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मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’

Posted By: kaashindia on March 8, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः-
1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपूर्ण होती हैं।
2। परिवार में महिला या पुरूष एक-दूसरे के पूरक होते हैं। परिवार की आंतरिक व्यवस्था में महिलाए तथा बाह्य में पुरूष प्रधान होते हैं किन्तु कुल मिलाकर सब बराबर हैं।
3। सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों से कम तथा सम्मान सुरक्षा पुरूषों से अधिक होती है।
4। परंपरागत परिवारों में आयी विकृतियों के कारण महिलाए पारम्परिक व्यवस्था की अपेक्षा आधुनिकता की ओर तेजी से बढ रही हैं।
5। पुरूष प्रधान व्यवस्था विकृति नहीं बल्कि व्यवस्था है किन्तु परिवार का प्रमुख, परिवार प्रमुख तक सीमित रहना चाहिये, मालिक नहीं। वर्तमान पारंपरिक परिवारों में मुखिया मालिक बन गये जो एक मुख्य विकृति है।
6। परंपरागत परिवारों की महिलाओं में घुटन अधिक है टूटन कम। आधुनिक महिलाओं में परिवार के प्रति टूटन अधिक है घुटन कम। दोनों स्थितियां ठीक नहीं।
7। अनुशासन और नियंत्रण अलग-अलग होते हैं। परंपरागत परिवारों में अनुशासन की जगह नियंत्रण बढा और आधुनिक परिवारों में अनुशासन की जगह उच्श्रृंखलता।
8। परंपरागत महिलाए परिवार के सुचारू संचालन, सन्तानोत्पत्ति तथा बच्चों के नैतिक विकास को अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं तो आधुनिक महिलाए स्वतंत्रता, सेक्स तथा बच्चों के भौतिक विकास को अधिक महत्तवपूर्ण मानती हैं।
9। परंपरागत महिलाए सहजीवन को भौतिक विकास की तुलना में अधिक महत्व देती हैं तो आधुनिक महिलाए भौतिक विकास को सहजीवन की तुलना में अधिक महत्व देती हैं।
10। परंपरागत परिवार व्यवस्था में सुधार तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था पर अंकुश आवश्यक है। परंपरागत या आधुनिक परिवार की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था एकमात्र समाधान है।
परिवार समाज व्यवस्था की पहली संगठनात्मक इकाई है। सेक्स की भूख, सन्तानोत्पत्ति, सहजीवन की ट्रेनिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य एक साथ सम्पन्न होने की पहली कार्यशाला है परिवार। परिवार के सभी उद्देश्य ठीक-ठाक पूरे हों इसके लिये महिला और पुरूष का एक साथ एकाकार स्वरूप में रहना आवश्यक है। अब तक भारत की परंपरागत परिवार व्यवस्था को दुनियां में सर्वाधिक सफल माना गया किन्तु धीरे-धीरे उसमें आयी कुछ विकृतियों के कारण अब उसका स्थान पाश्चात्य परिवार व्यवस्था लेती जा रही है। महिलाओं की भूमिका परिवार व्यवस्था के सफल संचालन में बहुत महत्वपूर्ण होती है और वर्तमान समय में महिलाओं में परंपरागत परिवार की अपेक्षा आधुनिक परिवार की ओर तेजी से कदम बढ रहे हैं इसलिये इसके कारण, लक्षण, परिणाम और समाधान की चर्चा आवश्यक है।
परंपरागत और आधुनिक महिलाओं के रहन-सहन, प्राथमिकताए तथा जीवन प्रणाली में कई अन्तर स्पष्ट हैं।
1। परंपरागत महिलाए कर्तव्य प्रधान होती हैं। वे कभी समान अधिकार की भी मांग नहीं करतीं। वे परिवार में होने वाले अपने शोषण के विरूद्ध चुप रहती हैं। आधुनिक महिलाए समान अधिकार से भी संतुष्ट नहीं। उन्हें समान अधिकार भी चाहिये तथा विशेष अधिकार भी चाहिये। परंपरागत महिलाए त्याग प्रधान होती हैं, आधुनिक महिलाए संग्रह प्रधान होती हैं।
2। परंपरागत महिलाए सेक्स की तुलना में सन्तानोत्पत्ति को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाओं में सन्तानोत्पत्ति के प्रति अरूचि और सेक्स के प्रति अधिक आकर्षण होता है।
3। परंपरागत महिलाए सहजीवन को अधिक महत्वपूर्ण मानकर संयुक्त परिवार को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देकर परिवारों को छोटे से छोटा करने को महत्वपूर्ण मानती हैं।
4। परंपरागत महिलाए भावना प्रधान अधिक होती हैं बुद्धि प्रधान कम। आधुनिक महिलाए बुद्धि प्रधान अधिक होती हैं, भावना प्रधान कम।
5। परंपरागत महिलाए नैतिकता को भौतिकता की तुलना में अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाए भौतिक उन्नति के लिये नैतिकता से जल्दी समझौता करने को तैयार रहती हैं।
6। परंपरागत महिलाए अन्य पुरूषों से आवश्यकता से अधिक दूरी बना कर रखती हैं। यदि इनके साथ कोई साधारण छेडछाड की आपराधिक घटना हो तो या तो छिपाती हैं या सामाजिक स्तर से निपटाना चाहती हैं। आधुनिक महिलाए अन्य पुरूषों के साथ कम से कम दूरी बनाने की कोशिश करती हैं तथा मामूली छेडछाड की घटना में आसमान सर पर उठा लेती हैं।
7। परंपरागत महिलाए परिवार या रिश्तेदारी तक आकर्षक तथा बाहर में अनाकर्षक पोषाक, हावभाव, बोलचाल का प्रयोग करती हैं। आधुनिक महिलाए परिवार में अनाकर्षक तथा बाहर में आकर्षक पोषाक, हावभाव तथा बोलचाल व्यवहार करती हैं।
एक अनुमान के अनुसार अब भी भारत में लगभग अठान्नवे प्रतिशत महिलाए पारंपरिक जीवन पद्धति में शामिल हैं तो दो प्रतिशत अति आधुनिक प्रणाली में। भौतिक विकास के आकलन में भी ये दो प्रतिशत आधुनिक परिवार अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो नैतिक पतन में भी। परिवार तोडने, तलाक, असंतोष, नैतिक पतन तथा सामाजिक अव्यवस्था विस्तार में भी ये दो प्रतिशत महिलाए अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो परिवार की भौतिक उन्नति, शिक्षा विस्तार, अधिकारों के लिये संघर्ष, में भी इन दो प्रतिशत आधुनिक महिलाओं का परंपरागत की तुलना में कई गुना अधिक योगदान है। परंपरागत महिलाए प्राचीन संस्कारों को आख मूंदकर चलने पर अधिक विश्वास करती है तो आधुनिक महिलायें प्राचीन संस्कारों को बिना विचारे आख मूंदकर तोडने और छोडने पर अधिक विश्वास करती है। परंपरागत महिलाए वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष को घातक मानती है तो आधुनिक महिलाए वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को महत्व देती है।
यह स्पष्ट है कि महिलाए परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के टूटने में आधुनिक महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है किन्तु यह भी मानना होगा कि परम्परागत परिवार व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो आधुनिक परिवार व्यवस्था को न रोका जा सकता है न सुधारा जा सकता हैं क्योंकि महिलाए ही अब इतनी जागरूक है कि वे घुटन की अपेक्षा टूटन को अधिक महत्व दे रही है। साथ ही भारत की संवैधानिक राजनैतिक व्यवस्था इस टूटन को अधिक विस्तार दे रही है। एक तरफ तो संवैधानिक व्यवस्था महिलाओं को समान अधिकार देना नही चाहती तो दूसरी ओर उन्हें विशेष अधिकार का लालच देकर आधुनिक बनने की ओर प्रेरित कर रही है। किसी तरह का कानूनी दबाव न तो परम्परागत परिवार व्यवस्था को बचा सकता है न ही आधुनिक व्यवस्था को रोक सकता है। यदि हम महिलाओं को आधुनिकता की अंधी दौड से रोकना चाहते है तो हमें परम्परागत परिवार व्यवस्था में आयी कमजोरियों को दूर करना चाहिए। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार व्यवस्था के संचालन में महिला पुरूष का भेद किया जाए या सम्पत्ति के अधिकार में दोनों की भूमिका अलग-अलग हो। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार से अलग होने के लिए महिलाओं को किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता है। महिला पुरूष के बीच भेद करने वाले सब प्रकार के कानून हटाकर सबको बराबर का अधिकार दे देना चाहिए। परम्परागत परिवार व्यवस्था तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था की परिवार तोडक भूमिका को बदलकर लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था प्रारंभ होनी चाहिए जिसका अर्थ है परिवार और समाज के संचालन तथा आर्थिक मामलों में भी महिलाओं के समान संवैधानिक कानूनी तथा परिवारिक अधिकार होना।
मैं समझता हूॅ कि लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का सुझाव न तो परम्परागत महिलाओं को पसंद आएगा। न ही आधुनिक महिलाओं को। परम्परागत महिलाएं इतनी डरी हुई है कि उन्हें लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था के लिए पुरूष वर्ग सहमत होने देगा न ही आधुनिक महिलाए इस दिशा कदम आगे बढने देगी क्योंकि ऐसा होते ही उनके विशेषाधिकार भी खत्म हो जाऐंगे तथा उनका न्यूसेंस वेंल्यू भी कम हो जाऐगा। किन्तु समाज व्यवस्था के सफल संचालन के लिए ऐसी परम्परागत महिलाओं को विचार प्रचार द्वारा सहमत करना होगा तथा आधुनिक महिलाओं को नियंत्रित करना होगा। मैं समझता हूॅ कि विषय बहुत गंभीर है तथा इस विषय पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि भारत की टूटती परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था का कारण क्या है और समाधान क्या है? मेरा सुझाव है कि परम्परागत महिलाओं को परिवार व्यवस्था में अधिक छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान समय में यह उचित होगा कि सरकार परिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने वाले कानून हटा लें। साथ ही परिवारों को इस प्रकार के सामाजिक और कानूनी निर्णय की स्वतंत्रता दी जाए की वे स्वंय मिल बैठकर इस बात का निर्णय कर ले कि उन्हें परम्परागत व्यवस्था में चलना है, आधुनिक मार्ग पकडना है अथवा लोकतांत्रिक मार्ग। मैं लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का पक्षधर हूॅ।

मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”

