट्रपतीय प्रणाली, सहभागी लोकतंत्र, तानाशाही लोकतंत्र। भारत का लोकतंत्र, संसदीय प्रणाली और साम्यवादी देशो का तानाशाही लोकतंत्र माना जाता है। 4. सुशासन और स्वशासन मे बहुत फर्क होता है। स्वशासन आदर्श लोकतंत्र है सुशासन विकृत। सुशासन लोकतंत्र मे भी संभव है और तानाशाही मे भी। 5. आदर्श लोकतंत्र मे लोक नियंत्रित तंत्र होता है। लोक मालिक और तंत्र प्रबंधक। तानाशाही मे तंत्र मालिक और लोक गुलाम रहता है। 6. भारत का लोकतंत्र अप्रत्यक्ष रूप से तंत्र की तानाशाही के रूप मे है, आदर्श लोकतंत्र नही । यहां तंत्र मालिक है और लोक गुलाम। 7. जब न्याय और कानून मे टकराव होता है तब आदर्श लोकतंत्र मे न्याय महत्वपूर्ण होता है और विकृत लोकतंत्र मे कानून। 8. विकृत लोकतंत्र मे संगठन शक्तिशाली होते है, संस्थाए कमजोर । आदर्श लोकतंत्र मे संस्थाए मजबूत होती है संगठन कमजोर। सन 75 मे इंदिरा गांधी ने व्यक्तिगत कारणो से आपातकाल लगाया था। उस आपातकाल मे सरकार ने घोषणा की थी कि मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गये है। घोषणा के अनुसार सरकार किसी भी व्यक्ति को कभी भी बिना कारण बताये गोली मार सकती थी। संसद और न्यायपालिका पर असंवैधानिक तरीके से नियंत्रण कर दिया गया था। सरकार की समीक्षा करने पर भी प्रतिबंध लग गया था। आलोचना या विरोध का तो कोई प्रश्न ही नही था। उस समय का आपातकाल पूरी तरह व्यक्तिगत तानाशाही थी क्योकि भारत का संविधान किसी व्यक्ति का गुलाम बन गया था। दो वर्ष बाद सन 77 मे फिर से विकृत लोकतंत्र की स्थापना हुई जो अब तक जारी है।नरेन्द्र मोदी ने अपने चार वर्षो के कार्यकाल मे सीधा सीधा धु्रवीकरण कर दिया है। 70 वर्षो तक जो लोग पक्ष विपक्ष मे विभाजित होकर सम्पूर्ण समाज का मार्ग दर्शन और नेतृत्व कर रहे थे उन सब लोगो को नरेन्द्र मोदी ने किनारे लगा दिया है। सम्पूर्ण विपक्ष तो पूरी तरह नाराज है ही किन्तु सत्ता पक्ष के भी करीब करीब सभी लोग नरेन्द्र मोदी से नाराज है । भले ही वे डर से समर्थन क्यो न करते हो । लगभग सभी संगठन मोदी से नाराज है चाहे वे हिन्दू संगठन हो या मुस्लिम इसाई संगठन। व्यापारी संगठन भी नरेन्द्र मोदी से नाराज हैं चाहे वे बडे उद्योग पति हो या छोटे व्यापारी । मीडिया मे भी नरेन्द्र मोदी के प्रति भारी असंतोष है भले ही कुछ लोग उनसे लाभ लेकर उपर उपर उनका गुणगान कर रहे हो । किसान संगठन के लोग हो या श्रमिक संगठन सब नरेन्द्र मोदी की नीतियो से असंतुष्ट है। सवर्णो के संगठन और अवर्णो के संगठन भी नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध इकठठे हो रहे है। गाय गंगा मंदिर के पक्षधर भी उनसे नाराज है तो इनके विरोधी भी। राजनैतिक सामाजिक धार्मिक व्यावसायिक किसी भी क्षेत्र का कोई भी ऐसा व्यक्ति मोदी से खुश नही है जो अपनी ताकत पर सौ पचास वोट दिलवाने की हिम्मत रखता हो। यहां तक कि एन डी ए मे शामिल घटक दल भी पूरी तरह मोदी के खिलाफ है। इसका मुख्य कारण यह है कि मोदी किसी की बात नही सुनते जो उनको ठीक लगता है वह बिना किसी की सलाह लिये स्वयं करते है। वे हर मामले मे स्वतंत्र रूप से तकनीकी लोगो की टीम बनाकर उससे जांच कराते है और किसी के दबाव मे नही आ रहे है।यहां तक कि संघ परिवार जिसका ताकत पर मोदी प्रधान मंत्री बने उसकी भी इन्होने कभी कोई विशेष परवाह नही की । मै जानता हॅू कि सिर्फ एक बार बडी मुस्किल से कुछ आर्थिक मुददे पर नरेन्द्र मोदी भागवत जी के दबाव मे आये थे और उस दबाव के कारण जो अर्थनीति मे थोडा बदलाव किया गया उसके दुष्परिणाम भी हुए। अन्यथा किसी और मामले मे मोदी किसी अन्य के दबाव मे नही झुके। यही कारण है कि देश के लगभग सभी सरकार के सहयोगी और मोदी विरोधी एक स्वर से उन्हे तानाशाह कहने लगे है। मै समझता हॅू कि नरेन्द्र मोदी ने यह जुआ खेला है। इसके अच्छे परिणाम भी हो सकते है और बुरे परिणाम भी। नरेन्द्र मोदी व्यक्तिगत रूप से सीधे मतदाताओ को संबोधित कर रहे है न कि बिचौलियो के माध्यम से। बिचौलियो को किनारे करके सीधे मतदाताओ से संपर्क करने का उनका प्रयास कितना सफल होगा । यह तो 2019 मे ही पता चलेगा । । वास्तव मे लीक छोडकर मोदी ने जो मार्ग अपनाया है वह अप्रत्यक्ष रूप से राष्टपतीय प्रणाली की ओर जाता है जिसका अर्थ है जनता राष्टपति का चुनाव करती है और राष्टपति शक्तिशाली व्यक्ति होता है। 70 वर्षो से चली आ रही राजनैतिक व्यवस्था मे वोटो के व्यापारी जिस प्रकार बिचौलिये की भूमिका निभाते थे वे समाप्त होगे या एक जुट होकर नरेन्द्र मोदी को समाप्त कर देंगे। यह अभी स्पष्ट नही कहा जा सकता।मै कोई भविष्य वक्ता नही हॅू। मै तो स्पष्ट देख रहा हॅू कि एक तरफ साम्प्रदायिकता जातियता संगठनवाद और सत्ता की जोड तोड मजबूती के साथ खडी है तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने अंगद का पैर इस तरह जमा दिया है उसे हिलाना भी बहुत कठिन हो रहा है। मै तो व्यक्तिगत रूप मे साम्प्रदायिकता जातिवाद परिवारवाद संगठनवाद का विरोधी हॅू किन्तु मै इस कार्य मे मोदी जी की कोई मदद नही कर पा रहा क्योकि मुझे अपने वोट देना नही है । वोट दिलाना भी नही है। मै तो जब तक भारत मे मोदी या कोई अन्य विकृत लोकतंत्र की उठा पटक को छोडकर आदर्श लोकतंत्र अर्थात लोक स्वराज्य या सहभागी लोकतंत्र की दिशा मे नही बढेगा तब तक मै कुछ करने की स्थिति मे नही हॅू। इसलिये मै तो सिर्फ मोदी के सशक्त होने के लिये ईश्वर से प्रार्थना मात्र कर सकता हॅू। मैने तो पिछले चुनाव के पूर्व मे मनमोहन सिंह के लिये भी ऐसी प्रार्थना की थी। किन्तु सोनियां गांधी ने पुत्र मोह मे पडकर मेरी प्रार्थना को ठुकरा दिया था और मनमोहन सिंह सरीखे एक लोक तांत्रिक संज्जन महापुरूष को राजनीति से असफल सिंद्ध किया गया था। उस समय ईश्वर ने मेरी नही सुनी अब क्या होगा मुझे पता नही।