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1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य।
2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्याओ का निवारण समाज का दायित्व होता है और सरकार को उसमे सहयोग करना चाहिये।
3 दुनियां मे अपराध एक ही होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता मे किसी प्रकार से बाधा पहुंचाना। राज्य का दायित्व होता है, उस स्वतंत्रता को सुरक्षा देना।
4 भारत मे समस्याए तीन प्रकार की होती है- 1 आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक । इन तीनो प्रकार की समस्याओ का स्वरूप कृत्रिम होता है और समाधान कठिन नहीं है।
5 दुनियां मे समस्याएं तीन प्रकार की होती है। 1 प्राकृत्रिक 2 भूमंडलीय 3 कृत्रिम । कृत्रिम समस्याए भी तीन होती है। आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक।
6 आर्थिक समस्याए कई्र प्रकार की होती है। आर्थिक असमानता, मंहगाई, गरीबी, भूख, अशिक्षा, पर्यावरण प्रदूषण, श्रम शोषण, विदेशी कर्ज।
7 सामाजिक समस्याए कई होती है। जातिय भेदभाव, साम्प्रदायिकता, छुआछूत उॅच नीच, वर्ण व्यवस्था का विकृत होना।
8 राजनैतिक समस्याए कई है। किसी समस्या का ऐसा समाधान जिसमे नई समस्या पैदा हो, वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहन, समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये अधिक से अधिक कानून बनाना, अपनी गलतियां छिपाने के लिये समाज पर दोषारोपण, राष्ट्र को समाज से उपर सिद्ध करना।
सारी दुनियां अप्रत्यक्ष रूप से राजनैतिक सत्ता की गुलाम बनी हुई है। दुनियां के दो महा शक्तियों के राष्ट्राध्यक्ष आपस मे टकरा जाये तो दुनियां के पांच अरब लोग मिलकर भी विश्व युद्ध से नही बच सकते। यह सत्ता का केन्द्रियकरण बहुत दुखद है। भारत की राजनैतिक स्थिति भी इससे भिन्न नही है। भारत मे अपराध तेजी से बढ रहे है। अपराध रोकना सरकार का दायित्व है किन्तु सरकारे अपराध रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता न देकर सामाजिक आर्थिक समस्याओ का समाधान करते रहती है। यह समाधान भी इस प्रकार होता है कि उससे कुछ नई समस्याओ का विस्तार होते रहता है। समस्याये बढती रहती है और समाधान निरंतर जारी रहता है। अपराध बढते रहते है और सत्ता की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहती है। इसका अंतिम परिणाम होता है गुलाम मानसिकता का विस्तार। आर्थिक समस्याए, कई प्रकार की दिखती है। इनमे मंहगाई, गरीबी, अमीरो गरीबो के बीच बढती दूरी, बढता पर्यावरण प्रदूषण, भूख से मृत्यु, श्रम शोषण, विदेशो का बढता हुआ कर्ज, शहरी आबादी का बढना, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि अनेक समस्याए विकराल होती जा रही है जिनका कोई समाधान नही दिखता । यदि गंहराई से विचार किया जाये तो ये समस्याए या तो राज्य द्वारा गलत अर्थनीति के परिणाम है अथवा अस्तित्वहीन समस्याए है जिन्हे राज्य ने प्रत्यक्ष बनाकर रखा है। मंहगाई तो है ही नही । गरीबी अमीरी भी इसी तरह आभाषीय शब्द है। स्पष्ट नही है कि कौन गरीब है कौन अमीर। अन्य समस्याए भी कृत्रिम है ही । ऐसी सभी आर्थिक समस्याओ का सिर्फ एक समाधान हो सकता है कि कृत्रिम उर्जा अर्थात डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, कोयला गैस की भारी मुल्य वृद्धि कर दी जाये । सिर्फ इस अकेले प्रयास से सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का समाधान हो जायेगा । यह एक छोटा सा समाधान है किन्तु इस समाधन से सब प्रकार की आर्थिक समस्याए अपने आप सुलझ सकती है। किन्तु मै देख रहा हॅू कि कोई भी राजनेता इस समाधान के पक्ष मे नही है । क्योकि बुद्धिजीवियो, पूंजीपतियों और राजनेताओ को इस समाधान से यह स्पष्ट परिणाम दिखता है कि श्रम की मांग बढ जायेगी श्रम का मूल्य बढ जायेगा आर्थिक असमानता घट जायेगी गरीब अमीर का भेद कम हो जायेगा और उनका स्वयं के अहंकार को चोट लगेगी। इसलिये वे समाधान के अनेक प्रकार के नाटक तो करते रहते है किन्तु किसी भी कृत्रिम उर्जा की किसी भी मूल्य वृद्धि का सब मिलकर विरोध करते है। यहां तक कि सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मामले पर एक जुट हो जाते है।
सामाजिक समस्याओ के रूप मे भी कई समस्याए समाज मे व्याप्त दिखती है। जातीय टकराव साम्प्रदायिकता, छुआछूत, उंच नीच का भेदभाव, विकार ग्रस्त वर्ण व्यवस्था इनमे से प्रमुख दिखती है। इन समस्याओं के समाधान मे भी राज्य निरंतर सक्रिय रहता है। ये समस्याए हमेशा बढती ही चली जाती है और समाज मे इतना असंतोष बढाती है कि वह यदा कदा टकराव का रूप ग्रहण कर ले । इस पूरी समस्या का एक साधारण समाधान है समान नागरिक संहिता । व्यक्ति एक इकाई होगा और संवैधानिक स्वरूप मे धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर, किसान मजदूर का कोई संवैधानिक या कानूनी भेदभाव नही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को बराबर के संवैधानिक अधिकार होगे। यह एक छोटा सा प्रयत्न इन सब समस्याओ का समाधान हो सकता है। किन्तु किसी भी राजनैतिक सामाजिक संगठन की इसमे कोई रूचि नही है क्योकि यदि ऐसा हो जायेगा तो वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष को नुकसान होगा। समाज मे अनेक समाज सुधारको के ऐसे संगठन बने हुए है जिनकी रोजी रोटी इन्ही समस्याओ पर निर्भर करती है। ये संगठन भी कभी नही चाहते कि समान नागरिक संहिता लागू हो । संघ परिवार बात तो समान नागरिक संहिता की करता है किन्तु चाहता है कि समान नागरिक संहित के नाम से समान आचार संहिता लागु हो और मुसलमान ऐसी आचार संहिता का विरोध करे। संघ परिवार भी सबको बराबर का अधिकार देने के पक्ष मे नही है। महिला संगठन भी बात समानता की करते है किन्तु महिलाओ को विशेष अधिकार उन्हे अवश्य चाहिये क्योकि समान नागरिक संहिता लागु होते ही सबकी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
राजनैतिक असमानता भी निरंतर बढती जा रही है। नये नये कानून बन रहे है और राज्य पर निर्भरता भी बढती जा रही है। परिवार के पारिवारिक और गांवो के गांव संबंधी आंतरिक मामलो मे भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। नये नये संगठन बन रहे है और ये संगठन शक्तिशाली होकर पूरे समाज को असमान कर रहे है। ये संगठन जब चाहे तब राज्य के सहायक भी बन जाते है और व्लैकमेलर भी। राज्य भी ऐसे समाज तोडक संगठनो को प्रश्रय देता रहता है। क्योकि ये संगठन वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष, के विस्तार सहायक होते है और जब विपरीत समूह आपस मे टकराते है तब राज्य उसमें पंच की भूमिका मे खडा होकर हस्तक्षेप करता है। ये सब समस्याए राज्य और राज्य द्वारा घोषित सामाजिक राजनैतिक धार्मिक संगठनो द्वारा पैदा की जाती है और ये सब मिलकर समाज को अशान्त किये रहते है। इन सभी समस्याओ का सीधे एक समाधान है सहभागी लोक तंत्र। इसमे राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेता है तथा परिवार गांव जिला प्रदेश को अधिकतम अधिकार बाटकर सिर्फ पुलिस सेना वित्त विदेश न्याय अपने पास रख लेता है। मै जानता हॅू कि यदि लोक स्वराज्य अर्थात सहभागी लोकतंत्र आ जाये तो अपने आप कानून कम हो जायेग, राज्य की आवश्यकता कम हो जायेगी, साथ ही राज्य पर निर्भरता भी कम हो जायेगी, राज्य पोशित अनेक समूह अपने आप समाप्त हो जायेगे। लेकिन ऐसे परिजीवी लोक स्वराज्य आने नही देंगे क्योकि ऐसा होना वे भी नही चाहते और राजनीति से जुडे लोग भी ऐसा बिल्कुल नही चाहते। उनकी भी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
मै स्पष्ट हॅू कि सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का एक समाधान है कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण, सामाजिक समस्याओ का एक समाधान है समान नागरिक संहिता और राजनैतिक समस्याओ का एक समाधान है, लोक स्वराज्य। यदि इन तीन समाधानो पर आगे बढा जाये तो भारत की लगभग सभी समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी और राज्य पूरी ताकत से अपराध नियंत्रण की दिषा मे सक्रिय हो सकता है। हम सबके लिये उचित होगा कि हम इन तीनो समस्याओ के एक एक समाधान की दिशा मे आगे बढे। हम लोगो का कर्तब्य है कि हम इन समस्याओ के वास्तविक समाधान पर पूरे देश मे जन जागरण मजबूत करे। जो संगठन इन समस्याओ से हटकर अन्य समाधानो का नाटक करते रहते है इन संगठनो की वास्तविकता समाज के समझ प्रकट होने दे। देश की समस्याए भी अपने आप सुलझ जायेगी और अपराध नियंत्रण भी अपने आप हो जायेगा।

मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’

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कुछ मान्य धारणाएं हैः-
(1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है।
(2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे वह इकाई परिवार हो, गांव हो अथवा देश।
(3) देश या राष्ट्र व्यवस्था की अंतिम इकाई नहीं होते हैं क्योंकि संपूर्ण विश्व-समाज ही व्यवस्था की अंतिम इकाई होता है। वर्तमान समय में विश्व व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने से राष्ट्र को संप्रभुता संपन्न इकाई मान लिया गया है।
(4) किसी अन्य देश का नागरिक यदि अपना देश छोड़कर किसी अन्य देश में जाता है तो उसके तीन कारण हो सकते हैंः-
(क) जीवन पर संकट (ख) सुविधाओं का अंतर (ग) राजनीतिक सामाजिक षड्यंत्र।
(5) दुनियां में मुसलमान अकेला ऐसा समुदाय है जो अन्य समुदायों की तुलना में सामाजिक धार्मिक षड्यंत्रों के आधार पर दूसरे देश में अधिक पलायन करता है।
(6) अन्य सभी सम्प्रदायों की तुलना में मुसलमान सहजीवन सर्व-धर्म समभाव की अपेक्षा संगठन और धार्मिक संख्या-विस्तार को अधिक महत्व देता है।
(7) वर्तमान समय में पूरी दुनियां के समक्ष संगठित इस्लाम सबसे बड़ी समस्या है। भारत के लिए तो यह समस्या खतरनाक स्वरुप धारण कर चुकी है।
भारत में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है कि वे शरणार्थी हमारे अस्थाई मेहमान हैं या घातक शत्रु? जो लोग किसी तरह की वैधानिक सहमति या स्वीकृति लेकर भारत में आए हैं उनके संबंध में हम कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं। हम तो चर्चा सिर्फ उन लोगों की कर रहे हैं जो बिना अनुमति के, छिपकर चोरी से भारत में घुस आए हैं और रह रहे हैं। स्वाभाविक है कि सामान्य रूप से ये सब घुसपैठिए ही माने जाएंगे किन्तु यदि गहराई से विचार किया जाए तो उनमें से कुछ लोग ऐसे होंगे जो किसी खतरे से बचाव के लिए भारत में प्रवेश किए होंगे। कुछ ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिन्हें बांग्लादेश की तुलना में भारत में अधिक भौतिक सुविधाएं मिल रही हों तथा कुछ अल्प संख्या ऐसे भी लोगों की हो सकती है जो भारत में किसी षड्यंत्र के अंतर्गत आए हो।
यदि सामान्यतः देखा जाए तो जो भी हिंदू बांग्लादेश से भागकर भारत आए है वेे किसी न किसी संकट के कारण यहां आए हैं। स्पष्ट है कि वे या तो वहां से भगाए गए हैं या डर कर भाग आए हैं जो भी मुसलमान भागकर आए हैं उनमे शायद ही कोई ऐसा हो जो किसी भय के कारण भारत आया हो। आमतौर पर वह सुविधाओं के लालच में भारत आया है लेकिन यह बात भी साफ है कि वह भारत में कुछ समय तक रह जाने के बाद भारत के संगठित मुसलमानों के साथ जुड़ जाता है धार्मिक मुसलमानों के साथ बिल्कुल नहीं जुड़ता। इस तरह यह बात लगभग निश्चित है कि वह भारत के लिए साम्प्रदायिक समस्याओं के विस्तार में सहयोगी बन जाता है समाधान नहीं।
स्पष्ट है कि बाहर से आए हुए अवैध हिन्दू भारत में शरणार्थी माने जाने चाहिए और उन्हें बिना जांच-पड़ताल किए नागरिकता प्रदान कर देनी चाहिए क्योंकि वे या तो भगाए जाने के कारण आये हैं अथवा डरकर। जो भी मुसलमान आए हैं उन लोगों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए और यदि उनमें से किसी के विषय में यह प्रमाणित हो जाता है कि उसको कोई खतरा था तब उस पर परिस्थितियों के अनुसार विचार किया जा सकता है. किंतु जो मुसलमान सुविधाओं के लालच में भारत आए हैं उन्हें पूरी तरह घुसपैठिया मानकर देश से निकाल देना चाहिए. क्योंकि भविष्य में वे भारत की सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाएंगे ही। इस संबंध में यदि कोई कानूनी या संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पड़े तो वह भी करना चाहिए। यह समस्या सिर्फ आसाम तक सीमित नहीं है बल्कि भारत के हर क्षेत्र में गांव-गांव तक इस समस्या का विस्तार हुआ है।
पूरी दुनियां के लिए संगठित इस्लाम हिंसा और आतंक का पर्याय बन गया है चाहे पश्चिम के देश हो अथवा साम्यवादी रूस और चीन। सभी इस खतरे को दुनियां का सबसे बड़ा खतरा समझ रहे हैं। भारत के लिए यह खतरा और भी अधिक गंभीर है। यदि वर्तमान स्थिति का ठीक-ठीक आकलन किया जाए तो संगठित और हिंसक इस्लाम भारत की सबसे बड़ी समस्या है और इसे आपातकाल मानकर सारी शक्ति इस समस्या के समाधान में लगनी चाहिए। यह खतरा इसलिए और भी अधिक गंभीर हो जाता है कि भारत के मजबूत पड़ोसी देशों की भारत को अस्थिर करने में गंभीर रूचि है और भारत का संगठित इस्लाम उनके लिए सहायक हो सकता है। मरता हुआ भारत का साम्यवाद इस संगठित इस्लाम को अपना संरक्षक समझकर उसके साथ मजबूती से खड़ा हुआ है। इन दोनों का तालमेल पूरा प्रयत्न कर रहा है कि येन केन प्रकारेण अन्य समुदायों को विभाजित करके उन्हें टुकड़ों में बांट दिया जाए। वे अन्य समुदायों के बीच सवर्ण-अवर्ण, हिंदू-ईसाई-सिख आदि के नाम पर मतभेद पैदा करके विभाजन के लिए दिन-रात सक्रिय रहते हैं। दूसरी ओर हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐसी अस्पष्ट भाषा बोलते हैं जिससे साम्यवादी व संगठित इस्लाम के गठजोड़ को अप्रत्यक्ष सहायता मिलती है। वर्तमान समय चुनावों के हिसाब से निर्णायक वर्ष है और काफी सोच समझकर निष्कर्ष निकालने की आवश्यकता है।
वर्तमान चुनावों में साफ-साफ धु्रवीकरण होना चाहिए जिसमें एक तरफ वे लोग हों जो संगठित इस्लाम और साम्यवादीे गठजोड़ को सबसे बड़ा खतरा समझते हैं तो दूसरी ओर वे लोग हों जो इस गठजोड़ को अपनी राजनीतिक सत्ता के लिए सहायक मानते हों। जो लोग कश्मीर के संबंध में ढुलमुल हो, बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति रखकर हिंदू शरणार्थियों को भी उन्हीं की श्रेणी में रखने की भाषा बोलते हों, म्यामार से आए मुस्लिम शरणार्थियों को मानवीय आधार पर भारत में रखे जाने की वकालत करते हों, भारत में समान नागरिक संहिता का विरोध करके अल्पसंख्यक बहुसंख्यक धारणा को मजबूत करते हों, या कश्मीर के संबंध में बातचीत की वकालत करते हो इस प्रकार के लोगों से पूरा सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि ऐसे लोग या तो खतरे को ठीक से समझ नहीं रहे अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए जयचंद की भूमिका निभा रहे हैं। साथ-साथ ऐसे लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है जो वर्तमान समय में सवर्ण-अवर्ण का मुद्दा उठाकर अप्रत्यक्ष रूप से संगठित इस्लाम व साम्यवादी गठजोड़ को लाभ पहुंचा रहे हैं। ऐसे नासमझ लोगों को भी समझाने की आवश्यकता है।
खतरा बहुत बड़ा है और भारत के लिए इस पार या उस पार का निर्णायक समय है। वर्तमान समय यह विचार करने का नहीं है कि राफेल डील में भ्रष्टाचार हुआ कि नहीं नोटबंदी से फायदा हुआ कि नुकसान, न्याय पालिका चुनाव आयोग आदि संस्थाओं की स्वायत्तता पर खतरा है कि नहीं, विपक्षी दलों के अस्तित्व पर संकट है या नहीं, अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही है या रसातल में जा रही है। वर्तमान समय तो सिर्फ एक प्रश्न का उत्तर खोजने में है कि भारत में साम्यवादी व संगठित इस्लाम के संभावित खतरे से कौन निपट सकता है और उसके लिए कौन प्रयत्नशील हो सकता है। वर्तमान समय में भारत के लोकतंत्र को कोई खतरा है या नहीं यह प्रश्न भी महत्व नहीं रखता है क्योंकि साम्यवादी व संगठित इस्लाम का गठजोड़ अव्यवस्था का विस्तार करेगा, वर्ग समन्वय की जगह वर्ग विद्वेष पैदा करेगा, व गृह युद्ध की परिस्थितियां पैदा करेगा जिसका निश्चित परिणाम तानाशाही है। चाहे वह तानाशाही शरीयत की हो या साम्यवादी हम किसी भी परिस्थिति में इस प्रकार के खतरे को नहीं झेल सकते हैं. अंत में मेरा सुझाव है- 1400 वर्षों के बाद दुनिया को यह महसूस हुआ है कि संगठित इस्लाम दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है. इस खतरे से निपटने में भारत का अपना भी हित निहित है और विश्व का भी. इस संकट काल में किसी भावना में बह कर मानवता के नाम पर अथवा, राजनीतिक स्वार्थ में की गई उनकी कोई भूल देश व संपूर्ण विश्व -समाज को निर्णायक नुकसान पहुंचाएगी, इसके प्रति सावधान होकर निर्णय करना चाहिए।

मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’

Posted By: kaashindia on March 6, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जुला स्वरूप होता है।
2. गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर यदि आॅकलन किया जाये तो चार अलग-अलग क्षमताओं के लोग मिलते है। इन्हें हम विचारक, प्रबंधक, व्यवस्थापक और श्रमिक के रूप में विभाजित कर सकते है। इस विभाजन को ही प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था कहा जाता था।
3. भारत की वर्ण व्यवस्था दुनियाॅ की एक मात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो आदर्श है। यदि यह व्यवस्था विकृत होकर योग्यता की जगह जन्म का आधार नहीं ग्रहण करती तो अब तक सारी दुनियां इसे स्वीकार कर चुकी होती।
4. बहुत लम्बे समय के बाद सामाजिक व्यवस्थाएं रूढ होकर विकृत हो जाती है और उसके दुष्परिणाम उस पूरी व्यवस्था को ही सामाजिक रूप से अमान्य कर देते है।
5. वर्ण और जाति अलग-अलग व्यवस्था है। जातियाॅ सिर्फ कर्म के आधार पर बनती है तो वर्ण गुण, कर्म, स्वभाव को मिलाकर। प्रत्येक वर्ण में कर्म के आधार पर अलग-अलग जातियाॅ बनती है।
6. वर्ण व्यवस्था से विकृति दूर करने की अपेक्षा वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना अव्यवस्था का प्रमुख कारण है।
7. स्वामी दयानंद महात्मा गांधी सरीखे महापुरूष वर्ण व्यवस्था की विकृतियों को दूर करना चाहते थे। भीमराव अम्बेडकर, नेहरू आदि ने वर्ण व्यवस्था की विकृतियों पर अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का प्रयास किया। उसका दुष्परिणाम भारत भोग रहा है।
8. वर्ण व्यवस्था में योग्यता और क्षमतानुसार कार्य का विभाजन होता है और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग वर्ण को अलग-अलग उपलब्धियाॅ भी प्राप्त होती है।
9. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था है। उसका राजनीति से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं। सामाजिक व्यवस्था में राजनीति का प्रवेष जितना ही बढता है उतनी ही अव्यवस्था बढती है जैसा भारत में हो रहा है।
10. वर्ण व्यवस्था में विचारक को सर्वोच्च सम्मान, प्रबंधक को शक्ति, व्यवस्थापक को अधिकतम आर्थिक सुविधा और श्रमिक को अधिकतम सुख की गारंटी और सीमा निर्धारित होती है। प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण विचार प्रधान होता था, क्षत्रिय शक्ति प्रधान, वैश्य कुशलता तथा श्रमिक सेवा प्रधान जाना जाता था। सबके गुण और स्वभाव के आधार पर वर्ण निर्धारित होते थे। जन्म के अनुसार सबको शून्य अर्थात शुद्र माना जाता था और धीरे-धीरे जन्म पूर्व के संस्कार पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश के आधार पर वह अपनी योग्यता सिद्ध करता था तब उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य का विशेष वर्ण दिया जाता था। ऐसी भी बात सुनी जाती है कि आठ वर्ष की उम्र में जो बालक ब्राह्मण की योग्यता की परीक्षा पास कर लेता था उसे ब्राह्मण का यज्ञोपवीत देकर ब्राह्मण घोषित किया जाता था। वह भविष्य में ब्राह्मण की पढाई विशेष रूप से करता था और उस एक दिशा में ही निरंतर आगे बढता जाता था। दस वर्ष की उम्र में शेष बच्चों की एक अलग तरह की परीक्षा होती थी। उस परीक्षा में उत्तीर्ण बच्चों को क्षत्रिय का यज्ञोपवीत दिया जाता था। बारह वर्ष की उम्र में वैश्य की परीक्षा होती थी और ऐसे बालक वैश्य का यज्ञोपवीत लेते थे। जो बालक तीन परीक्षाओं में पास नहीं होते थे उन्हें श्रमिक माना लिया जाता था और उन्हें यज्ञोपवीत से वंचित कर दिया जाता था। ब्राह्मणों के लिए जीवन पद्धति क्रियाकलाप तथा उपलब्धियाॅ सीमित होती थी। जो ब्राह्मण सम्मान के अतिरिक्त धन या राजनैतिक सत्ता की ओर प्रयत्न करता था उसे असामाजिक मान लिया जाता था अथवा उसका वर्ण बदल भी दिया जाता था। इसी तरह अन्य वणों के लिए भी था यदि कोई बढी उम्र में भी कोई विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता था तो उसका वर्ण बदलने की भी व्यवस्था थी। इसी तरह क्षत्रिय को ब्राह्मण की तुलना में कम सम्मान और सामान्य धन के आधार पर जीवन बिताना पडता था। वैश्य को सबसे कम सम्मान तथा राजनैतिक शक्ति शून्य पर संतोष करना था। श्रमिक को सर्वोच्च सुख की सुविधा प्राप्त थी उसे सम्मान, पाॅवर और धन से मुक्त होकर सेवा के माध्यम से अधिकतम सुख की व्यवस्था थी। उसकी सामान्य जीवन उपयोगी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने की गारंटी थी। ब्राह्मण को दान या भीख, क्षत्रिय को टैक्स, वैश्य को व्यापार तथा शुद्र को श्रम के आधार पर अपनी सुविधाएं इकठ्ठी करने की सीमाएं बनी हुयी थी। इन सीमाओं को न कोई तोड सकता था न ही उनकी तोडने की मजबूरी थी क्योंकि सामाजिक व्यवस्था इतनी मजबूत और सुचारू ढंग से चल रही थी कि किसी के सामने कोई संकट या मजबूरी कभी आती ही नही थी। कार्य विभाजन सबका अलग-अलग था और व्यवस्थित था। कोई किसी दूसरे के कार्य में न हस्तक्षेप करता था न प्रतिस्पर्धा करता था। कोई भी व्यक्ति एक से अधिक कार्य अपने पास केन्द्रीत नहीं कर पाता था। परिणामस्वरूप किसी भी वर्ण में बेरोजगारी का खतरा नही था। महिलाओं के संबंध में उच्च वर्ण के पुरूष निम्न वर्ण की महिलाओं के साथ विवाह और संतान उत्पत्ति कर सकते थे। निम्न वर्ण के पुरूष द्वारा उच्च वर्ण की महिलाओं से विवाह या संतान उत्पत्ति वर्जित था। यह सब सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक संरचना के आधार पर चल रही थी। जब यह रूढ बनी और बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के उद्देश्य से इस वर्ण व्यवस्था में आरक्षण लागू किया और योग्यता की परीक्षा की अपेक्षा जन्म के आधार पर वर्ण निश्चित करना शुरू कर दिया तब इसका दुरूपयोग शुरू हुआ और अव्यवस्था असंतोष बढने लगा। जब मूर्ख लोग ब्राह्मण बनकर ज्ञान और सम्मान के केन्द्र बनने लगे तब स्वाभाविक ही था कि समाज में असंतोष बढे। स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी ने इस वर्ण व्यवस्था की विकृति को ठीक करने का प्रयास शुरू किया और उसके बहुत अच्छे परिणाम आये लेकिन स्वतंत्रता के बाद नेहरू और भीमराव अम्बेडकर ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस विकृति का लाभ उठाना चाहा और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को तोडकर जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की पूरी-पूरी कोशिश की। परिणाम हुआ कि वे कोई नई व्यवस्था तो नहीं बना सके किन्तु पुरानी बनी हुई विकृत या अच्छी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। वर्तमान समय में समाज व्यवस्था को तोडकर राज्य व्यवस्था को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का उनका षणयंत्र सफल हो गया। धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर हो रही है, टूट रही है और राज्य व्यवस्था अधिक से अधिक शक्तिशाली होती जा रही है। मैं अच्छी तरह समझता हूॅ कि समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए वर्ण व्यवस्था से अच्छी कोई अन्य व्यवस्था नहीं हो सकती किन्तु वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के नाम से संशोधित या प्रचलित करना न संभव है न उचित। कुछ नये नामों पर विचार करके फिर से वर्ण व्यवस्था को सक्रिय और प्रभावी बनाने का प्रयास होना चाहिए। ब्राह्मण की जगह विचारक विद्वान या मार्गदर्शक नाम दिया जा सकता है। क्षत्रिय की जगह सुरक्षाकर्मी, प्रबंधक, राजनैतिक, राजनेता सरीखे नाम दिया जा सकता है। वैश्य की जगह व्यापारी, व्यवस्थापक या और नाम दे सकते है। शुद्र की जगह श्रमिक उपयुक्त नामकरण है किन्तु वर्ण व्यवस्था नये ढंग से विकसित होनी चाहिये और वह जन्म के आधार पर न होकर गुण और स्वभाव के आधार किसी परीक्षा के बाद घोषित होनी चाहिए। ऐसी कोई सामाजिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिये जो फिर से सम्मान, शक्ति, सुविधा और सेवा को योग्यता और क्षमतानुसार अपनी-अपनी सीमाओं में बिना किसी राजनैतिक कानून के दबाव में बांधने और संचालित करने में सक्षम हो सके। मैं पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के पक्ष में हूॅ। मैं समझता हूॅं कि ऐसी कोई नई व्यवस्था बनाना बहुत कठिन कार्य है किन्तु इसकी शुरूआत इस तरह हो सकती है कि वर्तमान समय में बने हुए व्यावसायिक बौद्धिक राजनैतिक या श्रमिक समूहों को मान्यता देकर उन्हें अपनी आंतरिक व्यवस्था को मान्यताएं दी जाये। इसका अर्थ हुआ कि अधिवक्ता समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था स्वयं तय करे तो वस्त्र व्यवसायी अपनी स्वयं । इसी तरह संत समाज के लोग भी अपने आंतरिक व्यवस्था स्वयं बना ले श्रमिक समूह भी बना सकते है। शिक्षक समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था और नियमावली स्वयं बना सके। मैं तो इस मत का हूॅ कि विवाह शादी तथा अन्य सामाजिक संबंधो में भी यदि जाति और वर्ण को प्राथमिकता दी जाए तो व्यवस्था और अच्छी होगी यदि वकील लडके का विवाह वकील लडकी से हो और श्रमिक का विवाह श्रमिक कन्या से हो तो इसमें लाभ ही होगा हानि नहीं। इस तरह धीरे-धीरे नये तरह की आदर्श वर्ण व्यवस्था एक स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सरकार को भी ऐसे समूहों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”