नरेन्द्र मोदी से आम जनता को जिस प्रकार की उम्मीदे थी वे पूरी नही हुई , किन्तु पिछले 70 वर्षो मे जितने भी प्रधान मंत्री हुए है उन सबकी तुलना मे नरेन्द्र मोदी ने बहुत कम समय मे बहुत अच्छा काम किया है। अब पुरानी व्यवस्था का तो समर्थन नही किया जा सकता। और यदि नरेन्द्र मोदी से भी कोई अच्छी व्यवस्था दिखाई देती है तब आम लोग वैसा प्रयोग कर सकते है। नीतिश कुमार अखिलेश यादव से अभी भी बहुत उम्मीदे बनी हुई है। नरेन्द्र मोदी उम्मीद से कई गुना अच्छा कार्य कर रहे है और अपनी नई प्रणाली के आधार पर प्रमुख लोगो को नाराज भी कर रहे है। इतिहास रचते रचते गोर्वा चोव गायव हो गये। मोदी का क्या होगा यह भविष्य बतायेगा।चार वर्ष पूर्व भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था मे आमूल चूल बदलाव दिखा। नरेन्द्र मोदी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद 70 वर्षो से लगातार जारी शासन व्यवस्था के तरीके मे आमूलचूल परिवर्तन किये जिसके अच्छे और बुरे परिणाम भी दिखे और आगे भी दिखेगे। मोदी सरकार ने चुनावो के पूर्व जनता से जो वादे किये उनमे से कोई भी वादा पूरा नही हुआ। क्योकि असंभव वादे कर दिये गये थे चाहे 15 लाख की बात हो अथवा रोजगार देने की या भ्रष्टाचार समाप्त करने की । अब भी मोदी सरकार ऐसे ही असंभव वादे करती जा रही है जो पूरे नही हो सकते। वर्तमान सरकार सिर्फ उन्ही कार्यो को आगे बढा रही है जो पिछली सरकारो के समय योजना मे थे या शुरू हुए थे। सिर्फ कार्य प्रणाली बदली है। फिछली सरकार किसी कार्य को पांच वर्ष मे पूरा करने की गति से चलती थी तो वर्तमान सरकार उसे एक वर्ष मे पूरा करने की घोषणा कर देती है। स्वाभाविक रूप से कार्य मे एक की तुलना मे डेढ दो वर्ष लग जाते है । अब इस विलंब को वर्तमान सरकार की सफलता माने या असफलता । लगभग सब प्रकार के कार्यो की गति बहुत तेज हुई है और घोषणा उससे भी अधिक तेज गति की कर दी जाती है। पिछली सरकारे नौकरी को ही रोजगार मानकर चलती थी वर्तमान सरकार ने पकौडा पौलिटिक्स के माध्यम से रोजगार को श्रम के साथ जोडने की शुरूआत की किन्तु हिम्मत टूट गई और फिर उसी परिभाषा पर सरकार आ गई है। वर्तमान सरकार आने के बाद राजनैतिक भ्रष्टाचार मे बहुत कमी आई है। सरकारी कर्मचारियों के भी भ्रष्टाचार मे आंशिक कमी आई है किन्तु जैसा वादा किया गया था उस तरह तेजी से भ्रष्टाचार घट नही रहा है। राजनीति मे परिवार वाद का समापन दिखने लगा है। अब नेहरू गांधी परिवार या लालू मुलायम राम विलास करूणा निधि जैसे परिवारो के राजनैतिक सत्ता विस्तार के दिन गये जमाने की बात बन गये है। अब ये लोग धीरे धीरे या तो अस्तित्वहीन हो जायेगे अथवा अपने मे बदलाव करेंगे। अखिलेश यादव परिवार की अपेक्षा अपनी स्वतंत्र योग्यता पर आगे बढ रहे है किन्तु उन्होने भी मुख्यमंत्री निवास खाली करने के मामले मे अपने उपर एक कलंक जोड लिया है। स्वाभाविक है कि अब भारत मे परिवार वाद के नाम पर राजनीति नही चल पायेगी। वैसे तो लगभग बीस वर्षो से ये लक्षण दिखने लगे थे कि राजनीति मे अच्छे लोग ही आगे बढ पायेंगे। अटल जी मनमोहन सिंह नीतिश कुमार अखिलेख यादव नरेन्द्र मोदी सरीखे अच्छे लोग समाज मे सम्मान पाते रहे और गंदे लोग धीरे धीरे कमजोर होते गये । अब नरेन्द्र मोदी के बाद यह बात और मजबूती से आगे बढी है कि राजनीति मे अच्छे लोग ही आगे बढ पायेगे चाहे वे सत्ता पक्ष मे हो अथवा विपक्ष मे।

मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा

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1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक वह व्यक्ति है एक से अधिक होते ही वह समाज का अंग बन जाता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है किन्तु एक से अधिक होते ही सबकी स्वतंत्रता समान हो जाती है। 3. असीम स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है। यह सीमा वहां तक होती है जहां से किसी अन्य की स्वतंत्रता का उल्लंघन न होता हो। 4. प्राकृतिक रूप से कोई भी दो व्यक्ति किसी भी मामले मे समान नही होते । असमानता प्राकृतिक है और समानता के प्रयत्न करना षणयंत्र। 5. समान स्वतंत्रता प्राकृतिक सिद्धान्त है । समान करने का प्रयास ऐसी समानता को असमान बनाता है। 6. कमजोरो की मदद करना मजबूतो का कर्तब्य होता है, कमजोरो का अधिकार नही । राजनैतिक षणयंत्र इसे कमजोरो का अधिकार बताता है और निकम्मे लोग इस षणयंत्र को अपना हथियार बनाते हे। 7. व्यक्ति दो प्रकार के होते है भावना प्रधान और बुद्धि प्रधान । हर बुद्धि प्रधान बिल्लियो के बीच बंदर की भूमिका मे भावना प्रधान लोगो को ठगने के लिये समानता दूर करने के प्रयास को हथियार बनाते है । 8. हर बुद्धि प्रधान अपने से उपर वाले से स्वतंत्रता चाहता है और अपने से नीचे वालो को स्वतंत्रता नही देना चाहता। 9. गरीब अमीर उंच नीच छोटा बडा, कमजोर और मजबूत भ्रामक शब्द है । हर व्यक्ति अपने से मजबूत की अपेक्षा कमजोर और कमजोर की अपेक्षा मजबूत समझता है। यह सापेक्ष शब्द है निर्पेक्ष नही।