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कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपालिका न्याय की।
2. सुरक्षा और न्याय पूरा होने के लिए आवश्यक है कि पुलिस और न्यायालय एक-दुसरे के पूरक और समन्वयक हो।
3. यदि न्यायपालिका न्याय देने में असफल हो जाती है तब पुलिस की मजबूरी हो जाती है कि वह सुरक्षा देने के लिए असंवैधानिक तरीकों का भी प्रयोग करे।
4. वर्तमान भारत में न्यायपालिका न्याय देने में भी असफल है और पुलिस के काम में निरंतर बाधा भी पहुॅचाती है।
5. न्याय और सुरक्षा देना राज्य का लक्ष्य होता है और कानून उसका मार्ग। यदि कानून का पालन कराना लक्ष्य मान लिया गया तो अव्यवस्था निश्चित है।
6. यदि न्याय और कानून के बीच दूरी बढ जाती है तब कानून की समीक्षा की जाती है न्याय की नहीं।
7. लोकतंत्र में विधायिका न्याय को परिभाषित करती है न्यायपालिका उस परिभाषा के अनुसार समीक्षा करती है और कार्यपालिका इसे क्रियान्वित करती है।
8. समाज में अपराधियों में पुलिस का भय होना चाहिए और निरपराध लोगों में विश्वास होना चाहिए। वर्तमान समय में उलटा हो रहा है।
9. सूचना और शिकायत में अंतर करने की आवश्यकता है। न्यायपालिका इन दोनो के बीच का फर्क और उसके कारण बढ रही अव्यवस्था के विषय में नही सोचती। पिछले 70 वर्षो में न्यायपालिका ने समाधान कम किए और समस्याएं अधिक पैदा की। न्यायपालिका को समझना चाहिए था कि वह कानून के अनुसार न्याय घोषित करने तक सीमित है न्याय को परिभाषित विधायिका करती है और क्रियान्वित कार्यपालिका। न्यायालय न्याय को परिभाषित करने पर भी सक्रिय हो गया और क्रियान्वित करवाने में भी। न्यायालय यह सिद्ध करने में जुट गया कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है जबकि यह सोच पूरी तरह गलत है। परिणाम हुआ कि अपराधियों को या तो दंड मिलने में विलम्ब होने लगा या दंड महत्वहीन हुआ। परिणाम हुआ कि भारत की आम जनता में प्रत्यक्ष हिंसक और अराजक दंड देने के प्रति विश्वास बढ रहा है। इन परिस्थिति को देखते हुए पुलिस विभाग भी सुरक्षा देने के लिए सक्रिय हुआ। उसमे भी अपराधियों को पकड-पकड कर अवैधानिक तरीके से मारना शुरू हुआ क्योंकि पुलिस के लिए न्याय की तुलना में सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है और यदि न्यायालय पुलिस के कार्य में लगातार बाधक बनता है तो पुलिस के समक्ष इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं बचता की वह झूठ का सहारा लेकर अपराधियों को सीधे दंडित करने का प्रयास करे। सोहराबुद्दीन हत्या इशरत जहां का प्रकरण स्पष्ट उदाहरण है जब पुलिस ने इस प्रकार की सुरक्षा के लिए गैरकानूनी कार्य किए और सम्पूर्ण समाज का विश्वास अर्जित किया भले ही न्यायालय ने उसमें कितने भी रोडे़ अटकाये हो। पंजाब में आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पुलिस की अतिसक्रियताही कारगार हो सकी। छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित उत्तरी हिस्से को नक्सलवाद से मुक्त करवाने में भी पुलिस की अतिसक्रियता की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। जिस पुलिस अफसर ने यह कार्य किया उसे आज भी उस क्षेत्र के लोग भगवान सरीखे मानते है। उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्श में पुलिस की अतिसक्रियता के कारण जितने अपराधी मारे गये है उस आधार पर पुलिस की विश्वसनीयता बढी है। मैंने पुलिस की अतिसक्रियता के अच्छे भी परिणाम देखे है और बुरे भी। महाराष्ट्र के एक न्यायालय से एक बडे अपराधी को बाहर निकाल कर कुछ महिलाओं ने हत्या कर दी थी उन महिलाओं को बहुत प्रशंसा मिली। इसी तरह अम्बिकापुर शहर में महिलाओं का चैन लूटकर भाग रहे पेशेवर लूटेरो को एक बार पकडे जाने पर भीड ने उनमें एक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पकडने वाले को वहाॅ के नागरिकों ने और पुलिस विभागों ने भी सम्मानित किया। एक विपरीत घटना में हमारे जिले में एक व्यक्ति अपनी पत्नी को पीछे बैठाकर मोटर साइकिल से जा रहा था स्पीड ब्रेकर के उछलने के कारण पत्नी गिरकर मर गयी और पुलिस ने उस मामले में उस मोटरसाइकिल चालक पति पर मुकदमा कर दिया। कुछ ही वर्ष बीते है कि यदि आज महाराष्ट्र और अम्बिकापुर की कानून तोडकर भीड द्वारा दिए गए दंड की आज समीक्षा हो तो कुछ वर्ष पूर्व जिन्हें सम्मानित किया गया था आज लिचिंग के अपराध में हत्या का मुकदमा झेल रहे होते। समझ में नही आता कि न्याय की परिभाषा सुविधानुसार बदली जा रही है। यदि कोई अपराध होता है और अपराध के पीछे कोई व्यक्तिगत उद्देश्य नहीं है, भूल है या उद्देश्य जनहित है तो ऐसे कार्य को गैरकानूनी माना जाना चाहिए अपराध नहीं। दोनों के दंड में भी अंतर होना चाहिए। एक पुलिस वाले ने जनहित की भावना से किसी अपराधी की हत्या कर दी या भूल से किसी निर्दोष की हत्या कर दी तथा यदि व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर किसी अपराधी या निर्दोष की हत्या कर दी तो यह तीनों घटनाएं भिन्न-भिन्न परिणाम रखती है। कानून और न्यायालय को इन सब में भिन्नता देखनी चाहिये। आश्चर्य होता है कि न्यायपालिका इतने स्पष्ट अंतर को भी नहीं समझ पाती। गैरकानूनी और अपराध बिल्कुल अलग-अलग होते है और अलग-अलग समझे जाने चाहिये। अपराध में अपराधी की नीयत अवश्य परिभाषित होनी चाहिए किन्तु हम देखते है कि जो न्यायालय बीस-तीस हत्याएं करने के बाद भी अपराधी को दंडित नहीं कर पाती या निर्दोष घोषित कर देता है उस अपराधी को कोई पुलिस वाला अवैध तरीके से मार दे तब न्यायिक सक्रियता देखते ही बनती है। विचित्र स्थिति है कि भारत में अनेक अपराधियों ने हत्या और अपराध को अपना व्यवसाय बना लिया है। भारत की न्यायपालिका को ऐसी खुली हुई दुकाने कभी विचलित नहीं करती। उसकी प्राथमिकता क्या है? न्यायपालिका तो लिचिंग रोकना अथवा बलात्कार को रोकना सबसे अधिक प्राथमिक कार्य समझती है। पेशेवर अपराधी भले ही दंडित न हो किन्तु किसी अल्पवयस्क कन्या के साथ किए गए बलात्कार के लिए न्यायालय बहुत सक्रिय हो जाता है और 40 दिन में फाॅसी का आदेश देकर अपनी पीठ थपथपाता है। मैं स्पष्ट हूॅ कि न्यायपालिका को अपनी प्राथमिताएं समझनी चाहिये। अपराधियों की खुली दुकाने सम्पूर्ण भारत के लिए बहुत बडा कलंक है। जिन पर आजतक कोई नियंत्रण नहीं होता है। लोकतंत्र में कोई एक इकाई व्यवस्था की ठेकेदार नहीं होती। 20-30 वर्ष पूर्व विधायिका अपने को ठेकेदार समझने लगी थी और पिछले कुछ वर्षाे से न्यायपालिका समझने लगी है, दोनो ही गलत है। न्यायपालिका को अपना काम छोड कर जनहित याचिकाएं निपटारा करने में मजा आने लगा है। परिणाम हुआ कि पुलिस को भी न्यायालय से हटकर सीधा न्याय देने में मजा आना शुरू हो गया है। यह टकराव पूरी तरह घातक है लेकिन इस टकराव में न्यायपालिका की भूमिका बहुत अधिक गलत दिखती है। अपराधी पुलिस के सामने सरेंडर करने की अपेक्षा न्यायालय के पास जाना अधिक सुरक्षित समझने लगे है। अपराधियों में पुलिस का भय घट रहा है और न्यायपालिका पर विश्वास बढ रहा है। यह अच्छी स्थिति नहीं है। न्यायपालिका को अच्छी तरह समझना चाहिये कि अपराध नियंत्रण में उसकी भी भूमिका एक सहयोगी की है। न्यायपालिका सिर्फ व्यक्ति पुलिस के बीच पूरी तरह तटस्थ भूमिका में नहीं रह सकती। यह सिद्धान्त भी गलत है कि जब तक कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा अपराधी सिद्ध न हो जाये तब तक वह निर्दोष है। होना तो यह चाहिए कि यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध कर देती है तो वह व्यक्ति निर्दोष न होकर संदिग्ध अपराधी है। उसे निर्दोष नहीं माना जाना चाहिये। यदि कोई असम्बद्ध व्यक्ति कोई शिकायत करता है तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उस शिकायत को सूचना समझकर कार्यवाही करे शिकायत समझ कर नहीं। वर्तमान समय में ऐसी सूचनाओं को शिकायत मान लेने के कारण अनेक ऐसे परजीवी व्यक्ति या संगठन खडे हो गये है जिनका ऐसी शिकायत करना एक व्यवसाय बन गया है और वे दिन रात न्यायालय के इर्द-गिर्द रहकर ही अपनी रोजी-रोटी चलाते है।पुलिस की अतिसक्रियता एक अल्पकालिक मजबूरी हो सकती है किन्तु पुलिस को ऐसी भौतिक या नैतिक छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपना काम छोडकर जनहित का काम करने लग जाए। इस समस्या का सिर्फ एक ही समाधान है कि न्यायालय स्वयं को न्याय तक सीमित कर ले तथा सुरक्षा और न्याय के बीच खीचतान को समाप्त करके दोनों में समन्वय करे। यदि कानून और न्याय मिलकर एकाकर हो जाऐगे पुलिस की सक्रियता अपने आप बंद हो जाऐगी अथवा सब मिलकर उसे अपनी सक्रियता छोडने के लिए मजबूर कर देगे।

मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन

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कुछ सिद्धान्त है।
1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है।
2 किसी भी प्रकार की सत्ता हमेशा वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष का प्रयत्न करती है। वर्ग संघर्ष सत्ता के सशक्तिकरण का मुख्य आधार होता है। इसे ही बांटो और राज करो कहा जाता है।
3 साम्यवाद खुलकर वर्ग संघर्ष का प्रयत्न करता है, समाजवाद अप्रत्यक्ष रूप से तथा पूंजीवाद आंशिक रूप से।
4 लोकतंत्र मे संगठन वर्ग संघर्ष का आधार होता है और वर्ग संघर्ष विभाजन की स्थितियां पैदा करता है।
5 मुसलमान चाहे जिस देश मे रहे वह संगठन भी बनायेगा ही और वर्ग विद्वेष बढाकर विभाजन भी करायेगा ही । विभाजन उसका लक्ष्य होता है मजबूरी नही।
6 हिन्दू कभी संगठन नही बनाता और यदि अन्य लोग संगठित हो तब भी वर्ग समन्वय का प्रयत्न करता है।
स्वतंत्रता के बहुत पूर्व धर्म के आधार पर राजनैतिक संगठन की शुरूआत मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने की । किसने किसकी प्रतिक्रिया मे की यह अलग विषय है किन्तु लगभग साथ साथ दोनो बातें उठी । एक तीसरी शक्ति के रूप मे संघ आया और चौथी शक्ति के रूप मे गांधी। हिन्दू महासभा की यह मान्यता थी कि भारत हिन्दू राष्ट होना चाहिये। मुसलमान इसके विरोधी थे और मुस्लिम राष्ट्र का सपना देख रहे थे। उनका मानना था कि भारत की सत्ता मुस्लिम राजाओ से अंग्रेजो ने छीनी है इसलिये मुसलमानो का उस पर पहला अधिकार है। हिन्दू महासभा का मानना था कि हिन्दुओ से मुसलमानो और मुसलमानो से अंग्रेजो ने सत्ता छीनी इसलिये भारत की सत्ता पर मूल रूप से हिन्दुओ का अधिकार है। संघ ने बीच का मार्ग अपनाया और माना कि अंग्रेजो की तुलना मे मुसलमान अधिक घातक है इसलिये सारा विरोध मुसलमानो के खिलाफ केन्द्रित होना चाहिये। गांधी का मानना था कि हम पहले अंग्रेजो की गुलामी से मुक्त हो जाये और शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक हो जिसमे हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न करके या तो प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो या यदि मजबूरी हो तो वर्ग समन्वय हो वर्ग संघर्ष नही। इस चार समूहो मे से किसी भी समूह ने किसी के साथ कोई समझौता नही किया और चारो अलग अलग तरीके से सक्रिय रहे । आर्य समाज कभी संगठन नही रहा बल्कि संस्था के रूप मे रहा। यही कारण था कि आर्य समाज ने मुसलमानो को छोडकर शेष तीनो से मिलकर स्वतंत्रता संघर्ष का साथ दिया तथा स्वतंत्रता के बाद भी आर्य समाज ने अपने को सत्ता संघर्ष से अलग कर लिया। स्वतंत्रता संघर्ष मे संघ लगभग निर्लिप्त रहा इसलिये उसने अपने को सांस्कृतिक संगठन घोषित कर लिया । लेकिन सतर्कता पूर्वक संलिप्तता संता के मामले मे इस तरह रही कि मुसलमान किसी भी रूप मे कमजोर रहे । गांधी के लिये स्वतंत्रता पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट और संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत। इसी बीच अम्बेडकर के रूप मे एक पांचवे समूह का उदय होता है और उसने आदिवासी हरिजन को एक वर्ग बनाकर अलग सत्ता की मांग शुरू कर दी। विभाजन रोकने के लिये गांधी अम्बेडकर की उस मांग से ऐसा समझौता करने को मजबूर हुए जो आजतक भारत की अखंडता की कीमत चुका रहा है। गांधी चाहते थे कि जिन्ना और पटेल के बीच भी कोई समझौता हो जाये किन्तु दोनो अपनी अपनी जिद पर अडे थे। जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ मानने को तैयार नही थे तो पटेल मुसलमानो को अलग वर्ग के रूप मे भी नही मानना चाहते थे । पटेल किसी भी रूप मे मुसलमानो को किसी तरह का विशेष महत्व नही देना चाहते थे भले ही विभाजन क्यो न हो जाये । गांधी को छोडकर राजनैतिक स्वरूप के जितने भी लोग स्वतंत्रता संघर्ष मे शामिल थे उनमे से कोई भी ऐसा नही निकला जिसने विभाजन का विरोध करने मे गांधी का खुंलकर साथ दिया हो। विभाजन मे अंग्रेजो की भी रूचि थी । हिन्दू मुस्लिम आदिवासी संघर्ष समाप्त न हो इसलिये वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सबकी पीठ थपथपाते थे। अंत मे सत्ता लोलुप नेहरू पटेल अम्बेडकर तथा अन्य सबने मिलकर विभाजन स्वीकार कर लिया । स्पष्ट है कि विभाजन की नींव वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत मे मुसलमानो के द्वारा प्रारंभ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बडा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये। इसी तरह विभाजन का एक मात्र विरोधी सिर्फ गांधी को माना जाना चाहिये क्योकि वे किसी भी रूप मे विभाजन के विरोधी थे। यदि बीच के पटेल नेहरू और अम्बेडकर की बात करे तो इन सबकी विभाजन के प्रति पूरी सक्रियता रही। कांग्रेस पार्टी मे सरदार पटेल का बहुमत था और नेहरू को पता था कि गांधी जी नेहरू को ही प्रधान मंत्री स्वीकार करेंगे । अम्बेडकर आगे स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक सत्ता के सपने देख रहे थे और तीनो ने मिलकर अन्य सबकी सहमति ले ली जिसके कारण गांधी भी विभाजन के लिये मजबूर हो गये।
राजनैतिक सत्ता बहुत चालाक होती है । वह षणयंत्र स्वयं करती है और दोषारोपण दूसरे पर करती है। वह अपने चाटुकारो को प्रचार माध्यमो मे लगाकर वे गुनाह को गुनाहगार प्रमाणित कर देती है। संघ स्वतंत्रता के पूर्व भले ही निर्लिप्त रहा हो किन्तु राजनैतिक सत्ता से उसकी दूरी कभी रही नही । स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान अलग हुआ और भारतीय सत्ता पर संघ की पकड मजबूत हो इसके लिये विभाजन का दोषी गांधी को सिद्ध करना आवश्यक था। संघ ने जान बूझकर गांधी को टारगेट किया क्योकि गांधी की छवि उसके संगठित वर्ग निर्माण मे बहुत बडी बाधा थी। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा। कोई भी वर्ग कभी नही चाहता कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जबतक वह कमजोर होता है तो न्याय की बात करता है और मजबूत होता है तब व्यवस्था की बात करता है। इसलिये संघ ने गांधी के जीवित रहते से लेकर आज तक बेगुनाह गांधी को विभाजन का दोषी प्रमाणित करने मे अपनी सारी ताकत लगा दी और विभाजन के प्रमुख दोषी सरदार पटेल को साफ बचा लिया। कांग्रेस पार्टी सत्ता लोलुप थी। नेहरू स्वयं गांधी की छवि का लाभ उठाना चाहते थे किन्तु गांधी की विचार धारा से उनका जीवन भर विरोध रहा । इसलिये कांग्रेस पार्टी ने संघ के इस गांधी विरोधी प्रचार से अपने को किनारे कर लिया। गांधीवादी धीरे धीरे साम्यवादियो के चंगुल मे फंस गये इसलिये वे संघ का विरोध करते रहे किन्तु गांधी विचारो का समर्थन नही कर सके। विभाजन मे गांधी की भूमिका विरोधी की थी यह बात स्पष्ट करने वाला कोई नही बचा था इसलिये विभाजन का सारा दोष निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया गया।
यदि आज भी भारत पाकिस्तान बंगलादेश को एक राष्ट्र के रूप मे मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा। भारत के मुसलमान इससे पूरी तरह सहमत हो जायेगे। आज अखंड भारत का लगातार राग अलाप रहे संघ के लोग अब एक भारत कभी नही चाहेंगे क्योकि वर्तमान मे सोलह प्रतिशत की मुस्लिम आबादी यदि इतनी बडी समस्या के रूप मे बनी हुई है और पाकिस्तान बंगलादेश मिल जाने के बाद यह आबादी पचीस प्रतिशत होगी तब शक्ति संतुलन और बिगड सकता है। इसलिये अखंड भारत का नारा संघ परिवार का नाटक मात्र है और कुछ नही।
मै इस मत का हॅू कि अब विभाजन का दोषी कौन इसकी खोज बंद कर देनी चाहिये और यह खोज तभी बंद हो सकती है जब इसके वास्तविक दोषी को सामने खडा कर दिया जाये जिससे विभाजन विरोधी गांधी पर आक्रमण अपने आप बंद जो जाये और यह चर्चा पूरी तरह समाप्त हो जाये। मै स्पष्ट हॅू कि यदि वर्ग निर्माण और संगठनो की मान्यता को अब भी नही रोका गया तो नये विभाजनो का खतरा बना रहेगा । भविष्य मे विभाजन न हो इसका सिर्फ एक ही समाधान है और वह है समान नागरिक संहिता । सबको मिलकर इस दिशा मे काम करना चाहिये।

मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”

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कुछ सिद्धान्त है।
1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।
2 समाज को एक बृहद परिवार कहा जा सकता है। जिस तरह की संरचना परिवार की होती है वैसी ही समाज की भी होती है।
3 स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है तो सहजीवन और परिवार भावना विकसित करना उसका कर्तब्य ।
4 समाज मे कुछ परिवार अक्षम और कुछ सक्षम होते है। सक्षम परिवारो का कर्तव्य है कि वे अक्षम लोगो की सहायता करे।
5 वर्ण व्यवस्था के अनुसार वैश्य को छोडकर शेष तीन वर्ण के लोग आर्थिक दृष्टि से अक्षम माने जाते है। दान चंदा और भीख इन तीन वर्णो की व्यवस्था के आधार होते है।
6 कर्तव्य और अधिकार एक दूसरे के पूरक होते है। किसी के सामाजिक अधिकार तब तक पूरे नही हो सकते जब तक अन्य लोग कर्तव्य न करे।
7 वर्तमान समय मे दान चंदा और भीख का निरंतर दुरूपयोग हो रहा है। इसलिये इसपर नये तरीके से सोचने की आवश्यकता है। इन तीन मे भी चंदा अधिक बडा व्यवसाय बनता जा रहा है। दान चंदा और भीख अलग अलग अर्थ और प्रभाव रखते है । दान स्वेच्छा से और अपनी क्षमतानुसार दिया जाता है। दान पर दान लेने वाले का पूरा अधिकार होता है । देने के बाद देने वाले का कोई अधिकार या हस्तक्षेप नही होता। यहां तक कि देने वाला उसका कोई हिसाब भी नही पूछ सकता। दान बिना मांगे दिया जाता है और देने के बाद किसी भी परिस्थिति मे वापस नही लिया जा सकता। किसी भी प्रकार का दान देने वाला कर्तव्य भावना से देता है। चंदा और दान मे बहुत फर्क होता है। चंदा दिया और लिया नही जाता बल्कि इकठठा किया जाता है। चंदे पर देने वाले का पूरा अधिकार होता है । वह कभी भी हिसाब मांग सकता है और विशेष परिस्थिति मे वापस भी ले सकता है। चंदा एक आपसी समझौता है जिसे हम सहभागिता भी कह सकते है। भीख एक भिन्न प्रकार की प्रक्रिया है । भीख मांगने पर दी जाती है। आवश्यकता का आकलन करके दी जा सकती हैं तथा भीख पर देने वाले का कोई अधिकार नही होता। भीख आमतौर पर दया की भावना से दी जाती है। भीख भी दान की तरह स्वेच्छा से दी जाती है जिसका न कभी हिसाब लिया जा सकता है न ही वापस मांगा जा सकता हैं।
यदि हम भारत की पुरानी व्यवस्था का आकलन करे तो दान चंदा और भीख एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था के रूप मे माना जा सकता है। प्रत्येक सक्षम व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता है कि वह परिस्थिति अनुसार तीनो मे सहयोग करे। सरकार द्वारा लिया जाने वाला टैक्स भी चंदा की ही श्रेणी मे आता है। यदि हम भारत की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की समीक्षा करें तो दान चंदा और भीख का पूरी तरह दुरूपयोग हो रहा है। अधिकांश लोगो ने तीनो को अपना व्यवसाय बना लिया है। वास्तविक भिखारी तो अब शायद ही दिखते है । पेशेवर भिखारी ही मिलते है यहां तक कि शारीरिक दृष्टि से पूरी तरह अक्षम और कुछ सक्षम लोग भी इसे व्यवसाय समझ लिये है। मैने तो सुना है कि कुछ गरीब लोगो को भीख मांगने के लिये जान बूझकर अपाहिज बनाया जाता है और उससे यह व्यापार कराया जाता है। चंदा मांगना तो एक धंधा बन ही गया है। चंदे के नाम पर अधिकांश धूर्त अपनी दुकानदारी चला रहे है। मैने अपने 60 वर्षो के कार्यकाल मे अपने रामानुजगंज शहर मे जब भी चंदा करने वालो के कार्य का आकलन किया तो एक दो सामाजिक संस्थाओ को छोडकर बाकी सब जगह आर्थिक घपला मिला चाहे वह यज्ञ के नाम पर होता हो या मंदिर या पूजा के नाम पर । यहां तक कि राष्टीय सुरक्षा के नाम पर भी किये गये धन संग्रह मे कई प्रकार की गडबडी प्रमाणित हो गई । अच्छी अच्छी नामी संस्थाओ के नाम पर भी होने वाले धन संग्रह मे भ्रष्टाचार प्रमाणित हुआ। सरकारें जो टैक्स के रूप मे चंदा लेती है उनमे भ्रष्टाचार तो जग जाहिर है। इसी तरह दान के नाम पर भी दुर्गति देखी जा रही है। बडे बडे मठाधीश आम लोगो को दान के लिये प्रेरित करते है और उस प्राप्त दान का दुरूपयोग करते है। धर्म के नाम पर या समाज सेवा के नाम पर दान मांगना फैशन बन गया है। सिद्धान्त रूप से दान मांगा नही जाता किन्तु वर्तमान समय मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दान मांगने वालो की समाज मे भीड लगी हुई है।
किसी महापुरूष ने कहा था कि जो मागने जाता है वह तो एक प्रकार से मर ही जाता है किन्तु जो मांगने पर भी नही देता उसकी मृत्यु मांगने वाले से भी पहले हो जाती है । आदर्श स्थिति मे इस कहावत का बहुत महत्व है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों मे यह कहावत बहुत अधिक हानिकारक है। हर धूर्त इस कहावत का पूरा पूरा दुरूपयोग करता है । इसलिये किसी अन्य महापुरूष को यह सलाह देनी पडी कि कुपात्र को दिया गया दान दाता को भी नर्क मे ले जाता है। इसका अर्थ हुआ कि दान बहुत ही सोच समझकर दिया जाना चाहिये क्योकि यदि दान का दुरूपयोग हुआ तो उसके पाप मे दान दाता भी हिस्सेदार माना जायेगा। इसी तरह चंदा भी बहुत सोच समझकर ही देना चाहिये। और दिये जाने के बाद उसपर अपनी नजर अवश्य रखनी चाहिये। क्योकि बिना सोचे समझे चंदा देना भी एक प्रकार से असामाजिक तत्वो का प्रोत्साहन माना जायेगा। भीख के मामले मे हम उस समय दया कर सकते है जब कोई अक्षम और अपंग हो और उसके पास अपने भरण पोषण का कोई अन्य मार्ग उपलब्ध न हो । वर्तमान समय मे सरकार सबको भरण पोषण के पर्याप्त साधन उपलब्ध करा रही है। मै नही समझता कि ऐसी परिस्थिति मे भीख मांगने का भी कोई औचित्य बचा है। दान चंदा या भीख न देना उतना हानिकर नही है जितना गलत व्यक्ति को देना। सरकार के टैक्स के मामले मे भी सतर्क रहने की आवश्यकता है । सरकारे मनमाना टैक्स लगाकर उसका भरपूर दुरूपयोग कर रही है। कोई ऐसी व्यवस्था सोची जानी चाहिये जिसमे सरकारी टैक्स पर भी कुछ अंकुश लग सके।
आजकल तो मतदान को भी दान कहकर प्रचारित किया जा रहा है। सिद्धान्त रूप से दान मांगा नही जाता किन्तु वोट के भिखारी दिन रात वोट मांगते भी है और उसे दान भी कहते है। वोट न तो दान है न ही भीख है । उसे आप चंदे की श्रेणी मे रख सकते है। मतदान का भी पूरा पूरा दुरूपयोग हो रहा है । इसे भी एक व्यवसाय बना दिया गया है। मेरा सुझाव है कि दान बहुत सोच समझकर दिया जाना चाहिये। दान और भीख की तुलना मे चंदा लेना देना अधिक घातक सिद्ध हो रहा है। चंदे का धंधा दान की प्रवृत्ति को भी निरूत्साहित कर रहा है। चंदा मांगना एक बुरी आदत है किन्तु बहुत बडे बडे लोग भी चंदा मांगकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते है। कहते है मालवीय जी ने चंदे के माध्यम से बनारस हिन्दू विश्व विधालय खडा कर दिया। यह बात सच होते हुए भी मै किसी भी प्रकार के चंदा लेने और देने के विरूद्ध हॅू क्योकि चंदा का कोई न तो हिसाब किताब रखा जाता है न ही किसी को दिखाया जाता है। यदि किसी कार्य के लिये धन संग्रह आवश्यक है और उसमे कोई घपला नही करना है तो उसे अधिकतम पारदर्शी होना चाहिये। साथ ही ऐसा धन संग्रह सिर्फ सहमत और सम्बंद्ध लोगो के बीच ही हो सकता है। दूसरे लोगो से नही मांगा जा सकता। वर्तमान समय मे दान चंदा और भीख के नाम पर जो खरपतवार खेतो मे पैदा हो गये है इन सबको नष्ट करने के लिये एक बार पूरे खेत की जुताई कर दी जाये और कोई बहुत आवश्यक पौधा हो तो उसे ही सुरक्षित रखा जाये । याद रखिये कि दान चंदा या भीख का दुरूपयोग आपके लिये भी घातक है और समाज के लिये भी ।

मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार

Posted By: kaashindia on March 5, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।
1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।
2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस इकाई के प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता अनिवार्य होती है। इकाई के सब लोग मिलकर भी किसी व्यक्ति को संविधान निर्माण से अलग नहीं रख सकते।
3. व्यवस्था चाहे कोई भी हो, कैसी भी हो, किन्तु वह संविधान के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।
4. वर्तमान समय में लोकतंत्र सबसे कम बुरी व्यवस्था है। इसे लोकस्वराज की दिशा में जाना चाहिए।
5. प्रत्येक व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकार होते हैं। इन अधिकारों को उसकी सहमति के बिना संविधान भी नहीं छीन सकता।
6. किसी भी संविधान में सर्वसम्मति से भी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी दीर्घकालिक कटौती का नियम नहीं बन सकता।
7. व्यक्ति समूह अर्थात समाज के अनुसार व्यवस्था कार्य करने के लिए बाध्य होती है और व्यवस्था के अनुसार व्यक्ति बाध्य होता है। व्यक्ति और व्यक्ति समूह के
बीच अंतर करना आवश्यक है।
8 संविधान व्यक्तियों की अपेक्षा सर्वोच्च होता है किन्तु व्यक्ति समूह की तुलना में सर्वोच्च नहीं होता। व्यक्ति समूह सर्वोच्च होता है। जब भारत का संविधान बन रहा था उस समय भी यह चर्चा मजबूती से उठी थी कि मतदान का अधिकार सिर्फ योग्य लोगों तक सीमित होना चाहिए और योग्यता का कोई एक मापदंड बनना चाहिए। अशिक्षित, अयोग्य, पागल या अपराधी यदि मतदान करेंगे तो संपूर्ण राष्ट्रीय व्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव निश्चित है। इस प्रकार का तर्क देने वालों में सरदार पटेल प्रमुख व्यक्ति थे। दूसरी ओर एक पक्ष ऐसा था जो बालिग मताधिकार का पक्षधर था और प्रत्येक व्यक्ति को व्यवस्था में समान रूप से भागीदार बनाना चाहता था चाहे किसी मापदंड के आधार पर अयोग्य ही क्यों न हो। इस पक्ष के प्रमुख पैरवीकार पंडित नेहरू को माना जाता है। बालिग मताधिकार को स्वीकार करते हुए सीमित मताधिकार की मांग छोड दी गई फिर भी कभी-कभी इस तरह की मांग उठती रहती है और अब तक उठ रही है। यदि मताधिकार के लिए किसी योग्यता को आधार बनाया गया तो सबसे पहला प्रश्न यह खडा होता है कि इस आधार को बनाने का निर्णय कौन-सी इकाई करेगी और उस इकाई के चयन में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका होगी या नहीं। यदि इस इकाई ने गलत निर्णय लिए तो उसकी समीक्षा कौन करेगा? जो भी सर्वोच्च इकाई होगी उस सर्वोच्च इकाई के निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति भूमिका ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में संविधान का शासन होता है शासन का संविधान नहीं। संपूर्ण राजनैतिक व्यवस्था एक संविधान के द्वारा संचालित होती है और संविधान से उपर लोक होता है। जिसका अर्थ होता है भारत के प्रत्येक नागरिक का संयुक्त समूह। इस संविधान निर्माण या संशोधन से किसी भी नागरिक को अलग नहीं किया जा सकता चाहे वह कोई भी हो क्योंकि प्राकृतिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, समान स्वतंत्रता प्राप्त है और वह व्यक्ति मतदान द्वारा अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान में शामिल करके स्वयं को व्यक्ति से नागरिक घोषित करता है। यह सारा कार्य उसकी सहमति से होता है। तर्क दिया जाता है कि अशिक्षित लोग जब संविधान और व्यवस्था का अर्थ ही नहीं जानते तो उनके वोट देने का क्या लाभ है। ऐसे लोग किसी भी रुप में बहकाये जा सकते हैं जिसका दुष्परिणाम सब को भोगना पड़ता है। प्रश्न महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे लोग बहकाये जा सकते हैं किंतु एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा होता है कि यदि बहकाने की क्षमता रखने वाले लोग ही सर्वशक्तिमान हो जाए तब समाज का क्या होगा। जिनकी नीयत पर संदेह है उन्हें सारी शक्ति नहीं दी जा सकती। लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका के बीच भिन्न प्रकार की योग्यताओं का समन्वय होना चाहिए। विधायिका में सम्मिलित लोग सिर्फ संविधान और कानून बनाते हैं किंतु क्रियान्वित नहीं कर सकते इसलिए उनकी नीयत पर विश्वास अधिक महत्व रखता है। कार्यक्षमता कम महत्व की मानी जाती है। कार्यपालिका के लोगों की कार्यक्षमता विशेष महत्व रखती है। नीयत का कम महत्व माना जाता है। यदि विधायिका के चयन में भी कार्यपालिका के समान ही नीयत की तुलना में कार्यक्षमता को अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया तब चेक एंड बैलेंस का महत्व समाप्त हो जाएगा। हरियाणा सरकार तथा अन्य कई प्रदेशों में विधायकों के लिए न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान लागू किया गया है। यह प्रावधान पूरी तरह गलत है क्योंकि विधायिका सिर्फ कानून बनाने वाली इकाई है, क्रियान्वित करने वाली नहीं। विधायिका की नीयत सर्वोच्च मापदंड है कार्यक्षमता नहीं। यदि शिक्षा को मापदंड घोषित किया गया तब कबीर दास कभी विधायक या विधायिका के आगे नहीं बन सकते। यह भी साफ दिख रहा है कि समाज को बहकाने और ठगने में शिक्षित लोग अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे चालाक और धूर्त नीयत के लोगों को विधायिका में पहुॅचने की प्राथमिकता पूरी तरह घातक सिद्ध होगी। अब तक भारत में बालिग मताधिकार की छूट दी गई है। पागल को मताधिकार से वंचित किया गया है। अपराधी को भी चुनाव लड़ने से रोका गया है। मेरे विचार से यह सारे नियम आकर्षक दिखते हैं किंतु न्याय संगत नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त है चाहे वह पागल और अपराधी क्यों ना हो। कल्पना करिए कि यदि कुछ डॉक्टरों ने मिलकर किसी व्यक्ति को षड्यंत्र पूर्वक पागल घोषित कर दिया तब क्या उसकी स्वतंत्रता छीन ली जाएगी और ऐसी स्वतंत्रता छीनने का नियम कानून बनाने की व्यवस्था से भी उसे बाहर कर दिया जाएगा। बालिग मताधिकार भी क्यों न्याय संगत माना जाए? क्यों नहीं जन्म लेते ही मत का अधिकार दे दिया जाए। हो सकता है यह आंशिक रूप से अव्यावहारिक लगे किंतु इसका कोई बहुत बड़ा दुष्प्रभाव नहीं हो सकता। हो सकता है कि इस तरह की प्रणाली कुछ अधिक खर्चीली हो किंतु यह मताधिकार सर्वोच्च व्यवस्था अर्थात संविधान के लिए होता है, न कि सरकार के लिए। सरकार के लिए तो प्रति 5 वर्ष में चुनाव करा सकते हैं और उसके लिए मतदान के नियम अलग तरह के भी बना सकते हैं किंतु संविधान निर्माण अथवा संविधान संशोधन के लिए आप किसी व्यक्ति को मतदान से वंचित नहीं कर सकते। भारत में संविधान निर्माण और संशोधन में भी विधायिका की अंतिम भूमिका होती है इसलिए आवश्यक है कि चुनावों में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता पूर्वक भाग लेने का अधिकार दिया जाए। यदि आपने मतदाताओं की क्षमता पर संदेह व्यक्त किया तो यह उचित नहीं। भारत का मतदाता किसी अपराधी, पागल व विदेशी को योग्य मानता हैं तब मतदाताओं की इच्छा को ही सर्वोच्च सक्षम मापदंड मानना चाहिए। मतदाताओं की इच्छा और क्षमता के उपर कोई अन्य नियम कानून या मापदंड नहीं बनाया जा सकता। यदि आप मतदाताओं की योग्यता का कोई भी मापदंड बनाते हैं तो वह पूरी तरह गलत होगा और भविष्य में इसका दुरुपयोग भी हो सकता है। हो सकता है कि उसका दुरूपयोग कभी लोकतंत्र को तानाशाही में बदल दे और आप इसे किसी भी रुप में न रोक सके। मैं तो इस मत का हूं कि सारी दुनियां के संचालन के लिए ऐसा संविधान बनना चाहिए जिसके बनाने में दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका हो अर्थात 6 अरब व्यक्ति मतदान द्वारा ऐसा संविधान बना सके। इस संविधान के आधार पर ही विश्व सरकार की कल्पना की जा सकती है जो सिर्फ राष्ट्रो का ही प्रतिनिधित्व नहीं करेगी बल्कि व्यक्ति से लेकर विश्व तक के बीच कार्य कर रही इकाईयों का संघ होगी। इसका अर्थ हुआ कि विष्व व्यवस्था एक अरब परिवारो, कुछ करोड गांवो और इसी तरह प्रदेशो और राष्ट्रो का संघ होगी। ऐसी व्यवस्था में नीचे से लेकर ऊपर तक बने हुए छोटे से बड़े सभी संविधानों की व्यवस्था का समावेश होगा। मैं स्पष्ट हूं कि मताधिकार को सीमित करने की मांग बहुत ही खतरनाक है और ऐसे प्रयत्न को पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए। मंथन का अगला विषय: दान, चंदा और भीख का फर्क

मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’

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कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं।

  1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।
  2. जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असंगठितों को अलग-अलग दबाते हैं या ठगते हैं और कभी इन असंगठितों को संगठित के रूप में ऐसा आभास हो जाता है तो संगठित अल्पसंख्यक लंबे समय के लिए अविश्वसनीय हो जाते हैं।
  3. असंगठित विश्व से संगठन की ताकत पर निरंतर लाभ उठाने वाला इस्लाम पूरी दुनियां में एक साथ अविश्वसनीय हो गया है।
  4. कोई भी व्यक्ति, व्यक्ति समूह या संगठन किसी विवाद के निपटारे के लिए सामाजिक न्याय या बल प्रयोग में से एक का ही सहारा ले सकता हैं दोनों का नहीं।
  5. भारत के 70 वर्षों के शासनकालों में अल्पसंख्यकों और सत्तारूढ़ो के बीच अघोषित समझौता होने के कारण कश्मीर समस्या फलती-फूलती रही।
  6. कश्मीर के संबंध में भारतीय मुसलमानों के बहुमत की निष्ठा या तो निष्क्रियता रही है या संदेहात्मक।
  7. भारत का मुसलमान भी दुनियां के मुसलमानों की तरह ही राष्ट्र की तुलना में संगठन को अधिक महत्वपूर्ण मानता है।
  8. यदि किसी अन्यायी के साथ कोई अन्य अन्याय करता है तो या तो हमें चुप रहना चाहिए या कमजोरों का साथ देना चाहिए। न्याय-अन्याय महत्वपूर्ण नहीं।
    कश्मीर समस्या का पुराना इतिहास रहा है। भारत के मुस्लिम बहुमत ने धर्म के आधार पर भारत के विभाजन की जिद्द की जिसे अंग्रेजों ने मान लिया। जहां-जहां अंग्रेजों का प्रत्यक्ष शासन था उन क्षेत्रों को भारत व पाकिस्तान में धर्म के आधार पर बांट दिया गया किन्तु जहां-जहां राजा थे उन क्षेत्रों के राजाओं को स्वतंत्र मान लिया गया कि वे भारत में या पाकिस्तान में चाहे तो मिल सकते हैं अन्यथा अलग भी रह सकते हैं। ऐसे करीब 500 स्वतंत्र राज्यों में से कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ को छोड़कर बाकी सबने भारत या पाकिस्तान में से किसी एक का चुनाव कर लिया। यह तीन टाल-मटोल करते रहे। जूनागढ़ पर भारत ने बलपूर्वक कब्जा कर लिया। हैदराबाद की जनता हिंदू थी, राजा मुसलमान। वहां आर्य समाज के नेतृत्व में हिंदुओं ने विद्रोह कर दिया और भारतीय सेना की सहायता से हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। कश्मीर में मुस्लिम बहुमत था और राजा हिंदू था। राजा भी भारत-पाकिस्तान में ना मिलकर स्वतंत्र रहने की सोच रहा था तभी पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और कश्मीर के राजा ने संभावित हार के डर से कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। इस तरह संवैधानिक आधार पर भारत में कश्मीर का विलय हो गया किंतु कुछ भाग पाकिस्तान के कब्जे में था और पाकिस्तान कश्मीर के विलय को मान्यता न देकर युद्धरत रहने का इच्छुक था। इसलिए यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में चला गया और राष्ट्र संघ ने जनमत संग्रह की सलाह दी जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया। उस समय कश्मीर की मुस्लिम आबादी हिन्दु राजा के पक्ष में थी और स्पष्ट दिखता था कि जनमत संग्रह में भारत का पक्ष मजबूत रहेगा। इसी बीच गांधी की हत्या हो जाती है और पाकिस्तान को यह अवसर मिलता है कि वह कश्मीर के मुसलमानों को हिन्दुओं के विरूद्ध लामबंद कर सके। धीरे-धीरे स्थितियॉ बदलती गयीं और जनमत संग्रह टलता गया। पाकिस्तान को चाहिए था कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिक जोर शोर से बात उठाता और उस पर पूरा विश्वास करता किंतु पाकिस्तान ने एक-दूसरा मार्ग भी अपनाया और भारत से बलपूर्वक कश्मीर छीनने का प्रयास किया। यहॉ से विश्व जनमत में पाकिस्तान का पक्ष कमजोर हुआ। न पाकिस्तान ताकत के बल पर कुछ हासिल कर पाया न ही विश्व -व्यवस्था के माध्यम से।
    प्रशांत भूषण ने कश्मीर में जनमत संग्रह को न्याय संगत बताया। यह बात न्यायसंगत दिखती भी है किंतु प्रशांत भूषण की आवाज के विरूद्ध देश भर में विपरीत प्रतिक्रिया हुई क्योंकि प्रशांत भूषण तटस्थ व्यक्ति न माने जाकर वामपंथी अल्पसंख्यक पक्ष के वकील के रूप में माने जाते है। साथ ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कश्मीर समस्या दो देशो के बीच कोई बार्डर समस्या नहीं है बल्कि एक मुस्लिम विस्तारवादी संस्कृति से अन्य संस्कृतियों की सुरक्षा का प्रश्न है। मुसलमान जहॉ बहुमत में होता है वहॉ शरीया का शासन लागू करता है और जहॉ अल्पमत में होता है वहॉ या तो बराबरी का व्यवहार चाहता है या न्याय संगत। भारत अकेला ऐसा देश है जहॉ का मुसलमान अल्पसंख्यक होते हुए भी अपने लिए विशेषाधिकार की सुविधा प्राप्त करता रहा और संवैधानिक आधार पर प्राप्त सुविधाओं से हिन्दुओं को दुसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा। स्वाभाविक था कि कश्मीर के मुसलमानों का भी हौसला बढता रहा और वे भी उस दिन की प्रतीक्षा करते रहे जब भारत दारूल इस्लाम बन जायेगा। इस दारूल इस्लाम के संघर्ष में भले ही पाकिस्तान कश्मीरी मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष दिखता हो किन्तु कश्मीरियों को दुनियां भर के सांप्रदायिक मुसलमानों की सहानुभूति मिलती रही। मैं आपको स्पष्ट कर दूॅ कि मुस्लिम देश सांप्रदायिक नहीं होते है बल्कि सांप्रदायिक भावना व्यक्तिओं में होती है और वहीं सांप्रदायिक भावना संगठित होकर राष्ट्र की पहचान बन जाती है। यदि कोई मुस्लिम बहुल देश आम मुस्लिम धारणा के विरूद्ध न्याय की बात करने लगे तो वह लम्बे समय तक नहीं टिक पाता। भले ही राजनैतिक परिस्थितिओं के कारण बहुत से मुस्लिम देश भारत के पक्ष में रहे किन्तु उन देशो के कट्टरवादी मुसलमानों की सहानुभूति व सक्रियता कश्मीर के मामलों में भारत के विरूद्ध रही। 1500 वर्षो में आम मुसलमानों के बीच यह धारणा मजबूती से स्थापित है कि वे यदि टकराते रहेंगे तो अंतिम लडाई वहीं जीतेगे क्योंकि खुदा उनके साथ है। न्याय-अन्याय अथवा सामाजिक सोच उनके लिए कोई मतलब नहीं रखती। यही कारण है कि दुनियां के अन्य समूह लम्बे समय तक लडने के बाद हित-अहित का ऑकलन करते है और लडाई छोड देते है किन्तु मुस्लिम समूह बर्बाद होने तक भी लडते रहते है क्योंकि उन्हें विश्वास है कि जीतेगें वही। प्रशांत भूषण को यह बात समझनी चाहिए थी कि कश्मीर समस्या न तो बार्डर समस्या है न ही न्याय-अन्याय से जुडा कोई मामला। यदि कश्मीर पाकिस्तान को दे दिया जाए तब भी किसी समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि लडाई दारूल इस्लाम की धारणा से है। युद्ध का नया मैदान या तो कश्मीर से हटकर पंजाब की ओर बढ जायेगा अथवा आसाम में नया मोर्चा खुल जायेगा। जब युद्ध होना निश्चित ही है तब कश्मीर में न्याय-अन्याय की बात करना एक आत्मघाती और मूर्खतापूर्ण कदम होगा। 70 वर्षो तक भारत ने तृष्टिकरण का राजनैतिक खेल खेलकर कश्मीर समस्याओं को मजबूत होने दिया। अब ऐसी भूल नहीं दोहरानी चाहिए।
    सारी दुनियां के लिए कश्मीर एक लिटमस टेस्ट की तरह है। आजतक दुनियां में मुसलमानों ने कहीं भी हार नहीं मानी भले ही कितना भी लम्बा युद्ध क्यों न चला हो। कश्मीर में उनके अस्तित्व की लडाई है। यहॉ का वातावरण उनके लिए परिस्थितियों के विपरीत है। दुनियां भर में उनकी विश्वसनीयता घट रही है। राजनैतिक समीकरण उनके विरूद्ध जा रहे है। मुस्लिम देश आम मुस्लिम धारणाओं के विपरीत आपस में ही बंटे हुए है। ऐसी स्थिति में उनके समक्ष कश्मीर में हार जाने का खतरा मंडरा रहा है। यदि कश्मीर में वे हार मानकर सहजीवन स्वीकार कर लेते है तो उनका 1400 वर्षों का विश्वास चूर-चूर हो जायेगा कि खुदा उनके साथ है और अंतिम विजय उनकी होगी। दूसरी ओर भारत में आबादी की दृष्टि से भी वे बहुत कम है और सरकार भी अब बदल गयी है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के मुसलमानों में भी बहुत बडा वर्ग अब सहजीवन की आवष्यकताओं को भी समझने लगा है। वह मानने लगा है कि उसे भारत में ही रहना है और कश्मीर के नाम पर किसी प्रकार का विवाद न ही न्यायसंगत है न ही उसके हित में है। ऐसे बदले वातावरण में अब कुछ सांप्रदायिक तत्व बातचीत से समाधान की वकालत करते दिखते है। स्पष्ट मानिए कि जो लोग बातचीत से कष्मीर समस्या का समाधान करने की बात करते है वे पूरी तरह गलत है और निराश भी है। उन्हें साफ-साफ दिख रहा है कि कष्मीर की लडाई में भारत पक्ष सब ओर मजबूत हो रहा है और बातचीत का कोई मार्ग ही कुछ उम्मीद जिंदा रख सकता है।
    कष्मीर समस्या भारत की बडी समस्या है क्योंकि सारी दुनियां की शाति का भविष्य कश्मीर पर टिका हैं। जो लोग कश्मीर में अब भी भारत के विरूद्ध टकराव की उम्मीद लगाये बैठे है ऐसे लोगों को न्याय-अन्याय की परवाह किए बिना नष्ट कर देने का प्रयत्न कर देना चाहिए। जो लोग कश्मीर में शांति पूर्ण वार्ता की वकालत करते है ऐसे लोगों का सामाजिक बाहिष्कार होना चाहिए। साथ ही भारत के जो मुसलमान कश्मीर मामले में अब भी चुप है उन्हें खुलकर भारत के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। कष्मीर तो भारत में ही रहेगा। कहीं ऐसा न हो कि कश्मीर को ले जाते-ले जाते कुछ ओर भी क्षेत्र भारत में शामिल न हो जाये।
    मंथन का अगला विषय बालिग मताधिकार होगा

मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा

Posted By: kaashindia on March 3, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धांत है

अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अहिंसा सर्व श्रेष्ठ धर्म माना गया है। धर्म की रक्षा करना राज्य का दायित्व होता है न कि धर्म पर आचरण करना। अहिंसा और कायरता मे बहुत फर्क होता है । हर कायर अपने को अहिंसक मानने की भूल करता है। बुद्ध और महावीर के पहले भारत मे अहिंसा और हिंसा के बीच सामाजिक संतुलन था। राज्य को छोडकर शेष पूरा समाज पूरी तरह अहिंसा का पक्षधर था। किसी भी प्रकार की हिंसा की न आवश्यकता थी न ही उसे नैतिक मार्ग माना जाता था। राज्य अहिंसक समाज रचना के लिये आवश्यक हिंसा करना अपना दायित्व समझता था। यह अलग बात है कि अलग अलग राज्य अपना कर्तब्य छोडकर आपस मे हिंसक टकराव शुरू कर देते थे जिसका परिणाम हमेशा बुरा होता था। बुद्ध और महावीर ने हिंसा और अहिंसा के बीच के संतुलन को बिगाडा। उन्होंने अहिंसा को मार्ग की जगह लक्ष्य मान लिया। इसका परिणाम हुआ कि राज्य मे उचित अनुचित का भ्रम पैदा हुआ और समाज में संतुलन की जगह कायरता का विकास हुआ। दुनियां के अन्य देशो में यहूदी हिंसा और अंहिसा के बीच सुतुलित थे। लेकिन ईशु मसिंह ने अहिंसा के पक्ष मे संतुलन बिगाडा। उसके बाद इस्लाम का उदय हुआ और इस्लाम नें एक पक्षीय अहिंसा के विरूद्ध एक पक्षीय हिंसा का समर्थन कर दिया। बुद्ध, महावीर और यीशु मसीह की कायरता प्रधान शिक्षाओ के परिणाम स्वरूप इस्लाम सारी दुनियां में बहुत तेजी से आगे बढा।
इस्लाम के विस्तार की चपेट में भारत भी आया और भारत कई सौ वर्षो तक विदेशीयों का गुलाम बना रहा। स्वतंत्रता के लिये भारत में दो मार्ग शुरू हुए उनमें भी सन 1857 से लेकर 1947 तक के 90 वर्षो मे अनवरत चले हिंसक मार्ग ने कोई सफलता नही की। दूसरी ओर गांधी के अहिंसक मार्ग ने बीस तीस वर्षो मे ही सफलता कर ली क्योकि भारत की गुलामी लोक तांत्रिक और अहिंसक अंग्रेजो के पास थी। यदि यह गुलामी मुसलमानो या साम्यवादियों की रही होती तो गांधी मार्ग किसी भी रूप मे सफल नही हो पाता।
शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिये राज्य को कभी भी अहिंसा को अपना मार्ग नही मानना चाहिये । यदि राज्य ऐसी भूल करता है तो उसके दुष्परिणाम होते है और समाज मे हिंसा की आवश्यकता बढती चली जाती है। स्वतंत्रता के समय गांधी हत्या के बाद गांधीवादियों ने भूल से अहिंसा को मार्ग की जगह लक्ष्य मान लिया। इसका अर्थ हुआ कि राज्य को भी उचित की जगह न्यूनतम हिंसा का उपयोग करना चाहिये। मार्ग को लक्ष्य मानने की गांधीवादी भूल का लाभ उठाया संघ परिवार ने, साम्यवादियों और कटटरपंथी मुसलमानो ने। इन तीनो ने मिलकर समाज मे हिंसा की आवश्यकता की भूख पैदा की। अहिंसा की पक्षधर गांधीवादी सरकारे अराजकता को नही रोक सकी। परिणाम स्वरूप समाज मे अराजकता से निपटने के लिये एक ऐसे राज्य की आवश्यकता महसूस की गयी जो अहिंसा की सुरक्षा के लिये हिंसा को एक उचित मार्ग मानता हो। हमे इस मामले मे नरेन्द्र मोदी से अधिक अच्छा व्यक्ति कोई नही मिला। परिणाम आज सबके सामने है।
जब भी संगठित हिंसा के विरूद्ध कायरता उबाल खाती है तो क्षणिक हिंसा का आक्रोश प्रकट होता है। भारत मे सिखो ने जब ऐसी ही भूल की तो देश भर मे ऐसा ही क्षणिक उबाल आया और हजारो निर्दोष सिख मारे गये। जब गोधरा कांड के समय ऐसा ही उबाल आया तो नरेन्द्र मोदी ने उसका नेतृत्व किया और हजारो निर्दोष मुसलमान मारे गये । लगता था कि इन घटनाओ से इन दोनो संगठनो पर दीर्घकालिक प्रभाव होगा और वे समाज मे सहजीवन और अहिंसा का महत्व समझेगे। लेकिन अब भी ऐसे कोई सुधार या पश्चाताप के लक्षण नही दिख रहे है भले ही परिस्थितियो की प्रतीक्षा क्यो न की जा रही हो।
इसके पूर्व भी नागासाकी और हिरोसिमा मे निर्दोष लाखो लोग मारे जा चुके है। आज तक यह तय नही हो पाया कि उन हत्याओ मे अमेरिका गलत था। साथ ही मुझे तो व्यक्तिगत रूप से महसूस होता है कि अमेरिका के पास उसके अतिरिक्त कोइ्र अन्य विकल्प नही था क्योकि अहिंसा की स्थापना के लिये समुचित बल प्रयोग करना उचित होता है और अमेरिका ने वह किया। यह अलग बात है कि अमेरिका के इस बर्बर आक्रमण से दुनियां ने सीख ली किन्तु अब भी भारत के सिख और मुसलमान अपनी दुविधा से दूर नही हो पा रहे है। उन्हे यह दुविधा दूर करके सहजीवन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करनी चाहिये । समाज मे हिंसा और संगठन का कोई औचित्य नही है और राज्य व्यवस्था मे अहिंसा का कोई औचित्य नही है । दोनो को अपनी अपनी सीमाए समझनी चाहिये । दोनो का घालमेल उचित नही। संघ परिवार मे हिंसा और अहिंसा के मामले मे मुसलमानो और साम्यवादियो के समान ही विचार रखता है। स्पष्ट है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था अहिंसा की जगह कायरता के रूप मे दिखती है। हिंसा समर्थक सभी संगठनो से एक साथ निपटना समाज के लिये कठिन है। इसलिये शत्रु का शत्रु मित्र होता है इस आधार पर अल्पकाल के लिये दो दिशाओ मे धु्रवीकरण हो रहा है । एक तरफ संघ परिवार के विरूद्ध संगठित इस्लाम और साम्यवाद है तो दूसरी तरफ है संगठित इस्लाम और साम्यवाद के विरूद्ध संगठित हिन्दुत्व जिसे हम संघ परिवार कहते है। मै तो पूरी तरह अहिंसा का पक्षधर हॅू और राज्य को अहिंसा से दूरी बनानी चाहिये । मै चाहता हूू कि वैचारिक तथा सामाजिक धरातल पर किसी भी प्रकार की हिंसक विचार धारा का विरोध करना चाहिये और राजनैतिक धरातल पर हिंसक प्रवृत्तियो के कुचलने के लिये किसी भी सीमा तक राज्य को मजबूत होना चाहिये। अहिंसा परम धर्म है और इस परम धर्म को परम धर्म के रूप मे स्थापित होना चाहिये। इस धार्मिक कार्य मे हम सबकी सह भागिता आवश्यक है।

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