वैसे तो पूरी दुनियां मे समानता के नाम पर बहुत बडा षणयंत्र चल रहा है किन्तु भारत मे इसका दूष्प्रभाव सबसे ज्यादा है। समानता लाने के नाम पर जो भी प्रयत्न किये जा रहे है वे सब हर मामले मे असमानता को बढा रहे है। इस मामले मे सबसे अधिक सक्रियता तंत्र से जुडे लोगो की है। ऐसे लोग आर्थिक सामाजिक असमानता दूर करने के नाम पर निरंतर राजनैतिक असमानता बढाते जाते है। यहां तक कि असमानता दूर करने के नाम पर ही तंत्र ने लोक को इतना गुलाम बना लिया है कि वोट देने के अतिरिक्त लोक के पास कोई ऐसी स्वतंत्रता नही बची है, जो तंत्र की दया पर निर्भर न हो। गली गली मे जाति प्रथा छुआछूत महिला उत्पीडन अमीरी और गरीबी रेखा के नाम पर दुकाने खुली हुई है और लगभग सबके तार राजनैतिक सत्ता के प्रयत्न से जुडे दिखते है। राजनीति के नाम पर अलग अलग गिरोह बने हुए है जो समाज के समक्ष तो आपस मे टकराने का नाटक करते है किन्तु खतरा दिखते ही सब एक हो जाते है। समझ मे नही आता कि जब प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता समान है तथा संवैधानिक अधिकार भी एक बराबर है तब ये राजनैतिक नेता और समाज सुधारक किस बात को बराबर करना चाहते है। जब व्यक्तिगत क्षमता प्राकृतिक रूप से असमान होती ही है और उसे किसी भी तरह समान नही किया जा सकता तो फिर समानता के प्रयत्नो का औचित्य क्या है? प्रष्न यह भी उठता है कि समान अधिकारो वाला व्यक्ति कैसे किसी दूसरे की असमानता दूर कर सकता है। किसी भी व्यक्ति या राज्य का यह अधिकार है कि वह किसी भी अन्य की किसी भी रूप मे मदद कर सकता है किन्तु किसी को यह अधिकार नही है कि वह किसी अन्य के अधिकार काटकर किसी अन्य को दे सके क्योकि अधिकार सबके समान होते है।समान स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है । इसमे किसी प्रकार का बदलाव न उचित है न संभव । बिना व्यक्ति की सहमति के इसकी स्वतंत्रता मे कोई कटौती नही की जा सकती। यह भी आवश्यक है कि उसकी सहमति के बाद भी उसकी स्वतंत्रता मे कोई मौलिक समझौता नही किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई समझौता उसकी सहमति के बाद भी तभी तक लागू रह सकता है जबतक उसकी सहमति है। अन्यथा वह समझौता समाज के लिये विचार का आधार बनेगा। ऐसी परिस्थिति मे राज्य समाज की सहमति से बनी हुई एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जो प्रत्येक व्यक्ति की उसकी असीम स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस तरह समानता की यह परिभाषा बनती है कि किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित सीमा रेखा से नीचे वालो को समान सुविधा तथा उपर वालो को समान स्वतंत्रता की गारंटी दी जानी चाहिये। स्वाभाविक है कि राज्य इस निमित्त सबसे अधिक उपयुक्त व्यवस्था है । समाज इस व्यवस्था मे सहायता कर सकता है। मेरे विचार मे किसी प्रकार की असमानता को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि समानता के लिये किये जाने वाले सारे प्रयत्न बंद कर दिये जाये क्योकि ये कानूनी प्रयत्न ही असमानता के प्रमुख कारण है। परिणाम स्वरूप अपने आप सबकी स्वतंत्रता समान हो जायेगी और किसी को कोई प्रयत्न नही करना होगा।

मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”

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कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।
1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।
2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण कर्म स्वभाव के अनुसार होता है। चार वर्ण ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र मे से सिर्फ एक क्षत्रिय को ही हिंसा की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। अन्य तीन के लिये हिंसा प्रतिबंधित है। 3 इस्लाम और साम्यवाद हिंसा को पहला शस्त्र मानते है । इसाई और हिन्दू अंतिम शस्त्र। 4 जब किसी व्यक्ति के किसी मौलिक अधिकार पर हिंसक आक्रमण होता है और न्याय का कोई मार्ग उपलब्ध न हो तभी हिंसा की विशेष अनुमति होती है, अन्यथा नही। 5 किसी भी सरकार को छत्रिय प्रवृत्ति का माना जाता है। अर्थात न्याय और सुरक्षा के लिये उसे हिंसा को पहला शस्त्र मानने का अधिकार है। 6 किसी भी विद्वान व्यवसायी अथवा श्रमिक को कभी भी किसी भी परिस्थिति मे हिंसा का सहारा नही लेना चाहिये। 7 यदि पूरी तरह गुलामी हो ओर मुक्ति का मार्ग न दिखे तब हिंसा या अहिंसा के मार्ग मे से एक चुना जा सकता है । लोकतंत्र मे अहिंसा के अतिरिक्त कोई अलग मार्ग नही है। 8 क्रान्तिकारियो ने गुलामी काल मे हिंसा का मार्ग चुना था। वर्तमान समय मे वे हिंसा का पूरी तरह विरोध करते ।पूरी दुनियां मे हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है । सत्ता के दो केन्द्र इस प्रकार बन रहे है कि ये दो जब चाहे तब सारी दुनियां को विश्व युद्ध मे ले जा सकते है। सारी दुनिया के कई अरब लोग मिलकर भी इन्हे विश्व युद्ध से नही रोक सकते। लेकिन पुरी दुनिया की अपेक्षा भारत की स्थिति कुछ ऐसी है कि यहां सामाजिक वातावरण मे भी हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है। सफलता के लिये फर्स्ट अटैक इज वेल डिफेन्स को सिद्धान्त के रूप मे स्वीकार कर लिया गया है। किसी एक्सीडेन्ट मे आग लगाना तोड फोड करना और हिंसा करना गुंडागर्दी के स्थान पर मजबूरी माना जाने लगा है। हिंसा करने के उद्देश्य से गलतियो के बहाने खोजे जा रहे है। गंभीर मरीज अस्पताल मे आते ही मर जाये तो डाक्टरो और नर्सो के साथ हिंसक वर्ताव प्रतिदिन दिखता है। कानून का पालन करने वाले राजनेता प्रतिदिन हिंसक तरीके से कानून तोडते है किन्तु उसे गुडागर्दी नही कहा जाता । न्यायालयो मे कानून की दुहाई देने वाले वकील भी सडको पर घूम घूम कर कानून तोडना अपना अधिकार समझते है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी अब न्यायालय छोडकर मीडिया से अपनी शिकायत करने लगे है। अपराधी कई कई बार अपराध करने के बाद भी न्यायालय से निर्दोष या जमानत पर बाहर धूमते है और पूलिस ऐसे लोगो को कभी वास्तविक तो कभी फर्जी एनकाउंटर मे मार गिराती है। न्यायालय कानून की बात करते समय बाल की खाल निकालता है तो सरकारे सुरक्षा देने के लिये अधिक से अधिक एन्काउंटर करने को अपनी सफलता घोषित करती है। जब मौलिक अधिकारो पर हिंसक आक्रमण होता हो और न्याय प्राप्ति का कोई मार्ग उपलब्ध न हो तभी हिंसा मजबूरी मानी जा सकती है, अन्यथा नही। मार्ग भी दो प्रकार के है । सामाजिक 2 कानूनी। दोनो ही प्रकार के प्रयत्न किये जा सकते है। तानाशाही से मुक्ति के लिये कभी हिंसा का सहारा लिया जा सकता है। किन्तु लोकतंत्र मे कानून के अतिरिक्त किसी प्रकार की हिंसा का किसी भी परिस्थिति मे कोई औचित्य नही है क्योकि न्याय के सामाजिक तथा कानूनी मार्ग पूरी तरह उपलब्ध होते है। इसके बाद भी भारत मे लगातार हिंसा बढ रही है। भविष्य मे भी कम होने की कोई संभावना नही दिखती।भारत के आम नागरिको मे हिंसा का पक्ष मजबूत किया गया है। बार बार यह बात दुहराई जाती है कि कायरता की अपेक्षा हिंसा अच्छी होती है किन्तु कभी यह नही बताया जाता कि हिन्सा की अपेक्षा अहिंसा अच्छी होती है। कभी कायरता और अहिंसा को ठीक ढंग से परिभाषित भी नही किया गया। इस मामले मे भारतीय वातावरण को खराब करने मे गांधीवादियो का सबसे अधिक योगदान है। गांधीवादियो ने आजतक सिर्फ गांधी की नकल की लेकिन कभी गांधी को नही समझा। भारत का हर गांधीवादी लगभग कायर होता है । वह अहिंसा के पक्ष मे इस प्रकार खुलकर बोलता है कि जैसे वह सबसे बडा अहिंसा का पक्षधर हो किन्तु हिंसक नक्सलवादियों और उग्रवादी मुसलमानो के पक्ष मे सबसे पहले गांधीवादी ही खडे होते है। उन्हे इस्लाम और साम्यवाद की हिंसा नही दिखती किन्तु हिन्दुओ या संघ परिवार की हिंसा बहुत बडी समस्या के रूप मे दिखाई देती है। दुसरी बात यह भी है कि भारत मे तंत्र से जुडा हर व्यक्ति सामाजिक हिंसा का समर्थन करता है। महिलाओ को अपनी सुरक्षा के लिये हिंसा का सहारा लेने के लिये बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है। गरीबो अछूतों आदिवासियो तक को कानून की तुलना मे प्रत्यक्ष मुकाबला करने की सलाह दी जाती है। पारिवारिक वातावरण से भी बचपन मे ही हिंसा की ट्रेनिंग मिलने लगती है। बच्चो को सिखाया जाता है कि गलत बात बर्दास्त नही करनी चाहिये। उन्हे यह ट्रेनिंग नही दी जाती कि गलत बात का विरोध करने का सामाजिक और संवैधानिक क्या तरीका है और विरोध करने की सीमाएं क्या है। बचपन से ही बच्चे को गाय और शेर की प्रवृत्ति मे शेर बनना अधिक अच्छा बताया जाता है । गाय को कायरता का और शेर को बहादुरी का मापदंड घोषित किया जाता है। विचार परिवर्तन के लिये विचार मंथन की जगह विचार प्रचार का सहारा लिया जाता है। एक झूठ को बार बार बोलकर सच सिद्ध कर दिया जाता है। किसी भी हिंसा को कभी भी मजबूरी के रूप मे बदलकर न्योचित बता देना आम बात हो गई है।आम नागरिक राज्य से सुरक्षा और न्याय की उम्मीद करता है। जब उसे राज्य से सुरक्षा और न्याय नही मिलता तब वह सुरक्षा और न्याय के लिये व्यक्तिगत प्रयास करता है और व्यक्तिगत प्रयास ही धीरे धीरे हिंसक वातावरण मे बदल जाते हेै। समाज मे हिंसा के बढते वातावरण का मुख्य कारण राज्य मे अहिंसा का बढता प्रभाव माना जाना चाहिये। राज्य यदि समुचित बल प्रयोग न करके न्यूनतम बल प्रयोग का सहारा लेगा तब परिणाम स्वरूप समाज मे हिंसा बढेगी ही। वर्तमान समय मे भारत विचारो के अभाव का देश बन गया है। जो भारत पहले दुनिया को विचारो का निर्यात करता था। वही भारत अब दुनियां से विचारो की नकल करता है। यहां तक कि भारत का संविधान भी पूरी तरह नकल पर आधारित है। भारत की न्यायपालिका इस प्रकार विदेशो की नकल करती है कि चाहे निन्यानवे अपराधी छूट जाये किन्तु किसी निरपराध को दंडित नही होना चाहिये। अपने को निर्दोष सिद्ध करने का दायित्व अपराधी पर न डालकर पुलिस पर डाल दिया जाता है। पुलिस द्वारा घोषित अपराधी को संदिग्ध अपराधी न मानकर निर्दोष माना जाता है। पुलिस और न्यायालय ओभर लोडेड कर दिये गये है किन्तु इन दोनो विभागो के खर्चे का कुल बजट एक प्रतिशत से भी कम रहता है जबकि शिक्षा पर ही छ प्रतिशत का बजट लग जाता है। सरकारे भी न्याय और सुरक्षा के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार करती है। बलात्कार की तुलना मे वैष्या वृत्ति मिलावट की तुलना मे मूल्य नियंत्रण और अपराध नियंत्रण की जगह शराब बंदी मांस बंदी जैसे कानून बनाने के प्रयास किये जाते है। जीव दया जैसे अनावश्यक कानून भी भारत मे बनाकर रखे जाते है। आपराधिक मुकदमे भले ही बीस तीस वर्ष तक चलते रहे किन्तु महिलाओ से छेडछाड या हरिजन आदिवासी अत्याचार के मुदकमे त्वरित निपटाने के प्रयास किये जाते है। तंत्र से जुडे तीनो भाग अपराधियों के प्रति लोक तांत्रिक बने रहने का शत प्रतिशत प्रयत्न करते है किन्तु अपराध पीडित व्यक्ति को न्याय के लिये समाज पर छोड देते है। किसी अपराधीके साथ अन्याय न हो इस बात की पूरी कोशिश की जाती है। भले ही वह न्याय किसी निरपराध के प्रति अन्याय ही क्यो न हो। परिणाम होता है कि समाज महसूस करने लगता है कि कानून मे असीमित विलंब है, न्याय की कोई उम्मीद नही है, भीड ही उसे सुरक्षा दे सकती है इसलिये वह हिंसा पर विश्वास करने लग जाता है। छोटे से छोटे गांव से शहर तक लोग अपनी सुरक्षा के लिये किसी स्थानीय दबंग के साथ इसलिये जुड जाते हे कि वह दबंग कम से कम उसके साथ अन्याय नही करेगा और दूसरे से होने वाले अन्याय मे उसे सुरक्षा भी देगा। इस तरह सरकार और कानून की तुलना मे उसे दबंगो से अधिक सुरक्षा की गारंटी भी मिलती है।समाधान बहुत कठिन है। समस्या विश्व व्यापी तो है ही किन्तु भारत के लिये तो नासूर का रूप ले चुकी है। कुछ कठोर कदम उठाने होगे। कानून पर विश्वास बढे इसके लिये कानून को मजबूत और परिणाम मूलक बनाना होगा । सुरक्षा और न्याय या तो राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बनायी जाय अथवा इसके लिये एक अलग से विभाग हो जिसे कोई अन्य कार्य न दिया जाये। अपराध को ठीक ढंग से परिभाषित किया जाये । कानूनी या अनैतिक कार्यो को अपराध से बाहर कर दिया जाये। न्यायपालिका इतनी मजबूत हो कि वास्तविक या फर्जी एनकाउंटर की आवश्यकता न पडे। विशेष समस्या ग्रस्त जिलो मे गुप्त मुकदमा प्रणाली के रूप मे विशेष न्यायिक प्रावधान लागु किये जाये जिससे दबंग लोगो के अंदर डर पैदा हो। स्वाभावि़क है कि गुप्त मुकदमा प्रणाली का डर समाज मे कानून के प्रति विश्वास पैदा करेगा । ये छोटे छोटे दो तीन कार्य समाज मे बढते हिंसा के प्रति विश्वास से मुक्ति दिला सकते है।

मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”

Posted By: kaashindia on February 22, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति किये जाने वाले कार्य पर निर्भर होता है, चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा। कोई व्यक्ति बिना सोचे तत्काल किसी कार्य को बार बार करने लगता है तब वह उस व्यक्ति की आदत मान ली जाती है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह संस्कार बन जाती है। ऐसे संस्कार किसी इकाई के अधिकांश लोगो के हो जावे तब वह उस इकाई की संस्कृति मान ली जाती है। सोच समझकर लिया गया निर्णय और तदनुसार किया गया कार्य संस्कार नही माना जाता है । धर्म व्यक्तिगत होता है समूह गत नही होता जबकि संस्कृति समूहगत होती है व्यक्तिगत नहीं। हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति को लगभग एक ही बताया जाता है इसलिये दोनो के बीच अंतर करना बहुत कठिन कार्य है। किन्तु मुझे दोनो के बीच मे बहुत अंतर दिखता हैं इसलिये मै इस विषय की विस्तृत समीक्षा कर रहा हॅू। करीब एक हजार वर्ष पहले जब तक भारत मे विदेशी गुलामी नही आयी थी तब तक भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृत एक मानी जाती थी । इस संस्कृति मे जैन बौद्ध सिख आर्य वैदिक और सनातनी मिलकर माने जाते है। जबसे भारत मे इसाई और मुसलमान शासक के रूप मे स्थापित हुए उस समय से हिन्दू संस्कृति पर धीरे धीेरे विदेशी संस्कृति का प्रभाव पडना शुरू हुआ। स्वाभाविक है कि प्राचीन संस्कृति मे धीरे धीरे विदेशी संस्कृति की मिलावट हुई और स्वतंत्रता के बाद जब उस संसकृति मे साम्यवाद शामिल हुआ तब वह मिलावट बहुत ज्यादा हो गई। इसलिये स्पष्ट है कि हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति मे इतना अधिक अंतर हो गया कि दोनो मे समानता खोजना ही बहुत कठिन हो गया।
हम भारत की प्राचीन संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के नाम से नामकरण कर रहे है । प्राचीन संस्कृति मे विचार प्रधान होता था और विचारो के आधार पर निकले निष्कर्ष को शेष समाज अपनी संस्कृति के रूप मे विकसित करता था। हिन्दू संस्कृति मे त्याग महत्वपूर्ण था, गुलामी के बाद विकसित भारतीय संस्कृति मे त्याग की जगह संग्रह प्रधान बन गया। विचारो के स्थान पर भी सत्ता और धन महत्वपूर्ण हो गये। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे स्पष्ट देखा जा सकता है कि धन और पद के लिये इतनी अधिक छीना झपटी हो गई है कि हर नई पीढी का सदस्य धन और पद की छीना झपटी मे इस तरह लग गया है कि उसे नैतिकता या अनैतिकता की न कोई चिंता है न ज्ञान। इसी तरह हिन्दू संस्कृति मे वर्ग समन्वय महत्वपूर्ण था। कोई भी समूह सख्या विस्तार को महत्व नही देता था बल्कि हर समूह गुण प्रधानता को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। भारतीय संस्कृति मे हिन्दू संस्कृति के ठीक विपरीत संख्या विस्तार को महत्व दिया जाने लगा । येन केन प्रकारेण हिन्दू संस्कृति के लागो की मान्यता और विष्वास को बदलकर उसे अपने साथ ले लेने को महत्व दिया गया । दुनिया मे हिन्दू संस्कृति आज तक ऐसा कीर्तिमान बनाये हुए है कि वह किसी अन्य संस्कृति के व्यक्ति को किसी तरह अपने साथ शामिल करने का प्रयत्न नही करती। अन्य विदेशी संस्कृतियां इन सब प्रयत्नो मे कितना भी नीचे उतरने के लिये तैयार रहती है। हिन्दू संस्कृति गुलामी सह सकती है किन्तु गुलाम नही बना सकती । वर्तमान भारतीय संस्कृति गुलामी सह तो सकती ही नही है बल्कि गुलाम बनाने को अपनी सफलता मानने लगी है। यही कारण है कि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे निरंतर हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है। यह भी प्रत्यक्ष है कि हिन्दू संस्कृति अपने को सुरक्षात्मक मार्ग पर आगे बढ रही है तो भारतीय संस्कृति विस्तार वादी नीति पर चल रही है। हिन्दू संस्कृति का पक्षधर एक महत्वपूर्ण अंश संघ परिवार के नाम से भारतीय संस्कृति के मार्ग पर तेजी से बढने का प्रयास कर रहा है। नई पीढी शराफत को छोडकर अधिक से अधिक चालाक बनने की ओर अग्रसर है। वर्तमान भारतीय संस्कृति एक मुख्य पहचान बना चुकी है कि मजबूत से दबो और कमजोर को दबाओ। इसका प्रमुख कारण है कि प्राचीन हिन्दू संस्कृति मे संगठन का कोई महत्व नही था जबकि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे सगठन को ही सबसे अधिक सफलता का मापदंड मान लिया गया है। गर्व के साथ संधे शक्ति कलौ युगे का खुले आम नारा लगाया जाता है। मै समझता हॅू कि हिन्दू संस्कृति पर आये विस्तारवादी संकट से सुरक्षा की आवश्यकता समझकर कुछ लोगो ने यह नारा लगाया है कि किन्तु यह नारा हिन्दू संस्कृति की परंपरा और पहचान के रूप मे स्वीकार नही किया जा सकता। प्राचीन संस्कृति मे व्यवस्था प्रमुख थी, राजनैतिक व्यवस्थ का हस्तक्षेप सामाजिक व्यवस्था मे न्युनतम था। दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था भी राजनैतिक व्यवस्था मे हस्तक्षेप नही करती थी। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे धन और सत्ता इतने महत्व पूर्ण हो गये है कि इन्होने मिलकर पूरे समाज को ही गुलाम बना दिया । प्राचीन हिन्दू संस्कृति लगभग सत्ता निरपेक्ष थी लेकिन वर्तमान भारतीय संस्कृति पूरी तरह सत्ता और धन सापेक्ष हो गई है। हिन्दू संस्कृति मे वसुधैव कुटुम्बकम सर्वधर्म समभाव का महत्व था। उस समय धर्म और राष्ट्र की तुलना मे समाज को सर्वाधिक महत्व पूर्ण माना जाता था। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते थे । वर्तमान भारतीय संस्कृति मे समाज और धर्म की परिभाषा भी बदल दी गई और महत्व भी बदल दिया गया। अब समाज की जगह या तो धर्म को उपर माना जाता है या राष्ट को। धर्म का अर्थ गुण प्रधान से बदलकर पहचान प्रधान हो गया है तो राष्ट का अर्थ बदलकर राज्य तक सीमित हो गया है। अब समाज सर्वोच्च तो रहा ही नही । हमारी प्राचीन संस्कृति मे नैतिक प्रगति को भौतिक उन्नति की तुलना मे अधिक महत्व दिया जाता था। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे नैतिक पतन की तो कोई चिंता ही नही है। भौतिक उन्नति ही सब कुछ मान ली गई है। इस तरह यदि हम वर्तमान भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण व्याख्या करे तो उसमे दो निष्कर्ष निकलते है। 1 कमजोर को दबाना और मजबूत से दबना। 2 कम से कम परिश्रम और अधिक से अधिक लाभ का प्रत्यन करना । दोनो दिशाओ मे भारत दूनिया के अन्य देशो की तुलना मे अधिक तेज गति से छलांग लगा रहा है। हम इसके कारणो पर विचार करे तो पायेंगे कि हमारी प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा के लिये धर्मगुरू और राजनेता महत्वपूर्ण हुआ करते थे। सम्पूर्ण समाज इन दो के पीछे चला करता था। आज भी सम्पूर्ण समाज तो इन दो के पीछे चल रहा है किन्तु इन दोनो की नीयत खराब हो गई है। धर्मगुरू भी समाज को गुलाम बनाने का प्रयास कर रहे है जबकि उन्हे मार्ग दर्शन देना चाहिये था तो सत्ता भी गुलाम बनाने का प्रयास कर रही है जबकि उन्हे सुरक्षा और न्याय की गारंटी देनी चाहिये थी। हमारी प्राचीन हिन्दू संस्कृति मे प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा और न्याय की गारंटी थी, प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार प्राप्त थे। समाज किसी को भी अनुशासित तो कर सकता था किन्तु दंडित नही कर सकता था । वर्तमान संस्कृति मे समाज विदेशियो की नकल करके दंडित करना सीख गया तो राज्य समाज के हाथ से अनुशासित करने के अधिकार को भी छीन चुका है। अब खाप पंचायते दंड भी देने लग गई है तो राज्य समाज को बहिष्कार के अधिकार से भी वंचित कर रहा है। प्राचीन और वर्तमान संस्कृति मे आये बदलाव का परिणाम साफ दिख रहा है। परिवार व्यवस्था टूट रही हैे। राज्य व्यवस्था भी अव्यवस्था की तरफ जा रही है। सुरक्षा और न्याय पर से विश्वास घटकर सामाजिक हिंसा पर विश्वास बढ रहा है। लोकतंत्र की जगह तानाशाही की आवश्यकता महसूस हो रही है। सम्पूर्ण समाज किं कर्तब्य विमूढ की स्थिति मे है। वह अपनी गौरव शाली प्राचीन संस्कृति का अनुकरण करके ठगा जाता रहे अथवा वर्तमान भारतीय संस्कृति के साथ घुल मिलकर समाज को ठग ले यह निश्चय करना कठिन हो रहा है। ऐसी परिस्थिति मे क्या करना चाहिये यह बहुत कठिन है। न तो हम ठगे जाने तक की शराफत की सलाह दे सकते है न ही ठग लेने तक की चालाकी को हम अच्छा मान सकते है। इसलिये जो कुछ हमारी हिन्दू संस्कृति का आधार है उसका ही आखं मूदंकर अनुकरण किया जाये इससे मै सहमत नही। साथ ही मै इस धारणा के भी विरूद्ध हॅू कि जो कुछ पुराना है वह पूरी तरह रूढिवादी है , विकास विरोधी है और उसे आंख मुदकर बदल देना चाहिये । मै तो इस मत का हॅू कि हम शराफत और चालाकी की जगह समझदारी से काम ले अर्थात प्राचीन हिन्दू संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति के सैद्धान्तिक गुण दोषो की विवेचना करके उन्हे व्यावहारिक धरातल की कसौटी पर कसा जाये। उसके बाद कोई मार्ग समाज को दिया जाये इस संबंध मे मेरा विचार यह है कि सबसे पहले पूरे भारत मे इस धारणा को विकसित किया जाये कि समाज सर्वोच्च है धर्म और राष्ट्र उसके सहायक या प्रबंधक है । परिवार को समाज की प्राथमिक और अनिवार्य इकाई माना जाये । अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी के साथ मिलकर सहजीवन मे जीवन जीने की शुरूआत करनी होगी । परिवार के बाद गांव को भी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई माना जाये। भारतीय संविधान मे से धर्म और जाति की जगह परिवार ओर गांव को शामिल किया जाये।

व्यवस्था के मार्ग दर्शन का अंतिम अधिकार धर्मगुरूओ तथा राजनेताओ से निकाल कर संपूर्ण समाज की भूमिका महत्वपूर्ण की जाये। इसका अर्थ हुआ कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र से निकालकर लोक को अथवा लोक द्वारा बनायी गई किसी व्यवस्था को दिया जाये जिसमे तंत्र से जुडी किसी इकाई का कोई हस्तक्षेप न हो । यहां से हम शुरूआत करे तो आगे आगे कुछ और मार्ग निकल सकते है जिसके परिणाम स्वरूप प्राचीन संस्कृति और वर्तमान संस्कृति के बीच का कोई संशोधित मार्ग निकल सकता है जो हमारे लिये आदर्श बने । नोट- मंथन का अगला विषय समाज मे बढता हिंसा पर विश्वास के कारण और निवारण

मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित

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कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट रखे। भारत में स्वतंत्रता पूर्व के शासक समाज को गुलाम बनाकर रखने के उद्देश्य से सरकारी कर्मचारियों को अधिक से अधिक सुविधाएॅं देने की नीति पर काम करते रहे। स्वतंत्रता के बाद भी शासन की नीयत में कोई बदलाव नहीं आया। इसलिये उनकी मजबूरी थी कि वे अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएॅं भी दें और संतुष्ट भी रखें।
प्रारंभिक वर्षों में सरकारी कर्मचारियों में असंतोष नहीं के बराबर था किन्तु जब उन्होंने देखा कि भारत का राजनेता सरकारी धन सम्पत्ति को दोनों हाथों से लूटने और लुटाने में लगा है तो धीरे धीरे इनके मन में भी लूट के माल में बंटवारे की इच्छा बढ़ी। सरकार के संचालन में राजनैतिक नेताओं के पास निर्णायक शक्ति होने के बाद भी उन्हें हर मामले में कर्मचारियों की सहायता की आवश्यकता होती थी क्योंकि संवैधानिक ढांचे के चेक और बैलेन्स सिस्टम में कर्मचारी भी एक पक्ष होता है। अतः व्यक्तिगत रूप से कर्मचारी लोग नेताओं के भ्रष्टाचार के सहायक और हिस्सेदार होते चले गये। किन्तु यदि हम भ्रष्टाचार की चर्चा न भी करें तो शासकीय कर्मचारी अपने पास अधिकार होते हुए भी एक पक्ष को इस तरह अकेले अकेले खाते नहीं देख सकता था। अतः उसने धीरे धीरे दबाव बनाना शुरू किया। दूसरी ओर सरकार ने भी नये नये विभाग बनाकर इनकी संख्या बढ़ानी शुरू कर दी और ज्यों ज्यों सरकारी कर्मचारियों की संख्या आबादी के अनुपात से भी कई गुना ज्यादा बढ़ने लगी त्यों त्यों उनकी ब्लैकमेलिंग की क्षमता भी बढ़ती चली गई। इस तरह भारत में लोक और तंत्र के बीच एक अघोशित दूरी बढ़ती चली गई जिसमें सरकार समाज की स्वतंत्रता की लूट करती रही, नेता भ्रष्टाचार के माध्यम से लूट लूट कर अपना घर भरते रहे और शासकीय कर्मचारी ब्लैकमेल करके इस लूट के माल में अपना हिस्सा बढ़ाते रहे।
किसी सरकारी कर्मचारी को इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसकी जरूरतें क्या हैं? न ही उसे इस बात से मतलब है कि भारत के आम नागरिक का जीवन स्तर क्या है। उसे इस बात से भी मतलब नहीं कि उसी के समकक्ष गैर सरकारी कर्मचारी के वेतन और सुविधाओं की तुलना में उसे प्राप्त वेतन और सुविधाएॅं कितनी ज्यादा हैं। उसे तो मतलब है सिर्फ एक बात से कि लोकतांत्रिक भारत में जो धन और अधिकारों की लूट मची है उस लूट में उसकी भी सहभागिता है। उस लूट के माल में हिस्सा मांगना उसका न्यायोचित कार्य है। यदि ठीक से सोचा जाये तो उसका तर्क गलत भी तो नहीं है। कर्मचारी लोक का तो भाग है नहीं। है तो वह तंत्र का ही हिस्सा। फिर वह अपने हिस्से की मांग से पीछे क्यों रहे? कुछ प्रारंभिक वर्षों में शिक्षक और न्यायालयों से संबद्ध लोग ऐसा करना अनुचित मानते थे किन्तु अब तो वे भी धीरे धीरे उसी तंत्र के भाग बन गये हैं। न्यायपालिका और विधायिका का वर्तमान टकराव तथा न्यायपालिका मे आपसी टकराव स्पष्ट प्रमाणित करता है कि सब जगह पावर या धन के अतिरिक्त समाज सेवा का नाम सिर्फ ढोंग है जो समय समय पर लोक को धोखा देने के लिये उपयोग किया जाता है।
सरकारी कर्मचारी अपना वेतन भत्ता बढ़वाने के लिये कई तरह के मार्ग अपनाते हैं। उसमें मंहगाई का आकलन भी एक है। भारत में स्वतंत्रता के बाद के सत्तर वर्षों में रोटी, कपड़ा, आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में औसत साठ पैसठ गुने की वृद्धि ही हुई है लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद छियानवे गुनी मूल्य वृद्धि हो चुकी है। छियानवे गुनी वेतन वृद्धि तो इनकी जायज मांग मान ली जाती है। यदि भारत में आवश्यक वस्तुओं के औसत मूल्य पांच प्रतिशत बढ़ते हैं तो सरकारी आंकड़े उन्हें सात आठ दिखाते हैं क्योंकि आंकड़े बनाने में कुछ और भी अनावश्यक चीजें शामिल कर दी जाती हैं। इसके बाद भी कई तरह के दबाव बनाकर इनके वेतन और सुविधाओं में वृद्धि होती ही रही है। स्वतंत्रता के बाद आज तक समकक्ष परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारी का वेतन करीब दो सौ से ढाई सौ गुना तक बढ़ गया है। उपर से प्राप्त सुविधाओं को तो जोड़ना ही व्यर्थ है। समाज इस पर उंगली उठा नहीं सकता क्योंकि जब नेता ने अपना वेतन भत्ता इनसे भी ज्यादा बढ़ा लिया तथा नेता ने अपनी उपरी आय भी बढ़ा ली तो कर्मचारी बेचारा क्यो न बढावे? सरकार और नेता सरकारी कर्मचारियों की ब्लैकमेलिंग से बचने के लिये कभी निजीकरण का मार्ग निकालते हैं तो कभी संविदा नियुक्ति जैसा। तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर कर्मचारी भी किसी न किसी रूप में इन तरीकों की काट खोजते रहते हैं। और यदि शेष समय में कर्मचारी दब भी जावे तो चुनावी वर्ष में तो वह अपना सारा बकाया सूद ब्याज समेत वसूल कर ही लेता है। अभी कुछ प्रदेशो और केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। कर्मचारी लंगोट कसकर चुनावों की प्रतीक्षा कर रहा है। चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही उसकी सांकेतिक हड़ताल और अन्य कई प्रकार के नाटक शुरू हो जायेंगे। प्रारंभ में सरकार भी उन्हें दबाने का नाटक करेगी। कुछ लोगों का निलम्बन और कुछ की बर्खास्तगी भी होगी। समझौता वार्ता भी चलेगी और अन्त में कर्मचारियों की कुछ मांगे मान कर आंदोलन समाप्त हो जायेगा। हड़ताल अवधि में की गई सारी प्रशासनिक कार्यवाही वापस हो जायेगी क्योंकि सभी नेता जानते हैं कि कर्मचारी चुनावों में जिसे चाहें उसे जिता या हरा सकते हैं। यद्यपि कर्मचारियों की कुल संख्या मतदाताओं की तीन प्रतिशत के आस पास ही होती है किन्तु उनके परिवार, उनके गांव गांव तक फैलाव और उनके एकजुट प्रयत्नों को मिलाकर यह अन्तर सात आठ प्रतिशत तक माना जाता है। आम तौर पर शायद ही कोई नेता हो जो इतना अधिक लोकप्रिय हो कि इतना बड़ा फर्क झेल सके अन्यथा दो तीन प्रतिशत का फर्क ही हार जीत के लिये निर्णायक हो सकता है। नेता को हर पांच वर्ष में जनता का समर्थन आवश्यक होता है जबकि सरकारी कर्मचारी को किसी प्रकार के जनसमर्थन की जरूरत नहीं। चुनावों के समय नेताओं के दो तीन गुट बनने आवश्यक हैं जबकि ऐसे मामलों में सभी कर्मचारी एक जुट हो जाते हैं। फिर उपर से यह भी कि कर्मचारियों को सुविधा देने से नेता को न व्यक्तिगत हानि है न सरकारी क्योंकि अन्ततोगत्वा सारा प्रभाव तो जनता को झेलना है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेता स्वयं अपनी सब प्रकार की सुख सुविधाएॅं बढ़ाता जाता है तो उसका नैतिक पक्ष भी मजबूत नहीं रहता। यही कारण है कि कर्मचारियों का पक्ष जनविरोधी, अनैतिक ब्लैकमेलिंग होते हुए भी नेता झुककर उनसे समझौता करने को मजबूर हो जाता है।
अधिकांश कर्मचारी नौकरी पाते समय ही भारी रकम देकर नौकरी पाते हैं। बहुत कम ऐसे होते हैं जो बिना पैसे या सिफारिश के नौकरी पा जायें। स्वाभाविक है कि उनसे इमानदारी या चरित्र की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो व्यक्ति घर के बर्तन या जमीन बेचकर एक नौकरी पाता है वह भ्रष्टाचार भी करेगा और ब्लैकमेलिंग भी करेगा। यदि नहीं करेगा तो परिवार से भी तिरस्कृत होगा और अन्य कर्मचारियों में भी मूर्ख ही माना जायेगा। ऐसी विकट परिस्थिति आज सम्पूर्ण भारत की है। चाहे केन्द्र सरकार के कर्मचारी हों या प्रदेश सरकार के। सबकी स्थिति एक समान है। चाहे हवाई जहाज के पायलट हो या बैंक कर्मचारी या कोई चपरासी। चाहे दस हजार रूपया मासिक वाला छोटा कर्मचारी हो या लाख दो लाख रूपया मासिक वाला सुविधा सम्पन्न कर्मचारी। सबकी मानसिकता एक समान है, सबकी एक जुटता एक समान है, सब स्वयं को तंत्र का हिस्सा मानते हैं। लोक को गुलाम बनाकर रखने में भी सब एक दूसरे के सहभागी हैं और लोक को नंगा करने में भी कभी किसी को कोई दया नहीं आती।
कोई भी सरकार चाहे कितना भी जोर लगा दे चुनाव के समय उसे कर्मचारियो के समक्ष झुकना ही पडेगा । 130 करोड की आबादी मे 127 करोड लोक के लोग है तो 3 करोड तंत्र से जुडे। इसमे भी नेताओ की कुल संख्या कुछ लाख तक सीमित है। ये ढाई करोड कर्मचारी तो परिस्थिति अनुसार एक जुट हो जाते है किन्तु पचास लाख राजनेता चुनावो के समय दो गुटो मे बट जाते है। इस समय उन्हे न देश दिखता है न समाज । इस समय उन्हे न न्याय दिखता है न व्यवस्था । उन्हे दिखता है सिर्फ चुनाव और किसी भी परिस्थिति मे वे मुठठी भर संगठित कर्मचारियों का समर्थन आवश्यक समझते है। यही कारण है कि 127 करोड का लोक इन नेता और कर्मचारी के चक्रव्यूह से अपने को कभी बचा नही पाता।
विचारणीय प्रश्न यह है कि इस स्थिति से निकलने का मार्ग क्या है? नेता चाहता है कि जनता सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ खड़ी हो। यह संभव नहीं क्योंकि जनता ने तो नेता को चुना है और नेता द्वारा बनाई गई व्यवस्था द्वारा सरकारी कर्मचारी नियुक्त होते हैं। कर्मचारियों की नियुक्ति में जनता का कोई रोल नहीं होता। जनता जब चाहे कर्मचारी के विरूद्ध कुछ नहीं कर सकती जब तक उसका काम नियम विरूद्ध न हो। दूसरी ओर नेता को जो शक्ति प्राप्त है वह जनता की अमानत है। जनता जब चाहे नेता को बिना कारण हटा सकती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों के विरूद्ध जन आक्रोश का कोई परिणाम संभव नहीं। उचित तो यही है कि इस विकट स्थिति से निकलने की शुरूआत नेता से ही करनी पड़ेगी। यदि कर्मचारी ब्लैकमेल करता है तो उसका सारा दोष नेता का है। नेता ही समाज के प्रति उत्तरदायी है। यही मानकर आगे की दिशा तय होनी चाहिये।
यह स्पष्ट है कि नेता कर्मचारी का गठबंधन टूटना चाहिये और अनवरत काल तक कभी टूटेगा नही । यदि नेता चाहे भी तो टूट नही सकेगा। इसका सबसे अच्छा समाधान सिर्फ निजीकरण है। अनावश्यक विभाग समाप्त हो राज्य सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो कर्मचारियो की संख्या अपने आप कम हो जायेगी। राज्य रोजगार और नौकरी की अबतक चली आ रही परिभाषाओ को बदले । राज्य का काम रोजगार के अवसर पैदा करना होता है न कि नौकरी के माध्यम से रोजगार देना । यह तो गुलामी काल की परिभाषा थी जिसे अबतक बढाया जा रहा है। मौलिक परिवर्तन की आवश्यकता है और इसके लिये जनजागरण करना होगा । कोई भी सरकारी कर्मचारी जान दे देगा किन्तु निजीकरण नही होने देगा। कोई भी नेता भले ही निजीकरण की बात करे किन्तु घुमफिर कर निजीविभागो पर अनावश्यक नियंत्रण करके उन्हे परेशान करेगा जिससे वे तंत्र के चंगुल मे बने रहे। समस्या विकट है समाधान करना होगा और इसके लिये जनजागरण ही एक मात्र मार्ग है।

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